काव्य: वीना श्रीवास्तव

वीना श्रीवास्तव

नाम

वो कहते हैं
नाम में क्या रखा है
सलमा हो या सीता
कुरान हो या गीता
क्या फर्क पड़ता है

लेकिन... फर्क तो पड़ता है
लोग पहचाने जाते हैं नाम से
उनका धर्म तय करते हैं
चेहरे पर उगे जंगल
टोपियाँ करती है तय
किस हंडिया का चावल है
जर्दा है, बिरयानी है या फकत खिचड़ी

नाम ही तो तय करता है
हमें झुकना है
या बैठना है पालथी मारकर
जहाँ नाम बनता हो मजहब की पहचान
टोपियाँ गिनकर
कर दी जाती हों आग के हवाले 
तूफानों से बचने के लिए
बदला जाता हो नाम का चोला
बाबू...
वहाँ नाम के साथ ही
तय हो जाती है मिट्टी

मिट्टी बनाने वाली प्रकृति ने बनाये
पेड़-पौधे, वृक्ष, घास भी
वो फल के हों, फूल के या हों जहरीले
होते हैं हरे, उनका खून, ईमान, जाति, धर्म
एक है - हरा

और हम मानव
बँट गए हरे, लाल, नीले, भगवा वस्त्रों में
नहीं बन पाए तो इंसान


बूढ़ी आँखें

मैंने समुन्दर से पूछा तू कितना गहरा है?
और बूढ़ी माँ की आँखें लहराने लगीं उसकी लहरों पर
मैंने पूछा गगन से तेरी ऊंचाई का विस्तार कहाँ तक है?
और नन्ही सी आँख तारा बन चमकने लगी
मैंने हवा से पूछा की तेरी गति क्या है?
की परिंदे का झुण्ड दूर आकाश में दिखा
मैंने फूलों से कहा तुझ सी मासूमियत कहाँ ढूंढूं?
और खिलखिलाने लगा एक नन्हा बच्चा
मैने खिलखिलाहट से पूछा तू कहाँ मिलेगी?
और खेतों में लहराने लगीं गेहूं कि बालियाँ
मैं दौड़ी ख़ुशी से बटोरने कुछ खिलखिलाहट अपने लिए
तभी एक बूढी अम्मा दिखी
नन्हे बच्चे के साथ।

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