कविता के नये प्रतिमान और स्वातंत्र्योत्तर प्रमुख आंदोलन

- भारती शर्मा

शोधार्थी, एम.फिल. (हिंदी), दिल्ली विश्विद्यालय, नई दिल्ली


“समूची नई कविता को ठीक-ठीक देखने के लिए नई कविता के प्रतिमान की ज़रूरत नहीं है, बल्कि कविता के नए प्रतिमान की ज़रूरत है।“1 - विजयदेव नारायण साही
                  'कविता के नए प्रतिमान’ (1968) हिन्दी का ऐसा महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें की गई स्थापनाएँ लम्बे वाद-विवाद के बाद हिन्दी काव्य समीक्षा में स्वीकृत हुई है। नामवर जी ने 'नई आलोचना' के औजारों (तथ्यों) का उपयोग करके ग़लत समझे जाने का खतरा उठाकर उन प्रतिमानों का विश्लेषण करते हुए उनके साथ आए दृष्टिकोण की एकांगी पर विस्तृत विचार करते हुए अपनी प्रगतिशील दृष्टि को स्थापित किया है।
                    नामवर जी लिखते है कि 'कविता के नए प्रतिमान' पुस्तक का केंद्र मुक्तिबोध है, जिसका एक कारण यह है कि मुक्तिबोध एक रचनाकार होने के साथ-साथ एक अच्छे आलोचक भी है। नामवर जी पर कई आलोचकों जैसे नेमिचंद्र जैन आदि ने 'रूपवादी झुकाव' होने का दावा भी किया है, परन्तु नामवर जी का कहना है कि मैंने संपूर्ण पुस्तक में 'सापेक्ष स्वतंत्रता' का पक्ष लिया है।
                   नई कविता पत्रिका ने विजयदेवनारायण साही के संकेत के आधार पर 'कविता के नए प्रतिमान' का प्रश्न उठाया। इस चर्चा में भाग लेते हुए श्री नागेश्वर लाल लिखते हैं, “इस प्रश्न को अब सहि ढंग से उठाया जा रहा है। नई कविता के प्रतिमानों के बदले कविता के नए प्रतिमानों पर विचार करना अधिक अर्धपूर्ण है।“2
                  कविता के नए प्रतिमानों पर विचार करते हुए अक्सर विद्वान कविता के पुराने प्रतिमानों की ओर देखते है। इसी समस्या की ओर संकेत करते हुए श्री कुवरनारायण ने 'हिन्दी आलोचना और रचनात्मक साहित्य' में लिखा है, “आज भी हिन्दी समीक्षा के सिद्धांत-पक्ष और व्यवहार-पक्ष में यह विषमता बनी हुई है। अधिकांश समीक्षा के पीछे बिल्कुल व्यक्तिगत रूचि और काव्यानुभव रहता है- समीक्षा के सुनिश्चित मानदंड या तो होते ही नहीं, या ऊल-जुलूल होते है।“3
                  'कविता के नए प्रतिमान' और स्वातंत्र्योत्तर प्रमुख आंदोलन- ऐतिहासिक दृष्टि से नयी कविता 'दूसरा सप्तक (1951) ई० के बाद की कविता है। लक्ष्मीकांत वर्मा के अनुसार नयी कविता मूलतः (1953) ई० में 'नये पत्ते' के प्रकाशन के साथ विकसित हुई और जगदीश गुप्त तथा रामस्वरूप चतुर्वेदी के संपादन में प्रकाशित होने वाले संकलन 'नयी कविता' (1954) ई० में सर्वप्रथम अपने सम्पूर्ण प्रतिमानों के साथ प्रकाश में आई। नई कविता का मूल स्त्रोत युग-सत्य और युग-यथार्थ में है।
                डॉ जगदीश गुप्त ने 'नयी कविता' के अंको में नयी कविता पर विस्तार से विचार किया है। उनके अनुसार -
“मेरा निश्चित मत है कि आज का साहित्य रसानुभूति के आधार पर नहीं सह-अनुभूति के आधार पर व्याख्यातित किया जा सकता है। और इतना ही नहीं, सह-अनुभूति, रसानुभूति के मूल में भी निहित है।”4
                 डॉ.जगदीश गुप्त के अनुसार 'नयी कविता' की मूल स्थापनाओं में चार पांच तत्व मुख्य है। - (1) नयी कविता का विश्वास आधुनिकता में है। (2) नयी कविता जिस आधुनिकता को स्वीकार करती है, उसमें वर्जनाओं और कुंठाओं की अपेक्षा मुक्त यथार्थ का समर्थन है। (3) इस मुक्त यथार्थ का साक्षात्कार वह विवके के आधार पर करना अधिक न्यायोचित मानते है। (4) क्षण का दायित्व और नितांत समसामयिकता का दायित्व नयी कविता में है। (5) पाँचवा तत्व है अर्थ की लय।
               डॉ. रामदरश मिश्र के अनुसार, “इस प्रकार नयी कविता की सबसे बड़ी विशेषता है कथ्य की व्यापकता।”5
   लक्ष्मीकांत वर्मा ने नयी कविता की मुख्य पाँच प्रकार की प्रवृत्तियाँ बताई है -
(1) यथार्थवाद अहंवाद की प्रथम प्रवृत्ति है, जिसमें यथार्थ की स्वीकृति के साथ-साथ कवि अपने अस्तित्व को उस यथार्थ का अंश मानकर उसके प्रति जागरूक अभिव्यक्तियाँ देता है। यथार्थवाद अहंवाद के कवियों में 'अज्ञेय' मुक्तिबोध, कुंवर नारायण, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना आदि की रचनाएँ है।
(2) दूसरी प्रवृत्ति व्यक्ति-अभिव्यक्ति की स्वच्छंद प्रवृत्ति है यह प्रवृत्ति प्रभाकर माचवे और मदन वात्स्यायन में है।
(3) तीसरी प्रवृत्ति आधुनिक यथार्थ से द्रवित व्यंग्यात्मक दृष्टि की है। इसमें लक्ष्मीकांत वर्मा, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, भवानीप्रसाद मिश्र और विजयदेवनारायण साही की रचनाएँ है।
(4) चौथी प्रवृत्ति ऐसे कवियों की है, जिसमें रस और रोमांच के साथ-साथ आधुनिकता और समसामयिकता का प्रतिनिधित्व संपूर्ण रूप से हुआ है। इसके अंतर्गत गिरजाकुमार माथुर, नेमिचंद्र जैन और धर्मवीर भारती आते है।
(5) इसमें वह चित्रमयता और अनुशासित शिल्प है, जिसमें आधुनिकता समस्त यथार्थ को केवल बिंबात्मक रूप में ग्रहण करती है। इसके अंतर्गत जगदीश गुप्त, केदारनाथ सिंह और शमशेर बहादुर सिंह आते है।
               इस प्रकार मुख्य रूप से नयी कविता की विशेषताएँ है - क्षणवाद और लघु मानवता, अनुभव की प्रामाणिकता, अनास्था, मूल्यों का परीक्षण और क्षरण, व्यंग्य, नित नये वादों का आंदोलन एवं कलागत विशेषताएँ आदि है। नयी कविता पर विचार करने के लिए पुरानी शास्त्रीय मान्यताएँ उपयोगी नहीं है, बल्कि नई कविता को जानने के लिए हमें ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, संकटग्रस्त मनुष्य की मनः स्थिति, नकार संत्रास ओर यंत्रणा के चित्र, कला और सौंदर्य के प्रति नवीन दृष्टि आदि पर विचार करने की आवश्यकता है।
                आज के युग में नए-से-नए प्रतिमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती छायावादी संस्कार है। डॉ. जगदीश गुप्त ने कविता की परिभाषा देते हुए लिखा है -
                  “कविता सहज आंतरिक अनुशासन से युक्त अनुभूतिजन्य सघन लयात्मक शब्दार्थ है, जिसमें सहानुभूति उत्पन्न करने की यथेष्ट क्षमता निहित रहती है।” 6
                    ध्यान देने वाली बात यह है कि 'नई कविता' की यह परिभाषा जिसने दी है वह 'नई कविता' के प्रवक्ता ही नहीं बल्कि स्वयं कवि भी है। परन्तु इसमें उन्होंने ऐसा कुछ नया नहीं कहा जो पहले नहीं कहा गया था या फिर यो कहें कि इनकी इस परिभाषा में छायावाद तो अवशिष्ट रह गया, किंतु 'नई कविता' जड़ न जमा पाई।
                     इसी प्रकार सैद्धांतिक आधार देने के लिए डॉ. नागेंद्र ने 'कविता क्या है' निबंध में तुलसीदास की एक पंक्ति को लक्ष्य बनाया और इस तरह तुलसीदास के आधार पर अपनी कविता-परिभाषा बनाकर उन्होंने पहले ही प्रकट कर दिया कि वह किस युग के लिए उपयोगी है। छायावाद के उदय के समय शुक्ल ने भी 'कविता क्या है' निबंध लिखा था। इस प्रकार डॉ. जगदीश गुप्त परम्परा के नाम पर छायावाद से नई कविता को जोड़ना चाहते हैं और डाॅ० नगेंद्र उसे छायावाद में समेटना चाहते हैं। इस खींच-तान के कारण श्री लक्ष्मीकांत वर्मा ने लिखा हैं, “नई कविता और छायावाद के बीच जो अर्धचेतन मन में समझौता प्रयोगवाद के रूप में हुआ था, वह सब-का-सब अब उलटकर आ पड़ा है।”7
                     इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आज भी छायावादी काव्य-संस्कार प्रबल है। डॉ.नगेंद्र का रस-सिद्धांत, जिसे नई कविता के संदर्भ में पूर्णता प्रदान करने के लिए उन्होंने पूरक-रूप में काव्य नामक पुस्तक भी लिखी है। डॉ. नगेंद्र के रसवाद पर छायावादी काव्य का प्रभाव है।
                     छायावादी काव्य-रचना की प्रक्रिया जहाँ भीतर से बाहर की ओर है, वहाँ नई कविता की रचना-प्रक्रिया बाहर से भीतर की ओर है। एक में रूप पर प्रभाव का आरोपण है तो दूसरी में रूप का भाव में रूपांतरण है। यही कारण है कि नई कविता, छायावाद के समान ही 'अनुभूति' पर बल देते हुए भी भावों की शाश्वतता के प्रति उतनी आश्वस्त नहीं है। दूसरे सप्तक की भूमिका में अज्ञेय लिखते हैं, “यह कहा जा सकता है कि हमारे मूल राग-विराग नहीं बदले-प्रेम अब भी प्रेम है और घृणा अब भी घृणा, यह साधारणतया स्वीकार किया जा सकता है। पर यह भी ध्यान में रखना होगा कि राग वही रहने पर भी रागात्मक संबंधों की प्रणालियाँ बदल गई हैं और कवि का क्षेत्र रागात्मक संबंधो का क्षेत्र होने के कारण परिवर्तन का माध्यम बना है।” 8
                      कहना न होगा कि जो आलोचक इस परिवर्तन को नहीं समझ पा रहे हैं, वे उस वास्तविकता से टूट गए हैं जो आज की वास्तविकता है।
                    नई कविता को कविता के रूप में जाँचनें तथा उसके प्रतिमान के निर्धारण के लिए उसे काव्यानुभूति की इस बदली हुई बनावट को ध्यान में रखना होगा तथा इसके प्रतिमानों पर विचार करने की आवश्यकता होगी। नई कविता के अग्रणी कवियों में मुक्तिबोध प्रमुख है, क्योंकि सबसे पहले उन्होंने ही नई कविता के समझौते का विरोध किया है। उनके अनुसार, “अपनी काट की कविता अपने फेम में फिट होने वाली कविता को तो कविता माना गया है, चाहे वह महत्त्वहीन गद्य ही क्यों न हो पर इसके विपरीत राजनीतिक भावावेश से सम्पन्न काव्य विदू्रप करार दिया गया अथवा उसकी जानबूझ कर उपेक्षा की गई।”9
                         इन्ही प्रतिरोधों के कारण मुक्तिबोध पूरे नये कविता के दौर में उपेक्षित रह गए। काव्य की संरचना पर बल देते हुए अज्ञेय ने कहा, “मैं मानता हूँ कि भावना-प्रधान कविताएँ छोटी ही हो सकती है... जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक मे स्मृति सी छाई वह एक आँसू बनकर आए यहाँ तक तो ठीक है, किंतु जब वह बरसात की झड़ी सी बरसने लगती है तब वह शायद वहीं पीड़ा नहीं रहती, और धनीभूत तो भला रही कैसे सकती है।'’10
                        संदर्भ यदि अर्थ है तो कविता की सार्थकता भी परिवेश से जु़ड़ी हुई है। श्रीकांत वर्मा, मुक्तिबोध और विजयदेवनारायण साही के काव्य, संसार की विशेषता बताते हुए नामवर सिंह 'सिरजे हुए संसार' की प्रासंगिकता के विषय में कहते हैं, “निस्संदेह किसी कविता का सिरजा हुआ संसार ही उसका मूल्य है किंतु उस मूल्य की प्रासंगिकता इस स्थिति पर निर्भर है कि वह सिरजा हुआ संसार कितना वास्तविकता है अथवा वास्तविकता के बारे में हमारी समझ को कितना गहरा और कितना समृद्ध करता है।” 11
                       नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि की एक विशेषता यह है कि वे उन अंतर्विरोधों को नज़र अंदाज़ करते है जिनसे साहित्य और समाज के व्यापक हित को हानि पहुँचती हो। इन्होंने काव्य के रस, संरचना, भाव प्रगीतात्मकता, नाटकीयता, परिवेश आदि पर विचार करते हुए कविता के प्रतिमानों पर विचार किया है।
                       नई कविता के बाद साहित्यिक आंदोलन प्रायः कम दिखते हैं, किन्तु कई साहित्यिक प्रवृतियाँ समानांतर रूप में बनी हुई है। सामान्य तौर पर 1960 ई० के बाद की सम्पूर्ण कविता को समकालीन कविता कहा जाता है। इसके अंतर्गत कई प्रकार की प्रवृत्तियाँ विकसित हुई जैसे- अकविता, जनवादी-कविता, नवगीत आंदोलन इत्यादि। इनके अतिरिक्त कुछ गौण प्रवृत्तियाँ जैसे विचार कविता, बीट कविता, अकविता इत्यादि भी दिखती हैं।
                       अकविता 1960 ई० के बाद विकसित हुआ आंदोलन है। इसे प्रतिष्ठित करने की पहली कोशिश 1963 ई० में जगदीश चतुर्वेदी के 'प्रारंभ' नामक काव्य संकलन में हुई। अकविता का सबसे प्रसिद्ध काव्य-ग्रंथ 'विजय' है, जिसमें तीन रचनाकारों - गंगा प्रसाद विमल, जगदीश चतुर्वेदी तथा श्याम परमार की रचनाएँ संकलित थी। इस आंदोलन के अन्य प्रमुख कवि हैं - धूमिल, राजकमल चैधरी, मोना गुलाटी, सौमित्र मोहन, मुद्राराक्षस इत्यादि। इनके अतिरिक्त, कैलाश वाजपेयी, श्रीकांत वर्मा व सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कुछ कविताएँ भी इस आंदोलन में शामिल की गई।
                       अकविता  आंदोलन को प्रायः विचारधाराओं तथा विचारों की विदाई की कविता कहा गया है यह किसी भी राजनीतिक विचारधारा को उपयोगी नहीं मानती। लोकतंत्र, समाजवाद जैसे तमाम शब्द इन कवियों के लिए निरर्थक हो चुके हैं। जगदीश चतुर्वेदी नें 'प्रारंभ' की भूमिका में लिखा है, “राजनीतिक विचारों पर काव्य रचने का ज़माना लद चुका है। यह कहने में मुझे कोई अड़चन नहीं कि किसी भी कुंठित या ग्रस्त राजनीतिक विचारधारा में हमारा विश्वास नहीं।” 13
                     स्पष्ट है कि अकविता नई कविता की निषेधवादी प्रवृत्तियों का विस्तार है। हिन्दी कविता के इतिहास में साधारणतः इसे अंधकार व पतन का काल माना गया है। समकालीन कविता में 1967 ई० के आसपास एक नवीन प्रवृत्ति तेजी से उभरी, जिसे जनवादी कविता कहा गया। यह प्रवृत्ति बाहरी तौर पर नवीन प्रतीत हो रही थी किंतु वस्तुतः पहले से चली आ रही प्रवृत्तियों का नव्य-प्रस्फुटन मात्र था। प्रगतिवाद के कुछ कवि प्रगतिवाद के दौर से ही समाजवादी यथार्थवाद की कविताएँ लिख रहे थे, जैसे-नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ-अग्रवाल आदि। ये साहित्यिक आंदोलनों के केंद्र में नही थें किंतु अपनी उपस्थिति अवश्य बनाए हुए थे। 'नई कविता' आंदोलन मे भी कुछ ऐसे कवि शामिल थे जो आधुनिकतावादी थे किंतु व्यक्तिवादी नहीं थे। इनमें शमशेर बाहादुर सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय तथा केदारनाथ सिंह आदि शामिल थे। 1967 ई० के आसपास ये कवि भी जनवाद की ओर प्रेरित हुए। इन दोनों वर्गों के अतिरिक्त अकविता आंदोलन से जुड़े कुछ कवि भी जनवाद की ओर प्रेरित हुए। इनमें प्रमुख थे - धूमिल, कुमार विकल, मगलेश डबराल, लीलाधर जगूड़ी तथा इब्बार रब्बी।
                              जनवादी कविता के आंदोलन में दो चरण दिखाई पड़ते है। पहला चरण- इस चरण में संसदीय लोकतंत्र तथा देश की राजनीतिक स्थितियों के प्रति तीव्र आक्रोश दिखाई पड़ता है। उदाहरण के लिए -
                                       “अपने यहाँ संसद, तेली की वह धानी है,
                                      जिसमें आधा तेल है और आधा पानी है।” 13
                        दूसरा चरण (1975 के बाद) - इस चरण में आपात्काल के दौरान सत्ता के दम के चित्र बहुतायत में दिखाई पड़ते है। आज़ादी का हनन कैसे हो रहा था, इसके अनेक चित्र कवियों ने प्रस्तुत किए है-
                                          “मैं क्या कर रहा था जब मै मरा
                                           मुझसे ज़्यादा जो तुम जानते लगते हो,
                                           तुमने लिखा मैंने कहा था स्वाधीनता
                                           शायद मैंने कहा था - बचाओ।” 14
                                 नवगीत आंदोलन समकालीन हिंदी कविता की एक प्रमुख प्रवृत्ति है। इसका आरंभ कब हुआ-इस प्रश्न पर विवाद है, किन्तु मोटे तौर पर इसे नवलेखन या नई कविता के दौर से संबंधित माना जाता है। वस्तुतः यह आंदोलन नई कविता के एक दावे के विरोध में उपजा है। नई कविता के समर्थक मानते थे कि आधुनिक भावबोध पर आधारित कविताओं की विषय - वस्तु इतनी जटिल व विश्लेषणात्मक है कि इसकी अभिव्यक्ति गीतों के माध्यम से नहीं हो सकती। गीत की रचना के लिए तीव्र भावुकता  रोमानियत और प्रवाह चाहिए, वह आधुनिक काव्यानुभव से सुसंगत नहीं है। इस दावे के विपरीत नवगीत के समर्थकों नें आधुनिक यथार्थ से सम्बद्ध गीत रचे और सिद्ध किया कि गीत अप्रासंगिक विधा नहीं है। उसमें इतनी लोचशीलता है कि वह समकालीन यथार्थ को भी धारण कर सके। यही आंदोलन नवगीत आंदोलन कहलाया। इस आंदोलन के प्रमुख सिद्धांतक हैं - रवीन्द्र भ्रमर तथा रमेश रंजक, कुमार शिव वीरेन्द्र-मिश्र, शंभूनाथ सिंह, ओम प्रभाकर, ठाकुर प्रसाद सिंह तथा उमाकांत मालवीय अन्य प्रसिद्ध नवगीतकार हैं।
                       इस प्रकार हम कह सकते  है कि कविता का सिद्धांत कविता को जाँचने में, चाहे वह पुराना सिद्धांत हो, चाहे आज का सिद्धांत, कई बार बाधक बनता है। किसी सिद्धांत का सहारा लेकर यदि कविता को जाँचे तो उसमें बहुत खतरा है। संभवतः नामवर सिंह इन खतरों को जानते थे। परंतु प्रश्न उठता है कि यह सब जानते हुए भी 'कविता के नए प्रतिमान' नामक पुस्तक लिखने की आवश्यकता क्यो पड़ी? इसका उत्तर वह स्वयं देते हुए कहते है  कि मैंने कोई नए प्रतिमान स्थापित नहीं किए है, बल्कि जो प्रतिमान कविता के लिए पहले से रखे गए है, केवल उनको जाँचा है। वर्तमान समय में कविता के प्रतिमानों तथा कवियों के विषय पर विचार करने की आवश्यकता है। आज कवियों में, पुराने कवियों में से ऐसी अनेक कविताएँ है, जिसके अर्थ पर लोगों की नज़र नहीं पड़ी है। इसलिए कविता को जाँचना-परखना जरूरी है लेकिन प्रदत्त मानदंडों से, निकषों से परम्पराओं से नहीं बल्कि अपने आप स्वार्जित चीज़ों से है।


संदर्भ - ग्रंथ
1. कविता के नए प्रतिमान – डॉ. नामवर सिंह, (राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली)
2. वही पृष्ठ संख्या - 27
3. वही पृष्ठ संख्या - 28
4. वही पृष्ठ संख्या - 26
5. वही पृष्ठ संख्या - 26
6. वही पृष्ठ संख्या - 17
7. वही पृष्ठ संख्या - 20
8. वही पृष्ठ संख्या - 25
9. वही पृष्ठ संख्या - 34
10. वही पृष्ठ संख्या - 140
11. नामवर सिंह संकलित निबंध, पृष्ठ संख्या - 10
12. हिन्दी आलोचना की परिभाषिक शब्दावली- डॉ. अमरनाथ (राजकमल-प्रकाशन, नई दिल्ली) पृष्ठ संख्या - 190
13. वही पृष्ठ संख्या - 190
14. वही पृष्ठ संख्या - 191

(सहायक ग्रंथ)
1. कविता के नामवरी प्रतिमान: कितना अर्थ, कितना अनर्थ - सुशील कमुार
2. सुरेन्द्र चैधरी - विराट ऐतिहासिक संदर्भों से समृद्ध आलोचक - मार्तंड प्रगल्भ

1 comment :

  1. बहिन भारती शर्मा जी का यह लघु शोध लेख हिन्दी साहित्य की नई कविता के विषय में जो जानकारी उपलब्ध करा रहा है वह बहुत उपयोगी है।

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