आपसे बहस व्यर्थ है: बर्ट्रेंड रसेल

मेहेर वान

- मेहेर वान


हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जिसमे विचारों और मतों में गहरा विभाजन हैं। इस वैचारिक विभाजन के दौर में लोगों से आपस में बातचीत करना और विषयों पर वाद-विवाद करना उतना सहज नहीं रहा। दोस्तों और अपनों में भी वैचारिक मतभेद के कारण विद्वेष उत्पन्न हो जाता है। किसी विषय पर वैचारिक असहमति अब विभाजन का कारण बन चुकी है। वैचारिक असहमति के बावजूद आपस में साथ रहकर भी यथासंभव समाज के भले की दिशा में सोचना और प्रयास करना बहुत असंभव सा लगता है। इस दौर में जब वैचारिक असहमति की तीव्रता का स्तर सामंजस्य के न्यूनतम स्तर से भी कम हो जाता है तो बातचीत और संवाद बेमानी प्रतीत होने लगता है। एक ऐसी ही परिस्थिति में बर्ट्रेंड रसेल ने वैचारिक रूप से भिन्न मत वाले व्यक्ति के एक पत्र का उत्तर देते हुए जवाब दिया था कि हमें अब बहस नहीं करनी चाहिए क्योंकि हमारे विचारधाराओं की भिन्नता का स्तर बहुत ही गहरा है। बर्ट्रेंड रसेल एक प्रख्यात दार्शनिक थे, जिन्हें उनके लेखन के लिए नोबेल पुरस्कार भी प्रदान किया गया था। सन 1962 में सर ओसवाल्ड मोसले की ओर से बर्ट्रेंड रसेल को पत्रों की एक श्रंखला प्राप्त हुई, मोसले ने इसके लगभग तीस साल पहले ब्रिटिश फासीवादी संघ की स्थापना की थी। मोसले इन पत्रों के ज़रिये रसेल को फासीवाद पर एक बहस में खींचना चाहते थे। रसेल का यह बेहतरीन पत्र रोनाल्ड क्लार्क द्वारा लिखित बर्ट्रेंड रसेल की जीवनी “द लाइफ ऑफ़ बर्ट्रेंड रसेल” में शामिल किया था। जब रसेल ने यह पत्र लिखा तब वह अपना 90वाँ जन्मदिन मना रहे थे।

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बर्ट्रेंड रसेल
(मई 18, 1872 – फ़रवरी 2, 1970)
प्रिय श्री ओस्वाल्ड,

आपके द्वारा भेजे गए पत्र और संलग्नकों के लिए शुक्रिया। मैंने हमारे हालिया पत्राचार पर कुछ विचार किया। यह तय करना हमेशा बहुत कठिन होता है कि उन व्यक्तियों को कैसे उत्तर दिए जाएँ जिनके संस्कार हमारे खुद के संस्कारों से एकदम पूरी तरह से अजनबी हों, वास्तव में कहा जाए तो जब उनके विचार हमारे विचारों के प्रतिकर्षी हों। ऐसा नहीं है कि मुझे आपके द्वारा दिए गए सामान्य बिन्दुओं से कोई आपत्ति है, लेकिन मेरी ऊर्जा का हर एक टुकड़ा उस निर्दयी धर्मान्धता, बाध्यकारी हिंसा और दूसरों को पीड़ा पहुँचाकर खुश होने की नियत से किये गए ज़ुल्म की निरंतर खिलाफत में तत्पर रहा है जोकि फासीवादी विचारधारा और उसका पालन करने के रूप में स्पष्ट होती हैं।

मैं यह कहने के लिए बाध्य हूँ कि हमारे अन्दर बसे संवेदनात्मक संसार इतने अधिक अलग है और आतंरिक रूप से इतने विरोधी हैं कि हमारे संबंधों से कुछ भी लाभकर या निष्ठावान कभी नहीं निकल सकता।

मैं चाहता हूँ कि आप आप मेरे इस दृढ़ विश्वास की तीव्रता को समझें। मेरा यह कहना किसी भी तरह से अभद्र होना नहीं है बल्कि यह इसलिए है क्योंकि मुझे मानव अनुभवों और मानव उपलब्धियों में बहुत विश्वास है।

भवदीय,
बर्ट्रेंड रसेल
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