अच्छी कहानी से अपेक्षाएँ

आफ़ताब अहमद

आफ़ताब अहमद

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क


“अच्छी” कहानी से क्या अपेक्षाएँ होनी चाहियें? या यह कि “अच्छी” कहानी क्या है? इस विषय पर चर्चा से पहले मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि यद्यपि मैं स्वयँ एक कहानीकार नहीं हूँ परन्तु कहानी का एक नियमित पाठक अवश्य रहा हूँ। घर और गाँव में साहित्यिक वातावरण न होने के बावजूद बचपन में ही किसी तरह कहानी और उपन्यास में रूचि पैदा हो गयी थी। उर्दू में रसीली कहानियों, क़िसस-उल-अम्बिया, युसुफ़-ज़ुलेख़ा, तोता-मैना की कहानियों के अलावा, उर्दू और हिन्दी के बहुत सारे रूमानी, जासूसी और तथाकथित ऐतिहासिक उपन्यास और प्रेमचंद की कई कहानियाँ स्कूल के ज़माने में ही पढ़ डाली थीं। ग्यारहवीं कक्षा में रहा हूँगा कि गोदान हाथ लग गयी। शायद यहीं से साहित्यिक उपन्यासों और कहानियों के पढ़ने का शौक़ पैदा हुआ। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय की शिक्षा के दौरान उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी के अलावा दूसरी भाषाओं से अनुदित कहानियाँ---विशेष रूप से रूसी और बंगाली--- पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पिछले एक दशक से भाषा और साहित्य का पठन-पाठन अपनी आजीविका ही ठहरी है। संक्षेप में यह कि कहानी के एक नियमित पाठक की हैसियत से इस विधा के बारे में मन में कुछ विचार पैदा हो जाना स्वाभाविक है। या कम-से-कम कोई कहानी पढ़ने के बाद इस बात का अहसास होता ही है कि कहानी “अच्छी लगी” या “अच्छी नहीं लगी” और अच्छा लगने या न लगने का आधार क्या है। लिहाज़ा यहाँ प्रकट किये गये विचार को आप कहानी में रूचि रखने वाले एक पाठक की प्रतिक्रिया कह सकते हैं।
अपनी पढ़ी हुई कहानियों पर विचार करता हूँ, तो पाता हूँ कि समय के साथ कहानी “अच्छी” लगने के मेरे ‘आधार’ बदलते रहे हैं। कुछ विशेष कहानियाँ या उस प्रकार की कहानियाँ जो कभी अच्छी लगती थीं, अब अच्छी नहीं लगतीं। कुछ कहानियाँ या उस प्रकार की कहानियाँ जो कभी अच्छी नहीं लगती थीं, अब अच्छी लगने लगी हैं। लेकिन कुछ ऐसी कहानियाँ हैं, जिन्हें बार-बार पढ़ने को जी चाहता है और वे हर बार अच्छी लगती हैं। प्रेमचंद की कहानियाँ “कफ़न”, “नई बीवी” “ठाकुर का कुआँ” “मन्त्र”, सआदत हसन मंटो की “हतक”, “खोल दो”, “टोबा टेक सिंह”, “ठंडा गोश्त”, “ख़ुशिया”, और “स्याह हाशिये” की लघु कहानियाँ, इस्मत चुग़ताई की “दो हाथ”, “अमरबेल”, “गेंदा”, “चौथी का जोड़ा”, “लिहाफ़”, क्रिशन चन्द्र की “ईरानी पुलाव”, राजेन्द्र सिंह बेदी की “मिथुन”,”लाजवन्ती”, क़ुर्रतुल-ऐन-हैदर की “आवारा गर्द”, “पतझड़ की आवाज़”, “फ़ोटोग्राफ़र”, “हाउसिंग सोसाइटी” (लघु-उपन्यास), चित्रा मुद्गल की लघु कहानियाँ “मर्द” और “दूध”, अनिल प्रभा कुमार की कहानियाँ “महानगर में ही कहीं”, “बे मौसम की बर्फ़” “वानप्रस्थ” वग़ैरह (यहाँ अधिकतर उर्दू लेखकों की कहानियों के उद्धरण का कारण केवल यह है कि मैं इन लेखकों से अधिक परिचित हूँ) ऐसी कहानियाँ हैं जिन्हें जब भी पढ़ता हूँ हर बार उनमें कुछ नएपन का अहसास होता है। ऐसा संभवतः इसलिए है क्योंकि इन कहानियों में कुछ ऐसे तत्व हैं जो इन्हें “अच्छा” बनाते हैं, और जिनकी एक कालजयी हैसियत है। मेरा अनुभव यह रहा है कि जो कहानियाँ मुझे हमेशा अच्छी लगीं या कोई नई कहानी जो आज भी अच्छी लगती है, उनमें उन कहानियों से सम्बंधित कुछ विशिष्ट बातों के अतिरिक्त दो बातें समान रही हैं। एक “कहानीपन” और दूसरी “जिज्ञासा”। मेरे विचार से ये दोनों कहानी के आधारभूत तत्व हैं जिनके बिना कहानी अच्छी हो ही नहीं सकती। ये दो तत्व किसी कहानी को “पठनीय” बनाते हैं। इनमें पहला तत्व ज़्यादातर कहानी के विषय और घटनाओं से सम्बंधित है और दूसरा कहानी के शिल्प से। लेकिन कहानी में ये दोनों तत्व अन्योन्याश्रित होते हैं। यानी कहानी की घटनाओं को इस प्रकार बुनना कि पाठक की जिज्ञासा अंत तक क़ायम रहे। प्रेमचंद, सआदत हसन मंटो, इस्मत चुग़ताई इत्यादि की कहानियों की लोकप्रियता का प्रमुख कारण यह है कि उनमें ये तत्व बहुत प्रबल हैं। वास्तव में किसी भी “अच्छी” कहानी में ये दोनों विशेषताएँ अवश्यम्भावी हैं। जासूसी कहानियों और उपन्यासों की रोचकता के तो ये आधार-बिंदु हैं।
फिर बात आती है कहानी के प्रभाव की। मेरे विचार में अच्छी कहानी पाठक के विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं के पुराने समीकरणों को तोड़कर नए समीकरण निर्मित करती है। कहने का आशय यह है कि कहानी के अन्दर यदि ऐसे तत्व हैं जो पाठक के विचारों और भावनाओं के जगत में हलचल मचाते हैं, उसके व्यक्तित्व की जड़ता को पिघलाकर उसके भीतर कुछ नया सृजन करते हैं, या उसके अंतर्मन में कुछ भूला-बिसरा जगाकर उसकी जीवन दृष्टि को कुछ और प्रकाशमान करते हैं, तो वह अच्छी कहानी होगी।
अच्छी कहानी पढ़ने के बाद पाठक को कुछ हो जाता है। वह वही नहीं रहता जो पहले था। उसको लगता है कि उसके भीतर कुछ लोच पैदा हो गया है, उसकी ग्रहणशीलता बढ़ गयी है, वह अधिक सजग और संवेदनशील हो गया है, उसके पुराने पूर्वाग्रह टूट गए हैं, और उसके अन्दर कुछ ऐसा जाग उठा है, जिससे उसकी दृष्टि में नयापन, ताज़गी और गहराई आ गयी है, और उसका हृदय कुछ अंतर्मुखी, कोमल और करुणामय हो गया है। इसी बात को एक गोष्टी में एक सज्जन ने बहुत सुन्दर तरीक़े से कहा था कि “अच्छी” कहानी पढ़ने के बाद पाठक महसूस करता है कि उसके अन्दर एक “उर्वरा-शक्ति” आ गयी है। कहानी की यही विशेषता शायद “प्रभावान्विति ” कहलाती है।
मेरे विचार में कहानी में यह “उर्वरता” या “प्रभावान्विति” कहानी के विभिन्न तत्वों के सृजनात्मक संयोजन से पैदा होती है। यहाँ से बात आरम्भ होती है “शिल्प” की। यानी कहानी को कैसे कहा गया है। दरअसल कहानी में शिल्प का काफ़ी महत्त्व है। शिल्प, कहानी के प्रभावशाली और सशक्त तत्वों का निर्माण भी करता है और साथ ही उन्हें सृजनात्मकता से एक दूसरे के साथ पिरोता भी है। ये तत्व कहानी के कुछ यादगार दृश्य हो सकते हैं, जीवन-सागर के भँवर में डूबते-उभरते पात्र और उनके संवाद हो सकते हैं, घटनाओं का सजीव वर्णन हो सकता है, भाषा का चमत्कारिक स्वरूप हो सकता है, रचनाकार का दार्शनिक दृष्टिकोण हो सकता है, कहानी के किसी सघन क्षण में वाचक का कोई पैना और चुभता हुआ वक्तव्य हो सकता है, कहानी का विषय या अभिव्यक्ति की नवीनता हो सकती है। यहाँ तक कि कोई एक शब्द या शब्दों और वाक्यों के बीच का अंतराल और उस अंतराल के वातावरण में फैली हुई एक गहरी ख़ामोशी हो सकती है। शिल्प, घटनाओं की कड़ियों और अपने द्वारा सृजित विभिन्न तत्वों को इस अंदाज़ में पिरोता है कि आरम्भ से अंत तक कहानी में पाठक की जिज्ञासा और रूचि क़ायम रहती है तथा पूरी कहानी एक इकाई के रूप में उभरती है जो हमारे हृदय के अन्दर एक गहरी छाप छोड़ जाती है—प्रभावान्विति।
उपर्युक्त बात को स्पष्ट करने के लिए मैं न्यूयार्क निवासित अप्रवासी लेखिका अनिल प्रभा कुमार की कहानी “वानप्रस्थ” का ज़िक्र करना चाहूँगा। दरअसल प्रस्तुत लेख मैंने इसी कहानी की प्रतिक्रिया में लिखा है। मैं इस कहानी को सुनकर स्तब्ध रह गया था और मेरे मन में जिज्ञासा पैदा हुई कि मैं जानूँ कि एक “अच्छी” कहानी से मैं क्या अपेक्षा करता हूँ या कोई कहानी “अच्छी” लगने का मेरा आधार क्या है। खैर, यह एक विषयांतर था। मैं कहने यह चला था कि “वानप्रस्थ” एक अति प्रभावशाली कहानी है। इसमें अमरीका में रह रही एक अधेड़ उम्र की बेटी और भारत से उसका सूनापन और दर्द बाँटने आयी उसकी वृद्धा माँ के गहरे आत्मीय संबंधों का मर्म-स्पर्शी चित्रण है। यह रचना किसी बड़ी घटना पर आधारित नहीं है। इसमें अमरीका के एक बड़े शहर में एक अप्रवासी परिवार के रोज़मर्रा जीवन के कुछ दृश्य हैं, जिन्हें बड़ी सहजता से पेश कर दिया गया है। यद्यपि कहानी अपने अन्दर जीवन के कई और आयाम छुपाये हुए है, परन्तु कहानी का भावनात्मक पहलू बहुत गहरा और हृदय-स्पर्शी है। इस कहानी की विशेषता यह है कि इसमें शब्दों से कहीं अधिक ख़ामोशियाँ बोलती हैं। दृश्यों के बीच के अंतराल से एक गहरा सन्नाटा फैलता हुआ महसूस होता है। उदाहरण के तौर पर, एक अवसर पर माँ का अकेलापन और आन्तरिक पीड़ा को महसूस करते हुए बेटी अपने मन में सोचती है कि वह अगले वीकेंड पर माँ को कहीं घुमाने ले जायेगी। उसी क्षण में बेटी के जीवन का सूनापन और संताप महसूस करते हुए माँ सोच रही है कि कल वह बेटी के लिए कोई अच्छी चीज़ पकाएगी। यद्यपि ये विचार माँ-बेटी के मन में चलते हैं, परन्तु उनकी गूँज पाठक को अपने हृदय में सुनाई पड़ती है। कहानी के एक भावनात्मक क्षण में यह वाक्य कि “माँ बेटी के दर्द को अपने सीने में सोख लेती है”, कहानी के उस क्षण को बहुत विशेष बना देता है। “वानप्रस्थ” का अंतिम दृश्य ख़ास तौर पर बहुत ही प्रभावशाली है। अपने हृदय में उमड़ते जज़्बात को शब्दों में व्यक्त करने के बजाय माँ खींचकर बेटी को गले लगा लेती है और उसी अवस्था में माँ-बेटी एक दूसरे से गले मिली खड़ी रह जाती हैं। लगता है जैसे ममता, पीड़ा, प्रेम, और सहानुभूति की दो नदियों का संगम हो गया हो। यह दृश्य तो मानो पाठक को गंगा स्नान करा देता है । ”वानप्रस्थ” में ऐसे सशक्त तत्वों बिखरे पड़े हैं। परन्तु इसके शिल्प का कमाल यह है कि इसने बड़ी सुन्दरता से इन तत्वों को एक दूसरे से पिरो दिया है। कहानी ख़त्म होने पर पाठक को एक लम्बी ख़ामोशी और एक गहरा सन्नाटा घेर लेता है ---- “प्रभावान्विति।”
स्पष्ट है कि यह सशक्त प्रभाव कहानी में थोथी नैतिकता और मानव-मूल्यों की बातें करने या किसी अवधारणा को कहानी का रूप देने से नहीं आ सकता। इसके लिए कहानी का शिल्प बहुत बड़ा आधार बनता है। लेकिन यहाँ एक और बात स्पष्ट करना चाहूँगा। शिल्प कोई सूचना या सिद्धांत नहीं है कि आप उसे किसी सामान्य ज्ञान या थ्योरी की पुस्तक में पढ़कर उसे बरतना शुरू करदें। रचनाकार ख़ुद अपना शिल्प पैदा करता है और इस शिल्प-वृक्ष को अपने हृदय-रक्त से सींचता है। उसे एक सशक्त, प्रभावशाली और चमत्कारी शिल्प को जन्म देने के लिए दिक् और काल से बंधी अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करना पड़ता है (स्थाई रूप से नहीं तो कम-से-कम कहानी सृजन के समय)। उर्दू के कवि डाक्टर मोहम्मद इक़बाल फ़रमाते हैं:
रंग हो या ख़िश्त-व-संग, चंग हो या हर्फ़-व-सौत
मोजिज़ा -ए- फ़न की है ख़ून- ए- जिगर से नुमूद

दूसरी पंक्ति में “फ़न” का मतलब वास्तव में “शिल्प” है। अर्थ यह है कि “शिल्प का चमत्कार” हृदय-रक्त (ख़ून –ए-जिगर) से पैदा होता है। अतः शिल्प का बहुत घनिष्ट सम्बन्ध रचनाकार के व्यक्तित्व से है। कहानी के रचयिता की संवेदनशीलता, उसकी विश्वदृष्टि, उसके विचार, उसका प्रेक्षण, अध्ययन और अनुभव आदि मिलकर शिल्प का निर्माण करते हैं। वास्तव में शिल्प और कहानीकार आपस में ऐसे घुले-मिले होते हैं कि उनको पृथक करना संभव नहीं। अतः यह बात महत्वपूर्ण है कि कहानीकार सृजन-प्रक्रिया के उस क्षण का अनुभव पूरी गहनता, सघनता और सम्पूर्णता में करे जिसको वह पेश कर रहा /रही है। कहानीकार के अनुभव की यही सघनता शिल्प को शक्तिशाली बनाती है और इसी सघनता के गर्भ में उन सशक्त और प्रभावशाली तत्वों का सृजन होता है जिन्हें कहानीकार अत्यंत कुशलता से एक इकाई में पिरोकर कहानी के रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता/करती है। शिल्प से कहानी के अन्दर “सार्थकता” भी आती है।
प्रोफ़ेसर नामवर सिंह के अनुसार कहानी में “सार्थकता” का अर्थ यह है कि “कहानी जीवन की छोटी से छोटी घटना में भी अर्थ ढूँढ लेती है या उसे अर्थ प्रदान करती है।” यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि सार्थकता की चर्चा कहानी को सीधा “यथार्थवाद” के प्रश्न से भी जोड़ देती है। कहानी तभी सार्थक हो सकती है जब उसमें मानव-जीवन और समाज का यथार्थ मौजूद हो। या दूसरे शब्दों में यूँ कह सकते हैं कि कहानी अगर सार्थक है तो वह मनुष्य के अंतर्संबंधों, उसके जीवन-मूल्यों, उसके अंतर्द्वंदों, उसकी अपेक्षाओं, मानव-समाज और विभिन्न सामाजिक सरोकारों से भी गहराई से जुड़ी होगी। लेकिन याद रहे कि कहानी में सार्थकता लाने की ख़ातिर इन पहलुओं को पेश करने की अलग से चेष्टा नहीं करनी पड़ती। बल्कि ऐसी कोई कोशिश कहानी के लिए घातक साबित होगी। दैनंदिन जीवन में साधारण घटनाओं के सिलसिले और कहानी के पात्रों के अनुभव- दुख-दर्द, भावनाएँ, विचार, प्रतिक्रियाएँ, संघर्ष - ये सब अपने अन्दर जीवन के विभिन्न आयाम लिए होते हैं। और अगर कहानीकार ने कहानी रचते समय उस क्षण को सघनता और सम्पूर्णता से जिया है, तो मानव-जीवन और समाज के उपर्युक्त सारे पहलू और मानव अस्तित्व से सम्बंधित गहरे सत्य स्वतः कहानी के अन्दर चले आते हैं। इसके लिए किसी अलग प्रयास कि ज़रूरत नहीं पड़ती। इस प्रकार रची गयी कहानी के अन्दर छोटी से छोटी घटना या अनुभव पाठक के जीवन और अनुभव-जगत से जुड़ जाता है - “सार्थकता”।
यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि “अच्छी” कहानी की जिन विशेषताओं की इस लेख में चर्चा हुई है, वे विशेषताएँ अन्य साहित्यिक विधाओं से भी अपेक्षित हैं, सिर्फ कहानी से ही नहीं। यह बिलकुल सत्य है। दरअसल अच्छी कहानी की विधागत विशेषताओं पर ज़रूरत से ज़्यादा आग्रह एक प्रकार का दुराग्रह होगा। किसी भी विधा में रचित “अच्छी” रचना को अपनी विधा-जनित सीमाओं का अतिक्रमण करके स्वयं को एक ऊर्जा-क्षेत्र में परिवर्तित कर देना पड़ता है। फिर चाहे वह कहानी हो या उपन्यास, संस्मरण हो या यात्रा-वृत्तांत, कविता हो या महाकाव्य, अन्ततोगत्वः पाठक स्वयँ को उनके ऊर्जा-क्षेत्र में पाता है। अतः “अच्छी” रचना होने के लिए रचना की विधा-सम्बंधित विशेषताओं की पृथक स्मिता मेरी दृष्टि में उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना यह कि रचनात्मक-प्रक्रिया के विशेष क्षण को रचनाकार कितनी गहराई से जी पायी / पाया है। 

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