विश्व हिंदी दिवस की बधाई!


आपके लिये यह संदेश लिखते समय पिट्सबर्ग का तापमान शून्य से बीस अंश (सेल्सियस) नीचे है। थोड़ी असुविधा अवश्य है, लेकिन जीवन पूर्ववत चल रहा है। शिकागो में रेल की पटरियों को आग से गर्म करके रेल-परिवहन को जारी रखा गया। मौसम बदलेगा लेकिन मानव जिजीविषा और अदम्य इच्छाशक्ति सदा विजयी रहेगी।

पिछले अंक में हमने सेतु के हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में अतिथि सम्पादकों को सामने लाने का विचार प्रस्तुत किया था। मुझे यह बताते हुये प्रसन्नता है कि गोपाल लाहिड़ी जी अतिथि सम्पादक के रूप में सेतु का वर्तमान अंग्रेज़ी अंक (जनवरी 2019) प्रस्तुत कर रहे हैं। इसी क्रम में डॉ कन्हैया त्रिपाठी फ़रवरी 2019 के हिंदी अंक के अतिथि सम्पादक होंगे। आप अपनी अप्रकाशित, अप्रसारित, यूनिकोड-टङ्कित, उत्कृष्ट प्रविष्टियाँ उन्हें hindswaraj2009@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं। विषयवस्तु में 'सेतु फ़रवरी 2019' भी लिख दें तो अच्छा होगा।
विश्व हिंदी दिवस के दौरान हिंदी चर्चा के केंद्र में आ जाती है। इस बार हिंदी की वैश्विक स्थिति के बारे में कई समाचार सोशल मीडिया पर साझा किये गये जिनमें हिंदी को विश्व में कहीं दूसरे, कहीं तीसरे, और कहीं चौथे स्थान पर दर्शाया गया है। समझना कठिन है कि इन सब में से कौन सा स्थान वास्तविक है। मेरे विचार से हिंदी की वैश्विक स्थिति के आँकलन में आने वाले अंतरों का एक बड़ा कारण हिंदी भाषा की वास्तविक सीमाओं के बारे में अनिश्चय है। जहाँ एक ओर हम सामान्यतः अवधी और ब्रज जैसी भाषाओं को हिंदी का अंग समझते हैं, वहीं उर्दू जैसी भाषा को लिपि-मात्र के अंतर के कारण हिंदी से बाहर मान लेते हैं। मेरे विचार से उर्दू भी हिंदी की ही एक उपभाषा है। हर हिंदीभाषी भले उर्दू न बोल सके, लेकिन हर उर्दूभाषी, स्वभाविक रूप से हिंदी बोलता ही है। इसलिये हिंदीभाषियों की गणना करते समय उर्दूभाषियों को सम्मिलित करना एक सही दृष्टिकोण है। लिप्यांतर एक नई भाषा का सृजन नहीं करता है। अगर करता होता तो भारत में गुरुमुखी और पाकिस्तान में शाहमुखी में लिखी जाने वाली पंजाबी भी दो अलग-अलग भाषाएँ होतीं और भारत और पाकिस्तान की सिंधी भी अलग-अलग ही होती। गणना का तरीका जो भी हो, याद रखने की बात यह है कि हिंदी विश्व की एक अग्रणी भाषा है और निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर है।

इस महीने (25 जनवरी 2019 को) हमने हिंदी की वरिष्ठ साहित्यकार कृष्णा सोबती को खोया है। 18 फरवरी, 1925 को गुजरात (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मी सोबती जी को ज्ञानपीठ (2017), और साहित्य अकादमी (1980) सहित अनेक सम्मान मिले हैं। दुखद खबर यह है कि उनकी अंतिम यात्रा में साथ चलने वालों की संख्या दो अंकों में थी। प्रेरक समाचार यह है कि वे अपना घर तथा बड़ी राशि विभिन्न साहित्यिक संस्थानों के नाम कर गयी हैं। ये दोनों समाचार हिंदी साहित्य की दो ऐसी विपरीत प्रवृत्तियों की ओर इशारा कर रहे हैं जिन पर हम सबको ध्यान देने की आवश्यकता है।

सेतु के पिछले अंक के विशाल स्वरूप के सामने वर्तमान अंक अपेक्षाकृत छोटा है। पढ़िये, अपने मित्रों को भी पढ़ाइये, और अपनी राय से अवगत कराइये।

शुभकामनाओं सहित,
अनुराग शर्मा

2 comments :

  1. बहुत दुखद है। हिंदी की इतनी बड़ी साहित्यकार गुजर गईं और उन्हें कंधा देने चंद कांधे ही आये। यह हमारे समाज की निर्दयता है।

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  2. विश्व हिन्दी दिवस की बधाई सेतु परिवार को भी । हिन्दी भाषा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित कर सम्मानित दर्जा दिलाने में निरंतर प्रयासरत सेतु के ईमानदार प्रयासों की मैं प्रशंसा करती हूं । संपादकीय में सभी गंभीर बिन्दु उठाए । उर्दू हिन्दी की ही एक उप भाषा है । सहमत हूं । हम हिंदोस्तानी भाषा ही रोज़मर्रा में इस्तेमाल करते हैं । एक सुंदर , सबको समझ आनेवाली भाषा मिश्रित हिन्दी ही है ।

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