ग़ज़ल: सूबे सिंह 'सुजान'

सूबे सिंह "सुजान"


धुन्ध गहरा रही है उसको उतर जाने दो
सबको मरना है यहाँ, उसको भी मर जाने दो।

क़त्ल करती है तरक्की भी बहुत लोगों के
थोड़ा परहेज करो, जख़्मों को भर जाने दो।

इतने सूरज न बनाओ कि तुम्हीं जल जाओ
यूँ करो फूल उगाओ, और बिखर जाने दो।

ऐ बुरे लोगों जरा बच के रहो अच्छों से
ये जिधर जायें, बस इनको तो उधर जाने दो।

रोती तन्हाई तेरे पास आ बैठी है "सुजान"
इसको सहलाओ, कहो वक़्त गुजर जाने दो।

आत्मकथ्य: कविता,ग़ज़ल मुख्य रूप से लेखन करता हूँ शिक्षक हूँ, शिक्षण कार्य के साथ साथ समाजिक कार्यों में लगातार भाग लेता हूँ शिक्षकों के अधिकारों के लिए काम करता हूँ रक्तदान शिविर का आयोजन करता हूँ आदि आदि ।

साहित्यिक परिचय - अदबी संगम कुरुक्षेत्र नामक साहित्यिक संस्था के सचिव के पद पर काम करता हूँ व कवि सम्मेलन का आयोजन करवाता हूँ। पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़लें प्रकाशित, रोहतक व कुरुक्षेत्र आकाशवाणी पर रचनाओं का प्रसारण तथा राज्य व राष्ट्रीय स्तर के कवि सम्मेलन व मुशायरों में शिरकत।

सम्पर्क: गाँव सुनेहड़ी खालसा, डाक - सलारपुर - 136119, जिला -कुरूक्षेत्र, हरियाणा
चलभाष: +91 941 633 4841
ईमेल: subesujan21@gmail.com

1 comment :

  1. सार्थक साहित्य पढ़ने को मिला और सार्थक संतोष व अहसास हुआ अपनी ग़ज़ल को अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में पाकर ।
    हिन्दी के लिए सकारात्मक काम अभी बहुत बाकी है वर्तमान में भी पत्रिकाओं की भूमिका है तो आजकल ई पत्रिका को बहुत जोशो खरोश से प्रकाशित करना युवाओं को साथ लेकर चलने जैसा है ।

    संपादक मंडल का बहुत बहुत आभार ।

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