मेरा अनुयायी सिर्फ एक है और वह खुद मैं हूँ

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


“हम न मरैं मरिहै संसारा” और “हरि मरिहैं तो हम मरिहैं” ये दो कथ्य हैं कबीर के जिसे उन्होंने अपने दो अलग अलग प्रसंग में कहा। और उनके कहने का मतलब यही था कि मेरी कोई भी मृत्यु संभव ही नहीं है। ईश्वर के साथ ही, या यूँ कहें की इस सृष्टि के साथ ही मेरा अंत संभव है यह कबीर का विश्वास था, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। आज जब हम गांधी के 150वें जन्मोत्सव पर उन्हें याद कर रहे हैं और उन्हें समझने की एक बार पुरजोर कोशिश कर रहे हैं, तो क्या ऐसा नहीं लगता कि गांधी भी कबीर की बात को दुहरा रहे हैं। खरी-खरी कहने वाले कबीर को किसी से भय नहीं था। वह निरंतर अपनी बात पूरे जीवन भर बेबाकी से कह जाते हैं। उन्हें समाज की उन बुराइयों से लड़ना था जिसे वे मनुष्यता के खिलाफ मानते रहे। उनका यह सीधा सा कहना था कि “कबीरा खड़ा बाज़ार में लिए लुकाठी हाथ जो घर फूँके आपनो चले हमारे साथ।” कबीर की चिंता में आत्म भी नहीं था बल्कि मेरी दृष्टि में स्थूल और सूक्ष्म की उनमें अद्भुत परख थी। वह तो निर्मुक्त और एकाकार थे। गांधी जी तो ‘आत्म’ के लिए जीवन भर आग्रही थे, क्योंकि वह शरीर को भी जीवन का जादू मानते थे। कबीर तो समस्त न्यौछावर करने वाले थे लेकिन गांधी जी ने भी लुकाठी हाथ ली और जहाँ आज़ादी के लिए समस्त का त्याग था, वही उनके लिए वरेण्य था। यहाँ भी तो घर, जीवन सब फूंककर आज़ादी के लिए गांधी सबको कह रहे थे। कबीर से थोड़ा कम माना जाए गांधी को तो भी गांधी कभी कभी पूरा कबीर के त्याग का वरण करते हुए मिलते हैं। हाँ, एक जगह बहुत वैअंतर है गांधी जी और कबीर में, तो वह है सगुण ब्रह्म को और निर्गुण ब्रह्म की स्वीकारोक्ति का। गांधी ने जीवन भर यह कहा कि मैं सनातनी हूँ। उन्होंने गीता के माध्यम से कृष्ण और राम की उपस्थिति से कभी इनकार नहीं किया। कबीर इसे नहीं मानते हैं। यदि गांधी कुछ समय और जिंदा होते तो हो सकता है वह कबीर की भांति जगत को मिथ्या मानने लगते। वे सत्ता सुख से तो स्वयं को अलग कर चुके थे। शरीर की परख कर रहे थे अपने ब्रह्मचर्य के प्रयोग से अब इसके बाद वह यह समझ पाते कि ब्रह्मचर्य सफल है पूर्णरूपेण तो मेरा यह अनुमान है कि वे ब्रह्ममय होकर अपनी सोच में भी परिवर्तन करते। वे निर्गुण भी हो सकते थे। यह उनके भीतर का बदलाव शेष रहा। कबीर जीवन में इस भाव को बहुत पहले समझ गए थे, इसलिए मेरे मन में उनके प्रति आदर का स्वरूप अलग है।
यह बात मैं इसलिए कह पा रहा हूँ, क्योंकि गांधी जी जीवन में स्वयं को अपडेट किया। कुछ समय के बाद वे अपनी सोच और चिंतन के आधार पर ऐसे तथ्य लाकर जीवन भर आश्चर्य में डालते रहे हैं। उनके ‘ईश्वर’ और ‘सत्य’ की ही समझ का हम उदाहरण लें तो यह पता चलता है कि गांधी जी ने कितना स्वयं को परिमार्जित किया। उनके जीवन के अन्य उदाहरण में ‘अहिंसा’ और ‘प्रेम’, ‘सत्य’ और ‘प्रेम’, ‘साधन’ और ‘साध्य’ के बारे में जो राय हमें पढ़ने को मिलती है उससे उनमें निरंतर बदलाव को हम समझ सकते हैं। अपनी सोच और समझ के आधार पर हर व्यक्ति अपनी दृष्टि और धारणा में परिवर्तन लाता है। यह एक प्राकृतिक परिवर्तन है लेकिन गांधी जी ने जो बदलाव किया वह तो मेरी दृष्टि से सिद्धांत बन गए। यह सिद्धांत कदाचित लोग दे पाते हैं। या हम यूँ भी कहें कि कदाचित लोग किसी की सोच और संकल्पना को सिद्धांत के रूप में स्वीकार करते हैं। यह आज सम्पूर्ण देश में आम स्वीकृति है कि गांधी के जीवन में उनके द्वारा प्रतिपादित कार्य-सिद्धांत और जीवन के आनुसंगिक व वरेण्य सूत्र हैं। कबीर दास और गांधी की प्रयोगशाला समाज ही रहा है लेकिन गांधी अपने जीवन में अध्यात्मिकता के साथ जीवन की तात्विकता को अनुप्रयोग में लाए इसलिए कहीं न कहीं गांधी समाज-वैज्ञानिक व प्रयोगधर्मी व्यक्तित्व के रूप में ज्यादा स्वीकार आज किए जा रहे हैं। कबीर ने कभी भी रचनात्मक कार्य की पहल नहीं की। वे तो संत थे। लेकिन वह एक अलग तरीके के संत थे। लेकिन जिस साबरमती के संत की बात मैं यहाँ कर रहा हूँ वह तो जीवन में कई आश्रम भी स्थापित करता है और रचनात्मक कार्य के माध्यम से जीवन की परिभाषा ही बदलने की अपनी अनिवार्य कोशिश करता है। गांधी जी ने अपने विभिन्न आश्रमों में आश्रम जीवन को जिस प्रकार सभी के लिए संहिता के रूप में स्थापित किया उसे एक पूरी व्यवस्था के रूप में मैं देखता हूँ। उन आश्रम में प्रार्थनाएँ होती थीं। अनुशासन होते थे। कृषि कार्य भी अनिवार्य था। साफ़-सफाई और निराई-गुड़ाई भी उतने ही अनिवार्य थे। अपने भोजन के लिए श्रम जितना अनिवार्य थे उतनी ही गांधी की यह कोशिश थी कि वे लोगों में सेवा-सुश्रुषा के लिए भी अलख जगा सकें।
मेरा अनुयायी सिर्फ एक है और वह खुद मैं हूँ। गांधी जी की यह बात बहुत अजीब सी लगेगी लेकिन उनके प्रयोग की पूरी जमीन देखेंगे तो यह पायेंगे कि उनके भीतर की यह आवाज़ थी। आत्मवत होकर यह बात कहना आसान नहीं होता। कोई व्यक्ति दूसरे का अनुयायी तो बन जाता है लेकिन खुद का अनुयायी होना आत्म-परीक्षण के बाद व्यक्ति हो पाता है। भारत में ऐसे बहुत से सिद्ध महान आत्माएँ हुई हैं जो स्वयं के भीतर छुपे अन्धकार को मिटाने की कलाएँ समझ सकीं। एक सूत्र है महात्मा बुद्ध का-अप्प दीपो भव, ऐसे अविष्कार ही स्वयं के अनुयायी होने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं, यह बुद्ध ने छठी शताब्दी में कहा था। कबीर जिस परम्परा के थे वे यह बात नहीं कह सके। लेकिन गांधी ने यह कहा कि मैं स्वतः अपना अनुगमन करता हूँ क्योंकि उनके लिए आत्म का विस्तार शायद सर्वोदय तक जाता है। अस्तेय व अपरिग्रह गांधी जी के लिए अन्य अनुशासन है। इसे वे जैन धर्म से प्राप्त करते हैं ऐसा उन्होंने अपने आलेखों में ज़िक्र किया है।
युद्ध भी गांधी के लिए अनिवार्य है लेकिन उसकी फिज़ा बिलकुल युद्ध जैसी नहीं है, आत्मरक्षात्मक है, अभयी है। प्रतिक्रिया है लेकिन सत्याग्रही है। युद्ध भी अहिंसा की बुनियाद पर है। और उनके युद्ध के लिए हथियार हैं-नमक सत्याग्रह, आमरण अनशन, स्वदेशी और चरखा। वे हिंसा की ताकत से कोई भी मनुष्य की आज़ादी नहीं चाहते। वे योद्धा के लिए आत्मबल को बड़ा हथियार मानते हैं। गांधी ने इसकी बड़ी संयमी भाषा में चर्चा अपनी पुस्तक हिन्द स्वराज में की है जिसमें पाठक और संपादक के बीच संवादशैली में अपनी बात को प्रकट किया गया है।
महावीर, बुद्ध और कबीर के बाद गांधी ने भारत में अपनी भूमिका को ठीक-ठीक रेखांकित किया है। उन सबके जीवन को यदि गहरे उतरकर देखेंगे तो व्यापक मानवीय परम्परा से यह सभी भारत भूमि में अपनी स्पष्ट भूमिका में दिखते हैं जिनके विमर्श के लिए जब कभी परिचर्चाएँ होती हैं तो यह बात उभर कर आती है कि इनका जीवन शारीर से तो अलग हुआ लेकिन सामासिक रूप से इस भूमि की आने वाली पीढ़ियों में समाता गया और उनके प्रेरणा का स्रोत भी बनता गया।
गांधी जी के 150वीं जयंती पर भारत की उर्वर भूमि से निकले रत्नों की विवेचना के साथ अगर हम गांधी को देखें तो गांधी ने मोहन से महात्मा बनने की पूरी कहानी में एक बड़े व्यक्तित्व के रूप में हमें मिलते हैं। उनसे हम तभी कुछ प्रेरणा ले सकते हैं जब उनका वृहद् अध्ययन होगा। गांधी द्वारा, गांधी पर और गांधी के बरक्स जो लिखा-पढ़ा गया है वह कम नहीं है। मैं समझता हूँ कि भारत में और दुनिया भर में सबसे ज्यादा कुछ पढ़ा गया तो तुलसी कृत श्रीरामचरित मानस, सबसे ज्यादा आध्यात्मिक पुस्तक अगर कोई प्रकाश में आई तो वह है गीता लेकिन उसके बाद सबसे ज्यादा अगर कोई प्रभाव डाला तो वह है गांधी। गांधी साहित्य भी सबसे ज्यादा उत्पादित हुए और ज्ञान परम्परा में गांधी विमर्श बहुत ही अहम् रहा है। इन सबके बावजूद गांधी के निजी जीवन और उनके संघर्ष की कहानी यहाँ हम नहीं बता सकेंगे लेकिन उनसे सीखने के लिए हमारे पास पर्याप्त अवसर है। पहला, क्या हम स्वयं अपने जीवन में यह साध सकते हैं और कह सकते हैं कि मेरा अनुयायी सिर्फ एक है और वह खुद मैं हूँ? दूसरा, गांधी पर विमर्श में हम शामिल हों, यह ठीक है लेकिन हम एक अच्छा कार्य भारत में क्या कर सकते हैं जो गांधी जी के लिए सच्ची श्रद्धांजलि बन जाए। मैंने किया है। एक गांधीयन चेयर बनाने का प्रयास मैंने किया है विदेश के एक शांति विश्वविद्यालय में। सूचना के मुताबिक उसकी स्थापना के लिए प्रयास शुरू हो चुके हैं। यदि यह चेयर यानी गांधी पीठ बनती है तो वहां गांधी पर एक बड़ा विमर्श शुरू होगा और हिंसक होती सभ्यता को बचाने का प्रयास भी शुरू होगा। वे लोग केवल गांधी को नहीं पढेंगे अपितु उसी बैनर तले मार्टिन लूथर किंग, नेलशन मंडेला, आंग-सांग सू की, यासर अराफात, दलाई लामा को भी पढेंगे क्योंकि हम सभी जानते हैं कि गांधी का प्रभाव सिर्फ भारत में नहीं अपितु दुनिया के तमाम भूभाग पर है। उस विश्वविद्यालय में पढने वाले युद्ध, हिंसा और संघर्ष के साथ अहिंसक सभ्यता की पढ़ाई कर सकेंगे क्योंकि आधुनिक सभ्यता को लेकर गांधी जीवन भर चिंतित रहे और उन्होंने इस पर बेबाकी से लिखा भी। गांधी के उनके जन्मोत्सव पर हम कुछ अहम करें ताकि आपके कार्यों से आप जीवित रहें कबीर की भांति। बुद्ध, महावीर और गांधी की भांति। संभावनाएँ सब जगह हैं पर भ्रम में पड़कर व्यक्ति ज़िन्दगी की खुबसूरत भूमिका भूल जाता है, इसे संवारने की आवश्यकता है।

पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश), 
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com  

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