संयम से ही अहिंसक समाज बनता है

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


मनुष्य इंद्रियों को संयमित करके ऋषियों और महर्षियों की श्रेणी प्राप्त किया है। प्रत्येक मनुष्य ऋषि महर्षि नहीं हो सकता पर गृहस्थ जीवन में रहकर भी अपने निजी जीवन में संयमित रह सकता है। यह कठिन है जितना उतना सरल भी है। कठिन इसलिए है क्योंकि मनुष्य मोह-माया में वशीभूत होकर संग्रह और शक्ति विस्तार की लालसा रखता है ऐसे में मन, वचन और कर्म से वह असत्य का सहारा लेता है। यह असत्य ही उसके असंयमित जीवन बनाने के लिए पर्याप्त है। असत्य से ही व्यक्ति सभी इंद्रियों पर नियंत्रण से दूर हो जाता है। यह गुण किसी व्यक्ति में तमोगुणी की आधिक्यता को दर्शाता है। सतोगुणी व्यक्ति बिना संयम के जीवन जी ही नहीं सकता। इस प्रकार हम पाते हैं, और हमारे शास्त्र इसके साक्ष्य हैं कि जितनी भी सत्यान्वेशकों की कथाएँ हैं वे बताती हैं कि सतोगुणी लोग हमेशा संयम और नियम पर अपना जीवन निर्वाह करते रहे हैं।
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एव अभिवर्तते ॥

जिसका तातपर्य है-मनुष्य की इच्छा कामनाओं के अनुरूप सुखभोग से नहीं तृप्त होती है। अर्थात व्यक्ति की इच्छा फिर भी बनी रहती है। वास्तव में, वह तो और बढ़ने लगती है, ठीक वैसे ही जैसे आग में इंधन डालने से वह अधिक प्रज्ज्वलित हो उठती है।

मनुष्य के भीतर सुख भोग की इच्छा बहुत अधिक होती है। सुख कभी भी वैराग्य धारण नहीं करने देता। सुख कभी भी निरपेक्ष होने नहीं देता। व्यक्ति, यहां तक कि देवता भी सुख भोग के लिए अहंकार से भर जाते हैं। ऐसे लोग अपना संयम खो देते हैं। अपने अहंकार और महत्त्वाकांक्षा की आपूर्ति के लिए ऐसे व्यक्ति हिंसा भी करने से नहीं चूकते।

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में संयम के लिए भी उपदेश दिया है। उपनिषदों में भी संयम पर अनेकों कथाएं और संदेश हैं। संयम के लिए तो हमारे जैन मुनियों ने बहुत ही श्रेष्ठ बातें बताई हैं। संयम ही जीवन का श्रृंगार है। मनुष्य संयम धारण कर सकता है, इसलिए समस्त जीवों में वह श्रेष्ठ है। जिसके जीवन में संयम नहीं, उसका जीवन बिना ब्रेक की गाड़ी जैसा है। जैन मुनिश्री ने एक संबोधन में यह कहा था कि संयम बिना प्राणी अधूरा : जीवन रूपी नदी के लिए संयम धर्म का पालन करना जरूरी है। संयम को हम बंधन कह सकते हैं। लेकिन यह बंधन सांसारिक प्राणी के लिए दुखदाई नहीं वरन्‌ दुखों से छुटकारा दिलाने वाला है। नदी बहती है पर तटों का होना जरूरी है। जैन धर्म में धैर्य पूर्वक इसीलिए कुछ कड़े तपस्या को भी स्थान दिया गया है जिसमें विपश्यना की आलोचना भी होती रही है लेकिन साथ ही यह कहा गया है कि संयमी व्रत-त्यागी पुरुष यदि रसना इन्द्रिय पर विजय प्राप्त न करे तो अपने समय को सुरक्षित नहीं रख सकता, वह अनशन, ऊनोदर, व्रतपरिसख्यान, रस परित्याग आदि तपों का ठीक समुचित आचरण नहीं कर सकता। इस कारण रसना इन्द्रिय का विषय भी स्पर्शन इन्द्रिय के समान महान् प्रबल है। इसीप्रकार बौद्धों ने भी धम्म पद और त्रिपिटक में संयम और नियम की बात की। बुद्ध धर्म में आष्टांगिक मार्ग संयम का महामंत्र है।
1. सम्यक दृष्टि,
2. सम्यक संकल्प,
3. सम्यक वाक,
4. सम्यक कर्मांत,
5. सम्यक आजीव,
6. सम्यक व्यायाम,
7. सम्यक स्मृति एवं
8. सम्यक समाधि
संयम जीवन का अभीष्ट है परंतु विडंबना यह है कि इस धरती पर मन, वचन और कर्म में संयम न होने के कारण वे युद्ध, हिंसा और विषाद में जाने से नहीं बच सके। हम जानते हैं कि मध्यकाल, भक्तिकाल में संत परम्पराओं में भी जितने महान आत्माएं आईं वे संयम और नियम, तप और श्रम पर ही जीवन जीने की प्रेरणा दिए।

पाश्चात्य देशों में भी संयम पर काफी विचार हुए हैं। यह विचार विमर्श कभी टेक्नोलॉजी के माध्यम से मनुष्य पर खतरे को रेखांकित करते हुए आया तो कभी कांट और लॉक के दर्शन में भी परिलक्षित हुआ है। अन टू दिस लास्ट जो गांधी को रस्किन की पुस्तक जीवन में बहुत आई उसमें एक बड़े संयम का भी उद्घाटन है। तालस्तोय के यहां प्रेम के नियम को अहिंसा के रूप में देखे जाने की दार्शनिकता को अगर समझें तो यह प्रतीत होता है कि हिंसा से मुक्ति के विकल्प के रूप में जिसे साध्य और साधन के रूप में रेखांकित किया जा रहा है तो उसके पीछे संयम जैसा व्रत काम कर रहा है। वस्तुतः संयम अहिंसक होने और अहिंसक मन को निर्मित करने सूत्र के रूप में देखा जा सकता है।

अशांति के लिए भी संयम की आवश्यकता होती है। दुनिया के जितने भी युद्ध हुए उनके इतिहास को खंगालिए तो पाएंगे कि हिंसा का मार्ग छोड़ने की पहली शर्त है संयम। वह संयम हो सकता है महत्त्वाकांक्षाओं के त्याग के रूप में देखा जाय या अपने जीवन में विस्तारवादी भावनाओं को संयमित करने के रूप में देखा जाय। लेकिन यह सत्य है कि संयम मनुष्यता की और जीवन के आत्म को परिष्कृत करने का अचूक मंत्र है।

शांतिवादियों के लिए और अहिंसा के लिए गांधी जी ने स्वयं सत्य और अहिंसा को अगर अपनाया तो उसके पीछे उनका संयम रहा है। संयम के अभाव में व्यक्ति न कुछ बड़ा कर सकता है और न ही किसी भू-भाग में अपनी एक अच्छी छवि निर्मित कर सकता है। इसलिए सकारात्मक और मनुष्यता के हिमायतियों के जीवन को देखेंगे तो उनके जीवन का संयम भी आपको मिलेगा। यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि यदि उनके जीवन मूल्यों को परखा जाएगा तो यह लगेगा कि जीवन मूल्य उनका उनके जीवन का संयम था। श्री अरविन्द के अनुसार मानव जीवन का उद्देश्य सत् चित्त एवं आनन्द की प्राप्ति है। इस महान लक्ष्य को गीता में प्रतिपादित कर्मयोग एवं ध्यानयोग द्वारा प्राप्त किया सकता है। संसार से पलायन की जगह निष्काम भाव से कर्म करने से ही सत्, चित्त एवं आनन्द की प्राप्ति की जा सकती है। पर इसके लिए स्वस्थ शरीर, विकार रहित मन एवं संयमित आचार-विचार आवश्यक है। योग के द्वारा मानव अपने शरीर, सोच, विचार एवं कार्य पर नियंत्रण रख उन्हें उचित दिशा में ले जा सकता है।

आध्यात्म और भौतिकवादी संसार में अंतर केवल इतना है कि भौतिकता आपके चित पर हावी हो जाती है जबकि वहीं आध्यात्मिक मन चित से निर्विकार हो जाता है और संयम धारण करने में कोई उसे समस्या नहीं होती है। महर्षि श्री अरविंद के समस्त जीवन दर्शन में इस तरीके के कई रहस्य उद्घाटित हुए हैं जिनसे संयमित जीवन की पहल प्रकट होती है।

अब परिस्थितियाँ बदल रही हैं। लोगों के भीतर व्यक्तिगत रूप से बहुत सारी नई इच्छाओं ने जन्म लिया है। राष्ट्रों के दूसरे राष्ट्र के प्रति संयम हो या पड़ोसी के साथ किसी पड़ोसी का संयम। सब दिख रहा है कि लोगों में असंतोष है। परिवार जैसी छोटी इकाई में अब संयम समाप्त होता जा रहा है। इसके बरक्स अब लोगों में असंयमित और अमर्यादित भाषाओं से संबोधन होने लगे हैं। एक ही परिवार में लोग इतने असंयमित व्यवहार करने लगे हैं कि इससे संबंधों पर असर आने लगा है। इस टूटते हुए विघटनकारी समय में एक संयमित समाज के निर्माण की जिम्मेदारी है। उपदेश देने और उपदेश करना बहुत आसान है। संयम व्रत धारण करना एक साधन है इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति स्वतः अपने जीवन में संयमी बने और अपने आसपास में भी संयमित होने के लिए आग्रह करे। ऐसे में चाहे व्यक्ति किसी परिवार, समाज, राज्य या राष्ट्र में रहता हो वह संयमित परिवार, समाज और राष्ट्र तैयार कर सकेगा।

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