लघुकथा: गरमाहट

अंजु लता सिंह
लाइब्रेरी में काफी देर से  पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखें बंद सी हो रही थीं। मेरे आसपास  बैठी कुछ  लेडी-टीचर्स घरेलू नौकरों और कामवाली बाइयों के नखरों और उनके दिनोंदिन बिगड़ते जा रहे व्यवहार का जिक्र करने में मशगूल थीं। मेरा मन भी घबराने सा लगा था जब मिसेज वर्मा ने अचानक मुझसे कहा, "अरी, नीता! तेरे बेटे को लेकर वो तेरी कल्लो सी मेड भी गली-गली घूमती रहती है रे। किसी दिन लेकर न भाग जाए तेरे चांद से गोरे चिट्टे पुत्तर को... जरा सावधान रहियो हुँह..."

"नहीं रे! बहुत देखभाल  की है शोभा ने हमारे बेटे की। पता है जब सोनू सात महीने का था तो उसकी कमर के नीचे एक फोड़ा हुआ था। गरम पानी से सिकाई करना, दवा लगाना, नैपी बदलना... उसकी सेवा तो मेरे लिये अनमोल है। भूल ही नहीं सकती जी"

"तो क्या ढेर रोकड़ा भी तो लेती है होगी रे। मुझे क्या, मैं तो बस  बात कह रही थी... बाकी तुम जानो।"
छुट्टी की घंटी बजते ही मैंने तेजी से कार स्टार्ट की। रवि तो उम्र से पहले ही बच्चों को प्ले स्कूल में डालने के सख्त खिलाफ थे, पर अब तो शायद... सोचते हुए मेरे सिर में  तेज दर्द होने लगा था। जैसे ही मैं गाड़ी  से उतरी तो गली का दृश्य देखकर बुत सी बनी खड़ी रह गई।

बेबाक बोलने वाली चुगलखोर और लड़ाका पड़ोसन मीरा के बाल खींचते हुए उसे जमीन पर पटककर शोभा चीखे चली जा रही थी, "बोल... बोल... बोल दे जरा फिर से... क्या कहा तूने मेरे और साब के बारे में? बोल आज? यहीं तेरा फैसला करती हूँ" जमीन पर औंधी सी पड़ी  महिला की गर्दन पकड़कर वह फिर चीखी, "नउकरी करते हैं... गरीब हैं... पइसे वाले नहीं। तो क्या? ढोंग नई करते... बाप समान हैं मेरे लिये सा आ आ ब... तुम कोठी वाले रिश्ता पइसे से जोड़ते जी... बोला तो कइसे... इतना गंदी बात... बता मेरको... छोड़ेगी नई ... स्सा ल... इइइइइ"
इससे पहले कि वह  आवेश में आकर कोई और भद्दी गाली मुँह से निकाले या गलत बात कहे, मैंने उसे बगल में लेकर  पुचकारते हुए कमरे के भीतर जोर से खींचकर कहा, "चल... आजा शोभा! चुप हो जा... आ, भीतर आकर बता हुआ क्या आखिर?"

"मैडम! ये गंदी सोच रखती मन में मेरे लिये... पूरी गली में अंट शंट बकतीच... मैं इसको छोड़ेगी नहीं... जाने क्या गंद बकती फिरती है पूरा गली मुहल्ला में। मोनू सोनू बाबा हमारा बच्चा है मैडम... बचपन से हम उनको  कितना प्यार किया है। ये कुँवारी बुड्ढी क्या जाने, क्या होताइच प्यार... अपना घर तो बसाया नहीं... दूसरे का उजाड़ने का..." बुरी तरह रोते हुए वह लिपट गई थी मुझसे।

मैंने अपना पर्स साइड में रखकर दोनों हाथों से उसे संभाला और उसके सिर पर अपना ममता भरा हाथ फेरकर उसे ढाढस बंधाया।

"आपको तो पता है ना मैडम, हम कइसे हैं? हमारा भी बेटा है पर नसीब  खोटा निकला मेरा। छीन लिया दुष्टों ने... मेरी गोद भी भरी थी कान्हा ने। ठंडी की रात में पीकर इतना मारा... इतना मारा मुझे। मैं खुदई छोड़कर भाग आई थी दिल्ली... देवता समान आप लोग मिल गए। नहीं तो हम तो कबके मर गए  होते मैडम!" वह लगातार  रोए जा रही थी। बड़ी  मुश्किल  से चुप करा सकी उसे। मैंने उसे  ठंडा पानी पिलाते हुए उसकी सभी बातों के लिये स्वीकृति में सिर हिलाया।

बाहर सर्दी बढ़ने लगी थी वह सुबकते हुए सोनू की दूध की बोतल साफ करने लगी थी।

सोनू उठ गया था शायद। पालने से उठाकर मैंने उसे सीने से चिपका लिया... पर वह तो चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था। ये क्या? लंबे हाथ करके शोभा ने ज्यों ही गोद में लिया, जनाब टा-टा-टा-टा करने लगे नन्हे-नन्हे हाथों से।

मुझे अनजान  रिश्तों की गरमाहट और मजबूती का बखूबी अहसास हो रहा था आज।

1 comment :

  1. अच्‍छी है, पर बीच में उलझ गई है।

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