कहानी: लेडीज़ सीट

प्रियांकी मिश्रा

- प्रियांकी मिश्रा


जेठ की चिलचिलाती दुपहरी में राष्ट्रीय राजमार्ग-33 ऊंघ रहा था। मनुष्य तो दूर, पक्षी-शावक भी इस जानलेवा गर्मी से बचने के लिए अपने अपने ठिकानों पर दुबके पड़े थे। पर वह तो अपने गंतव्य पर पँहुचने को व्याकुल थी। बस के इंतजार में खड़ी, जल्दी से बेटे के पास पँहुचने को आतुर। दूसरे शहर में नौकरी की मजबूरी थी और इधर बेटा बीमार था। सो दोनों में तालमेल बिठाने की कठिन कोशिश में दोनों तरफ से रोज का यह तीन घंटे का सफर एक महीने से बदस्तूर जारी था।

ईश्वर हर जगह खुद नहीं हो सकता, इसलिए उसने माँ बनाई। अपनी इस रचना पर सबसे ज्यादा इठलाता होगा वो शायद, क्योंकि उसके उम्मीदों पर सबसे ज्यादा खरी भी तो वही उतरी है।

बहरहाल, एक रेंगती सी बस आई और कंडक्टर ने उसे खड़ा देख, बस रुकवा भी दी। अमूमन, अच्छी बसें सुबह सुबह ही निकल भी जातीं थीं। इस समय में बस मिल जाना ही एक तसल्ली थी। बस में लेडीज़ सीट खाली थी। कंडक्टर ने हाथों से उसे इशारा किया तो भाड़े के पैसे उसे पकड़ा, वह खिड़की वाली सीट पर बैठ गई। बस चल पड़ी थी अपनी ढनमनाती गति से, काला धुआँ वातावरण में पसारती हुई।

सुबह की बस यात्रा, दौड़ कर समय से ड्यूटी पकड़ने की जद्दोजहद, कार्यस्थल की चिक चिक, पुनः लौटने के लिए बस पकड़ने की भागा -दौड़ी, थक तो वह बेतरह चुकी थी। रोज का यह छह घंटे का सफर, फिर घर पँहुच कर घर की जिम्मेदारी, धीरे-धीरे यह सब उसकी बढ़ती उम्र के साथ मिल षडयंत्र रचते हुए, उसकी शारीरिक क्षमताओं पर अपने निशान छोड़ रहा था। भारी हो आई पलकों को मूंद, उस खटारा सी सीट पर निढ़ाल हो गई वह। दिमाग तो यंत्रवत चलता ही रहा, घर पहुँच कर बाकी के काम निपटाने की सूची बनाने में।

बस लगभग भरी हुई थी पर उसके बगल की सीट अभी भी खाली थी। दस मिनट भी बीते न होंगे कि हिचकोले खाती, घर्र की आवाज के साथ बस फिर रुकी। बंद आँखों से ही वह समझ गई कि उसके बगल की सीट पर किसी का कब्जा हो चुका है। किसी तरह का कोई सरोकार नहीं था उसे किसी से। वह तो बस इन तीन घंटों का भरपूर उपयोग करना चाहती थी, अपनी खोई हुई उर्जा वापस लाने के लिए, ताकि मंजिल पर पँहुच फिर चकरघिन्नी की मानिंद अपने कार्य में मुस्तैद हो सके।

पर एक मीठी सी आवाज ने उसकी तंद्रा में खलल डाल दिया। "थोड़ा पानी मिलेगा क्या?" यह प्रश्न उसकी नूतन सहयात्री का था।

सहसा उसे खुद पर खीझ हो आई। सफर में सामान हल्का होना चाहिए , यही सोच कर वह अपने लिए पानी की एक छोटी बोतल अपनी पर्स में डाल लिया करती थी। वैसे भी, बहुत कम पानी पीती थी वह। उसका यह स्वभाव उसके घर वालों और उसकी सहेलियों के बीच हमेशा एक मजाक का विषय था। आज उसे महसूस हो रहा था कि कभी-कभी अतिरिक्त भार ढोना भी आवश्यक होता है। क्या पता, कब किस की जरूरत पूरी कर दे!

"हाँ, हाँ, देती हूँ", कह कर उसने अपनी क्षुद्र सी बोतल पर्स में से निकाल, उसकी ओर बढ़ा दिया। छोटी बोतल और उसमें थोड़ा पानी, अचानक दोनों की नज़रें मिली और दोनों एक साथ हँस पड़ीं। उसके चेहरे की स्मित मुसकान बोल रही थी मानो, "इतने से पानी से क्या होगा मेरा?"

"काम चला लूंगी" बोल कर उसने एक मिनट में सारा पानी शेष कर दिया। बहुत प्यासी थी वह। यह बोलने की आवश्यकता नहीं कि वह भी बहुत थकी माँदी बस में चढ़ी थी और जल्दबाजी में पानी की बोतल पकड़ना भूल गई थी। उफ ये औरतें!इतना कुछ याद करना होता है हर एक के लिए, कि अपना ही असबाब भूल जातीं हैं हर बार। पुरूष इसे बेतरतीबी, लापरवाही की संज्ञा देता है।

कुछ विशेष सी चमक थी उसकी आत्म विश्वास से लबरेज़ आँखों में। साधारणतया वह चुपचाप सफर तय किया करती थी, पर आज रोक नहीं पाई खुद को वह। "क्या नाम है तुम्हारा?" अपनी हमउम्र सी प्रतीत होती उस युवती से बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाने का प्रयास था यह।

"मरियम" उसके खुलते लबों के साथ उसकी आँखें भी बोल उठी थीं। औसत से कुछ लंबी कद काठी, सामान्य नाक नक़्श और श्याम वर्ण, झारखंड के किसी आदिवासी जन जाति की युवती थी वह। पर कुछ तो अद्भुत आकर्षण था उसके पूरे व्यक्तित्व में। उसे लग रहा था जैसे उससे काफी पुरानी जान पहचान हो उसकी।

मरियम से बातों ही बातों में पता चला कि वह अपनी बड़ी बहन के यहाँ किसी घरेलू कार्यवश जा रही थी। खुद वह यहीं चर्च द्वारा संचालित किसी छोटे से स्कूल में अध्यापन का कार्य कर रही थी। अपने नाम के अनुरूप ही उसका चेहरा माता मरियम की भांति स्नेहिल था। ईसाई मत को मानने वाली इस औरत के गले में एक रोजरी भी थी जिसके एक छोर पर क्रॉस लटक रहा था।

परिवार के बारे में पूछने पर ठिठक गई वह। बोलती आँखें सहसा उदास सी हो आईं और कोनों से बूंदें ढलकने को बेताब। उसे लगा, शायद कुछ भूल कर बैठी वह। इतना नहीं कुरेदना चाहिए था उसे । उसका हाथ अपने हाथों में ले, वह मौन हो गई दो मिनट के लिए। चलती हुई बस की धीमी स्पीड भी हठात् खलने लगी उसे।

"नही, कोई बात नहीं, अब वैसे भी उबर चुकी हूँ मैं ..." कह कर दोनों होंठ दाँतों से भींच लिए उसने, "मेरी दो छोटी छोटी बच्चियाँ हैं, प्यारी प्यारी, मेरी जान", कहकर फिर से मुस्काने लगी वह। उसकी रोती आँखों में भी फिर से पहले वाली चमक उभरने लगी थी । "प्यारी तो होंगी ही , इतनी प्यारी माँ जो है उनकी", बोल कर उसके दोनों हाथ, जो अभी तक उसके ही हाथों में थे, थपथपा दिये उसने।

"धन्यवाद मैडम", अनायास ही जबाब दिया उसने। ऐसा लगा, जैसे बखूबी वाकिफ थी वह अपनी आंतरिक सुंदरता और उसकी असीम संभावनाओं की।

"दोनों बच्चियाँ जब बहुत ही छोटी थीं, तभी पति ने छोड़ दिया मुझे। अपनी विधवा माँ के साथ ही रहती हूँ, वही देखती हैं उनको , जब मैं बाहर जाती हूँ। स्कूल की कमाई से किसी तरह भरण-पोषण कर रही हूँ उनका", आहिस्ते से बोल कर फिर एक मिनट के लिए मौन हो गई मरियम।

"तब तो तुम बहुत साहसी हो, ईश्वर तुम्हारी मदद जरूर करेंगे, तुम्हारी बच्चियाँ एक दिन पढ लिख कर तुम्हारा सर गर्व से ऊँचा करेंगी" वह उसको दिलासा देती हुई बोली। उसके ढ़ृढ़ चरित्र की पटकथा वह अब कुछ कुछ समझ पा रही थी।

"जी, मैडम , अब तो मेरे क्रूस का भार जीसस ही उठायेगा। मैंने अपना सब कुछ उस को ही सौंप दिया है, ", रोजरी में लगे क्रॉस को होंठों से चूमते हुए उसने कहा।

यह वाक्य अभी पूर्ण ही हुआ था कि बस अनायास रूक गई। हमारी बातों की लड़ी में अचानक एक विराम आ गया। खिड़की से झाँक कर देखा तो एक ढाबा दिखाई दिया। यात्री एक एक करके बस से उतर रहे थे। साँझ ढलने के कगार पर थी और दिन की तपती गर्मी से भी थोड़ी सी राहत हो चली थी।

बस से उतरने के क्रम में उसने यह भी गौर किया कि बस मे सफर करने वालों में सिर्फ वही दो महिलाएं थीं।
मरियम और वो भी नीचे उतर पहले वॉशरूम की खोज में ढाबे के पीछे पहुँचे। एक बूढ़ी सी औरत ने स्थानीय भाषा में उन्हें जगह दिखाते हुए उनसे चाय पीने को पैसे माँगे। लौटते हुए उसे दस रूपये पकड़ा, वो आकर सामने लगे उन टेबिलों पर बैठ गये जँहा कोई पकौड़ी, कोई समोसा, तो कोई मिठाई खा रहा था। पूछने पर मरियम बोली, "सिर्फ चाय ही पीते हैं "। सहमति से दो कप चाय मंगाकर चुस्कियाँ लेनी शुरू ही की थी कि ड्राइवर अपनी सीट पर बैठकर हार्न बजाने लगा। जल्दी बस में बैठने को कह रहा था वह सबसे।

किसी तरह गर्म चाय सुड़क, बैरा को पैसे पकड़ा, वह जल्दी से बस में चढ़ी। पर यह क्या, मरियम तो उससे पहले उठी थी! फिर वह बस में चढ़ी क्यो नही? बाहर झाँका तो वह पान की गुमटी में खड़ी, चिप्स के पैकेट खरीद रही थी।
बस जल्दी ही चल पड़ी। मरियम ने एक चिप्स का पैकेट निकाल कर मुझे पकड़ाया, "खाईये मैडम।"

"अरे नहीं, बहन के बच्चों के लिए लेकर जाना"

"उनके लिए लिया है अलग से, यह तो हम दोनों का है", बोल मरियम ने जबरदस्ती वह पैकेट उसके हाथ में पकड़ा दिया। यह उसका स्वाभिमान था; उसने उसे चाय पिलायी थी, तो वह क्यूँ कर उसे ऐसे ही जाने देती। समझ गई थी वह कि उसके शायद यही खास गुण उसके इस स्वरूप की पहचान थे और किसी को भी प्रभावित करने के लिए पर्याप्त थे। जीवन के थपेडों ने उसमें जो हिम्मत और आत्मसम्मान कूट-कूट कर भर दिया था उसमें, उसकी झलक से सराबोर था उसका संपूर्ण अस्तित्व।

"क्यूँ छोड़ा होगा उसके पति ने उसको", सोच में डूब गई वह। फिर उसे लगा, औरत में कमी निकालना तो चुटकी भर का काम है , गुण क्यूँ नहीं दीखता किसी को? याद हो आई उसे तुलसीदास की पंक्तियाँ, "जाकी रही भावना जैसी ..."।

"आपने अपने बारे में तो कुछ बताया ही नहीं मुझे" मरियम उसके विचारों की श्रॄंखला तोड़ते हुए बोल रही थी। फिर से हँसने लगे दोनों, उन्मुक्त सी हँसी, हर बंधन, हर रिश्ते से परे।

बस शहर में प्रवेश करने ही वाली थी। सफर भी कम बचा था और इन दोनों का साथ भी। संक्षिप्त में अपने बेटे की बीमारी और रोज के आने जाने का क्रम बताते हुए भी वह सारी बातें बताने की ईमानदारी न दिखा पाई। पर सच तो यह है कि अगर श्रोता ईमानदार हो तो बीच के कई अनकहे शब्द वह खुद ब खुद समझ जाता है।

सब कुछ सुनने के बाद मरियम ने सिर्फ इतना कहा, "मैडम, आपको प्रभु इतनी शक्ति दे कि आपने जो यह बीड़ा उठाया है, आप उसे मंजिल तक पहुँचाने में सक्षम हों।"

अपने कष्ट में डूबी हर औरत समझती है कि उसका दर्द अथाह और असीम है। पर जरा सी नज़र दौड़ाने पर समझ आता है कि उसका दर्द तो एक बूंद मात्र है, यत्र तत्र सर्वत्र बहते दर्द की दरिया में। हर किसी का दुःख उसके लिए उतना ही त्रास देने वाला है। ऊपर से मजबूत और प्रसन्न दिखने वाली शख्सियत भीतर से अक्सर बिखरा हुआ काँच होती है।

बस तब तक स्टैंड में लग चुकी थी। मरियम ने अपनी मुसकान बाँटते हुए उससे विदा ली और अपनी मंजिल की ओर बढ़ चली । वह भी अपने घर की ओर बढ़ती हुई सिर्फ यही सोचती रही, "मैं अकेली नहीं।"

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