कहानी: फ़ैरी टेल्ज़

मुक्ता सिंह-ज़ौक्की

- मुक्ता सिंह-ज़ौक्की

भौतिकी में पी एचडी, मुक्ता सिंह-ज़ौक्की हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों भाषाओं में लिखती हैं। इनकी कई कहानियाँ भारतीय और अमरीकी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। सन् 2008 में ये अमरीकी स्टोरीकोव शॉर्ट फ़िक्शन अवार्ड से सम्मानित हुई थीं। 2014 में इनका पहला उपन्यास “द ठग्ज़ ऐंड ए कोर्टिज़न” प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास का हिन्दी अनुवाद “ठग” 2018 में प्रकाशित हुआ।

- 1 -
आई.सी.यू. में भर्ती होने के तीन दिन बाद ही मेरे अंगों ने दुबारा काम करना शुरू कर दिया था। यह एक चमत्कार से कम नहीं था। बीमार बदन में कैंसर जो भयानक सूजन ले आया था, वह भी अब निश्चित तौर से घटने लगी थी। अगले कई दिन जो भी डॉक्टर राउंड लगाता, मेरा चार्ट उठाता और उसका मुँह खुला का खुला रह जाता।
‘ट्यूमर इतनी जल्दी घट कैसे गए?”
मैंने खाना पहुँचाने वाली नली निकलवाने की ज़िद पकड़ ली, बड़ी बहस हुई, आखिर वह निकाल दी गई। फिर मेरी ऑक्सीजन ट्यूब भी निकाल दी गई। अब मेरा शरीर कमज़ोर ज़रूर था, मगर आज़ाद था। मैं खुश थी। बस संगीत की कमी थी। कू से कह कर अपना साऊंडबॉट मंगवा लिया।
कू – यानि कुंवरजीत – मेरा प्रेमासक्त, प्राणार्पित पति। अपनी बीमारी से कितना तड़पाया था मैंने उसको। कहना भर था, तुरंत लगा दिये स्पीकर बैडसाईड-टेबल पर। मैंने सबसे जोशीले गानों वाली प्लेलिस्ट चालू कर दी। सारा समय वही सुनती रही। ताकत नहीं थी, वरना मन तो नाचने का कर रहा था।
मेरा हाल देख कर डॉक्टरों ने मुझे पोस्ट क्रिटिकल केयर – पी.सी.सी. वॉर्ड में ट्रांस्फ़र करने का निर्णय लिया।
मैंने फिर संग्राम-मुद्रा धारण कर ली, “फफोले छटने लगे हैं। कैंसर जाता लग रहा है। फिर मैं घर क्यों नहीं जा सकती?”
डॉक्टर पर कोई असर नहीं हुआ। चश्मे के पीछे से दो पैनी आँखों ने मुझे गाड़ते हुए कहा, “दस दिन पहले आप जिस हाल में यहाँ लाई गईं थीं, आप शायद भूल गई हैं।“
हाँ, मैं भूल गई हूँ। उस बुरे हाल को याद करने का मतलब! थूक निगलते हुए मैं सोच रही थी।
“हम कैंसर रोज़ देखते हैं...“ वे बोले जा रहे थे, “कैंसर यों नहीं चला जाता। आपके केस ने हमें हैरान कर दिया है। आपका अंडर-ऑब्ज़रवेशन रहना बहुत ज़रूरी है। इलाज भी जारी रखना है। टैस्ट भी करने हैं।”
मैं कू को देखने लगी। उसे कुछ कहना चाहिये था। लेकिन वह तो किसी और जहान में खोया हुआ था। इतना खुश मैंने आज तक किसी बंदे को नहीं देखा था। वह चुप रहा।
दस दिन पहले क्या, मेरा हाल तो पिछले दो साल से बिगड़ा हुआ था। गर्दन पर एक छोटी सी गाँठ इतना परेशान कर डालेगी, क्या मालूम था। गाँठ लिम्फ़ोमा निकली थी। ऐम.आर.आई. से पता चला था कि कैंसर शरीर के ऊपरी भाग में फैल चुका था। मैंने कीमो के लिये फौरन मना कर दिया। हाल ही में अपनी सहेली की, कैंसर से जंग में जो कुव्वत हुई थी, देख चुकी थी। इसीलिये होलिस्टिक हल आज़माने की ठान ली थी। उन दिनों क्रोध, आशंका, निराशा, मायूसी – सभी ने बारी-बारी से मेरे आसपास पड़ाव डालना शुरू कर दिया। लोग तरस खाई नज़रों से मुझे देखते, कोई कह भी देता, “कितनी बहादुर हैं आप’। मैं लोगों से बचने लगी। बस माँ और कू को अपने करीब आने देती।
फिर पिछले कुछ महीनों में साँसें लेना दूभर होने लगा, मेरे हाथ पैर चार बाँस बन गए, भय के पिंजड़े में बंद मैं अपने विनाश का तेज़ी से आगमन देख रही थी। कुंठा से लबालब भरी अलग थी। हर स्वस्थ इंसान से मुझे जलन होने लगी थी। कितने भाग्यवान थे वे लोग जिनके सामने सम्पूर्ण जीवन का वरदान पड़ा था। फिर भी हर सुबह इस खुश उम्मीद से उठती थी कि शायद आज वह दिन हो जब कोई चमत्कार हो जाए और मेरा स्वास्थ्य बिगड़ने के रास्ते से हट कर उभरने लगे। शाम आ जाती, उम्मीद हार कर, मन मार कर मैं सोने चली जाती। हाल दिन-ब-दिन बिगड़ता ही जाता। अस्पताल के चक्कर लगते रहते। थकान बढ़ती जाती। वज़न घटता जाता। हिम्मत फिर भी नहीं घटती। एक बार भूल से डॉक्टर से पूछ बैठी, “क्या आपको लगता है मैं बेहतर हो पाऊँगी?”
जवाब देने के बजाय डॉक्टर ये कहते हुए चले गए कि “अभी नर्स को भेजता हूँ, आपको कपड़े पहनने में मदद कर देगी।”
मेरे ट्यूमर बढ़ रहे थे, शहतूत के दानों की तादाद में, संतरे जितने बड़े। कैंसर पूरे शरीर में फैल चुका था। अब कोई इलाज काम में नहीं आने वाला था। मेरा जीवन एक-आध महीने से ज़्यादा का नहीं है, बताया था कू को डॉक्टर ने।
“क्या मैं मरने जा रही हूँ,” उस शाम कू की उदासी देख कर मैंने उससे पूछा था।
मुसकुरा कर, जवाब में बस इतना ही कहा, “मरना तो हम सब को है, यह कैसा सवाल पूछ रही हो?”
“डॉक्टर ने तुमसे क्या कहा था। मुझे सीधे-सीधे बताओ, क्या मैं मरने जा रही हूँ?”
“एक बात सुन लो। तुम अगर मरोगी, तो ये कुंवरजीत सावित्री बन जाएगा और अपनी रागिनी को वापस ले आएगा,” कह कर उसने मुझे अपनी बाँहों में ले लिया था।
वह मेरे सिरहाने बैठा था। मेरा सिर उसके कंधे पर था। देर तक कू की बात मन में मंडराती रही। फिर मैं सो गई।

- 2 -
उन दिनों हम पैराडिसो में रहते थे। परदेस में एक शहर, पैराडिसो में। स्वर्ग-सी जगह थी पैराडिसो। ऐसे लोग वहाँ रहते थे जो हर आकार में सौन्दर्य ढूंढने में लगे रहते थे। सुंदर गुलाब को घंटों एकटक देखने में उन्हें समय व्यर्थ करना नहीं लगता था। कलाकारों की नगरी थी वह। वहाँ प्यार का चलन था। ट्रैफ़िक लाइट पर अकसर जब कार धीमी कर के रोकती, तो साइड में झूम-झूम कर बाइक-चालक भी रुक जाता। चेहरा खिड़की तक ला कर फ़्लाईंग किस भेज देता। मैं भी वापस किस भेज देती। ये बात अलग थी कि बाइक-चालक कू होता। घर से हम दोनों साथ निकलते, वह अपने रास्ते, मैं अपने। लेकिन वह उस जगह का कमाल था। वहाँ ऐसे सीन आम थे। प्रेमियों का वहाँ जमघट जो था।
वहाँ की आबो-हवा भाने के बावजूद वहाँ की भाषा मैं नहीं सीख पाई थी। जब पी।सी।सी। वॉर्ड में कई और मरीज़ों से मिलना हुआ, इशारों से बातचीत शुरू होते-होते, वहाँ की बोली भी सीखने लगी। वॉर्ड में पहले हफ़्ते मैगी का आना हुआ। बातचीत का सिलसिला मुस्कुराहटों से शुरू हुआ। हम चुपचाप अपने-अपने बैड पर पीठ टिकाए बैठे होते, खाना आता, हम मुसकुराते। उचक कर बैठ जाते। खाना खाने लगते। वह कुछ कहती, मैं बिन समझे मुसकुराती। फिर एक बार उसने हवा में प्रश्न चिन्ह बनाया। मैं समझ गई – मेरा नाम? फिर दूसरे प्रश्न चिन्ह पर मैं बोली, “इंडिया’। उसके बाद कब हमारी बातचीत में चार-पाँच शब्दों की लड़ियाँ जगह पाने लगीं, हमें पता नहीं चल पाया। हमारे वॉर्ड में तीन बैड थे। मेरे बगल के बैड में शुरू से एक कोमा-ग्रस्त औरत थी। शायद पी।सी।सी। वॉर्ड के शोरगुल में उसमें जागने की इच्छा जागे, इस वजह से उसे वहाँ लाया गया था।
फिर भी जब तक मैगी वॉर्ड में थी, बहुत मज़ा था। हम खाने का इंतज़ार करते, खाने में क्या आएगा, अनुमान लगाते। एक बार वह बोली कि आज लगता है खाने में मटर का सूप और प्रोशुत्तो आएगा।
‘प्रोशुत्तो?” मैंने पूछा।
उसने मुझे कई तरह से समझाया, पर मैं समझ नहीं पाई। आखिर चारों पाँव बिस्तर पर रख उसने ज़ोर से अपने पिछवाड़े पर चपत जड़ दिया। उसके इस अजीब प्रदर्शन से मैं हकबका गई। जब तक मालूम चला सूउर के पिछवाड़े हैम को यहाँ प्रोशुत्तो कहते हैं, वह डिसचार्ज हो चुकी थी। उस के बाद कई और मरीज़ आए। कोमा में पड़ी मरीज़ से मिलने अकसर एक महिला आती थीं। भारतीय थीं। मालूम हुआ मरीज़ के बेटे की पत्नी थी। जब वे आतीं, हिन्दी में बात हो जाती। पिछले दस सालों से सास सीनियर होम में थीं। अब हालत खराब होने पर उनके बेटे पर उनकी ज़िम्मेवारी फिर पड़ गई थी। माँ की डाँवाडोल हालत पर बहुत परेशान थे बेचारे मियाँ-बीवी।
‘पिछले पूरे महीने से यों ही पड़ी थीं, बेजान सी, आँखों में दर्द लिये, कमज़ोरी इतनी की आवाज़ ने भी साथ छोड़ दिया था, उंगली हिलाने भर की ताकत थी ... कभी फेफड़ों में पानी भर जाता था, कभी सर्जरी की गई आँतों में इन्फ़ैक्शन ... अब अचानक कोमा में पड़ गईं हैं, तीसरी बार। हर बार चार-पाँच दिन के बाद कोमा से निकल कर आतीं हैं, फिर वही सेहत की लड़ाई शुरू हो जाती है। अब हमें लगता है इन्हें इंजैक्शन दे देना चाहिये, क्यों रागिनी जी?”
क्या कहती। मैंने तो इनकी मदर-इन-लॉ को ठीक से देखा भी नहीं था। चुपचाप उनकी बातें सुनती रहती।
कू भी अब काम पर जाने लगा था। एक बड़ी कम्पनी में उच्च पद पर था। उच्च पद पर था इसलिये मेरी बीमारी के दौरान काम रिमोट से कर सकता था। वरना, आम आदमी के यहाँ एक कंकड़ लुढ़कता है तो उसके जीवन का पूरा का पूरा पहाड़ गिरने के आसार दिखाने लगता है। अब जब लग रहा था कि मैं ठीक होने लगी हूँ, तो कू सुकून से काम पर जाता था। शाम को मिलने आता था। देर तक साथ रहता, रात होती, मैं न चाहने पर भी थक जाती और वह मेरा माथा चूम कर, मुझे सुला कर, चला जाता।
इधर डॉक्टरों ने मुझ पर हल्की कीमोथैरिपी शुरू कर दी थी। कुछ दिन पहले की गई बोन-मैरो बायौप्सी के नतीजों ने उन्हें हैरान कर दिया था। उन्हें मेरे बोन-मैरो में कैंसर के कोई निशान नहीं मिले थे। अब कुछ और दिन रुक कर लिम्फ़ नोड बायौप्सी करना चाह रहे थे।
मैं बहुत खुश थी। लेकिन खुशी बाँटने के लिये न कू था, न आसपास कोई दोस्तनुमा मरीज़। तीसरे बैड में एक चिड़चिड़ी सी औरत थी। तीस-पैंतीस साल की थी। मेरी तरफ़ मुँह भी नहीं कर रही थी। मैं उससे क्या बात करती। मैं एक फ़ैशन-मैगज़ीन पढ़ने में इतना रम गई, पता ही नहीं चला कितनी देर हो चुकी थी। वह औरत कुछ समय से बड़बड़ा रही थी, लेकिन मेरा ध्यान उस पर तब ही गया जब वह ज़ोर से चीखने लगी। मैंने चौंक कर उसकी ओर देखा, वह मुझ से ही कुछ कह रही थी। मैंने उससे उसकी तकलीफ़ पूछी। वह फिर चिल्ला उठी। आँखें फाड़ कर बोली, “लूचे! ”
“लूचे?” मैं उसे समझने की कोशिश कर रही थी, उसके चिल्लाने से घबरा भी गई थी। फिर हाथ उठा कर उसने ऊपर बत्ती की ओर संकेत किया। मैंने तुरंत बत्ती बुझाई, और बीच आर्टिकल में मैगज़ीन को छोड़ कर सोने चली गई।
सुबह नई जानकारी के साथ उठी। लूचे! वह औरत जा चुकी थी। मैं जानती थी कि प्रेमनगरी में बीमार भी होते हैं और पीड़ा बीमार को नाखुश कर देती है। वह औरत पीड़ाग्रस्त थी, तभी परेशान थी।
कोमा में पड़ी मरीज़ की बहू सुबह से बैठी थी। मुझे उठते देखते ही मेरा हाल पूछा। मैंने भी जब उससे उसका हाल पूछा तो उसके अंदर का गुबार उमड़ कर बाहर आ गया।
- मेरे हसबैंड का तो इत्ता बुरा हाल है रागिनी जी, मैं क्या बताऊँ। हमने तय कर लिया है, आज डॉक्टर से कह देंगे ... दे दें इन्हें इन्जैक्शन।
- इन्जैक्शन?
- हाँ, कम से कम इनकी तकलीफ़ तो खत्म होगी।
- क्या ये भी यही चाहती हैं?
- आपको क्या लगता है इन्हें इस तरह जीना पसंद है?
तभी मेरी मसल ट्रेनिंग के लिये बुलावा आ गया। अब मैं खुद चल पाने लगी थी। थैरपिस्ट के कमरे की एक दीवार पूरे शीशे की थी। उसी पर खुद को आँक रही थी। अब मैं टूटी हुई नहीं दिखती थी। फिर इंसान लगने लगी थी। मसल ट्रेनिंग के बाद मेरी लिम्फ़ नोड बायौप्सी हुई। कू काम से जल्दी लौट कर आ गया था। रेडियौलजी रिपोर्ट के अनुसार मेरे लिम्फ़-नोड कैंसर-रहित थे। फिर भी एहतियात बरतने के लिये सर्जन ये बायौप्सी चाहते थे। सर्जरी पीड़ाजनक थी। मैं थक चुकी थी। उस शाम जल्दी सोने चली गई। कू से बात भी नहीं कर पाई।

- 3 -
रात के सपने ने मन का करार ही उड़ा दिया। मैं उठ गई। सीने में दिल सरपट दौड़ रहा था, फेफड़े धौंकनी की तरह दब-फूल रहे थे। मैंने समय देखने के लिये जो साइड-टेबल की ओर नज़र फिराई, तो पैताने पर लटकी काली परछाई पर नज़र अटक गई।
‘घबरा क्यों गई?” वहाँ से आवाज़ आई। मेरे देखते ही देखते परछाई गठ कर एक भुजंग-काले आदमी में बदल गई। आदमी पतला-सा था, कोई पाँच फ़ुट छः इंच, मुसकुराते हुए मेरे पैताने पर बैठ गया। उसके हाथ में पीतल की सुराही थी। दूसरे हाथ में एक प्याला। सफ़ेद सूट पहने था, ढीली की हुई गुलाबी टाई, सफ़ेद कमीज़, खुला कॉलर, भीतर से एक लॉकिट झाँक रहा था। कान में फुँदा ...
एक अनजान आदमी मेरे पलंग पर बैठ गया था। मैं समझ नहीं पा रही थी कि मुझे नर्स की घंटी बजानी चाहिये या उसे सीधे-सीधे डाँट लगानी चाहिये। लेकिन मेरी हिम्मत भाग गई थी। मैं उस आदमी को देखे जा रही थी, पसीने छूटे जा रहे थे।
“घबरा क्यों रही हो? भूल गई क्या? मैं – राजकुमार!”
प्याला भरकर उसने सुराही मेज़ पर रख दी।
“या यों कहूँ, राज-कू!” वह एक चौड़ी मुस्कान मुसकुराने लगा।
मैंने अपने ऊपर पड़ी चादर से अपना चेहरा सुखाना शुरू कर दिया। तकिया ठीक से टिकाया और उसके सहारे बैठ गई।
‘इसी पलंग पर ही तो था पूरे दो हफ़्ते ... आज सोचा ज़रा देख आऊँ क्या हाल हैं पुराने दोस्तों के। और क्या मालूम कोई नया दोस्त बन जाए।”
मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी। पर अब तक अंदर का डर जाता लग रहा था। खाली बैड पर इशारा करते हुए वह बोला, “वहाँ थी मोना।” वह मुसकुरा रहा था, “उसे भी भूल गई?”
अब मैं उसे अचंभे से देख रही थी। मुझे तो वह कोई फ़्रॉड लग रहा था।
‘मोना को मैं कहानियाँ सुनाते-सुनाते थक जाता था, पर वह नहीं थकती थी। रोज़ ज़िद करती थी, कि और सुनाऊँ, और सुनाऊँ। बड़ी याद आती हैं उसकी बातें!’
उसकी आवाज़ में लाड़ भरा था। फिर उसकी नज़र दूर गढ़ गई, अतीत में कहीं। उसने अपने प्याले से चुस्की ली और मुँह से एक आह निकाल ली। फिर शुरू हो गया।
- “याद है जब मैंने उसे अपने जंग के दिनों की कहानियाँ सुनानी शुरू कीं, कि कैसे अपने लोगों को इंसाफ़ दिलाने मैं भी निकल पड़ा था जंगलों में, जान हथेली पर रखकर, बंदूक तान कर, कैसे हमने शोषक ताकतों में दहशत फैला दी थी, हम उनके सैनिकों पर वार करते, वापस जंगलों में छिप जाते, दुश्मन से भिड़ने के लिये मिलिटरी बेस और बैंक लूटते, हथियार खरीदते, दुश्मन पर लगातार हावी रहते। मन में हौसला था, इस विश्वास से जी रहे थे कि जीत हमारी होगी, हमारे लोगों में चैन और अमन होगा। लेकिन फिर हम अपने ही लोगों पर अत्याचार करने लगे, उन्हें मारने लगे, उनकी लड़कियों का अपहरण करने लगे, उनके लड़कों को पकड़ कर ज़बरदस्ती अपनी सेना में भरती करने लगे। जिन वजहों के लिये मैं इस जंग में शामिल हुआ था, एक-एक कर वे सब मरने लगीं थीं। दिल का मैं प्रेमी था न, न्याय चाहता था, आतंक फैलाना नहीं। इसलिये एक दिन आया, जब मैं भाग गया, साथ में पकड़ी हुई लड़कियों में से सबसे दुखी लड़की को ले गया, कि भाग रहा हूँ, एक भला काम और कर लूँ। इस बेचारी लड़की को – ज़रा नाम था उसका – ज़रा को वापस उसके घर पहुँचा दूँ। ज़रा के आँसू हमारे भाग जाने के पहले दिन ही गायब हो गए। मैंने उससे कहा था कि डरो मत, देखना हम यहाँ से ज़रूर निकल पाएंगे। मैं ध्यान से, अपने पुराने साथियों से और सरकारी सैनिकों से बच-बच कर जंगल से निकलने के रास्ते ढूँढता था, वह भी जल्द सावधान रहने के सब तरीके सीख गई। खतरों के बावजूद, हमें दिख रहा था कि हमारे चारों तरफ़ जंगल में स्वर्ग बसा था, हर पेड़ देवता सा खड़ा था। हम वन के जानवरों को देखते थे, उनके ढंग समझते थे, हमें लगता था कि अगर कुछ दिन और हम इस जंगल में इस तरह रहेंगे तो उनकी भाषा भी सीख जाएंगे। मैं ढूँढ कर उसके लिये खाना लाता था, वह रास्ते भर फूल बीनती हुई चलती थी। उन्हें मिला-मिलाकर मालाएँ बनाती थी। कुछ पेड़ों को पहनाती थी, कुछ खुद को, मुझे भी। हमने जंगल में दस दिन यों काटे। फिर एक दिन जंगल खत्म होता हुआ दिखा। मैं खुश था। उसे बताने को मुड़ा तो वह थकी सी लग रही थी। उसने मेरी बंदूक मेरे कंधे से उतरवाई और वहीं पेड़ के तले छोड़ दी। हम बाहर आ गए। मुझे उसके गाँव का रास्ता मालूम था। गाँव उसका दूर नहीं था। तीन-चार दिन का रास्ता था। मैं उसमें उत्साह जगाना चाह रहा था, मगर उसका तो हौसला ही मर चुका था। उसके गाँव पहुँचने में मुझे दस दिन लगे। पूरे रास्ते उसे गोद में जो लिये हुए था। फिर जब उसका गाँव आया, उसे अपनी आँखें खुली रखने में मुश्किल हो रही थी। फिर भी उन्हें खोल-खोल कर उंगली से इशारा करती, कि यहाँ नहीं, वहाँ जाओ, अब इधर मुड़ो। जब तक हम उसके दरवाज़े पर पहुँचे, वह इस दुनिया से जा चुकी थी।”
उसकी कहानी सुन कर मेरे रौंगटे खड़े हो गए थे। इस बीच वह खिसक कर और पास आ गया था। उसने अपना प्याला मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने उसे अनदेखा कर कहा, “क्या तुम ... क्या वह ... क्या तुम दोनों एक दूसरे को प्यार करने लगे थे?” सवाल पूछते ही मुझे लगा कि यह कैसा बेमतलब सवाल पूछ लिया।
वह मुसकुरा कर बोला, “मोना ने भी तो एकदम यही बात पूछी थी। मैं क्या कहता। ऐसा प्यार तो हर इंसान को एक दूसरे से करना चाहिये न। चुप रहा। फिर वही बोली थी, काश मैंने भी अपने जीवन में प्यार महसूस किया होता।”
उसने वही प्याला जो कुछ पल पहले मेरी ओर बढ़ाया था बड़े भव्य अंदाज़ में हवा में ऊपर किया और बोला, “फिर याद है न मैंने मोना से पूछा था, तो क्या तुमने कभी प्यार नहीं किया?”
बड़ा झूम-झूम कर बोल रहा था वह। मैं भी उसकी हर बात कान लगा कर सुन रही थी।
“और बड़ी हिचकिचाहट से, हकलाते-हकलाते वह बोली थी, किया है न, लेकिन अपने लिये किसी का प्यार महसूस नहीं किया। फिर मैंने उससे कहा था ...” यह बात वह अपनी आवाज़ घुमाते हुए बोला, “अच्छा, कौन है वह खुशनसीब जिसे तुमने प्यार किया है? हमें नहीं बताओगी? और वह बोली थी, नहीं, तुम गलत समझ बैठोगे। अगर बताऊंगी तो कहीं गलती न हो जाए। फिर मैंने ही उससे कहा था। हाँ, न ही बताओ, क्योंकि अगर मैं उसका नाम सुनूँगा तो जल कर भस्म हो जाऊँगा। मेरे यों कहने से उसने अपना सिर चादर में छिपा लिया था। अरे तुम ये सब भूल कैसे गई?”
“ओह माय गॉड! हाओ कैन दैट बी?” मेरे मुँह से ये बात तीर की तरह निकल गई। “क्या मोना तुम से प्यार करने लगी थी?”
हाय, मैंने ‘तुम से’ पर इतना ज़ोर क्यों दिया?  देखा कैसे उसका खुशी से खिला चेहरा कुम्हला गया।
“हाँ, वह मुझ से प्यार करने लगी थी। मुझे तो यही लगता था कि प्यार दिलों के बीच में होता है, सूरत का प्यार से क्या लेना-देना। लेकिन शायद मैं गलत था। शायद वह बेवकूफ़ मुझसे यों प्यार कर बैठी क्योंकि वह अंधी थी। लेकिन मैं खुश हूँ कि मेरी वजह से वह खुशी से मर तो पाई।”
“तो क्या वह मर गई?” मैंने चौंक कर पूछा।
“हाँ, यहाँ जो आता है, मरने ही तो आता है। इस जगह का यही दस्तूर है।” वह अब जाने के लिये खड़ा हो रहा था। तभी उसकी नज़र साथ वाली महिला पर पड़ी। वह चौंक गया। ‘अरे, ये फिर आ गई!’
मुझे अब तक उससे उसके दिल दुखाने वाली बात कहने पर पछतावा हो रहा था। मैंने उसका हाथ तुरंत थाम लिया। “आए ऐम सौरी राजकुमार ... अम् ... राज-कू।”
तब एक जादू हो गया। मेरे शब्द सुन कर राजकुमार की बाँछें खिल गईं। वह वापस बैठ गया। वह मेरे इतने करीब था कि मुझे उसकी आँखों का हर भाव, चेहरे का रोम-रोम, मुस्कान को घेरे हर लकीर साफ़ दिखाई दे रही थी। वह मेरे लिये अनजान ज़रूर था, फिर भी मैं उसे समझ पा रही थी। उसने अपना प्याला मेज़ पर रखा और मेरा गाल अपनी हथेली में लेते हुए कहा, “अच्छा दोस्त, जाता हूँ। बहुत खुशी मिली दुबारा मिल कर।”
खड़े होते-होते एक बार फिर उस औरत की ओर देखा। जाने लगा।
“रुको - हम पहले कब मिले थे?” मैं बोली।
“अरे,” चलने को उसके उठते कदम रुक गए। “यह कैसे भूल गईं?” उसने अपना लॉकिट खोल कर दिखाया। अंदर मेरी और एक और लड़की की फ़ोटो थी। लड़की देखने में अंधी लग रही थी। मैं उसे अचंभे से देखने लगी। सिर टेढ़ा कर के, आँखें बड़ी कर, शरारती मुस्कान मुसकुराते हुए वह बोला, “मोना और तुम ... इसी वॉर्ड में...”
फिर चलने को हुआ, “अच्छा, एक ज़रूरी काम आ गया है। जाना पड़ेगा। फिर कभी, फिर मिलेंगे।” दरवाज़े पर पहुँच कर उसने मुड़ कर मुझे देखा। अंगूठा होठों पर फिराया। यही अंगूठा कुछ पल पहले मेरे गाल पर था। “लो, हो गया न चुम्मा कम्प्लीट,” ठसक कर हँस दिया, “अब मैं शान से दोस्तों को बताऊँगा कि मैंने भी एक हिन्दुस्तानी राजकुमारी को चूमा है ...”
वह चला गया। मेरे मन में ढेर सारी खुशी भरी छोड़ गया।

- 4 –
घड़ी सुबह के चार बता रही थी। मुझे अब सोना मुश्किल लग रहा था। तभी मेरे बगल वाली मरीज़ की करवट बदलने नर्स आ गई। मरीज़ को नपा-तुला खाना सीधा पेट में जाते पैग-ट्यूब के ज़रिये खिलाया जाता था। इन सब बातों का चार्ट बनाने के लिये नर्स दिन में दो बार चक्कर लगाती थी। मुझे जागा देख उसने मुसकुरा कर पूछा, “नींद नहीं आ रही, आईस क्रीम लाऊँ?” मैं यहाँ की मिरेकल मरीज़ थी। मुझे जल्द-से-जल्द स्वस्थ बनाना यहाँ के स्टाफ़ का एक मिशन बन गया था।
“रुपया-पैसा, शौहरत, आराम, इज़्ज़त, प्यार ... सबको इस तरह की चीज़ें चाहिये। लेकिन प्यार ही सबसे ज़रूरी चीज़ है। वही सबसे ज़्यादा खुशी देती है। लेने वाले को भी, देने वाले को भी।” उस आदमी के जाने के बाद मन में एक स्वच्छता सी आ गई थी। मैं आईस-क्रीम खा रही थी और इस तरह की बातें सोच रही थी। मुझे अपनी आँख के किनारे से कोमा में पड़ी मरीज़ का कुछ हिलना-डुलना महसूस होने लगा। मैंने उस ओर देखा, सच में वह छटपटा रही थीं। मैंने खुद को पलंग से खींच कर उठाया और आई.वी. पोल का सहारा ले कर उनके पास आ गई। उनकी आँखें खुली थीं। वे मुझे देख रही थीं। मैंने झट पास पड़ी नर्स की घंटी बजाई। जिस नर्स ने राउंड लगाया था, उसकी ड्यूटी खत्म हो चुकी थी। अगली नर्स आधे घंटे में आने वाली थी। जाते-जाते नर्स कॉल-बैल को पास के दूसरे वॉर्ड के नर्स-स्टेशन से कनैक्ट करके गई थी। शायद इसलिये तुरंत कोई नहीं आ पाया। मैंने कोमा से निकली उन मरीज़ से कहा, “मुझे बताइये, क्या चाहिये?”
उन्हें कुछ समय लगा, उनकी मुस्कान ने मुझे दंग कर दिया। शायद वे बहुत दिन बाद हिन्दी सुन रही थीं।
मैंने उनसे फिर पूछा, “आन्टी, आपको कुछ चाहिये?”
उनके सीधे हाथ में कुछ हरकत हुई। फिर धीरे-धीरे वह उसे उठा कर अपने मुँह तक ले आईं। उंगली मुँह में डाल दी, फिर पूरा दम लगा कर बोलीं, “खा ... खा-ना-!”
मेरी नज़र उनके पैग-ट्यूब पर गई। अभी तो नर्स उन्हें देख कर गई थी।
मैंने उनसे कहा कि मैं नर्स को बुलाती हूँ और एक बार फिर घंटी बजा दी। मुझे नहीं मालूम था कि दूसरे वॉर्ड का नर्स-स्टेशन है किधर। इतने वक्त अस्पताल एकदम खाली पड़ा था, दिन के वक्त अस्पताल में खो जाने का ख्याल ही नहीं उठता था, परंतु रात में सब हॉलवे-कॉरिडोर एक से लगने लगते थे, लेबल अनजान भाषा में लिखे होते, मरीज़ आराम से यहाँ खो सकता था। मैं बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। चुपचाप अपने बिस्तर पर बैठ गई। उन्हें देखने लगी। वह फिर उंगली मुँह पर ला कर चिल्लाईं, खा– ना-!
मैं उनकी आवाज़ सुनकर चौंक गई। घंटी दुबारा बजा दी। अपनी आईस-क्रीम उठा कर खाने लगी। अब तो उससे भी मेरा मन हट गया था। पता नहीं कोई नर्स क्यों नहीं आ रही थी।
फिर उन्हें न जाने क्या हो गया, वह लगातार उसी ढंग से चिल्लाने लगीं, खा- ना- खा- ना- खा- ना- ...
मैं बुरी तरह घबरा गई। बार-बार कभी दरवाज़ा देखती, कभी घंटी, कभी उन्हें। मैं फिर उठ कर उनके पास आ गई। उनका हाथ पकड़ा। बोली, “आन्टी, मैंने नर्स को बुलाया है न। प्लीज़, ऐसे न करिये। आपकी हालत न खराब हो जाए।”
फिर मेरी आँखों में झाँकते हुए वह बोलीं, “मुझे खाना चाहिये।”
वे ये सब धीरे-धीरे बोल रही थीं।
‘ये लोग मुझे खाना नहीं देते हैं।”
वह आँखें फाड़ कर कह रही थीं।
‘मुझे आईस-क्रीम चाहिये। अभी।”
मैं बोली, “हाँ, आईस-क्रीम मंगवाते हैं न।”
फिर घंटी बजाई। पलंग पर बैठ कर दरवाज़े को देखने लगी। लेकिन इस बार आन्टी ने फ़ुल-फ़्लैज्ड धरना शुरू कर दिया।
‘मु-झे- आईस-क्रीम चा-हि-ये- ... आईस-क्रीम ... आईस-क्रीम ... आईस-क्रीम ...”
मैंने दो बार फिर घंटी बजाई। मुझे लगा मैं रो पड़ूँगी। मुझे लगा मुझे अपनी आईस-क्रीम को ही फेंक देना चाहिये। फेंकने के लिये जो उठाया तो सोचा, क्यों न बस आधी चम्मच आईस-क्रीम इन्हें चखा दूँ।
मैं बड़े सम्हल कर उनके बिस्तर पर बैठी। दुबारा उनका हाथ पकड़ा। बोली, “आन्टी, मैं आपको आईस-क्रीम दूँगी। मेरी बात सुनिये। अगर आप इसे बहुत ध्यान से निगलेंगी, तभी मैं आपको आईस-क्रीम दूँगी। आप समझ रही हैं न।”
वे शांत हो गईं। फिर बोलीं, “हाँ, तू मुझे थोड़ी सी आईस-क्रीम चटा दे। बस।”
फिर मैंने ज़रा सी आईस-क्रीम उनके मुँह में डाल दी। उन्होंने उसे पिघलने दिया। देर तक आँखें मूंदे रहीं। चेहरे में एक सुकून फैल गया। ऐसा लग रहा था वह किसी ऊँची शिखर में पहुँचने में कामयाब होकर अब नीचे फैले जहान को निहार रही हैं। फिर अचानक उन्होंने आँखें खोलीं, आँखों से ही अगली चम्मच की माँग की। मैंने फिर बड़े ध्यान से उनके मुँह में आधी चम्मच आईस-क्रीम डाल दी। इस बार मुझे नर्स के आ जाने का डर बिलकुल नहीं लगा। उनके चेहरे का वह सुकून जो दुबारा देखना था। इस बार भी उन्होंने आईस-क्रीम की वह चम्मच उतने ही चाव से खाई। ठीक से निगल भी ली। कोई मुश्किल नहीं हुई। मैं और दबंग हो गई थी। आधी-आधी चम्मच करके उनके मन की ख्वाईश पूरी करती गई। पाँचवी चम्मच के बाद उन्होंने हाथ आगे कर दिया। बोलीं, “बस।” आराम से तकिये पर लेट गईं। मैंने उनका मुँह साफ़ किया। हाथ से जो प्लास्टिक की चम्मच गिरकर उनके बैड के नीचे पहुँच गई थी, उसे उठाने की हिम्मत नहीं हुई। अपने पलंग पर लौट आई। वह टकटकी बाँधे मुझे देख रही थीं। उनके चेहरे पर मुझे कोई पीड़ा नहीं दिख रही थी। वे संतुष्ट लग रही थीं।
फिर धीमे से बोलीं, “शादी?”
मैंने सिर हिला कर हाँ किया।
- बच्चे?
सिर के ही इशारे से न कर दिया।
- कोई नहीं। बच्चे ज़रूरी नहीं होते।
फिर वे ज़रा देर चुप रहीं। मैं भी लेट कर आराम करने लगी। थक गई थी। कुछ देर बाद वह फिर बोलीं, “प्यार करता है आदमी?”
मैंने सिर हिला कर हाँ कर दिया।
- खुश है?
मैंने फिर सिर हिला दिया।
- बस, यही काफ़ी है।
उन्होंने आँखें मूंद लीं। फिर दुबारा खोल कर, “थक गई हूँ, थोड़ा सो लूँ, कल ... और बातें ...”
इसके बाद वे सो गईं। मैं भी सो गई।

- 5 -
सुबह मैं एक नए उत्साह के साथ उठी। लगा मैं यहाँ अस्पताल के बैड में क्या कर रही हूँ। अब घर लौटना चाहिये। मेरे दोनों तरफ़ के बैड में दो नए मरीज़ थे। चिड़चिड़े से, तकलीफ़ में थे न। कोमा वाली आन्टी होश में आ गई थीं, शायद इसलिये उन्हें डिसचार्ज कर दिया होगा, मैं सोच रही थी। दुख हो रहा था कि उनके जाने पर उनसे विदा भी नहीं ले पाई, सोती रही। कुछ देर में नर्स आई। उसने मुझे बताया कि डॉक्टर ने मुझे घर जाने की स्वीकृति दे दी है। कू को सुबह ही इत्तला कर दी गई थी। वह कभी भी मुझे लेने पहुँचने वाला था। नर्स मेरा सामान इकट्ठा करने आई थी। साइड-टेबल में कुछ चीज़ें थीं, और साथ लगी अलमारी में कुछ कपड़े और किताबें। वह सब नर्स ने मेरे बैग में लगा दिये। मैं पलंग पर बैठे देखती रही।
नज़र बगल के पलंग के नीचे पड़ी चम्मच पर पड़ी। मैंने उससे कहा, “सॉरी, वह चम्मच मुझसे गिर गई थी। उठा नहीं पाई।”
नर्स बोली, “नो वरीज़, चैमप्यन!’
चम्मच उठा ली।
मेरा ध्यान साईड-टेबल पर रखी सुराही पर गया। मैं बोली, “ये मेरी नहीं है। ये तो उस ...”
मैं उस आदमी का नाम याद करने लगी ...
नर्स बोली, “नहीं, नहीं, ये उस कोमाटोज़ मरीज़ की भी नहीं है। सुबह उनके घर वाले उनका सब सामान ले गए। उन्होंने ही कहा ये आपकी होगी।”
मैंने कहा, “कुछ नहीं होता।”
नर्स मुझे बाहर वेटिंग रूम में ले आई। कुछ देर में डॉक्टर से बात करके कू भी आ गया। आते ही मुझे अपनी बाहों में भर लिया। हम अस्पताल के रिवौल्विंग डोर से बाहर निकले, साईड में पार्किंग थी, सामने खूबसूरत दुनिया।

“वैल्कम टु यौर न्यू लाईफ़, माय लव!” कह कर कू मुझे कार की तरफ़ ले जाने लगा। वह मेरे साथ रफ्तार बनाए धीरे-धीरे चल रहा था। या फिर वक्त ही मेहरबान हो कर ख़ास हमारे लिये धीमा हो गया था।
सामने से कोमा वाली आन्टी की बहू आती दिखीं। उन्होंने मुझे ठीक होने की खूब बधाई दी।
“क्या अब आन्टी घर में हैं?” मैंने चहक कर पूछा।
वह मुझे अजीब तरह से देखने लगीं। फिर बोलीं, “अरे हाँ, आज सुबह हम तड़के आए थे, पाँच बजे। डॉक्टर ने तब ही का अपॉइन्टमैंट दिया था। तब आप सो रही थीं, रागिनी जी। इसलिये शायद आपको मालूम नहीं चल पाया। हमने माँ को जाने दिया। अब माँ चैन से वैकुंठ में हैं। आज मेरे पति को कितने अरसे बाद शांति मिली है, मैं आपको क्या बताऊँ, रागिनी जी, वरना ...”
वह बोलती चली जा रही थीं और मैं आगे बढ़ गई थी।

2 comments :

  1. मुक्ता जी , आप की कहानी ने मुझे अपने कैंसर ट्रीटमैंट के काल में पहूंचा दिया । आप ने जो भी लिखा मैं चलचित्र की भांति देख रही थी । और आप की नायिका की जगह स्वय को पा रही थी ।
    उत्कृष्ट कहानी ।

    ReplyDelete
  2. वाह, अद्भुत लेखन शैली। एक उत्कृष्ट कहानी के लिए हार्दिक बधाई।

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।