पवित्र प्रेम की भावाभिव्यञ्जना: तीन पहर

समीक्षक- डॉ. अरुण कुमार निषाद

पुस्तक: तीन पहर (अवधी नाटक)
लेखक: प्रो. रवीन्द्र प्रताप सिंह
प्रकाशन: सनलाइम पब्लिकेशन्स, जयपुर
संस्करण: प्रथम संस्करण 2018
मूल्य: ₹ 180 रुपया
पृष्ठ संख्या: 64।


प्रेम के बिना यह संसार अधूरा है। सुप्रसिद्ध शायर आमिर उस्मानी के अनुसार-“आबलों का शिकवा क्या ठोकरों का गम कैसा/आदमी मोहब्बत में सब कुछ भूल जाता है।” प्रेम का दूसरा नाम ही भगवान है। प्रेम के रुप पृथक्‍-पृथक्‍ हो सकते हैं,पर करते सभी हैं। कोई लौकिक प्रेम में मग्‍न है तो कोई पारलौकिक। परन्तु आशिक और माशूका के प्रेम का जो आनन्द है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। वह अवर्णनीय है। प्राचीनकाल से लेकर अद्यतन इस पर न जाने कितने गद्य-पद्य लिखे जा चुके हैं और लिखे जायेंगे कहा नहीं जा सकता। यह कभी न समाप्त होने वाला एक ऐसा विषय है, जिस पर तब तक रचनाएँ रची जायेंगी जब तक इस पृथ्वी पर मनुष्य का अस्तित्व रहेगा। हाँ कालक्रम के साथ इन रचनाओं में अधिकता या न्यूनता आ सकती है।

अरुण कुमार निषाद
समकालीन साहित्यकारों में प्रो. रवीन्द्र प्रताप सिंह कोई नया नाम नहीं है। उनकी लेखन शैली ही उनकी पहचान है। लीक से हटकर लिखना उनकी आदत में शुमार है। हाल में ही उनका अवधी नाटक "तीन पहर" प्रकाशित हुआ है। वैसे लेखक प्रोफेसर हैं तो विषय की नवीनता उनकी रचनाओं में स्वभाविक है, परन्तु जो अन्वेषण करके वे पाठकों को देते हैं, उससे आश्चर्यचकित हुए बिना पाठक रह नहीं पाता है। प्रो.सिंह हैं तो अंग्रेजी के प्रोफेसर पर हिन्दी और अवधी के भी वे सिद्धहस्त कलमकार हैं।
अगर प्रेम सच्चा है तो उसे प्राप्त करने से कोई रोक नहीं सकता है। लाख रुकावट और विघ्न बाँधाएँ भी चाहने वाले के सामने दीवार नहीं खड़ा कर सकती। जो जिसके लिए बना है उसे प्राप्त हो कर ही रहेगा। जाति-पाँति, ऊँच-नीच, गोरा-काला, कोई मयाने नहीं रखता। सच्चा प्रेम दिलों का नहीं दो आत्माओं का मेल है। दो दिलों का एकाकार हो जाना ही प्रेम है।
सहजू-(आवाज ऊँची कै कय) ठीक है, जात पाँत धरम, कुछ नाही, कुछ नाही होत है ई सब ....।
प्रेम की भी अपनी एक मर्यादा होती है, जो बातें लोग अपने घर परिवार में नहीं कह पाते हैं उसे यार दोस्तों के माध्यम से घर वालों तक पहुँचवाते हैं। जुग्गू भी अपने दोस्त सहजू और हौंसिला से अपने दिल की बात कहता है।
जुग्गू- बोली? कहव तौ बोल दई, नाही तौ छोड़ौ।
सहजू हौंसिला केर साथ-साथ सुर- हाँ भई बोलौ।
जुग्गू-हम गैरजात से प्रेम करी।
प्रो.सिंह का भी यह मानना है कि प्रेम और आकर्षण दो अलग-अलग चीजें हैं प्रेम शाश्वत है और आकर्षण क्षणिक।
सहजू- (गम्भीर बन कै) अच्छा......। सोच लेव भइया इव प्रेम आय की आकरषन। दुइ तीन दिन मा कउन प्रेम –विरह।
प्रो. सिंह कहते हैं कि सच्चा प्रेम भगवान का रूप है परन्तु आज यह बहुत मुश्किल से प्राप्त होता है 99% प्रेम तो केवल दिखावा है। जिसमें वासना कूट-कूट कर भरी होती है क्षणिक आनन्द के लिए युवक युवतियां एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं और वासना की भूख मिटते ही प्रेम का सारा बुखार उतर जाता है। ऐसे प्रेम में सच्चा प्रेमी या प्रेमिका अपने को ठगा महसूस करता है। सच्चा प्रेम करने वाला यह नहीं समझ पाता कि उससे कौन सी गलती हो गई जिसकी सजा उसे मिल रही है।
सूक्ष्मदृष्टि डालने पर ऐसा प्रतीत होता है कि भोजपुरी भाषा की लोककलाओं के सहेजने का जो कार्य महेन्द्र मिश्र और भिखारी ठाकुर ने किया था, अवधी में उसी लोककला को बचाने का कार्य प्रो. रवीन्द्र प्रताप सिंह कर रहे हैं।
भाषा के प्रयोग में प्रो. रवीन्द्र तनिक भी नहीं हिचकिचाते। उन्होंने ठेठ अवधी शब्दों का प्रयोग अपने इस नाटक में किया है, जो कथाकथित अपने को सभ्य कहलाने वालों को अश्लील लग सकता है। परन्तु भाषा और बोली का आनन्द तभी है जब वह अपना अल्हड़पन लिए हुए हो। जैसे-लंठ, लौंडे, सरऊ, लद्द से, पेलिहैं, ओंकत-पोंकत, नीक-सूक, नास पीटा, पलवैयय काटी, कंटाइन, टोर्रा, जंडइल, हिंया कटहर छीलत हौ बैठा आदि।
गंवई लोकोक्तियों (कहावतों) का भी खूब प्रयोग हुआ है।
1.बिन मारे बैरी मरै
इव सुख कहाँ समाय 
2.नीम केरी चिपटी नीमै मा लागी
3.करिया अच्छर भंइस बराबर
4.दाल भात मा मूसर चन्द आदि।
अवधी नाटक होने के बावजूद भी यह नाटक अरस्तू द्वारा प्रतिपादित नाटक के 6 तत्त्वों (कथावस्तु, चरित्र-चित्रण, शैली, विचार या संवाद, अभिनेयता और गीत) से परिपूर्ण है। 
प्रो. रवीन्द्र प्रताप सिंह इस नवीन प्रयोग के लिए बधाई के पात्र हैं। उनको साधुवाद। उन्होंने समाप्ति की ओर बढ़ रही लोककलाओं को अपने नाटक के माध्यम से संवर्धित और संरक्षित करने का एक अच्छा प्रयास किया है। इस नई रचना के लिए अशेष मंगलकामनाएँ।

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