सुवास कुमार और हिंदी कथा आलोचना

स्वाति चौधरी
स्वाति चौधरी

सुयोग्य कवि, सुचिंतित आलोचक, मार्क्सवादी मूल्यों को समर्पित डॉ. सुवास कुमार का जन्म 3 जुलाई 1948 को बिहार के बेगूसराय जिले में हुआ था। उन्होंने हिंदी साहित्य में एम.ए. (स्वर्ण पदक) व पी.एचडी की शिक्षा प्राप्त करके विक्रमशिला कॉलेज कहल गाँव, बी.बी कॉलेज आसनसोल, वर्धमान विश्वविद्यालय व हैदराबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य किया। 1996 से 1998 तक दि यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेस्ट इंडीज के सेंट ऑगस्टीन कैम्पस ट्रिनिडाड में हिंदी के विजिटिंग प्रोफ़ेसर रहे। लौटकर हैदराबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यक्ष के पद पर भी रहे।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार सुवास कुमार ने कविता, कहानी, आलोचना, अनुवाद आदि विविध विधाओं पर अपनी लेखनी चलायी है। इनकी रचनाओं को अगर देखा जाए तो उसमें आलोचनात्मक पुस्तकों में प्रमुख है; ‘मध्यकालीन फैंटेसी: सूरदास और चंडीदास का काव्य’ 1987, ‘आधुनिक हिंदी कविता : आत्मनिर्वासन और अकेलेपन का सन्दर्भ’ 1989, ‘आंचलिकता, यथार्थवाद और फणीश्वरनाथ रेणु’ (समीक्षा) 1992, ‘साहित्यिक समझ, विवेक और प्रतिबद्धता’ (आलोचना) 1993, ‘हिंदी: विविध व्यवहारों की भाषा’ 1994, ‘फणीश्वरनाथ रेणु संचयिता’ 2003, ‘गल्प का यथार्थ एवं कथालोचन के आयाम’ 2010 प्रमुख है। उनकी कहानियाँ भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती थी। उसके साथ ही उनके तीन प्रसिद्ध कहानी-संग्रह भी हैं - ‘अन्य रस तथा अन्य कहानियाँ’ 1992, ‘देशी-विदेशी गुड़ियाँ’ 1997, ‘यहाँ एक नदी थी’ 2006 उनकी कहानियों के सम्बन्ध में डॉ.गोपेश्वर सिंह लिखते भी है कि “सुवास कुमार ने संख्या की दृष्टि से कम किन्तु सार्थकता की दृष्टि से बेजोड़ कहानियाँ लिखी है। उनका विश्वास कम लिखने और सार्थक लिखने में है।”  कविताओं में अगर देखा जाए तो उनकी पहली कविता 1964 में हैदराबाद की ‘कल्पना’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी और उनका एक कविता संग्रह ‘कविता में आदमी’ 1992 भी है। उन्होंने मैथिली और बांग्ला भाषा का भी गहरा अध्ययन किया था। बांग्ला भाषा पर गहरी पकड़ होने के कारण उन्होंने ‘आधुनिक बंगला कविता’ 1994 नामक अनुवाद की पुस्तक भी लिखी थी। ‘वेस्ट इंडीज का साहित्य’ 2007 यह भी उनकी अनुवाद की गई पुस्तक है।

डॉ. सुवास कुमार
इस प्रकार स्पष्ट है कि सुवास कुमार ने अनेक विधाओं पर अपनी लेखनी चलायी है। कहानी विधा की अगर बात की जाये तो उनकी कहानियाँ अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही है। उनकी पहली कहानी ‘स्थानपूर्ति’ 1966 में ज्ञानोदय (कलकत्ता) में प्रकाशित हुई थी। वे अत्यंत सहज ढंग से कहानियाँ लिखते थे। जिसके कारण उनकी रेणु, कमलेश्वर व राजकमल चौधरी ने भी प्रशंसा की थी। उनके तीन कहानी-संग्रह आ चुके हैं जिसमें ‘यहाँ एक नदी थी’ कहानी-संग्रह उनकी चार लम्बी कहानियों का संग्रह है। पुरानी किस्सागोई और आधुनिक कथा चेतना से युक्त ये चारों कहानियाँ यहाँ एक नदी थी, काला सफ़ेद रंगीन, एकादश कुमारचरित, काला और भारतखंड माहत्म्य प्रगतिशील जीवन दृष्टि से संवलित होने पर भी किसी कथा रुढ़ि का शिकार नहीं है। इनमें आंचलिकता के अतिक्रमण के साथ-साथ यांत्रिक जनवाद भी है। उन्होंने समकालीन यथार्थ और फैंटेसी जनित किस्से का ऐसा आधुनिक ताना बाना बुना है जो हिंदी कहानी को विस्तार के साथ-साथ एक नई दिशा भी देता है। इनमें किस्सागोई, फैंटेसी, आंचलिकता और जनवाद का ऐसा सृजनात्मक आयाम है, जो उनको एक मजबूत और लीक से हटकर अलग कहानीकार बनाता है।

अनुवाद के क्षेत्र में अगर देखा जाए तो उन्होंने आधुनिक बांग्ला कविताओं का सफल अनुवाद किया है। कविता का अनुवाद साहित्येतर अनुवाद की अपेक्षा अधिक आत्मिक होता है। जिसके कारण यह अत्यंत जटिल, अंतर्विरोधों और विरोधाभासों से भरा रहता है। यह मूल का रूपान्तरण और पुनर्नवीकरण होता है लेकिन कविता के अनुवाद की विभिन्न समस्याओं के होने के बावजूद भी उनका यह अनुवाद सफल अनुवाद है। जिसमें उन्होंने बांग्ला भाषा के 52 कवियों की कविताओं का अनुवाद किया है। इसमें उन्होंने अनुवाद करने से पहले अनुवाद की अनेक समस्याओं पर भी विचार किया है।

आलोचना को अगर देखा जाए तो उन्होंने साहित्य, गल्प और यथार्थ को लेकर आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया। वे गल्प और यथार्थ को अलग-अलग नहीं मानकर एक ही दृष्टि से देखते हैं, उनके लिए अंग्रेजी में जिसे फिक्शन और नरेशन कहते हैं वही हिंदी में कथा-कहानी या सिर्फ गल्प बन जाता है। वे कल्पना और वास्तविकता की कथा में बराबर की हिस्सेदारी मानते थे। गल्प भीतरी परतों में से सत्य की संभावनाओं को महसूस करता हुआ पाठ के साथ आगे बढ़ता जाता है। एक के अंदर छुपी हुई इन कई परतों में सच के कई चेहरे झिलमिलाते रहते हैं। उनके अनुसार कथा या गल्प शब्दाश्रित होती है, जिसमें गल्पकार या कथाकार कथा की पृष्ठभूमि से लेकर उसके मुख्य कार्यव्यापार तथा पाठक पर पड़ने वाले प्रभाव को प्रकट करने का प्रयास करता है।

आज कथा साहित्य का जैसा विकास हुआ है, उसी तरह कथालोचना का विकास नहीं हो पाया है। नई पीढ़ी के कहानीकारों के सामने सबसे बड़ी समस्या यही है कि उनकी रचनाशीलता पर पर्याप्त विचार-विमर्श नहीं हुआ है। लेकिन इस दिशा में अगर सुवास कुमार की ‘गल्प का यथार्थ कथालोचना के आयाम’ पुस्तक की बात की जाये तो आलोचना की यह पुस्तक न केवल इस समस्या पर विचार प्रस्तुत करती है, बल्कि सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर कथालोचना के नए प्रतिमान और औजार भी गढ़ती है। इसमें लेखक की सबसे बड़ी खासियत दिखाई देती है वह है उनकी व्यापकता और खुलापन। इसमें वे न किसी वाद से ग्रसित और न ही किसी पूर्वग्रहों में बंधे हुए है। कथात्मक विधा और विधा की बात करते हुए उसमें भारतीय व पाश्चात्य विचारकों के सभी दृष्टिकोणों को देखते हुए विस्तृत रूप में देखने का प्रयास किया है। वे लिखते हैं कि प्रत्येक भाषा का साहित्य पहले पद्य या कविता के रूप में ही आया। गद्य का विकास बाद में हुआ। फिर धीरे-धीरे गद्य और पद्य दोनों विधाओं का विकास हुआ। भारतीय काव्यशास्त्र में नाट्यशास्त्र व रस सिद्धांत भी नाटक और महाकाव्य से सम्बंधित था जो कि दोनों विधाएँ ही गद्य और पद्य से मिली हुई है। गद्य के भेद व कथा आलोचना के शब्दों के सम्बन्ध में वे लिखते हैं कि “गद्य की शैली तथा विषयवस्तु के आधार पर पाँच प्रकारों में वर्गीकृत किया गया- आख्यायिका, कथा, खंडकाव्य, परिकथा और कथानिका। आज की हिंदी कथा-आलोचना के अनेक शब्दों यथा-कथा, उपन्यास, उपन्यासिका, लघु उपन्यास, लम्बी कहानी, कहानी, लघुकथा आदि को उक्त वर्गीकरण से जोड़कर देखा जा सकता है।”

विधा के सम्बन्ध में वे कहते हैं कि विधा क्या है? क्यों एक विधा मर जाती है? और कोई दूसरी नयी विधा पैदा हो जाती है, विधाएँ निरंतर परिवर्तित होती रहती है, जिसमें किसी विधा को खास युग से तो किसी विधा को खास वर्ग से जोड़कर देखा जाता है। विधा के सम्बन्ध में वे लिखते है कि “विधा का अर्थ है भेद या प्रकार। फ्रेंच और लैटिन के इन दिनों बहुप्रचलित शब्द ‘ज्याँ’ (Genre) को उसी प्रकार साहित्य के प्रकार (kind) के रूप में व्यवहृत किया जाता रहा है जिस प्रकार संस्कृत के शब्द काव्य ‘भेद’ या‘विधा’ को। जैसे अंग्रेजी में modes, form, kind, type आदि हैं वैसे ही हिंदी में काव्य-रूप, काव्य-भेद, काव्य-प्रकार, विधा आदि।” विधाओं में भी अगर कथा-विधा को देखा जाये तो कथा आज साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है इसका प्रारंभ भी अमेरिका, यूरोप और रूस में लगभग एक ही साथ उन्नीसवीं सदी के मध्य के आसपास हुआ। रूस में गोगोल की कहानियाँ 1842 ई. में छपी थी और वहाँ गोगोल ही आधुनिक रूसी कहानी के आरंभकर्ता माने जाते हैं। सभी कहानीकारों का आगमन गोगोल के ओवरकोट से ही हुआ है। सुवास कुमार कहानी विधा की महत्ता और लोकप्रियता के सम्बन्ध में लिखते हैं कि “विश्व साहित्य में चेखव, ओ हेरा, मोपासाँ, गोर्की, लूशुन, प्रेमचंद, सॉमरसेट माम, नुल हैन्सन, काफ्फा, कारेल चापेक, गुंटर ग्रास, गैब्रील गार्सिया मारक्वेज, मिलान कुंडेरा जैसे महान कहानीकारों ने दिखा दिया है कि इस विधा में जीवन और परिवेश के अंतर्विरोधों को उघाड़ने में पर्याप्त ताकत और ऊर्जा है और यह विधा अत्यंत गंभीर प्रभाव क्षमता भी रखती है।”  हिंदी कहानी का विधात्मक स्वरूप इस बात से स्वयमेव प्रमाणित हो जाता है कि लगभग एक दशक से कहानी हिंदी साहित्य के केंद्र में रह चुकी है। हिंदी कहानी को विशिष्ट पहचान प्रदान करने वाले प्रेमचंद की कहानियाँ भी विश्व साहित्य में विशिष्ट पहचान रखती है।

सुवास कुमार कहानी और कविता के पारस्परिक संबंधों पर भी बात करते हैं। वे लिखते हैं कि कविता और कहानी दोनों ही आदि विधाएँ है और दोनों एक दुसरे से बिलकुल अलग और निरपेक्ष विधाएँ नहीं है। जिसके कारण अनेक कहानीकार और कवि एक-दुसरे के तत्वों को समाहित करते हुए कविता और कहानी लिखते हैं। इसमें अगर मुक्तिबोध की बात की जाए तो वे कहानी और कविता दोनों को कभी-कभी एक ही साँचे में ढालकर लिखते थे। वहीं राजकमल चौधरी ने कहानी और कविता के लिए बिलकुल अलग काव्यभाषा का प्रयोग किया है। सुवास कुमार मानते हैं कि कहानी के अंतर्गत उत्सुकता, पठनीयता और विश्वनीयता ये सभी होने चाहिए क्योंकि एक कहानीकार इन्हीं तत्त्वों को समाहित करके कहानी लिखता है। सुवास कुमार सुरेन्द्र वर्मा की कहानियों की समीक्षा करते हुए लिखते हैं कि उनकी कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता है दैहिक भोग और सेक्स; और इस समस्या का चित्रण भी इस तरह किया गया है कि जो हमें किसी व्यापक मानवीय आधार या ऊँचाई तक नहीं पहुँचाता। मध्यमवर्गीय ओछी और टुच्ची हरकतों को रस लेकर इस प्रकार व्यंग्यात्मक रूप में दिखाया जाता है कि वह आलोचनात्मक होने के बजाय रसात्मक हो जाता है। वे ‘प्यार की बातें’ कहानी-संग्रह के सम्बन्ध में लिखते हैं कि “प्यार की बातें’ संग्रह में आठ कहानियाँ हैं, जिनमें ‘काउंटर’ और ‘सलाहकार’ इन कहानियाँ के सिवा बाकी छहों कहानियाँ रोमांस के वर्णन के सहारे टिककर ही अपने पाँव फैलाती हैं। रूमानी स्थितियों के चित्रण में सुरेन्द्र वर्मा सिद्धहस्त हैं। ‘कॉमिक’ कहानी को कहानीकार ने एक एंटीरोमांटिक और विद्रूपात्मक टिप्पणी दी है और इस बात से उसकी सभी से कहानियों में उसकी एक विशिष्ट पहचान बनती है।”  सुरेन्द्र वर्मा मूलत: नाटककार थे इसी कारण स्थितियों की नाटकीयता की पहचान और चुस्त स्वाभाविक संवाद ही उनकी कहानियों की प्रमुख विशेषता कही जा सकती है।

सभ्यता और संस्कृति के तत्वों पर अगर बात की जाए तो कहानी का सम्बन्ध सभ्यता से अधिक संस्कृति से होता है और संस्कृति से भी अधिक मानवीय संसक्ति और मानवीय नियति से है। सुवास कुमार आज की कहानी पर गंभीरता से विचार करते हैं उनका मानना है कि कहानी के गंभीर मसले पर विचार-विमर्श करने का जमाना अब नहीं रहा हैं। अगर इसपर गंभीरता से विचार-विमर्श किया भी किया जाता है तो वह उपदेश की तरह लगने लग जाती है। इन कहानियों में मध्यमवर्गीय जीवन की औपचारिकता तथा अनौपचारिकताओं के बाद भी दिखाने की प्रवृत्ति और एक-दूसरे से खुद को अधिक बेहतर समझने के भाव दिखाई पड़ते हैं। इनमें बदतर जीवन जीने और देश में रहने वाले मनुष्यों की जिस प्रकार की मानसिकता बनी हुई है, उसका प्रतीकात्मक चित्रण किया गया है। इस संदर्भ में सुवास कुमार रमाकांत श्रीकांत का उदाहरण देते हुए लिखते हैं कि “प्रेतबाधा’ में वर्मा और बेलचन्द के दो परिवार मध्यवर्ग के दो दृष्टिकोणों को प्रतिबिम्बित करते हैं। वर्मा मध्मवर्गीय नैतिकता की लीक पर आँख मूंदकर चलने वाले हैं। ‘वे अर्ली टू बेड एंड अर्ली टू राइज की जीवन पद्धति को अपनाने वाले ऐसे लोगों में हैं जो न स्वस्थ हैं, न धनवान न ही बुद्धिमान। उनकी जिन्दगी में है निरीह सीधापन और शरारत।”

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि सुवास कुमार ने अनेक विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई है। जब वे कहानी लेखन में अत्यंत सफलता प्राप्त कर रहे थे उस समय उन्होंने कहानी को छोड़कर आलोचना की तरफ अपना रूख मोड़ लिया और सफलता भी प्राप्त की। उन्होंने आलोचना में अपने नए प्रतिमान स्थापित किये। जिसमें उनकी आलोचनात्मक दृष्टि में सबसे प्रमुख विशेषता है उनका खुलापन और व्यापकता। वे न किसी वाद से बंधे हुए है न किसी पूर्वाग्रह से। इसके बावजूद भी उनकी प्रतिबद्धताएँ किसी से कम गहरी नहीं है और उनकी यही निर्मल और बेबाक शैली प्रेमचंद, रेणु, परसाई, श्रीलाल शुक्ल, ज्ञानरंजन, गोविन्द मिश्र आदि के कथा स्वभाव को समझने और उनका मूल्यांकन करने में प्रकट होती है। इसी विशेषता के कारण उनकी आलोचना में वे अपने नवीन दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं।

संदर्भ-ग्रन्थ
1. कुमार  सुवास, ‘यहाँ एक  नदी थी’,  फ्लेपपेज से-
2. कुमार सुवास, ‘गल्प का यथार्थ कथालोचन के विविध आयाम’ (2010)  वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली पृ. सं. 02
3. वही, पृ. 4
4. वही, पृ.11
5. वही, पृ. 151
6. वही, पृ. 175

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