संस्कृति व सांस्कृतिक परिवर्तनों का कारणोल्लेख

- मोनिका घुल्ला

शोधार्थी: पंजाब विश्वविद्यालय; सहायक प्रवक्ता: डीएवी कालेज, बठिण्डा


संस्कृति का साधारण अभिप्राय है संस्कार करना या परिमार्जन करना। संस्कारहीन व्यक्ति को समाज में कोई सभ्य नहीं कह सकता। संस्कृति मनुष्य के आचरण और विचारों को उच्च धरातल पर प्रतिष्ठित करती है। संस्कृति का लौकिक पक्ष कर्म व अलौकिक पक्ष कर्म और धर्म दोनों है। संस्कृति मनुष्य के उन व्यापारों, मूल्यों, विश्वासों तथा अभिव्यक्तियों का नाम है जिसे साध्य के रूप में महत्वपूर्ण मानता है। संस्कृति समाज के संरक्षक का कार्य कर मानव विकास की सरणि के कार्य का निर्वहन करती है। संस्कृति के निर्माण का कार्य कोई दस या बीस वर्ष का नहीं होता अपितु सदियों के संपोषण व संरक्षण से इसका निर्माण होता है। संस्कृति के इस संपोषण में सैकड़ों वर्ष लगते हैं और समय-समय पर विविध संस्कारों, मान्यताओं मूल्यों और रीति रिवाजों से छनकर संस्कृति अपना रूप धारण करती है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि अनेक शताब्दियों से एक समाज के लोग जिस तरह खाते पीते, पढ़ते-लिखते, सोचते-समझते, रहते-सहते और मूल्यों, विश्वासों व मान्यताओं को मानते व धर्म-कर्म करते रहते हैं। उन सभी कार्यों के परिणामस्वरूप उनकी संस्कृति का जन्म होता है।

संस्कृति शब्द किसी ठोस यथार्थ वाचक नहीं है अपितु केवल अमूर्त कल्पना है। इसलिए विद्वानों के विचार भी संस्कृति को लेकर अस्पष्ट और विविध है। संस्कृति शब्द सम् व कृ धातु में क्तिन् प्रत्यय के योग से बना है। जिसका अर्थ है सुन्दर बनाने वाली सम्यक् कृति या संस्कार करने की क्रिया है। अंग्रेजी भाषा मे संस्कृति के लिए ‘कलचर’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। विविध विद्वानों ने परिभाषा वैविध्य के माध्यम से संस्कृति के स्वरूप को विश्लेषित करने का सार्थक प्रयास किया है।

 बृहत् हिंदी शब्दकोष के अनुसार -
“संस्कृति वह दृष्टिकोण है जिससे कोई मानव समाज, समुदाय या वर्ग जीवन की समस्याओं पर दृष्टिकोण डालता है”1

 वृहत् हिंदी शब्दकोष के अनुसार -
“संस्कृति सभ्यता का वह स्वरूप है जो आध्यात्मिक एवं मानसिक वैशिष्ट्य का द्योतक होता है।”2

 रायल मानक विशाल हिंदी शब्दकोष के अनुसार -
“संस्कृति शब्द के आचरणगत परम्परा, सभ्यता, निर्माण, पूरा करना, सजावट,  उद्योग, शुद्धि, सुधार, पवित्रीकरण, परिष्कार आदि अर्थ दिए गए है।”3

हिंदी साहित्य कोष के अनुसार -
“संस्कृति” शब्द सम् उपसर्ग के साथ संस्कृत की कृ धातु से बनता है, जिसका मूल अर्थ साम्य या परिष्कृत करना है।आज की हिंदी में यह अंग्रेजी शब्द “कल्चर” का पयार्य माना जाता है। संस्कृति प्रायः उन गुणों का समुदाय समझी जाती है जो व्यक्तित्व को परिष्कृत एवं समृद्ध बनाते है।”4

 श्री परशुराम चतुर्वेदी संस्कृति’ की व्यक्तिपरक एवं समाजपरक व्याख्या करते हुए कहा है -
“संस्कृति शब्द किसी व्यक्ति के पक्ष में बहुधा उसकी शिष्टता, सौजन्यता अथवा मानवता का बोधक होता है और इन गुणों द्वारा उसकी किसी ऐसी स्थायी मनोवृत्ति या ऐसी शील का पता चलता है जिसके कारण वह समाज में स्वभावतः उच्च कोटि का गिना जाता है।”5

 हजारी प्रसाद द्विवेदी संस्कृति को परिभाषित करते हुए कहते है -
“मनुष्य की श्रेष्ठ साधनाएँ ही संस्कृति है”6

 वासुदेवशरण अग्रवाल संस्कृति को व्याख्यायित करते हुए लिखते है -
“संस्कृति मनुष्य के भूत, वर्तमान और भावी जीवन का महत्वपूर्ण प्रकार रही है। हमारे जीवन का ढंग संस्कृति है।संस्कृति हवा में नही रहती, उसका मूर्तिमान रूप होता है। जीवन के नानाविधि रूपों का समुदाय संस्कृति है ।”7

 एस. एम. चाद के अनुसार -
“किसी भी देश जाति अथवा समुदाय विशेष की संस्कृति से अभिप्राय होता है - उस देश, जाति अथवा समुदाय के लोगों के रहन-सहन अथवा जीवन यापन का तरीका है।”8

 बाबू गुलाबराय के अनुसार -
“संस्कृति का क्षेत्र विस्तृत मानते हुए उसके अन्तर्गत साहित्य, संगीत, कला, दर्शन, धर्म, लोक वार्ता तथा राजनीति का समावेश करते है।”9

 विद्वान डा.नगेन्द्र के अनुसार -
“संस्कृति मानव जीवन की वह अवस्था है जहां उसके प्राकृत राग-द्वेषों में परिमार्जन हो जाता है।”10
इस प्रकार विविध परिभाषाओं में दिए गए संस्कृति के अर्थ वैविध्य के आधार पर यह कह सकते है कि संस्कृति से मनुष्य के व्यक्तित्व को सम्पन्न कर उसके स्वरूप को परिष्कृत व परिमार्जित करती है। यह प्रक्रिया  पीढ़ी दर पीढ़ी आगे चलती रहती है। संक्षिप्त रूप में संस्कृति सामाजिक परम्परा से प्राप्त चिंतन, अनुभव, और व्यवहार की समस्त रीतियों की समष्टि है।

संस्कृति में समय-समय पर विविध कारणों से बदलाव आते रहते है। पंजाब की संस्कृति में विविध कारणों से बदलाव होते रहे है। चाहे वह राजनीतिक विद्रूपताओं, सामाज में रूचि परिवर्तन, विभाजन, पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव के कारण या फिर वैज्ञानिक प्रगति के कारण हो। ’जब भी किसी आक्रमणकारी ने भारत पर आक्रमण किया तो सर्वप्रथम पंजाब के लोगों को ही उसका सामना करना पडा जिसके कारण अनेक बार उसने पंजाब की धरती को रौंद कर अपने भीतर के क्रोध को शांत किया। इससे हर बार समूचे देश में से केवल पंजाब के व्यक्ति को ही परिस्थितियों ने प्रभावित किया और उसके जीवन तथा व्यक्तित्व पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। नित्य नवीन संस्कृति से जुड़े लोगों से उलझने मिलने का परिणाम हुआ कि पंजाब के व्यक्तित्व में विशेष प्रकार की लचक आ गई।‘11

इस प्रकार पंजाब की संस्कृति में बदलाव के कारण लचीलापन आ गया है और पंजाबियों ने सहज ही संस्कृति के इस बदलाव को अपनाया है। सांस्कृतिक अन्तराल  व सांस्कृतिक प्रसार संस्कृति परिवर्तन का मुख्य कारण होते है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से संस्कृति दो प्रकार की होती है-भौतिक और अभौतिक तथा जब भौतिक संस्कृति जैसे विज्ञान, तकनीकी विकास, कम्प्यूटर व अन्य संसाधनों में तीव्र गति से विकास होता है, परन्तु अभौतिक संस्कृति जैसे हमारे रीति रिवाज, प्रथाएँ, सामाजिक मूल्य, आदर्श, सामाजिक मान्यताओं में विकास नहीं हो पाता तथा भौतिक संस्कृति, अभौतिक संस्कृति से अधिक तीव्र विकास कर आगे निकल जाती है ऐसी अवस्था आर्गबन के अनुसार  सांस्कृतिक विलम्बना कहलाती है।*12  जो कि सांस्कृतिक अन्तराल का ही दूसरा नाम है। इसके कारण मानव भौतिकतावाद की और अग्रसर हो रहा हैं। वैज्ञानिक प्रगति के कारण भौतिकतावाद को बढावा मिला है। जिसके कारण मानव के नैतिक मूल्यों, आदर्शों का पतन होता जा रहा है व पीढ़ी अन्तराल बढ़ता जा रहा है। सांस्कृतिक प्रसार सांस्कृतिक परिवर्तन की एक प्रक्रिया है। प्रत्येक संस्कृति में ऐसे तत्व तो होते है जो उसकी संस्कृति के विशेष होते है परन्तु ऐसे भी तत्व प्रत्येक संस्कृति में बहुधा रूप में होते है अन्य संस्कृतियों के सम्पर्क में आने से समयानुसार ग्रहण करते रहते है जिसके परिणामस्वरूप संस्कृति में बदलाव होता है। इस प्रक्रिया के दौरान जब किसी संस्कृति की एक इकाई दूसरी किसी अन्य संस्कृति से विश्वास, रीति रिवाज व मूल्य आदि ग्रहण करती है और उनके टकराहट की स्थिति भी बनती है तो इसे सांस्कृतिक प्रसार कहा जाता है। क्रोबर के अनुसार“विभिन्न संस्कृतियों के लोक समूह जब एक-दूसरे के सम्पर्क में आते है तो उनके वास्तविक मूल्यों और रूप विधियों में परिवर्तन हो जाता है। आपसी सम्पर्क के परिणामस्वरूप या तो कोई नया तत्व या समानता पैदा होती है। इस तरह सांस्कृतिक प्रसार से वह परिवर्तन सम्भव है जिसके कारण कोई नई समरूपता अस्तित्व में आती है।’13  इसके अतिरिक्त राजनीति व भारत की भौगोलिक दशा भी संस्कृति परिवर्तन का कारण है। राजनीति की स्वार्थपूर्ण नीतियों ने हमारी संस्कृति को बहुधा प्रभावित किया है, जिससे संस्कृति में मूलभूत बदलाव आए है। विभाजन, आतंकवाद, साम्प्रदायिकता व नशा फैलाव राजनीति की स्वार्थपूर्ण नीतियों की ही देन है।

                       संस्कृति एक पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली ऐसी प्रक्रिया है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी को परिष्कृत कर सभ्य व संस्कारी बनाती है। संस्कृति की विशेषता है कि यह पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित होकर भी समयनुसार अपने स्वरूप को परिमार्जित करती है। जिसके फलस्वरूप संस्कृति में परिवर्तन होते रहते है।


सहायक ग्रन्थ सूची
1- वर्मा, धीरेन्द्र, बृहत् हिंदी शब्द कोष, खण्ड-2, दिल्ली, प्रभात प्रकाशन, संस्करण 2010, पृष्ठ-2401
2-  वही, पृष्ठ- 1182
3-  पाठक, रामप्रकाश, पाठक शिव प्रकाश, उपाध्याय, लक्ष्मीकांत, रायल मानक विशाल हिंदी शब्दकोष, दिल्ली, रायल बुक डिप्पो, संस्करण- 2010, पृष्ठ -1006
4- वर्मा, डा वीरेन्द्र, बनारस ज्ञानमण्डल लिमिटेड, पृष्ठ सं.  801 हिंदी साहित्य कोष 
5- चतुर्वेदी, परशुराम, बौद्ध साहित्य की सांस्कृतिक झलक, इलाहबाद, साहित्य भवन प्रा. लि. , 1958, पृ. -2
6- द्विवेदी, हजारी प्रसाद, अशोक के फूल, दिल्ली, लोकभारती प्रकाशन, 2007, पृष्ठ-77
7- अग्रवाल, वासुदेवशरण, कला और संस्कृति, इलाहबाद, साहित्य भवन प्रा. लि - 1952, पृ. -11
8- चंद, एस. एम., भारतीय संस्कृति का विकास, जयपुर, प्रिन्टवैल रूपा बुक्स प्रा. लि., 1992, पृ़.-10
9- राय, बाबू गुलाब, भारतीय संस्कृति की रूपरेखा, ग्वालियर, साहित्य प्रकाशन, 2009, पृष्ठ-2
10- नगेद्र, साकेत एक अध्ययन, नई दिल्ली, राजकमल प्रकाशन, 2009, पृ़-100
11- हिंदी उपन्यास साहित्य को पंजाबी लेखकों की देन, चण्डीगढ़, कृष्ण मधोक, पैराडाइज प्रिन्टर्स संस्करण 1982
12- anilsainisikar.blogspot.com/2014/04/blog-post_2443.html?m=1
13- Krocber,A.L. and clyde Klukhohn, Culture: a critical review of concepts and Definations, university of Chicago, Chicago,1925, p. 425


निवास स्थान- गिदड़बाहा
व्यवसाय- सहायक प्रवक्ता व हिंदी विभागाध्यक्षा, डी-ए-वी-कालेज, बठिण्डा
शैक्षिक योग्यता- स्नातकोत्तर हिंदी (स्वर्ण पदक), पंजाब विश्वविद्यालय नैट परीक्षा उत्तीर्ण व शोधार्थी पंजाब विश्वविद्यालय
शोध लेखन - अब तक 15 शोध लेख विविध पत्रिकाओं व किताबों में प्रकाशित हो चुके हैं।

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