राजीव तनेजा की फैलसूफ़ियाँ समीर लाल ’समीर’ की नजर से

फैलसूफ़ियाँ

लेखक: राजीव तनेजा
प्रकाशक: अधिकरण प्रकाशन, दिल्ली
ईमेल: adhikaranprakashan@gmail.com
मूल्य: ₹150 रुपये
पृष्ठ: 160, पेपरबैक

समीक्षक: समीर लाल ’समीर’

एक दशक बीते राजीव तनेजा जी से पहली व्यक्तिगत मुलाकात हुए। पहली मुलाकात में मित्र ही नहीं परिवार के सदस्य बन जाने वाली शक्सियत के मालिक यूँ तो मुलाकात में धीर गंभीर ही रहते हैं और रहते भी हमेशा सपत्नीक ही हैं मगर लेखन में हास्य का जो ठहाका रहता है एवं पत्नी को मायके भेजने की आतुरता और हँसते हँसाते किसी विसंगति पर व्यंग्य के हथौड़े से ऐसा प्रहार कि आप थम कर सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि क्या बात कह गये राजीव। उनको पढ़ने का अनुभव उनसे मेरी हर व्यक्तिगत मुलाकात से विपरीत ही रहा है। यह मेरा अपना उनसे 3 से 4 मुलाकातों का अनुभव है, किसी और का कुछ और हो तो पता नहीं।

उनके मेरे ब्लॉग लेखन से संबंध शुरु हुए और पारिवारिक हो गये। राजीव जब शुरुआती दौर में हास्य व्यंग्य पर अपना हाथ साफ कर रहे थे तो हालांकि छोटे छोटे संवादों से लबरेज लेख लिख रहे थे मगर लिखते लिखते भूल जाते थे कि कहीं रुकना भी है। लम्बे-लम्बे आलेख, मगर चूँकि वे बाँधने की क्षमता रखते थे और पाठक उसके बहाव में बहता चला जाता था तो अखरते भी न थे मगर उनको पढ़ने के चक्कर में न जाने कितने अन्य लोगों को हम पढ़ने से वंचित रह जाते थे इसका कोई मलाल न रहता। हालांकि लम्बाई के लिए कई बार उनको टोका मगर जबाब स्माईली से मिला और वो कभी न सुधरे। और वही न सुधरना आज भी उजागर है।


राजीव तनेजा
अब जो उनकी किताब 'फैलसूफ़ियाँ' आई छप कर तो उन्होंने मेरे आग्रह पर कनाडा भेजी। पढ़ा और पाया कि उसमें भी लम्बाई तो अच्छी साधी है मगर लेखनी भी गजब साध ली है इतने सालों में कि पढ़ने बैठे तो पढ़ते ही चले गये। कुछ जगह कुछ ज्यादा लंबाई अखरी भी मगर अधिकतर जगह गुदगुदाती रही तो जब आप एवरेज निकालेंगे तो गुदगुदाना ज्यादा पायेंगे। जैसे इतना लेखन साधा वैसे ही मुझे पूरी उम्मीद है कि आने वाले संग्रहों में लम्बाई नापक संयंत्र या हम जैसे मित्रों को संपादन हेतु साथ टांगे चलेंगे जो खुले आम टोकने का अधिकार रखते हैं तो लम्बाई भी सध ही जायेगी। जबरदस्त संवाद, हास्य, मनोरंजन, व्यंजनायें और कटाक्ष ऐसा कि विसंगतियाँ पनाह मांगें। एकदम रोजमर्रा के चित्र, संवाद और आसपास बिखरी विसंगतियाँ जिन पर हमारी नजर तो रोज जाती हैं मगर उन पर इस तरह लिख पाना सहजता से, शायद राजीव के बस की बात है।

पहले तो कुछ वक्त लगा शीर्षक समझने में मगर शायद राजीव भी जानते थे कि इनके पाठक न समझ पायेंगे इसका अर्थ तो अंत में खुद ही बता दिया है किताब में – फैलसूफियाँ मतलब ऐश करना, तामझाम। मात्र दस कहानियों को समेटने में 160 पन्नों की किताब छप गई। व्यंग्य बिखरा है मगर कुछ और भी गहरा कटाक्ष किया जा सकता था अनेकों जगह, जहाँ बस हास्य और संवाद को महत्व देकर छोड़ दिया है।

खुद को, अपनी पत्नी को और परिवार एवं मित्रों को अपनी रचनाओं को पात्र बना कर लिखने वाले राजीव निश्चित ही पात्रों के चुनाव में समर्थ हैं और सहज ही उचित पात्र इनमें से चुन लेते हैं।

किताब में 'अलख निरंजन', 'काम हो गया, मार दो हथौड़ा', 'व्यथा झोला छाप डॉक्टर की' एवं 'शार्टकट- गाँव से शहर तक' आदि आलेख प्रभावित करते हैं और भविष्य में राजीव से अनेक उम्मीदें बँधवाते हैं। मैं चाहता था कि कुछ हिस्से और संवाद यहाँ दूँ मगर यह उनके अन्य संवादों से नाइंसाफी होगी अतः यह उनके पाठकों पर इस निवेदन के साथ छोड़ता हूँ कि वे इस पुस्तक को बिना किसी पूर्वाग्रह के पढ़ें, निश्चित ही आनंदित होंगे।

वैसे चलते चलते समस्त शुभकामनाओं के साथ एक मशवरा और- पेपर क्वालिटी उम्दा होने के बावजूद कुछ जगह पर इक्का दुक्का मात्राओं की गलतियाँ भी जब किताब में होती हैं तो चुभती हैं, उस पर अगली बार अवश्य ध्यान दें।

अनेक शुभकामनायें राजीव को, उनके परिवार को साधुवाद और एक उम्मीद कि आगे अनेक ऐसे व्यंग्य संग्रह पढ़वायेंगे।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।