व्यंग्य: साहब के दस्तख़त

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

हम साहब के बड़े क़द्रदाँ हैं। जब भी उनके चेम्बर में उनकी झलक मिलती है, हमारी भोज्य पाई फाइलों में कागज़ात उफनने लगते हैं। कागज़ात साहब के पेन का स्पर्श या वैतरणी पार करना चाहते हैं, इसलिए तारक मुद्रा में साहब पूछते हैं, क्या करना है? हम कहते हैं दस्तख़त सर। वे साहबी अंदाज में पूछते हैं, कहाँ करना है? हम उँगली से रिक्त स्थान बता देते हैं। साहब अपनी प्रतिभा को सुरक्षित रखने के लिए पूछ बैठते हैं, ‘सब ठीक है न, देख लिया है न।’ हम हमारे शरीर को ‘यस सर नुमा’ झटका देते हैं। उनके दस्तख़त के बाद काग़ज़ हुक्म हो जाता है और चूहा पहलवान। दस्तख़त के इस विटामिनत्व के कारण हम सब साहब के क़द्रदाँ हैं, चमचे हैं और वह सब कुछ हैं जो भाषा के परे है।
हमने कई साहब देखे हैं। छोटे-बड़े कई साहब हमारे हाथ के नीचे से निकले हैं और निकलते ही उनके दस्तख़त का दर्ज़ा ऊँचा हो गया है। इसके लिए वे हमें आज तक याद करते हैं और अपने दायें-बायें कहीं रख लेते हैं। घोड़े के पीछे और अफ़सर के आगे चलना हमारी परम्परा के विरुद्ध है क्योंकि घोड़ा पीछे से दुलत्ती और अफ़सर सामने से दस्तख़त मारता है।
साहब नए-नए आए थे, इसलिए इधर कमाऊ महकमा मिला। पहले दिन उन्होंने दो चार दस्तख़त ही किए। उनकी धीमी गति से सारे विभाग में खलबली मच गई। जनता विरुदावली पढ़ने लगी। हमसे रहा नहीं गया। साहब के पास पहुँचे और अदब के साथ कहा – सर, बहुत सारे ज़रूरी कागज़ातों पर आपके दस्तख़त होना है सर, दस्तख़त थोड़ी तेज़ी से हो जाएं तो अच्छा रहे, आप कहें तो मैं कुछ मदद कर दूँ सर। उनका युवा ख़ून मुझे अतिक्रमण के लिए रोकना चाह रहा था, कि मैंने जन आक्रोश की उन्हें ख़बर दे दी। वे फटाफट दस्तख़त करने लगे। तब से वे तेज़ी से दस्तख़त करने में लगे हैं। उनके काग़ज़ चल रहे हैं, प्रशासन चल रहा है, और सरकार चल रही है।
हम दस्तख़त की गति से देश की नब्ज़ भाँपते हैं। पहले जब साहब अंग्रेज़ी में रामलाल लिखते थे, फाइलें देरी से निबटती थीं। दूसरे अधिकारी उनके दस्तख़त देख अंदाज़ लगा लेते थे, ‘नई भर्ती है, इस पर रौब गाँठो।’ इस कारण हमारी फाइलें वापस आने लगीं। हमारा धंधा बैठ गया। साहब उदास हो गए। उनका तख्ते-ताउस डगमगाता नज़र आया। हमारे साहब का अपमान हमारा अपमान था। हमसे रहा नहीं गया। हमने साहब को गुरु मंत्र दिया, ‘सर आपके दस्तख़त साहबों जैसे नहीं हैं सर, साहब के दस्तख़त की भाषा नहीं होती सर। दस्तख़त का पहला अक्षर अंग्रेज़ी में तो दूसरा हिन्दी, तेलगु या हिब्रू का होता है सर। बाकी तो लाइन स्केच रहता है सर। इसलिए साहब के दस्तख़त की कोई लिपि नहीं होती सर। साहब के दस्तख़त बड़े होते हैं विशालता बताने वाले, संकुचित स्वभाव बताने वाले छोटे-छोटे नहीं होते सर। अनुभव और क्षमता से ज़्यादा दम दस्तख़त में होता है सर।”
साहब ने हमारी बात गाँठ बाँध ली। हफ़्ते भर दस्तख़त बनाना ही सीखते रहे और उन्होंने दस्तख़त विधा को नए आयाम दिए। अब साहब के दस्तख़त में प्रवाह है, ओज है, गोपनीयता और गंभीरता है, इसलिए उसमें शक्ति है। गंभीरता से अध्ययन करने वालों को साहब के दस्तख़त रोनाल्ड रेगन, रोमियो रौलां या राजीव गाँधी का व्यक्तित्व प्रस्तुत करते हैं, रामलाल का नहीं। अब उनके दस्तख़त से चली फाइलें बेखटके दौड़ती हैं और मैराथन जीतकर लौट आती हैं।

साहब के दस्तख़त इतने लोकप्रिय हैं कि आम लोग साहब से ज़्यादा साहब के दस्तख़त को पहचानते हैं और छुप-छुप कर साहब के दस्तख़त साधने की कोशिश करते हैं। उनके दस्तख़त से अब तक इतने काम हो गए हैं जो साहब जैसे दस बीस साहब, जन्मों नहीं कर सकते। धन्य हैं साहब के दस्तख़त। हम साहब के इसलिए भी क़द्रदाँ हैं कि साहब आँख मींच कर दस्तख़त करना सीख गए और इतनी ऊँचाई पर पहुँच गए।
जब साहब का तबादला होगा, साहब और ऊपर उठेंगे, और ज़्यादा ज़रूरी काग़ज़ों पर तब दस्तख़त करेंगे। हम तो सेवक हैं, छोटे मुँह बड़ी बात क्या करना, पर साहब के दस्तख़त देखकर हमें ख़ुशी होती है और होगी कि हमने उन्हें दस्तख़त करना सिखाया और क़ाबिल बनाया।

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