लघुकथाएँ

ज्योत्सना सिंह

- ज्योत्सना सिंह

1. लबादा 


शाम गहराती जा रही थी। अब और इंतज़ार उसकी बेचैनी बढ़ा रही थी।

कल तबियत नासाज़ है कह कर वह कुछ अनमाना सा भी लगा था। कहीं बीमार ही न पड़ गया हो सोच मन विचलित हुआ जाता था।

दो गली छोड़ कर तीसरा या चौथा घर ही तो बताया था उसने क्यूँ न चल कर देख ही आऊँ ये विचार उसके मन में कौंधा ही था कि उसने हाथ घड़ी पर निगाह दौड़ाई और ऊहा-पोह में पड़ गया कितनी भी जल्दी वह करेगा तब भी वक़्त पर घर न पहुँच पायेगा और खाना बनाने वाली तो घड़ी के काँटे के साथ ही चलती है।

अगर खाना न पका फिर तो कुछ और ही पक जाएगा।

छड़ी टेक वह मन को मार घर की ओर चल पड़ा रोज़ की तरह आज मन में उसके सुख और अपनी पीड़ा की उठा पटक न थी।

बस मन उसके लिए भटक रहा था। कहीं कुछ हो न गया हो फिर ख़ुद को ही बहलाने लगा।

अरे उसे क्या होगा मुझसे दो साल छोटा भी तो है और मुझसे ज़्यादा सुखी भी परिवार में मान सम्मान भी तो है आख़िर बेटी के घर रह रहा है।

खा कर जब वह बिस्तर पर लेटा तब भी वह उसके ज़ेहन से न गया फिर ख़ुद पर ही कुछ झल्लाहट हुई कि पंद्रह दिनो से रोज़ शाम का साथ और एक दूसरे का फ़ोन नम्बर भी शेयर नहीं किया और न जाने ज़िंदगी की कितनी बातें शेयर कर डाली।

उसकी ख़ुशी से एक स्वाभाविक सी ईर्ष्या तो थी उसे पर मन में ख़ुशी भी थी कि बेटी के घर ही सही ख़ुश तो है।

तभी अपनी ज़िंदगी को भी ख़ुशगवार ही बना कर परोसी थी उसके सामने रिटायरमेंट का सुख बेटे के घर का मालिक सब कुछ तो बताया था उसे

और अपनी ही कही बातों से इस वक़्त वह बग़लें झाँक रहा था।

करवटों में रात गुज़री और दूध लेने जाने से ज़्यादा उसकी मुलाक़ात की चाह में वह आधा घंटा पहले ही घर से चल पड़ा।

पार्क के पास से गुज़रा तो उसी बेंच पर एक काया की परछाईं देख वह ठिठक गया और पास जा पुकार उठा।

“तुम यहाँ? सब ठीक तो है न?”

वह हड़बड़ा कर उठ बैठा और बोला

“हाँ, हाँ सब ठीक है वो तो बिटिया के ससुराल वाले आ गये थे तो मैं तो बोर हो गया तो ज़रा खुली हवा में साँस लेने चला आया चलो दूध लेने चलते हैं।”

अब चुपचाप चले रहे थे वो, बस उनकी पदचाप सुनाई दे रही थी। पंद्रह दिनो की गहरी दोस्ती और उससे पनपी ईर्ष्या का सच दोनो के बीच अभी भी अपना-अपना एक परदा था।

दोनो चले जा रहे थे झूठे सुख का लबादा ओढ़े हुए।

2. खट-पट 


सुहानी भोर ने खिड़की पर दस्तक दी साथ ही उन्होंने बिस्तर पर खट-पट की।

“यार! अपनी बाई से बोलो संडे को देर से आया करे।”

“क्यूँ संडे बर्तन तुम साफ़ करोगे क्या?”

“फिर तुम ही खोलो मैं नहीं जाता।”

“मुझे फ़्रेश होना है।गो एंड ओपन दा डोर।”

और एक दूसरे की ओर रूख किये बिना ही वह बिस्तर से उठ गये।

आधुनिक साजो सामान और पुरानी कलाकृतियों से सज़ा धज़ा वह छोटा सा घर ख़ुद ही बयाँ कर रहा था।

अलग-अलग विचारधाराओं का प्रवाह। अलग-अलग पसंद के बीच बस एक हम थे जो दोनो की पसंद थे।

दोनो ने बड़े प्यार से अपने हनीमून पर हमें ख़रीद था। अपनी बेड की सामने वाली दीवाल पर टाँगने के लिये।

और हमने इनके आशियाने में अपनी जगह पाई थी।

अभी साल भी न होने पाया है, पर इनके स्नेह द्वार पर अहम ने अपनी पैठ बना ली और प्यार खिड़की से कूदने को तैयार खड़ा है।

अब हम तो ठहरे कठपुतली तो इनकी खट-पट से मेरी बींदनी उदास हो जाती है आख़िर वह पूछ ही बैठी मुझसे।

“राणाजी! के जोड़े का प्यार ऊपर वाले ने छीन लिया के?”

“न राणी! ऊपर वाला तो प्यार झोली भर-भर देवे है। जे उसे संभाल न पा रहे।”

“सो कैसे महराज?”

“सुन बींदनी! आज कल कोई जोड़ा घर न चाहे है। सब अपने को चाहे हैं। ख़ुद को एक दूसरे से ऊपर समझे हैं।

प्यार और सम्मान के बीच एक झीणी सी चादर होवे है। जो एक दूजे का सम्मान करे तो प्यार तो ख़ुद-बख़ुद पूरे घर मा महके है।”

बाथरूम से बाहर आ जैसे ही उसने खिड़की खोली तेज़ हवा का एक झोंका दीवाल पर लटके कठपुतली के जोड़े को तेज़ी से हिलाने लगा उसकी खट-पट से दोनो का ही ध्यान गया और एक साथ हाथ बढ़ा उन्होंने उसे गिरने से बचा लिया।उन्हें थामने में उनकी नज़रे एक दूसरे से जो मिली तो उन्हें अपने प्यार भरे दिन याद हो आये।

और अब वह उन्ही मधुर पलों को संजो रहे थे, और कठपुतलियाँ ख़ुश हो हल्की हवा में मधुर सुर में खट-पट कर रहीं थी।

3. परजाई


सीली लकड़ी चूल्हे में लगाते ही धुएँ का ग़ुबार उठा और उसकी कच्ची रसोई और पक्के मन पर अपना पूरा साम्राज्य बना लिया। धुएँ से कड़वाई अपनी आँखो में अपने हृदय से निकले आँसुओ को भी उसने उसी में मसल दिया।

दालान से आ रही आवाज़ें उसके कानो को छलनी किये देती थीं। बात ज़मीनी बँटवारे की थी और इज़्ज़त उसके किये कामों की दाँव पर लगा दी देवर ने। पुत्रवत देवर की ईर्ष्या भरी ज़बान से शब्द-शब्द कोढ़ से टपक रहे थे। उसके पति का क्रोध भी सातवें आसमान पर जा पहुँचा।
बात एक दूसरे की जान लेने पर आ बनी।

जर्जर बेवा बुढ़ापा, निरीह सा अपनी जायी औलाद की नीचता को देख अपनी दुआओं की गठरी पर गाँठें मज़बूती से कसे जा रही थी।

अपनी बहू को पास बुला बोली, “धुएँ से बाहर निकल री, आग बन आग जा सबै नू भस्म कर दे, महतारी होये के भी कह रहे हैं तोहसे।”

उसने ठंडी सी साँस ली और सास का हाथ अपने हाथो में ले बोली, “अम्मा जी! औरत जननी है संहारी न।  रही बात आग बनने की तो आग तो सब एक पल में जला राख कर देती है और राख तो धरती पर ही रह जावे है। धुआँ, करकन तो सभी को देवे है पर ख़ुद आसमान की तरफ़ ही जाये है। सो अम्मा! मैं धुँआ ही ठीक सबकी करकन बन ख़ुद का आसमान बनाऊँगी।”

और वह अपने शुरू किये कुटीर उद्योग के लिए तैयार अचार-पापड़ की पैकिंग में लग गई।

अम्मा की दुआओं की गठरी की गाँठे उस परजाई के लिये ढीली पड़ने लगीं।

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