कविताएँ: मजदूर झा

सब जानते हैं

सब जानते हैं कि कुछ जानना नहीं है
सब मानते हैं कि सब कुछ मानना है
सब पहचानते हैं कि किसी को पहचानना नहीं है
सब कुछ जानने, सब नहीं मानने और
सबको पहचानने वाले झोंक दिए गए हैं
इतिहास की तपतपाती भट्टियों में.
इसलिए इल्म सिखाए जाते हैं,
तालीम परोसी जाती हैं
नज़र की सीमाओं और जानने समझने की रफ़्तार
तय कर दी गई हैं.
सीमाओं का उल्लंघन पिशाचों के साथ-साथ
इल्म वालों को, तालीम वालों को भी क्रोधित करता है
क्योंकि पिशाचों के कई चक्र होते हैं.
लेकिन चक्र भट्टियों में तप जाने वालों का भी है
इसलिए भट्टियों का वर्तमान भी गर्म है
पंक्तियाँ अभी शेष हैं
शायद इतनी लंबी कि खून के फव्वारों से
भट्टियों का एक दिन अस्तित्व भी मिट जाए.
उस भविष्य का सिर्फ एक कोण धुंधला है
इल्म और तालीम वालों का इतिहास.


2. ताकि एक कविता कह सकूँ

नतमस्तकों के मुहल्ले से भागने में
एक पुख़्ता उम्र बीत गई.
कंधे से जनेऊ और कपाल से कृपा सरकाने में
एक पुख़्ता दुनिया छूट गई.
चरित्र से संस्कार और संस्कार से चरित्र खरोंचने में
संभावित भविष्य खंड-खंड हो गया.
अब सीखना चाहता हूँ, गिरे लोगों की गिरी ज़ुबान को
एक गिरी हुई भाषा
एक गिरा हुआ व्यक्तित्व
एक लहू-लुहान वर्तमान
एक टूटा हुआ भविष्य
सिर्फ इसलिए ताकि
एक नीच, अधर्मी, चरित्रहीन कविता लिख सकूं.
पर ध्यान रहे उस कविता के अंत में
मुझसे मेरी जात मत पूछना.


3. हम होंगे

जब जूता नहीं था, पैर था.
जब बर्गर नहीं था, गेंहू था.
जब मोबाइल नहीं था, भाषा थी.
जब शिक्षक नहीं थे, शिक्षा थी.
जब घर नहीं था, जंगल था.
जब विकास नहीं था, दुनिया थी.
जब तंत्र नहीं था, लोक था.
एक दिन फिर तुम नहीं होंगे, हम होंगे।


4. तुम सुरक्षित हो

चारों पहर की दुर्घटनाओं से
बचते-बचाते नाले-सड़कों पर
नींद आ जाती है हमें
इसलिए तुम सुरक्षित हो।

तुम सुरक्षित हो कि
पिता की कु-समय हत्या पर
ग़ुस्से से पथराई आंखों के सामने
उसके अंशनुमा पौत्र की किलकारियाँ
गूंज रही होती हैं।

तुम सुरक्षित इसलिए भी हो कि
हमें अपने जीर्ण-जीवन से अधिक
तुम्हारे विलासितापूर्ण जीवन से संवेदना हैं।

यकीन जानो तुम्हारे इतराने की सभी खोखली कलाएँ
तभी तक सुरक्षित है जब तक
हमारी थकान भारी नींद जारी है।

ध्यान रहे, तुम्हारे मृदंगीय कटु अलाप से हमारी नींद न खुले
वरना
हमारा एक पहर भर का जागना
तुम्हारे हज़ार वर्षों के रास-नृत्यों को
भस्म कर देगी।

9 comments :

  1. अलग तासीर की कविताओं को पढ़ के हर्ष हुआ। आक्रोश ,उत्साह ,करुणा सभी कुछ एक साथ ,वाह।

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    1. हौसला आफजाई के लिए शुक्रिया आपका.

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  2. अच्छी कविताएँ हैं भाई मज़दूर (या मजदूर) झा !

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    1. विशेष रूप से आपका आभार आपने वक़्त निकाल कर इसे पढ़ा

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  3. मर्मस्पर्शी कविता दादा।
    आज इंसान सब कुछ जानते हुए भी कुछ समझना नहीं चाहता। आपकी कृतियों में इंसानियत का दर्द झलकता है।
    बहुत खूब...����

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका आपने समय निकाला

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  4. आप सभी को शुक्रिया. जनविजय सर के प्रति आभार कि उन्होंने वक़्त निकाला

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  5. बेहतरीन कविताएं । दूसरी और तीसरी एकदम सध गईं हैं

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