सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास में शिक्षा का योगदान

कुमार सौरभ

- कुमार सौरभ 

शोधार्थी, तेजपुर विश्वविद्याल, तेजपुर, असम
चलभाष: +91 801 181 0461
ईमेल: saurabhpoet@gmail.com

जब हम किसी विचार प्रणाली को देश की सीमावर्ती क्षेत्र के परिप्रेक्ष्य में सोच रहे होते हैं तो हमारी नज़रों में एक ऐसे क्षेत्र की परिकल्पना आती है जहाँ जन-जीवन मुख्यधारा में शामिल क्षेत्रों की तुलना में दुर्गम तथा कठिन है। शिक्षा का एक महत्वपूर्ण कार्य जीवन की दुरूहता को कम करना भी है। मानव विकास के इतिहास में शिक्षा की प्रमुख भूमिका रही है। शिक्षा और शिक्षा से जुड़े सरोकारों का क्षेत्र बहुत व्यापक है। सीमावर्ती क्षेत्र में शिक्षा के योगदान पर विचार करने से पूर्व यह लाज़िमी है कि शिक्षा के विविध सरोकारों को अपनी दृष्टि-पथ पर रखा जाए। अमेरिका के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री जॉन डिवी ने 1916 में एक महत्वपूर्ण पुस्तक ‘शिक्षा और लोकतन्त्र’ लिखी जिसमें शिक्षा को निम्नलिखित रूपों में देखा गया-
जीवन की आवश्यकता के रूप में
1) सामाजिक कार्य के रूप में
2) दिशा निर्देश के रूप में
3) विकास के रूप में
4) वर्तमान के साथ भावी जीवन की तैयारी एवं ज्ञान-विस्तार के रूप में
5) प्रगतिशील लोकतान्त्रिक चेतना के रूप में ।

जॉन डिवी का शैक्षिक दर्शन शिक्षा की वृहत्तर भूमिका की एक झलक मात्र है। शिक्षा जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। ध्यातव्य है कि चेतन प्राणी तथा जड़ पदार्थों के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह होता है कि चेतन प्राणी नवीकरण के द्वारा अपना अस्तित्व कायम रखते हैं और इस नवीकरण की प्रक्रिया में शिक्षा की महत्तर भूमिका है। इस नवीकरण की प्रक्रिया द्वारा मनुष्य केवल अपने अस्तित्व को ही कायम नहीं रखता है बल्कि अपने कौशल तथा रीति-रिवाजों को भी जीवित रखता है। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि देश का सीमावर्ती क्षेत्र अपने में कई विशिष्ट हुनरों, रीति-रिवाजों को समेटे हुए है। यह शिक्षा ही है जो इन विशिष्टताओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने का काम करती है, और विशेषताओं का यह पीढ़ीतर गमन परोक्ष रूप से कई हुनरों और रीति-रिवाजों का जीवन-रक्षक बन जाता है। उदाहरण के तौर पर अगर हम माजूली के ‘मुखौटा कला’ की अब तक की विकास-यात्रा को देखें तो पाएंगे कि शिक्षा ने जहाँ एक ओर इस कला के संरक्षण का कार्य किया है वहीं इसके स्वरूप में कई सकारात्मक बदलाव भी इस शिक्षा की वजह से आये हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि शिक्षा न सिर्फ जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है अपितु वह इन आवश्यकताओं के संरक्षण का भी कार्य करता है। जरा सोचिये कि अगर हेमचन्द्र गोस्वामी ने मुखौटा कला से संबंधित विविध प्रयोग नहीं किए होते तो आज इस कला का क्या रूप होता? कहने का आशय है कि शिक्षा में अनुप्रयोगों का खासा महत्त्व है, अनुप्रयोग एक कसौटी की तरह कार्य करता है जिसपर हम किसी वस्तु की प्रासंगिकता को समय के बदलाव के साथ-साथ परख सकते हैं। ध्यातव्य है कि कोई वस्तु आज जिस स्वरूप में हमारे लिए उपयोगी है कल भी उसी रूप में उपयोगी होगा यह आवश्यक नहीं है। रेन डेकार्ट लिखते हैं कि “कोई भी सत्य अंतिम सत्य नहीं है” अगर कोई भी सत्य अंतिम सत्य नहीं है तो हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए की सत्य का निरंतर अनुसंधान करते रहना ही सच्ची शिक्षा है।

जीवन की आवश्यकता, नये अनुप्रयोग, और सत्य के निरंतर अनुसंधान के साथ-साथ सामाजिक कार्य के रूप में शिक्षा की महत्तर भूमिका है। इस विषय में जॉन डिवी का मत दृष्टव्य है- “न केवल सामाजिक जीवन को अपने स्थायित्व के लिए शिक्षण और ज्ञानार्जन की आवश्यकता होती है, बल्कि साथ रहने की प्रक्रिया अपने आप में शिक्षाप्रद होती है। उससे अनुभव विस्तृत और प्रबुद्ध होता है- उससे कल्पना उत्प्रेरित होती है और उसमें प्रगाढ़ता आती है, उससे कथ्य और विचार की सत्यता और विशदता के सम्बन्ध में ज़िम्मेदारी की भावना आती है।”[1] देश की सीमावर्ती क्षेत्र में फैले विभिन्न जनजातियों के बीच आपसी सौहार्द के निर्माण और अनुभव के आदान-प्रदान में शिक्षा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और जहाँ इस शिक्षा का अभाव हुआ है वहां दो भिन्न समुदायों के बीच सहयोग का स्थान संघर्ष ने ले लिया है। राजनतिक दलों ने अपने स्वार्थ-सिद्धि के लिए इन संघर्षों को लगातार बल दिया है, क्योंकि उन्हें इसी पर अपने सत्ता की रोटी सेंकनी है। सीमावर्ती क्षेत्र के भोले-भाले जनता के अन्दर राजनीतिक विवेक विकसित करने का काम भी शिक्षा करती है। वह उसे विभिन्न राजनीतिक पार्टियों में से उचित-अनुचित का चयन करने के लिए मार्गदर्शन देती है।

           शिक्षा व्यक्ति में आंतरिक विवेक का निर्माण करती है जिससे वह उचित अनुचित का निर्णय कर जीवन को सार्थक दिशा निर्देश दे सके। जे. कृष्णमूर्ति लिखते हैं- “जब व्यक्ति में आन्तरिक दृष्टि नहीं होती, तब बाहरी सत्ता एवं पद बहुत बड़ा महत्त्व ले लेते हैं और तब व्यक्ति सत्ता एवं दबाव के अधिकाधिक अधीन होता चला जाता है, वह दूसरों का पुर्जा भर बनकर रह जाता है।”[2] देश के सीमावर्ती क्षेत्र में शिक्षा का महत्त्व इस लिहाज से भी है कि शिक्षा इस भूभाग में निवास करने वाले मनुष्यों को महज़ पुर्जा बनकर रहने नहीं देगा। यंत्रीकरण के इस दौड़ में जब सम्पूर्ण सत्ता व्यवस्था मनुष्य को पुर्जा मात्र बनाने पर तुली है, ऐसे में देश का कोई भी भूभाग अगर सच्ची शिक्षा से अछूता रहा तो यह बाज़ारवादी व्यवस्था उसे लील जाएगी।

           हम सब एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जब शिक्षा का माध्यम और उसका लक्ष्य दोनों बहुत तेजी से बदल रहा है। यह बदलाव का समय है, इस समय में शिक्षा की मूल परिकल्पना में तीव्रतम गति से आ रहे बदलाव को समझना बेहद ज़रूरी है। जिस शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का बौद्धिक, शारीरिक और भावनात्मक विकास कर सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से श्रेष्ठ नागरिक तैयार करना था, उस शिक्षा के लक्ष्य में औद्योगिक क्रांति के बाद से ही बहुत बड़े परिवर्तन को लक्षित किया जा सकता है। औद्योगिक क्रांति के बाद से ही शिक्षा मानव संसाधन को तैयार करने वाले साधन के रूप में महत्त्व पाने लगी। लिखने, पढ़ने, गिनने में दक्ष होना शिक्षा की कसौटी बन गयी, उत्पादन की कुशलताएँ शिक्षा का ध्येय बनने लगीं। इस पूरी परिवर्तन की प्रक्रिया का एक घातक परिणाम यह हुआ कि शिक्षा अपने मूल लक्ष्य से भटक गयी। हमने पर्यावरण का लगातार दोहन किया, कंक्रीट के जाल बिछाये, हवा में जहर घोला और यह सब करते हुए स्वयं को विकास की ओर आरूढ़ मानते रहे। जिस शिक्षा को विकास का कारण बनना चाहिए था वह शिक्षा विकास के पीछे-पीछे चलने लगी। हमें यह समझना होगा की आर्थिक, सामाजिक, पर्यावरणीय विकास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। किसी एक की अनदेखी कर विकास के सार्थक स्वरूप को प्राप्त नहीं किया जा सकता।  भारतीय परंपरा में शिक्षा केवल उपयोगिता को निर्मित और संवर्धित करने का माध्यम नहीं रही है, बल्कि इसने उचित अनुचित का बोध विकसित करने वाली प्रज्ञा के रूप में अपनी भूमिका निभाई है। इस प्रज्ञा को विकसित करने के लिए शिक्षा के औपचारिक साधन ही पर्याप्त नहीं, बल्कि घर समुदाय आदि को भी शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनी भूमिका की समझ होना अनिवार्य है। अब सवाल उठता है कि क्या देश की औपचारिक शिक्षा व्यवस्था में इतनी जगह शेष रह गयी है कि वह घर, और समुदाय को शिक्षा प्रक्रिया का हिस्सा बनाये? मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि धीरे-धीरे विद्यालय और समाज से बीच की खाई चौरी होती जा रही है। न विद्यालय के पाठ्यक्रम में परिवार और समाज शामिल है, न ही घर और समाज की जीवनशैली में विद्यालय की चारदीवारी के अन्दर का परिवेश। यहाँ तक की घर में व्यवहृत भाषा और विद्यालय में व्यवहृत भाषा में भी पर्याप्त अंतर देखने को मिलता है। असम जैसा सीमावर्ती क्षेत्र जिसने पर्यावरण का अपेक्षाकृत कम दोहन किया है उसे दिल्ली जैसे महानगरों के लिए रोल मॉडल बनना चाहिए। विकास को मापने का एक तरीका यह भी है। शिक्षित और प्रबुद्ध नागरिक को परखने की एक कसौटी यह भी है। यह सोचने का विषय है कि क्या कारण है कि हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था ने उन जीवन-मूल्यों को बिसरा दिया जो जीवन के संरक्षक मूल्य हैं? अगर हम इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए थोड़ी और सूक्ष्म दृष्टि से विचार करें तो पाएंगे कि हमारी शिक्षा व्यवस्था पाठ्य-पुस्तक, और परीक्षा केन्द्रित होती जा रही है। इसलिए यह आवश्यक है की शिक्षा को पाठ्य-पुस्तक मात्र में सीमित न होने दिया जाए, एवं उसे ज्यादा से ज्यादा व्यवहारिक बनाने का प्रयत्न किया जाए।

           देश के सीमावर्ती क्षेत्र के विकास में शिक्षा की भूमिका इस लिहाज़ से भी महत्वपूर्ण है कि शिक्षा किसी भी स्थिति को देखने के लिए वैज्ञानिक एवं तर्कपूर्ण दृष्टि प्रदान करता है तथा विपरीत परिस्थितियों से निपटने का विवेक भी देता है। सीमावर्ती क्षेत्र में चाहे बाढ़ की समस्या हो, अन्नाभाव हो, किसी योजना के प्रति जागरूकता की कमी हो, या अन्य विपरीत परिस्थिति शिक्षा उसे बेहतर स्थिति में बदलने का माद्दा रखती है। शिक्षा वह माध्यम है जिसके द्वारा देश का सीमावर्ती क्षेत्र उन योजनाओं और गतिविधियों का लाभ उठा सकता है जो उसका अधिकार है। यह सोचने का विषय है कि आज़ादी के 71 वर्षों के बाद भी देश का  अधिकांश सीमावर्ती क्षेत्र मुख्य-धारा की विकास यात्रा में उस हद तक शामिल नहीं हो सका है जितना उसे होना चाहिए! जब हम इनके पीछे के वजहों की पड़ताल करते हैं तो इसकी वजह के मूल में शिक्षा और शिक्षा से जुड़े सरोकार हैं। ध्यातव्य है कि शिक्षा न सिर्फ विभिन्न योजनाओं से सामान्य मनुष्य का परिचय कराती है बल्कि बदलते समय में उन योजनाओं की प्रासंगिकता और सुधार संबंधी विवेक भी प्रदान करती है।
           सीमावर्ती क्षेत्र के सुदूर गाँवों में जहाँ कई तरह के अन्धविश्वास अब भी शेष हैं वहां शिक्षा का महत्त्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि शिक्षा हमें सवाल करना सिखाती है और सवाल पूछना किसी भी सत्य तक पहुँचने की ओर पहला कदम है। आजकल धर्म को जिस रूप में व्याख्यायित किया जा रहा है एवं धर्म के नाम पर मानवीय गरिमा को जिस कदर चोट पहुँचाई जा रही है ऐसे समय में शिक्षा का महत्त्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि वही हमें अंधविश्वास और धार्मिक आडम्बरों से बाहर निकाल सकता है। जे. कृष्णमूर्ति इस विषय में लिखते हैं- “सच्ची धार्मिक शिक्षा का अर्थ है प्रज्ञापूर्वक जागरूक रहने में, वास्तविक और क्षणिक के बीच विभेद करने में तथा जीवन के प्रति तटस्थ दृष्टि अपनाने में बालक की सहायता करना। किन्हीं शब्दों या सूत्रों के बारम्बार बुदबुदाने या दोहराए जाने की अपेक्षा घर या स्कूल में प्रत्येक दिन का शुभारम्भ गहन चिंतन तथा गंभीर एवं महत्वपूर्ण पाठ से हो, तो क्या यह अधिक अर्थपूर्ण नहीं होगा?”[3] शिक्षित व्यक्तित्व की सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि वह स्वयं में निहित संभावनाओं का उत्खनन करना सीख जाता है। ज्यों-ज्यों मनुष्य शिक्षित होता जाता है वह शिक्षा की गरिमा को पहचानने लग जाता है, वह मनुष्य के रूप में अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सचेत होने लगता है।
            शिक्षा वर्तमान के साथ-साथ भावी जीवन की तैयारी भी है इस लिहाज से देश के सीमावर्ती क्षेत्र के परिप्रेक्ष्य में शिक्षा जहाँ एक ओर नये अनुभव को अर्जित करने का एक माध्यम है वहीं दूसरी ओर पूर्व के अनुभव से सीखने का उत्प्रेरक भी है। जॉन डिवी के शब्दों में, “अनुभव के ऐसे पुननिर्माण अथवा पुनः संगठन को शिक्षा कहते हैं जो अनुभव को अतिरिक्त अर्थ प्रदान करता है और जिससे बाद में अनुभवों को दिशा प्रदान करने की योग्यता बढ़ती है।” (शिक्षा और लोकतन्त्र, ग्रन्थशिल्पी, दिल्ली पृष्ठ 49)  यह अनुभव महज़ कक्षा-कक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रसार जीवन के विभिन्न गतिविधियों में है और विभिन्न गतिविधियों से इस अनुभव के अर्जन की प्रक्रिया में वृद्धि होती है। कई ऐसे लोकगीत और लोकनृत्य हैं जिसका संरक्षण और प्रसार शिक्षा के द्वारा ही संभव है। देश के सत्ताधीशों की उपेक्षाओं के बावजूद अगर देश का सीमावर्ती क्षेत्र सांस्कृतिक रूप से संपन्न है तो इसके लिए इस क्षेत्र में निवास करने वाले विभिन्न कलाओं के सरक्षणकर्ता को बधाई दी जानी चाहिए । यहाँ इस बात का उल्लेख किया जाना भी आवश्यक है कि कला की संभावनाओं को औपचारिक शिक्षा में दरकिनार कर दिया गया है। विद्यालय की पाठ्यचर्या में कला को विज्ञान, गणित, भाषा की तुलना में कम जगह दी गयी है और दिनों दिन यह जगह संकुचित होती जा रही है। कला के नाम पर एक-दो क्राफ्ट को शामिल कर खानापूर्ति कर दी जाती है। ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि शिक्षा में कला के महत्त्व को अब तक ठीक-ठीक समझा ही नहीं गया है। यह समझे जाने की आवश्यकता है कि कला एक सांस्कृतिक गतिविधि है, यह खोज की एक विधि है जो जितनी वैयक्तिक है उतनी ही सामाजिक सांस्कृतिक भी। अपने इस शोधपत्र के प्रारंभ में मैंने विद्यालय और समुदाय के बीच जिस रिक्त जगह के लिए चिंता जाहिर कि थी, विभिन्न कलाओं को अगर हम विद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल करते हैं तो उस रिक्त स्थान को भरा जा सकता है। स्थानीय समुदाय की कलाओं और कलाकार को कक्षा में स्थान देना कक्षा को संस्कृति-धर्मी बनाकर उसमें नवजीवन का संचार करती है।

देश का सीमावर्ती क्षेत्र और शैक्षिक साधनों की उपलब्धता- आज़ादी के इतने वर्ष बीत जाने के बावजूद देश के सीमावर्ती क्षेत्र में शैक्षिक साधन सहज रूप से उपलब्ध नहीं हैं। कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ समाचार पत्र जैसी मूलभूत सामग्री भी देर से पहुँचती है तो कई जगहों पर सभी समाचार-पत्रों का पहुँच पाना भी संभव नहीं हो पाता। ऐसे में एक ओर जहाँ यातायात के साधनों को दुर्गम से दुर्गम क्षेत्र तक पहुँचाये  जाने कि आवश्यकता है वहीं दूसरी ओर इन्टरनेट की सुविधा इन क्षेत्रों में सहज रूप से उपलब्ध कराना आवश्यक है। भारत जैसे देश में जहाँ मुख्यधारा के कुछ चुनिन्दा शहरों को छोड़ दें तो प्राथमिक शिक्षा की हालत ज्यादातर शहरों में अच्छी नहीं है वहाँ सीमावर्ती क्षेत्र(जो मुख्यधारा से कई मायनों में कटा हुआ है) में इसकी क्या दुर्दशा होगी यह अनुमेय है। ऐसे में यह आवश्यक है कि सीमावर्ती क्षेत्र की प्राथमिक शिक्षा को बेहतर बनाने का प्रयत्न किया जाएँ, क्योंकि वह समस्त शिक्षा का आधार है।

           प्राथमिक शिक्षा में सुधार के लिए जहाँ एक ओर विद्यालयों को संसाधन-युक्त बनाने पर बल दिया जाना चाहिए वहीं सामान्य-जन को शिक्षा के महत्त्व से परिचित कराना भी आवश्यक है ताकि वे अपने बच्चों को विद्यालय भेजें। वहीं अगर बात उच्च शिक्षण संस्थानों की कि जाये तो दिल्ली जैसे महानगरों की तुलना में यहाँ शिक्षण संस्थानों का अभाव है। इस क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए यह आवश्यक है कि उच्च शिक्षण संस्थानों की इस कमी को पूरा करने की ओर ध्यान दिया जाए। एक ओर जहाँ उच्च गुणवत्ता वाले नये संस्थान खोले जाने की आवश्यकता है वहीं दूसरी ओर दूसरी ओर दूरस्थ शिक्षा जैसे विकल्पों का उचित प्रयोग किया जाना भी ज़रूरी है।

           सारतः यह कहा जा सकता है कि देश का सीमावर्ती क्षेत्र शिक्षा के माध्यम से न सिर्फ अपनी सामाजिक सांस्कृतिक विरासत को संवर्धित कर सकता है बल्कि जीवन की संभावनाओं के उत्खनन में भी शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। हिंसात्मक मनोवृत्ति, बाज़ारवादी मानसिकता, लोक-कलाओं के प्रति उपेक्षा का भाव हमें शैक्षिक नीतियों और उसके क्रियान्वयन पर पुनर्विचार को मजबूर करता है। सीमावर्ती क्षेत्र के विकास के लिए जितनी आवश्यकता शैक्षिक संसाधनों की है उतनी ही दृढ इच्छा शक्ति की भी। सीमावर्ती क्षेत्र की शैक्षिक नीतियों और पाठ्यचर्या का निर्धारण करते वक्त स्थानीय समुदाय, स्थानीय लोक कलाओं एवं स्थानीय जरूरतों का भी ख़ास ख्याल रखा जाना चाहिए।


सन्दर्भ ग्रंथ-सूची
1. जॉन डिवी, ‘शिक्षा का लोकतन्त्र’, ग्रंथशिल्पी, दिल्ली, 2004
2. जे. कृष्णमूर्ति, ‘शिक्षा एवं जीवन का तात्पर्य’, कृष्णमूर्ति फाउंडेशन इण्डिया, वाराणसी, 2005
3. सुभाष शर्मा, भारत में शिक्षा व्यवस्था, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2004
4. एन. सी. ई. आर.टी. राष्ट्रीय पाठ्चार्या की रूपरेखा, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्, नई दिल्ली, 2006
5. जे. कृष्णमूर्ति, शिक्षा एवं जीवन का तात्पर्य, कृष्णमूर्ति फाउंडेशन, इंडिया, वाराणसी, 2005
6. जे. कृष्णमूर्ति, शिक्षा संवाद, कृष्णमूर्ति फाउंडेशन, इंडिया, वाराणसी, 1998
7. एम. एम झा, समावेशी शिक्षा, प्रकाशन संस्था, नई दिल्ली, 2003
8. अनिल सदगोपाल, शिक्षा में बदलाव का सवाल, ग्रंथशिल्पी, दिल्ली, 2004



1.     शिक्षा और लोकतन्त्र, ग्रन्थशिल्पी, दिल्ली, पृष्ठ 6
2.     शिक्षा एवं जीवन का तात्पर्य, कृष्णमूर्ति फाउंडेशन इण्डिया, वाराणसी, पृष्ठ 1
3.      शिक्षा से जीवन का तात्पर्य, कृष्णमूर्ति फाउंडेशन इण्डिया, वाराणसी, पृष्ठ-11

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