कँवल भारती की आलोचना दृष्टि और कबीर

- कैलास बळीराम घाटे 

शोधार्थी, हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद
ईमेल- ghatekailas@gmai.com; चलभाष: +91 738 245 2980


     हिन्दी दलित साहित्य की वैचारिकी एवं आलोचना विधा को सशक्त बनाने में ‘कँवल भारती’ जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कँवल भारती जी ने हिंदी दलित साहित्य में कविता, आलोचना, वैचारिकी एवं पत्रकारिता आदि विधाओं में अपनी कलम चलाकर दलित साहित्य की सीमाओं को विस्तृत कर उसे सशक्त बनाने का यत्न किया है। उनका ‘तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती’ कविता संग्रह हिंदी साहित्य में काफी प्रसिद्ध रहा है। इसके बाद कविता के क्षेत्र में कम पर वैचारिकी एवं आलोचना में उनका सृजन-कार्य अनवरत दिखाई देता है।

     कँवल भारती जी का मध्ययुगीन कवियों, रैदास एवं कबीर पर किया हुआ आलोचनात्मक सृजन-कार्य काफी उलझनों को दूर करने में सफल रहा है। ऐसा भी नहीं कि कबीर और रैदास पर इससे पहले आलोचनात्मक कार्य हुआ ही नहीं, हुआ है - डॉ. धर्मवीर इस विषय पर लिखनेवाले दलित साहित्य के प्रमुख आलोचक रहे हैं। डॉ. धर्मवीर पहले ऐसे दलित आलोचक रहे हैं जिन्होंने ब्राह्मणवादी विचारधारा के पोषक आलोचकों से वैचारिक संघर्ष कर कबीर के अस्तित्व को बचाकर उनके (कबीर) इतिहास, दर्शन एवं धर्म को पुन: स्थापित करने का प्रयास करते हैं।

     उन्हें यह कार्य करने की क्यों जरूरत पड़ी? इसका जवाब भारतीय इतिहास में दलित अस्तित्व की तलाश से जुड़ा है। डॉ. बाबासाहब आम्बेडकर भारतीय इतिहास को समझने के लिए क्रांति-प्रतिक्रांति का विचार दे चुके हैं। जिससे भारतीय इतिहास को जानने में काफ़ी असानी हो जाती है और साथ ही उन परम्परों को जानने की जिनका संघर्ष वैदिक परम्परा से रहा है। वैदिक परम्परा के इतिहास को जब हम देखते हैं तो यह बात पता चलती है कि, इस परम्परा ने अपनी विरोधी परम्परा (आजीवक, बौद्ध) को नष्ट करने का प्रयास किया है। अत: इस प्रयास के कारण हमें आजीवक एवं बौद्धों के साहित्य एवं इतिहास का ज्ञान काफ़ी अल्प रूप में उपलब्ध है और जो है उसका ज्यादातर हिस्सा विकृतीकरण का शिकार है। अत: कबीर भी इसका शिकार बने हैं। इस बात को प्रो. मैनेजर पाण्डेय भी रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं – “प्राय: वैदिक-पौराणिक परम्परा के प्रतिनिधि अपने विरोधी और विकल्पी विचारों के साथ जो व्यवहार करते रहे हैं, उसकी प्रक्रिया ध्यान देने लायक है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले विरोधी विचार का उग्र विरोध होता है। अगर वह विरोध के बाद भी नष्ट नहीं होता तो उसे विकृत करके बदनाम करने की कोशिश होती है। इसके बाद भी यदि विरोधी विचार जीवित रहता है, तो उसके विरोध की धार की तेजी को नष्ट करके अपने भीतर समेट लेने का प्रयत्न चलता है। विरोध, विकृति और समाहार की इस सर्वग्रासी प्रक्रिया के शिकार चार्वाक, आजीवक और बौद्ध ही नहीं, कबीर जैसे कवि भी हो चुके हैं।”[1]

     अत: हम देख सकते हैं कि, विरोध, विकृति और समाहार की सर्वग्रासी प्रक्रिया जिसके शिकार अवैदिकों के साथ-साथ कबीर भी हुए हैं। अत: इनको इस जाल से छुडाने का काम दलित आलोचना कर रही है। इस आलोचना कर्म में डॉ. धर्मवीर के बाद एक नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है, वह है – कँवल भारती।

     जहाँ डॉ. धर्मवीर विरोध, विकृति और समाहार की सर्वग्रासी प्रक्रिया को निरंतर चलाए रखनेवाले तथा कबीर के अस्तित्व को नकारनेवाले चेहरों को सामने ले आते हैं, वहीं वे हिंदी में आजीवक कबीर को स्थापित करते हैं। वहीं दूसरी ओर कँवल भारती आजीवक एवं कबीर परम्परा की अदृश्य हुई संबंधों की डोर को अपनी आलोचना से दृश्यमान कर उसे मजबूती देने का कार्य करते हुए दिखाई देते हैं।

     यह कैसी विडम्बना है जहाँ आजीवन कबीर अपने अस्तित्व को पुरज़ोर तरीके से हिंदू एवं मुसलमान दोनों धर्मों से अलगाते हैं। उन्हीं को आज तक हिंदी आलोचना ने हिंदू धर्म में समाहित कर उनके अस्तित्व को नकारने की कोशिश की है। जिनका आधार काल्पनिक कथा-परम्पराएँ रहीं हैं।

आजीवक कबीर की पहचान करने निकले कँवल भारती आजीवकों के बारे में लिखते हैं – “आजीवक वे लोग थे, जो घूम-फिरकर अपनी जीविका कमाते थे। दूसरे शब्दों में, अपनी जीविका के लिये भ्रमण करनेवाले आजीवक कहलाते थे।”[2] पूर्ण काश्यप, मक्खलि गोशाल, अजित केश कम्बल, प्रक्रुध कात्यायन एवं संजय बेलट्ठिपुत्त इसी आजीवक परम्परा के प्रतिनिधि हैं। इन आजीवकों के दर्शन को स्थूल रूप में इस प्रकार देख सकते हैं- चार महाभूतों का अस्तित्व, आत्मा का न होना यह अनिश्चितता का सिध्दांत जो कि अजित केस कम्बल का था, मृत्यु के बाद व्यक्ति कोई कर्मफल नहीं भोगता है यह पूर्ण काश्यप का सिद्धांत रहा है। मक्खलि गोशाल का नियतिवाद का विचार था। नियतिवाद को कँवल भारती व्याख्यायीत करते हैं – “गोशाल के नियतिवाद का अर्थ था सभी वस्तुएँ स्वभाव के अधीन हैं। उसके स्वभाव को कोई नहीं बदल सकता – पराक्रमी पुरुष भी नहीं।”[3]

     परलोक-पुनर्जन्म का खण्डन, आत्मा की अस्वीकृति, जार-कर्म का विरोध आदि बातें आजीवक धर्म में दिखाई देती हैं। जिनसे वैदिक परम्परा के जड़ पर ही आघात होता है। यही बातें कबीर में भी देखने को मिलती हैं- आत्मा, पुनर्जन्म, वेद-पुराण, बैकुंठ, ईश्वरीय अवतार, मूर्तिपूजा आदि का विरोध वे करते हुए दिखाई देते हैं।

“बहुरि नहिं आवना या देस।
जो जो गये बहुरि नहिं आये, पठवत नाहिं संदेस।”[4]

* * * 
“चलन चलन सबको कहत है, नाँ जानौं बैकुंठ कहाँ है।
जोजन एक प्रमिति नहिं जानै, बातनि ही बैकुंठ बखानैं।।
कहें-सुनें कैसें पंतिअइये, जब लग तहाँ आप नहिं जइये।।”[5]


     यहाँ प्रखर रूप में पुनर्जन्म-बैकुंठ का विरोध करते हुए कबीर को देखा जा सकता है। इसी तरह का विरोध वे ईश्वर के अवतार को लेकर भी करते हैं।

“दस औतार निरंजन कहिए, सो अपना ना होई।
यह तो अपनी करनी भोगैं, कर्ता औरहि कोई।।”


     ये पद जो अपने आप में आजीवक धर्म के विचार लिए हुए हैं जो किसी भी रूप में कबीर को हिंदू वैष्णव होने के संकेत नहीं देते हैं। वहीं हिंदी के आलोचक कबीर को रामानंद का शिष्य एवं वैष्णव बनाने पर तुले हुए हैं। क्या इस के पीछे यही मानसिकता काम नहीं कर रही है जिसे डॉ. धर्मवीर रेखांकित करते हैं- “इस ब्राह्मणी मानसिकता में माना यह गया है कि शूद्र को बिना ब्राह्मण की कृपा के अपने आप या अपनी परम्परा से कोई ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। इस प्रकार के दृष्टिकोण में ब्राह्मण की शूद्र को हर दृष्टि से नीचे गिराने की मनोवृत्ति काम कर रही है।”[6]


     डॉ. धर्मवीर का चिंतन इस ब्राह्मणवादी मनोवृत्ति से संघर्ष करने में बीता है। इसमें उनसे ‘आँखन देखी’ कहने वाले कबीर की कविताओं के अनगिणत पहलुओं का मूल्यांकन रह ही जाता है जिसे कँवल भारती के आलोचना कर्म में देखा जा सकता है।


     आजीवक गोसाल की परम्परा में जार-कर्म का विरोध दिखाई देता है वही बात कबीर में भी देखी जा सकती है। जार-कर्म में स्त्री के साथ-साथ पुरुष भी उतना ही दोषी है जितनी की स्त्री। कबीर की नज़र में कामी पुरूष कुत्ते से भी निचले दर्जे का है- ‘कामी थैं कुतो भलौ, खोलें एक जू काछ।’ कामी स्त्री के बारे में वे कहते हैं-

“परनारी राता फिरै, चोरी बिढता खांहि।
दिवस चारि सरसा रहै, अंति समूला जाँहिं।।”[7]


     जिन आलोचकों को कबीर स्त्री विरोधी लगते हैं उन्हें कँवल भारती की इस बात पर ध्यान देना चाहिए। वे कहते हैं- “कबीर की लड़ाई स्त्री के विरुद्ध नहीं है, बल्कि व्यभिचार में लिप्त स्त्री के विरुद्ध है। उन्होंने ‘पर नारी’, ‘कामी’ और ‘व्यभिचारी’ शब्दों का प्रयोग किया है। वे ऐसी स्त्री को बिलकुल आदर नहीं देते हैं, जो व्यभिचारिणी हैं...”[8] आजीवक गोसाल से शुरू हुई बुद्ध, फुले एवं डॉ. बाबासाहब तक आनेवाली इस अवैदिक परम्परा में जहाँ, जितना पुरूष सम्मान एवं अधिकार का हकदार रहा है, उतनी स्त्री भी रही है। अत: एक बार फिर रूक कर यह सोचा जाना चाहिए कि क्या सच में कबीर स्त्री विरोधी रहे हैं।


     कँवल भारती गरीब, किसान, मजदूर की व्यथा को अभिव्यक्त करनेवाले कबीर के इस पक्ष को भी उजागर करते हैं-

“अब न बसूँ इहि गाँइ गुसाई, तेरे नेवगी खरे सयाँने हो राम ।।टेक।।
गाँइ कु ठाकुर खेत कु नेपै, काइथ खरच न पारै।
जोरि जेवरि खेति पसारै, सब मिलि मोकौं मारे हो राम।।”[9]


     हिंदी आलोचना में खेतों में काम करने वाले दलित, मजदूर वर्ग की हृदय-विदारक स्थिति को उजागर करते कबीर प्राय: लुप्त ही रहे हैं।   



कबीर का एक और रूप जहाँ वे गरीबी, दरिद्रता के दु:ख को अभिव्यक्त करते हैं –

“इब न रहूँ माटी के घर में। / इब मैं जाइ रहूँ मिलि हरि मैं।।
छिनहर घर अरु झिरहर टाटी। / घन गरजत कंपै मेरी छाती।।”[10]


     कबीर कह रहे हैं कँवल भारती के शब्द उदाहरण स्वरूप - “घर, जिसकी दीवारें मिट्टी की बनी हैं, छप्पर में जगह-जगह छेद हैं, जिससे गरमी में धूप और वर्षा में पानी आता है। इसलिये जब बादल गरजते हैं, तो उस गरीब की छाती काँप जाती है।”[11]


निष्कर्षत: बाबासाहब आम्बेडकर जिस कसौटी को ‘बुद्ध और उनका धम्म’ में प्रयोग करते हैं वह कसौटी है- “भगवान बुद्ध ने कभी ऐसी बेकार की चर्चा में नहीं पड़ना चाहा, जिसका आदमी के कल्याण से कोई सम्बन्ध न हो। इसलिए कोई भी ऐसी बात जिसका आदमी के कल्याण से सम्बन्ध नहीं, यदि भगवान बुद्ध के सिर मढ़ी जाती है, तो उसे ‘बुद्ध वचन’ स्वीकार नहीं करना चाहिए।”[12] अत: उपरोक्त आलोचना दृष्टि को देखने के बाद यह कहा जा सकता है कि यह कसौटी कबीर की तलाश में कँवल भारती की आलोचना का आधार रही है।


प्रतिक्रांति की परम्परा ने कबीर को भक्त एवं वैष्णव धर्म में समाहित कर उनके आजीवक धर्म पर पर्दा डाला है तो वहीं जाति-मुक्त, शोषण रहित समाज परिवर्तन के विचारों को धुंधला करने की कोशिश भी की है, जो ब्राह्मणवादी परम्परा के लिए घातक सिद्ध हो रही थीं। अत: हम कह सकते हैं कि, कँवल भारती की आलोचना दृष्टि कबीर के उस रूप को सामने ले आती है जो जातिमुक्त, शोषणरहित समाज निर्माण के लिए कारगर है और जिसका संबंध आजीवक धर्म एवं दर्शन से है जो वैदिक परम्परा के विरोध की धारा है। इस पूरे आलोचना कर्म में कँवल भारती की आलोचना दृष्टि कबीर के अस्तित्व की तलाश ही नहीं बल्कि दलित दर्शन की अवैदिक धारा का इतिहास लेखन भी करती है।

संदर्भ

[1] मैनेजर पाण्डेय – भारतीय समाज में प्रतिरोध की परम्परा, पृष्ठ 113
[2] कँवल भारती – आजीवक परम्परा और कबीर अर्थात् दलित धर्म की खोज, पृष्ठ 40
[3] कँवल भारती – आजीवक परम्परा और कबीर अर्थात् दलित धर्म की खोज, पृष्ठ 55
[4] आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी – कबीर, पृष्ठ 238
[5] आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी – कबीर, पृष्ठ 245
[6] डॉ. धर्मवीर – कबीर बाज भी, कपोत भी, पपीहा भी, पृष्ठ 151
[7] सम्पा. डॉ. श्यामसुंदर दास - कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ 30
[8] कँवल भारती – आजीवक परम्परा और कबीर अर्थात् दलित धर्म की खोज, पृष्ठ 60
[9] सम्पा. डॉ. श्यामसुंदर दास - कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ 121-122
[10] आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी – कबीर, पृष्ठ 263
[11] कँवल भारती – कबीर : एक विश्लेषण, पृष्ठ 71
[12] डॉ. बी. आर. आम्बेडकर, अनु. डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन, भगवान बुद्ध और उनका धम्म, पृष्ठ19

4 comments :

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  2. Kailas ji is lekh me kanval Bharati par bahut kam likha hai.....jiske Karan unki drashti saf nhi Ho rahi....aisa lag raha hai ki unke upar aap apani alochana dristi thop rahe hai ya Dr. Dharmveer ki.......chunki aap Dr. Dharmveer aur kanval bharati ki alochana drishti me antar nhin kar paye hai.....and last me isme ek shabd galat hai pahaloo o me..... Check this.... Bhasha bahut achhi hai...... Aage ke lie shabhkamaye...

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    1. ध्यान से पढ़ने, महत्वपूर्ण टिप्पणी लिखने, तथा तथा पहलुओं की वर्तनी पर ध्यान दिलाने के लिये आपका आभार।

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