पेरिस: स्वाद का अनोखा शहर

यात्रा-वृत्तांत: विनय गुदारी


सम्पादकीय टिप्पणी: इस आलेख ने विश्व हिंदी सचिवालय (मॉरिशस) की यात्रा वृत्तांत लेखन प्रतियोगिता में अफ़्रीका क्षेत्र में प्रथम पुरस्कार पाया है। हिंदी के प्रोत्साहन के लिये ऐसे प्रयोगों के लिये प्रतियोगिता के आयोजक धन्यवाद के पात्र हैं। 

यात्राएँ हमें बहुत कुछ सिखाती हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में अपने बी.ए. की पढ़ाई के अंतर्गत निर्मल वर्मा के चीड़ों की चाँदनी पढ़कर अधिक प्रभावित रहा। एक पंक्ति जो अब तक ज़ेहन में है कि यायावर को बिना किसी अपेक्षा से अपनी यात्रा पर निकलना चाहिए, तब निराशा नहीं होती है। निर्मल वर्मा को पढ़ने के बाद, अपने दोनों मित्रों के साथ हम निर्मल वर्मा से उनके घर मिलने गए। अभी तक उनकी आँखों की गहराई से लेकर, उनकी उंगलियों की निर्मलता तक, उनकी धीमी आवाज़, सब स्मरण आते हैं। और उनकी कही गई इस बात को संभवतः विस्मृत नहीं कर पाऊँगा कि मनुष्य की सबसे बड़ी यात्रा उसके अंतर्मन की यात्रा होती है जहाँ वह स्वयं का अन्वेषण कर सके। कहीं न कहीं हर रचनाकार के साहित्य-सृजन का यही आरंभिक बिंदु होता होगा ...
निर्मल वर्मा की इन्हीं पंक्तियों को ध्यान में रखते हुए, सितम्बर 2016 की मेरी पेरिस यात्रा आरम्भ हुई थी। वास्तव में, ईनालको में दो दिवसीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए पहली बार यूरोप की ओर जाने का अवसर प्राप्त हुआ था। भारत में अनेक बार कुछेक जगहों में अपने शोध पत्र पढ़ने का अवसर तो मिला था परंतु, पेरिस और लंदन की मेरी हवाई-टिकट बनते ही, उद्भूत उमंगों के पंखों पर उड़ने लग गया था ....
एयर मॉरीशस विमान में मेरे बगल में एक वृद्ध फ्रेंच व्यक्ति बैठा था। स्वभाव से मेरा बातूनी व्यवहार उसकी खामोशी से अव्यक्त रूप में संघर्ष करता रहा। लम्बे अंतराल तक अपनी खामोशी से जूझने के बाद, अंततः हार मानकर उससे बातें करने लगा तब उसके सूखे-रूखे जवाबों से मुझे आभास हो चुका कि मैं उसे डिस्टर्ब कर रहा हूँ। अपने अनेक सवालों को मन ही मन दबाकर मैं फ़िल्में देखने लगा। फ्रांस के हवाई घेरे में प्रवेश करते हुए, शायद मेरे सह-यात्री को मेरी आँखों की उत्साह समझ आ गई थी। उसने तब मुझे एक हवाई-गाइड की तरह, देशों और जगहों की दिशा दी। निस्संदेह मैं और उत्सुक होता गया। बातों ही बातों में मुझे पता चला कि वह स्वेत्ज़ेलेंड का निवासी है, और उसके फ्रांसीसी शब्दों में भी ज़रा सा अंतर था। उस व्यक्ति से मुझे मानव-व्यवहार की एक बड़ी सीख मिली कि कुछ लोगों को दूसरों के व्यवहारों की ईमानदारी पर गहरे अध्ययन करने के बाद ही, वे आप से घुल मिल सकते हैं।
पेरिस के शार्ल दे गोल एयरपोर्ट पर उतरते ही, हिंदी में स्वागत देखकर मन खुश हो गया। मुझे अंग्रेज़ी, हिंदी, भोजपुरी, मोरिश्यन क्रियोल के अतिरिक्त फ्रेंच भी आती है। एस्कलेटर पर इमिग्रेशन की ओर जाते हुए, मैं सोच रहा था कि फ्रेंच लोगों को हिंदी के अक्षरों के उच्चारण की कितनी कठिनाई होती होगी। परंतु जिन लोगों से मेरा परिचय बाद में होने वाला था, उन्होंने मेरे इस संदेह को मिटा दिया। किसी भी भाषा को सीखने के लिए, उसकी संस्कृति को हृदय में गहनतम स्थान दे दीजिए, तो सीखने में आसानी होती है। मुझे तब 2005 के अपने विदेशी सहपाठियों की याद आई जो केन्द्रीय हिंदी संस्थान में पूरे समर्पण से हिंदी सीखने गए थे। कभी-कभी, भारतीयों से संवाद करते हुए, वे ‘शौचालय, ‘आरक्षण’, ‘पंजीकरण’ जैसे संस्कृतनिष्ठ शब्दों के प्रयोग से सभी को चौंका देते थे। कुछ इस प्रकार के अनुभव मुझे पेरिस में भी हुआ।
मॉरीशस के इतिहास को गहराई से समझें तो हमारे देश में भारतीय आप्रवासियों पर किए गए अनेक प्रकार के शोषणों के ज़िम्मेदार ब्रिटिश तथा फ्रांसीसी उपनिवेशवाद रहा जिनपर अभिमन्यु अनत से लेकर अनेक रचनाकारों ने अपनी कलम चलाई। परंतु तटस्थ व पूर्वाग्रह-रहित दृष्टि से देखें, तो लगेगा कि भाग्य के निर्माण की पृष्ठभूमि नित्य दुखदायी और कष्टप्रद होता है। पेरिस की भूमि पर उतरते हुए, मैंने अपने सारे पूर्वाग्रहों को महासागर में ही डूबा दिया था...    
एयरपोर्ट से बाहर निकालकर, टैक्सी ली। ड्राइवर ने बड़ी नम्रता से पेरिस मेरा स्वागत किया, फिर मेरे सूटकेस को गाड़ी की डिक्की में डाला। बातों ही बातों में पता चला कि वह हैची छोड़कर पेरिस काम करने गया था। मिलनसार मिज़ाज वाले मेरे इस दोस्त ने अपने परिवार के बारे में बताया। मुझे उसके अनुभवों में कई कहानियाँ जन्म लेती दिख रही थीं। मैंने उसे बताया कि हैची के भूकंप पर मेरी एक कविता मॉरीशस के फ्रेंच समाचार पत्र ले मोरिसियें में प्रकाशित हुआ था, तो भावुक होकर , वह मुझसे और अधिक खुलकर बात करने लगा। उसे पेरिस में टैक्सी चलाते हुए २० साल हो गए है। बातें, शहर से निकलकर, उसके देश के गाँवों तक पहुँचीं। फिर वापस पेरिस के उसके आरंभिक दिनों के संघर्षों पर काफी लम्बे समय तक ठहरीं। मुझे अपनी बुआ के यहाँ, क्रेतेय नामक जगह जाना था और एयरपोर्ट से लगभग तीस मिनट की दूरी के रास्ते पर, वहां तक पहुँचते पहुंचते उसने मॉरीशस की मूल जानकारियों से अपने को धनी पाने लगा। मुझे लगा कि सामान्य ज्ञान की जानकारियाँ वही व्यक्ति सबसे अधिक रखता है जिसका संपर्क जनता के हर स्तर के लोगों से होता है और जिसकी जिज्ञासा असीमित होती है। फ्रांस के अपने पहले ज़मीनी साथी से मिलकर मुझे अपार आनंद की प्राप्ति हुई। आज भी उसका हट्टा-कट्टा शरीर, अश्वेत रंग वाला शरीर और नित्य मुस्कान के वाहक के इस दोस्त का स्मरण है, जिससे हम दोनों के लगातार के संवादों में हमारे नामों का परिचय भी नहीं आ पाया।
12 सितम्बर 2016, दिन के लगभग 11 बजे का समय था। शकीला बुआ नौकरी पर थी, फूफा भी काम पर निकले थे, परंतु छोटी बुआ (आरती) घर पर मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। मॉरीशस के भोजन के साथ मेरा स्वागत हुआ। जब तक कि भोजन समाप्त हुआ, प्रकाश फूफा वापस आ चुके थे। हम दोनों उनके अपार्टमेंट के पीछे वाले दुकान में गए। मुझे कुछ सामानों के साथ-साथ एक सिम कार्ड लेना था। राजेन, लगभग मेरी ही उम्र का श्रीलंका के निवासी का स्टोर था। उसकी फ्रेंच भी अजीब थी। पता नहीं कैसे मूल फ्रांसीसी निवासी उसको समझ पाता! लेकिन बन्दा था बड़ा रोचक। चार-पाँच ग्राहकों को एक साथ, एक ही समय पर संभाल पाना, कोई आसान काम थोड़े ही है!
फूफा से कहा कि मुझे उसी समय पेरिस देखना है। मेरी थकान को पढ़कर भी, मेरी उत्सुकता को उन्होंने प्राथमिकता दी। करीब १ किलोमीटर पैदल चलकर, हमने पुरानी मेट्रो पकड़ी। पहला गंतव्य, मोंमात्र चर्च था। वहां तक पहुँचने के लिए, हम कुछ पथरीली गलियों से गुज़रे। मुझे अचानक दिल्ली ६ के चाँदनी चौक की गलियाँ याद आ गईं। परंतु दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई करते समय, अपने पाँच वर्षों के दौरान मॉरीशस के अतिथियों को जितनी बार शोपिंग के लिए उन गलियों में ले जाता था, हम हर बार कहीं न कहीं उन में खो जाते थे। एक गली पकड़ने के बाद, जब भी दिमागी तौर पर उस क्षेत्र की परिकल्पना करता था और सोचता था कि इसके अंत में दूसरी वाली जानी-पहचानी गली निकलेगी, तो हमेशा धोखा खा जाता था। यहाँ स्थिति उलटी थी। पहली बार में ही जगह की पहचान में मेरा आत्मविश्वास इतना बढ़ गया था कि फूफा से कहने का मन हुआ कि ‘आप निकलिए, मैं स्वयं घूमने जाऊंगा’ परंतु आतिथ्य-सेवा से उनको वंचित नहीं कर पाया। फूफा की आँखों से मुझे आभास हुआ जैसे कि वे भी पहली बार के लिए वहां जा रहा था।
थोड़ी ऊँचाई में स्थित, मोंमात्र तक पहुँचने के लिए केबल कार लेना पड़ा। टिकट खरीद ली थी और हम अपनी बारी की प्रतीक्षा करा रहे थे। तब तक मेरी निगाहें उस जगह को अन्वेषित करने के लिए किसी गिलहरी की तरह इधर-उधर झपका रही थी। ऊपर पहुंचते ही, मैंने एक गहरी सांस ली। सभी लोग तीव्र गति से मोंमात्र की उस भव्य भवन में प्रवेश करने लगे। मैंने उलटा किया। मोंमात्र से जितनी दूर जा सका, मैं उस ओर बढ़ा। उस गिरजाघर के शांत-शून्य परंतु गांभीर्य को दूर से ही अनुभव करने लग गया था परंतु बाहर से पार्थिव रूप में, वह कैसा दिख रहा था, उसे मेरे कैमरे के लेंस ने कैद करना शुरू कर दिया। आँखें चमकने लगीं। अजीब सुकून! उसके आर्किटेक्चर निहारता रहा देर तक ... उन कारीगरों को सलाम करने के बाद, भीतर गया। अजी क्या बताएं! उद्भूत! संतुष्टि! उस स्वच्छ और सौंदर्यपूर्ण वातावरण ने मुझे आध्यात्मिक होने पर विवश कर दिया। कुछ-कुछ जैसे स्वर्ग में होने का आभास! बाबू गुलाबराय का निबंध प्रभुजी मेरे अवगुण चित्त न धरो के शब्द मेरे मन में गूंजने लगे; मैंने सोचा, यार यदि यहाँ कोई पादरी मिल जाए, तो अपने गुनाहों के लिए माफ़ी मांगकर निकलना चाहता हूँ ... परंतु यह हो नहीं पाया ... और मैं वहां से निकला, खुश, आनंदित और इस आस्था के साथ कि ईसा मसीह की तरह मुझे अपने जीवन को सार्थक बनाने-हेतु, दूसरों की अब से अधिक सहायता करनी होगी, उनके चेहरे पर और अधिक मुस्कान लाना होगा ...  
इसके बाद, उसी दिन हम दोनों अनेक जगह गए। ला देफांस, जो पेरिस का मुख्य व्यापार केंद्र है और जिसकी इमारतें आकाश से बातें करती हुई नज़र आती है, से हम अपनी पैदल-यात्रा आरम्भ की। उस समय पेरिस के व्यापार-जिला कहने वाली उस जगह ने बिलकुल प्रभावित नहीं किया था और यह इसलिए क्योंकि शायद उसे देखने की टाइमिंग सही नहीं थी (चूँकि मोंमात्र की आध्यात्मिकता वाले उस पात्र से मैं पूरी तरह से बाहर निकल नहीं पाया था) परंतु शाम को जब हम बुआ के घर पहुंचे और ला देफांस पर अधिक जानकारी के लिए गूगल पर गया, तो अवाक रह गया।
ला देफांस का नामकरण  लुई-अर्नेस्ट बैरीस द्वारा बनाई गई मूर्ति ला देफांस दे पेरिस के नाम पर रखा गया है, जो 1883 में उन असंख्य सैनिकों की स्मृति में बनाई गई थी जिन्होंने फ्रैंको-प्रशिया युद्ध के दौरान पेरिस को बचाने के लिए और उसे सुरक्षित का दायित्व उठाया था। फूफा ने उस जगह का परिचय देते हुए बताया था कि वह मॉरीशस के एबेन जैसी है जहाँ बड़े-बड़े व्यापार होते हैं। ईमानदारी से इसमें मेरी कोई रुचि नहीं बनी। मात्र यह दृश्य अभी भी याद है कि मॉरीशस के प्रसिद्ध कवि-रचनाकार, राज हीरामन की बेटी, निधि मुझसे अपने शिशु के साथ मिलने आई थी। निधि मुझे अपना बड़ा भाई मानता है। और इस छोटी बहन की आत्मनिर्भरता देखकर मुझे गर्व हुआ।
हाँ! बात कर रहा था, ला देफांस की जिसकी जानकारी ने मुझे चकित कर दी थी। लगभग 1,400 एकड़ की फलक में, 72 ऐसी ग्लास और स्टील की इमारतें पाई जाती है जिनमें 180,000 कामगार अपनी आजीविका पाते हैं। इन कुछेक आंकड़ों से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इमारतों की ऊँचाई कितनी होंगी। फिर भी, उस समय मैं इमारतों को भूलकर हृदय की ऊँचाई, या यूँ कहें, गहराई में खोया हुआ था ...
ऊँचाई और गहराई से दूर, हम लंबाई नापते गए और वहाँ से निकलकर हम विश्व के विख्यात स्मारकों में से, आर्क दे त्रिओम्फ की ओर पैदल बढ़ने लगे। बीच रास्ते में, में शकीला बुआ से मुलाक़ात हुई। पेरिस के सड़कों की चौड़ाई, और हर जगह साइकिल चलाने वालों के लिए अलग से स्पेस, अनुशासन का पालन करते हुए चालक, शिष्टाचार से पेश होने वाले व्यापारी, चाव से ग्राहकों का सत्कार करने वाले लोग, इन सभी दृश्यों ने मुझे अत्यंत प्रभावित किया। इन सभी जगहों पर विस्तार से चर्चा शाम को ठंडी बियर के साथ हुई जब बुआ का बेटा, आश्विन घर लौटा।  
अगले दिन एक अद्भुत स्थान के पर्यटन पर हम सभी लोग निकले। काताकोम्ब ... (या कत्कुम्भ?)। डरावना सा नाम! शायद। पर जो अनुभव करने वाला था, वह उससे कहीं अधिक था। कल्पना कीजिए एक ऐसी सुरंग, भूल-भुलैया जैसी, पेरिस के हृदय के ठीक भीतर जो कि 20 मीटर की गहराई पर स्थित और पंद्रह सौ मीटर की लंबाई ... क्या है? मनुष्य की खोपड़ियाँ और हड्डियाँ! इसी उत्सुकता के साथ मैं उस सुरंग की यात्रा पर निकला कि आखिर विश्व की मानव-हड्डियों के इस सबसे बड़े संग्रहालय के पीछे क्या इतिहास है? करोड़ों की संख्याओं में पेरिस निवासियों की खोपड़ियाँ जो 18वीं शताब्दी से संग्रहीत हैं एक ही जगह पर ठोस मिट्टी की दीवारों पर इकट्ठा करने का अर्थ क्या है? कहीं इतिहास को सम्मानपूर्वक जीवित रखने के इस प्रयास में, फ्रांस की मूल संस्कृति वास तो नहीं करती? गर्व से, उन मृतकों को सम्मान देते हुए, कारीगारिता और डिजाइन के अतुलनीय मिश्रण से अतीत और भविष्य के बीच पुल बाँधने का प्रयोजन तो नहीं था? जो भूमि के नीचे देखने को मिला और पेरिस को वास्तु-संरचना को दृष्टि से टटोलने को मिला, उसमें मुझे कोई अंतर दिखाई नहीं दिया ... अंतर, दृष्टिकोण का मिला। अन्यथा, शून्य ... समर्पण ... आत्मसात ...

मात्र स्थूल में नहीं, सूक्ष्म में भी, जीवन में और जीवन शैली को पल-पल परिभाषित करती हुई पेरिस की वह संस्कृति जिसमें लंदन की हड़बड़ी नहीं थी, और थी तो, एक ठहराव, एक चाव, जीवन्तता जो पेरिस निवासी अपनी कॉफ़ी पर बैठने का मतलब वक्त बिताना मानता है ... दोस्तों को पूरा समय देना ... न कोई जल्दबाज़ी, न भागा-दौड़ी ... पेरिस की स्वाद-भरी, सादगी वाली संस्कृति मुझे रोमांटिक आध्यात्मिकता सिखा गई जहाँ प्रेम और श्रद्धा के योग से भक्ति साक्षात उभरती है और मेरी यात्रा तत्व से निकलकर सूक्ष्म की ओर बढ़ती गई और आज भी स्मृतियों से रोमांचित होकर, आत्म-पहचान की दिशा में सूक्ष्मतम होती जा रही है ...  

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