कविताएँ: प्रगति गुप्ता

प्रगति गुप्ता

अनकही व्यथा सुमन की

हर बार बाट
जोहती हूँ तुम्हारी, और
तुम मुझसे ओझल ही रहते हो
जाने मुझ से,
छिप-छिपकर तुम
किस-किस से मिला करते हो
बांध सका न प्रेम मेरा तुमको,
तभी तो स्वछन्द,
रहने को हरदम हरपल
मचला करते हो
तुम्हारी फितरत कुछ-कुछ
उस भंवरे जैसी है,
जो स्पर्श कर,
मेरे जैसे हर सुमन का
कभी इस पर तो कभी उस पर
भुनभुन करता उड़ता है।
हर सुमन की सुवास लेकर भी
ह्रदय उसका, नही भरता है
अपनी इसी भुनभुन के स्वरों के बीच
कब वह दिल से,
सुमन की पीड़ा को सुनता है
भटकन ही जब आदत बन जाए,
तो क्षणिक सुख ही आते जाते हैं,
जिसे बाट जोहनी पड़े
किसी की, उसी को,
कमी के एहसास बांध पाते हैं।
------------

सांध्य समर्पण

संध्या तू भी
कितनी मतवाली है
स्वागत करने
सूर्य और चंद्र का
दोनों काल चली आती है
ठहरती नहीं दोनों में से
साथ किसी के, बस सुपुर्द कर
सूरज को सुबह और
चांद को घनी रात के हाथ
विदा लालिमा लिए, लिए ही हो जाती है
न कोई शिकायत न कोई शिकन
तेरे माथे पर कभी नज़र आती है,
जिस खूबसूरती से
उतरती है संध्या प्रकृति के गोद तले
तनिक विश्राम कर वहीं
शान्त भाव से उतर गोद से
वह चली जाती है
संध्या तू भी कितनी मतवाली है
स्वागत करने सूर्य और चन्द्र का
दोनों काल चली आती है।
-------------
     

गिरगिट

रिश्तों की हकीक़तो को
बहुत करीब़ से महसूस करते चलिए
जब तक गति है
बराबर आदान-प्रदान की
ये दौड़ते हैं साथ-साथ
और आते ही शिथिलता
तन की या मन की
यह भी सरकते जाते है
मन्द गति के साथ ही
रुपयों का वजन
अगर रिश्ते पर रखा हो
तो सभी कमियां पीछे छूट जाती है,
बस तारीफ़े ही तारीफ़े
जुबाँ से दोहराई जाती हैं
गुमान करना ही है
तो अपनी-अपनी,
करनी को निहारिए
क्योंकि
यहां वक्त नहीं लगता
दूसरों को किनारा करते हुए
यह इंसान ही है
जिसको देखिए हरदम हरपल
गिरगिटों की तरह रंग बदलते हुए।
--------------

मन एक दिल एक

हो रूप, रंग और भाषा
बेशक़, अलग-अलग
मन एक दिल एक
और उनसे  जुड़े भाव एक हैं
जीने से जुड़ी
खुशियां और उदासी एक
जो समझ आ जाए
बगैर कहे बगैर जताये
चाहना दिलों की एक है
तभी तो नयन मिले,
नयनो की कह जाये
मन करे वही,
और मन की सी हो जाये ...
जब दिल पढ़ ले दिल की भाषा
खो जाये दो जन एक दूजे में
बगैर सोचे,
रुप, रंग और भाषा से कुछ भी जुड़ा
वह तो रम जाये
दिल से, दिल की कह
दिल को सुने सा।
जो बाहर से दिख रहा
वो कब और कहाँ, मायने रखता
दिल और मन जब एक दूजे के
भावों को छू लें,
बस रच जाये, कुछ अनूठा
ईश्वर के निमित्त किये सा।
----------------------

प्रतीक्षा         

शिला सी दिखकर भी
भावों से
तिनका-तिनका झरती हूँ मैं
अविचल मौन धारे
जाने कितने आघात सहकर भी
तिनका-तिनका झरती हूँ मैं
शायद गुम हो जाऊँ किसी रोज
ना दिखने को कभी
जाने से पहले,
मूर्तिकार के भावों में समा
उसकी रचना को मूर्त रूप दे
स्वयं ही खो जाऊँगी मैं
प्रतीक्षा मेरी माना कि अनंत है
पर पढ़ेगा मेरे भी
भावों को गढ़ने वाला
देने उसको भी अपनी मूर्ति को
कुछ सजीव से रंग है
करेगा मुझ पर जब वह कठोर प्रहार
सृजक के भावों से जुङ
जीवन्त हो जाऊँगी मैं
तिनका-तिनका बिखर कर भी
भावों से अनंत हो जाऊँगी मैं।
------------------

मौन

मेरे अन्तर से अंत तक की
तेरी मेरी सहयात्रा
उस अनंत सुख की परिभाषा है
जहाँ शब्द बोलकर भी
मौन है और मौन भी
बहुत कुछ बोलता है
क्योंकि
वही मौन तेरे मेरे बीच
इस अतः से अंत तक की
अनंत यात्रा में
स्वतः ही विचरता है
और उस मौन को
मौन ही रहकर पढ़ता है।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।