कहानी: पारसमणि

संजय कुमार सिंह


"तुम मेरी माँ को गाली दोगी?  तुम्हारी यह मजाल? मैं सरबन कुमार हूँ इस कलियुग में...जीभ खींच लूँगा! पत्नी के पल्लू में बँध कर जीने वाला बेटा नहीं हूँ अपनी माँ का, चाहे कुछ हो जाए।" श्रवन बाबू ने गुस्सा में जोर का धक्का दिया ललकती हुई पत्नी को, वह मोढ़े पर जा गिरी। माथा फूट गया। चोट हल्की सी थी, पर खून रिसा, तो वे सन्न रह गए, यह क्या हो गया!डर से वे कुर्सी पर बैठ गए।

घायल, चोट खायी पत्नी खून देख कर उठी और कमरे में जा कर सांकल बन्द कर लिया, " रहो, अपनी माँ के साथ...अब बुढ़िया का जी जुड़ा गया...मार खिला कर अब विलाप बंद कर दिया...सरवन बेटा बनते हो तो, अब बढ़िया से बनो!"

माँ ने कहा, "यह क्या तुमने? लोग सुनेंगे, तो क्या कहेंगे? छि:छि: इस उम्र में इतना बड़ा आदमी हो कर औरत पर हाथ उठाते हो? अपने सिर भी कलंक ले रहे हो और मुझे भी बेभरम कर रहे हो... अब यही सब देखने के लिए भगवान ने रखा है... बड़का काम किया... कहीं कुछ हो गया तब भुगतना... मार खाओगे बेटा-बेटी से..."

"पानी!" बेटे ने गरज कर कहा।

माँ दौड़ कर पानी ले आयी, "लो, पीओ।"

ड्राइवर रामदास अवाक खड़ा था। बच्चों को स्कूल से लाने का टाइम हो रहा था। भीतर से कराहने और रोने की आवाजें आ रही थीं, "विवाह काहे किया निबंसा? माँ की पूजा करता, तब न दुनिया देखती... बड़ा आया है माँ का प्यारा-दुलारा, दूध पीने वाला।"

"अब सुनो..." माँ डर से हिल रही थी, "मुझको गाँव दे आओ। मैं वहीं रह लूँगी। उसी घर-दुआर पर। चिडी चुनमुन, पेड-पौधे  हैं न... अगल-बगल हित-परमीन... मैं ही बज्जड़ हूँ यहाँ... मैं ही हूँ रार-तकरार का कारण...भगवान उठाए मुझको..."

"वह कलक्टर कैसे मरा जानती हो? " श्रवण बाबू ने कहा, "कलह से, और घर के रोज-रोज के किच किच से ... मैं भी मर जाऊँगा... तुम जाओगी तो और मर जाऊँगा एक दिन में... यहाँ कौन है मुझे देखने वाला? सब पैसे के साथी हैं, नोच कर खा जाएँगे! मुझे  मूर्ख-गँवार रहने देतीं।" उनकी आँखों में आँसू आ गए, "इससे बढिया तो मैं गाँव में ही रहता?  किसके लिए मर-जर रहा हूँ?  किसी को है खयाल?  अफसरी का टोप लगाकर बेहाल हो गया मैं... न बाप के राज में सुख मिला और न अपने राज में... मैं नहीं जीना चाहता हूँ, मैं या तो मर जाऊँगा, नहीं तो पहाड़ की तरफ निकल जाऊँगा। विवाह नहीं करवाया तुम लोगों ने, समझो सब साध पूरी कर दी...श्राद्ध कर दिया।"

माँ अकबक थी, क्या करे, किधर बोले। उसने फुसफुसा कर कहा, "नौटंकी नहीं करो दोनों जने, डॉक्टर को बुलाओ...पहले.पट्टी हो जाए। नुनू बाबू जानेगा, तो और बवाल होगा। आग लग जाएगी।"

"होने दो, जो होना है।"

"नासमझ नहीं बनो।"

"नहीं, अब जो होना होगा, सो होगा इस घर में।"

"बाल-बच्चा बिलट जाएँगे।"

"बिलटने दो।"

"बिलटने कैसे दें?" माँ का रोल पल भर में बदल गया था। श्रवण बाबू को आश्चर्य हो रहा था।। होनी जो न कराए! क्या सोच कर घर आए, क्या हो गया।

***

बच्चे स्कूल से आए, तो अट्टी-पट्टी हो गयी। लेकिन घर के मौन में तनाव खिंचा हुआ था। एक तरफ बूढ़ी माँ और श्रवण बाबू, तो दूसरी तरफ पत्नी, बेटा और बेटी। टोक-टाक और ओल-बोल सब बन्द। खाना-पानी सब बेरस, सब बेकार।

शाम को बेटे ने कहा, "तुम को अपनी माँ प्यारी है, तो मुझको नहीं?"

"सब को माँ प्यारी होती है..." श्रवण बाबू ने जानकर मुलायम स्वर में कहा।

"फिर काहे मारा?" वह आँखें तरेर रहा था, "पत्थर है कि लोहा मेरी माँ... बोलो क्या समझ रखा है?"

"मारे कहाँ.." उन्होंने सफाई देते हुए कहा, "बस ठेल दिया... जरा सा चमड़ा छिल गया, तो इतना बवेला?"

"तुम्हारी माँ को ठेलें?" वह क्रोध में था।

"ठेल दो, बूढ़ी है, भले मर जाएगी।" वे हँसे, पर मन में कहीं रोष भी आ रहा था लड़के के अंदाज पर। क्या अब यह औरत मुझे अपने बेटे से मार खिलाएगी?  मगर वे चुप रहे।

लड़का दादी की ओर घूमा, "बुढ़िया गोली मार दूँगा बेटे को..."

"मार दो।" तमस को छिपा कर माँ ने कहा, "तब पता चलेगा... तुम लोगों के भी मन बढ़ गए हैं।"

"क्या पता चलेगा?" वह बिफरा, " समझा दो।"

"राजू..." भीतर से पत्नी ने कहा, "तुम उसके जैसे मत बनो... इधर आओ।"

उन्हें मिर्ची सी लगी पत्नी की कटूक्ति से। वे तिलमला कर रह गए। इस औरत के इसी स्वभाव से वे और जले हैं...

पत्नी मानो उनके सात पुश्तों के कुल-शील को गलिया रही हो। ऐसे समय उनकी तरफ से भी कुछ निकल ही जाता है। वे क्रोध से तमतमा उठे। मुँह से निकल गया, "किसके जैसा? एक बार और बोलो, इन बच्चों में अभी से विष भरो... आगे काम आएगा।"

"पापा..." राजू से एक साल बड़ी दसवीं में पढ़ रही बेटी बोल रही थी, "मम्मी को चोट लगी है, तो बोलेंगी नहीं? आपको हाथ नहीं उठाना चाहिए था... बहुत गलत बात है... अभी केस हो जाएगा, तो नाक कट जाएगी। औरत पर हाथ उठाते हैं?"

"मेरी माँ क्या मरद है?" उन्हौंने काट की, "फिर कहे न कि हाथ नहीं उठाए, जरा सा धक्का दिया... जान कर गिर गयी।"

"जानकर गिर गयी?" बेटी ने असहमति जतायी।

"रामदास से पूछो..." उन्हौंने पैंतरा बदला।

"रामदास से क्या पूछें?" उसने नाराज होकर कहा, "मम्मी बोल रही थी, तो आप भी डाँटते । दादी कौन काम करती है? "

"तो क्या करूँ?" वे बेकाबू हुए, "फेंक दूँ?"

"नही!" वह बोली, "दादी, मम्मी और हम सब के बीच तालमेल बनाकर चलना होगा आपको।"

"केवल मुझी को?"

"हाँ, केवल आपको।"

"क्यों?"

"वह आप जानिए।"

"अच्छा ठीक है।" वे कसमसा कर रह गए, जैसे चारों ओर से बाँधकर नैतिकता और जिम्मेवारी के नाम पर बेबस किया जा रहो हो।उनके जीने का मकसद उनके हाथ में नहीं, इस घर के दूसरे तीसरे और चौथे लोगों के हाथों में है।चाय माँगो, तो अभी बच्चे का नाश्ता बन रहा है, पानी तो वही... कपड़े, आईना, कंघी माँगो तो वही जवाब, वही कठ-बोल। ऐसे वक्त कई बार उन्हें लगता है, वे पत्थर के एक पिण्ड की तरह हैं, फिर उनके होने का मतलब?  जब जिसे जरूरत होगी, जादू से आदमी बनो और फिर जादू से पत्थर... वे उकठ से गए हों जैसे अपने ही घर में... अपने ही लोगों के बीच...उनके होने का, अपने लिए कुछ नहीं... दूसरा जो करे और कहे, वही सही! वे क्यों मरें और जीएँ?  पत्थर हैं, तो पत्थर ही रहें! वही ठीक! बार-बार मरने-जीने से फायदा?

***

घर में एक तरह का अलगाव पहले से था । वे इस घटना के बाद और बेगाने हो गए। अफसर का टोप पहनते और गाड़ी से दफ्तर निकल जाते। फिर देर शाम को लौटते। किसी से कुछ नहीं कहते और न कोई उन्हें टोकता। खाना-पीना उठना -बैठना सब बेतरतीब। दाढी-मूँछ सब वैसे! चलने दो, रहने दो।

माँ ने एक रोज टोका, "ऐसे कैसे चलेगा? किसी से कोई टोक-बोल नहीं?  सब अलग-अलग। एक-दूसरे से उकठे हुए। तुम भी क्या देह धरे हो? ढब-ढाँचा देखो।"

"देह धरे को दुख माँ!" अफसर बेटे ने कहा, "दुख बाँट लोगी क्या?  पाला-पोसा, बड़ा किया, दूध-फूल से... अब मत सोचो माँ...दुख-सुख सात-प्राण और आठ कोस भी जाओ, तो पिण्ड नहीं छोड़ते। सब का अपना भाग-भोग। विधि का लेख ! आदमी का जनम, तो सौ बात! चिड़ी चुनमुन के लिए कौन रोता है माँ? अपना गोला कुत्ता गाँव में बैलगाड़ी से दब कर मर गया, तो कोई रोयाा? ? कुछ मत बोल। चुप हो जा।"

माँ रोने लगी, "मैं तो रोई।"

"तू भी मत रो।"

"मैं माँ हूँ..." वह हिचकने लगी, "मैं नहीं रोऊँगी, तुम लोगों के लिए, तो लोग रोएँगे?"

"रोने से किसके भाग बदले माँ?" बेटा बोला, "सब को मुझी से गिला-शिकवा है न? यह टोप उतार दूँगा..."

"अपने बाबू पर ना जा" माँ बोली, "एक जनम गिंजन हो गया। अब न कर। बहू भी दिल से बुरी नहीं, सुलह करो। बाल-लाल पर ध्यान लगाओ। घर-परिवार में सब होता है। क्या तुम्हारे बाबू भाग सके, जो तुम भाग सकोगे?"

"अच्छा जाओ माँ।" अफसर बेटा ने कहा, " मेरा माथा नहीं खाओ। जीव-माया तुम औरतों  का महारास है। ज्यादा पसार न करो। मेरा भाग-करम फिर से नहीं लिखो।"

"बेटा बाबू पहले भूल-गलती से पत्थर हुए और फिर दुख और अभाव से।" माँ ने बिसूरते हुए कहा, "छत्तीस भर सोना और बीस बीघा खेत बिक गए...राजमहल  से निकल के धुर-माटी हो गए। पढने के लिए बडे बाबा ने नौकर और गाय बन्हवा दी थी बिहारी बाग में ...नौकरी छोड़ के बैठे, तो गाय-बैल की कुट्टी -सानी लगानी पड़ी..जब गियान हुआ, तो तुम लोग को पढाने में लग गए...बिटिया के बियाह में और टूट-फूट गए!"

"बन्द करो गरूड़-पुराण।" बेटे ने चिढ़ कर कहा, " उस वक्त कहाँ गया था ज्ञान...सब तुम लोगों के कारण हुआ।पहले ही भाग-तकदीर जला बैठी हो, अब मुझे दोष मत दो। चलो हटो।"

मूड गरम देखकर माँ हट गयी।

***

मन टूटा -बिखरा सा था श्रवण बाबू का। माँ की बातों से बचपन की स्मृति दिमाग में कटे-फटे मेघ खण्ड की तरह उड़ियाने लगी। बड़का हवेली में बाबू सबसे बड़े कंगाल। दर-दियाद और रिश्ते-नाते में भी हँसी-उपहास। कहते हैं बाबू का गुस्सा नौ लाख का, बिका नौ पैसे में। कोई गत नहीं रही। पाई-कौड़ी के लिए तरस गए। मर-खप गए।दुख की रुई की गाँठ बाँधते-ढोते खुद फूल से काँट हो गए। फिर गल गए । एक युग, दो युग और तीन युग बीत गए। देह गेंदा फूल थी। रहड़ की डार रह गयी।

बचपन से जवानी तक कभी ढंग कपडे और चैन से भोजन करते नहीं देखा बाबू को। दस करजदार हमेशा सवार। फजीहत ही फजीहत। फिर बड़े बेटे की मौत! दुख ने पूरा तोडकर रख दिया उन्हें!अभागत ही अभागत!  सरबन रन-बन।मगर मालिक ने सरबन  के सिर पर टोप रखी, तो एक बार बाबू के काँटे सूख कर फिर गिरे। सरबन, सरबन से श्रवण बाबू बने। गाड़ी खरीदी और बाबू को घूमाया। बोले, " हँसिए बाबू! एक बार हँसिए। बहुत रोए हम लोग! देह धरे को दुख बाबू और देह धरे को सुख। जीव-जगत का यही खेल। यही रीत।"

दुखवा में उगल कटइया
सुखवा में ओहि गाछे फूल
बाबा जिनगी में होवे गलती-भूल...

बाबू रोए पहले और फिर हँसे, "गाड़ी का दाम बौआ?"

"तीन लाख।" किसी ने कहा।

"तीन गाम भोज करना मेरे मरने पर!"

"पहले बेटा का बियाह करिए मामा" भूपन डीलर ने कहा, "अभी काहे मरिएगा। अभी तो राज-पाट लौटा है। सातो घोड़े इन्द्रधनुष के सात रंग लेकर आए हैंं..."

"विवाह!" वे हँसे, "एक ठो मास्टर साहब को वचन दे दिया। अब सरबन जाने। विवाह भी धारे-साजे तब न। बड़का तो ससुराल से ही विदा हुआ। अब और क्या बोलूँ! छोटा घर ही ठीक। सरबन को समझाओ।"

***

समझाने की जरूरत नहीं पड़ी। विवाह धूम-धाम से हुआ सरबन का। तीन साल बाद बाबू मरे, तो तीन गाम भोज भी। वही पुराना ठाठ-बाट। वही नाम-धाम और मोर-महल... पर आज?

श्रवण बाबू ने खुद को झटका दिया।

रात काफी हो गयी थी। वे सो गए। आकाश में फूलझड़ियाँ छूट रही थीं। शोले जलकर गिर रहे थे दिल की धरती पर... हल्दी-पिठार कुमकुम और रोली से बनायी अल्पनाएँ जल रही थीं!

***

कल जिस टोपी को वे फेंकने की धमकी दे रहे थे। सवेरे सिर पर थी। रामदास गाड़ी साफ कर रह था। उन्हौंने एक बार पत्नी और बच्चों की ओर देखा। टोपी की जगह मोर-मुकुट! लाल-पीली धोती।बीस बरस पहले की बात याद आयी। मन कसैला हो गया। कान में वह गाना गूँजा, जो उनकी बहनें गा रही थीं परीक्षण के समय...

हँसी -हँसी पनवा खियौले बेईमनवा
अँखिया में झोंकि देल$ धूल
बाबा जिनगी में होवे गलती भूल...

बाबू ने सरबन को बोर दिया। लडकी  भैय्या के बरोबर नहीं। ये बडा अन्याय हो गया... हँसी में भी हँसी नहीं और खुशी में भी खुशी नहीं! भाग का जला, फूल भी छूए, तो धूल! किसके सिर, किसकी गलती-भूल!

बाबू कह रहे थे मन लटकाए माँ से, "सरबन की माँ लडकी के रूप पर मत जाओ, उसके शील-स्वभाव पर जाओ। आशीष दो, बेटा का भाग-सुभाग सही रहे।"

...और आज? आज क्या?  उसी रोज से श्रवण बाबू को लगा भाग का लेखा भगवान भी नहीं बदल सकते। सरबन पूरब तो पत्नी पश्चिम। सरबन पश्चिम तो पत्नी पूरब।

"मेरा सोना कहाँ गया? दस अँगूठी में पाँच कहाँ गयीं? "हाथ की मेंहदी के रंग उतरे नहीं कि वह विष उगल रही थी।

"बहन-बहनोई को नेग-देग दिए।"

"इतना बडा आदमी है, तो बनाकर देते।"

"दे देंगे।" वे अनमनाए।

"मेरा हाथ पकड़े हो, तो मुझसे भी पूछो।"

"काहे पूछें? "

"विवाह काहे किए?"

वे उठकर दरवाजे पर आ गए। औरतों में कानाफूसी हुई। मान-मनौव्वल। माँ हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयी। बहन-बहनोई हाथ पकड़ कर, "जो हुआ, सो हुआ। गाँव-समाज घिना जाएगा।"

सरबन लौट आए।

***

एक सप्ताह तक श्रवण बाबू पर माँ की बातों का कोई असर नहीं हुआ। वे उसी तरह खुद से रूठे रहे। दफ्तर से लौटते समय रामदास ने कहा, " दोपहर में मेम साहिब रो रही थीं दादी माँ को पकड़ कर..."

"काहे? " वे चौंके।

"आप घर में खाते-पीते नहीं।" रामदास ने कहा, "औरत का दिल दुखाने से फायदा? "

रामदास उनके गाँव का ड्राइवर था। लगभग घरेलू। दुख-सुख का राजदार। वह भी दुखी था कई दिनों से।

"वह बूढ़ी माँ से लड़ती है।"

"कहाँ लड़ती हैं?" वह बोला, "दादी माँ, तो उन्हीं के पाट बोल रही थीं कि बहू सरबन बाप की नाल ठोक रहा है... मरद क्या जाने औरत का दर्द... धीरज धरो... समझा रही हूँ..."

"क्या?" उन्हें बिजली सी लगी।

"अच्छा नहीं लग रहा।" रामदास ने साहस कर कहा, "पूरा घर उदास है। महरी कह रही थी साहब आजकल होटल में खाते हैं क्या ड्राइवर साहब...?"

वे अवाक हो गए। उन्हें रामदास की बात पर हँसी भी आयी। उल्टे चोर, कोतवाल को डाँटे। वे मन ही मन और पत्थर हो गए।

...

रात में अप्रत्याशित बदलाव के साथ पत्नी आयी, तो वे चौंके, "क्या बात है? कहाँ आयी हो? गोली मरवाओगी क्या?"

"दस साल के बच्चे की बात पकड़ कर बैठो हो?" वह हँसी, "किसी की माँ को मारोगे, तो वह क्या कहेगा?"

"तुमको मारा था मैंने?"

"तो क्या चूमने में माथा फटा?" वह सहज भाव से बोली, "मार भी दिए और रूठ भी गए।"

"मेरे रूठने का दर्द तुमको काहे?"

"तब किसको होगा? "

"किसी को नहीं।" उन्होंने टूट कर कहा।

वह रुआँसी होकर बोली, "तुमने कभी मुझे दिल से प्यार नहीं किया।"

"तब किसे किया?" उन्होंने उबल कर कहा।

"वह मैं क्या जानूँ, तुम जानो। तुम्हारे दिल का मलाल है।"

वह पूरा पसीज रही थी।

"जलील कर रही हो!" वे बौखला गए, "तुमने हमेशा मुझे हर्ट किया है... इसी तरह जली-कटी बोल कर, तब मैं ऐसा हो गया।"

"मेरी क्या बिसात!" वह उसी तरह बोली, "अफसर हो, बाबू हो, बड़े आदमी हो ...पत्थर नहीं, पारसमणि हो तुम... पुरुष माने पारसमणि!"

"औरत माने?"

"पत्थर, बज्जड़, लोहा..."

"नहीं तुम पारसमणि हो!"

"नहीं तुम..."

"उल्टा बोल, बोल रही हो?" उन्होंने दबी जुबान से कहा, "जाओगी तुम?"

"नहीं मेरे हाकिम!," वह मुस्कूरायी, "एक बार मुझे प्यार से छुओ, तो सही, मैं सोना बन जाऊँगी। पिघल कर सोना... आज सोना बनाओ मुझे... पत्थर को, लोह को, काठ-उकठ, जो भी कहो..."

"इस उम्र में? " वे बोले, "लगता है पागल हो गयी हो।"

"हाँ..." वह बोली, "गिनने में रह गए, तो पागल हो गयी, पर औरत के दुख-दर्द को जानो आज, तो जानें..."

श्रवण कुमार ने अपने अफसर को देखा, क्या सच कह रही है वह। उन्हें खुद से पश्चाताप हुआ... अगर सचमुच वे पारसमणि हैं, तो इस औरत को, नहीं पत्थर को, बज्जड लोहा को, अब तक सोना हो जाना चाहिए था। वे कुछ पल खुद में अटके से रहे फिर पत्नी से लिपट गए!

***

केहु कहे राजा, केहु कहे रानी
केहु कहे पाथर, केहु कहे पानी
बगिया में उगल फेनू फूल
बाबा जिनगी में होवे गलती-भूल...


सम्प्रति: प्राचार्य, आर.डी.एस. काॅलेज, सालमारी, कटिहार।
चलभाष: +91 943 186 7283
रचनात्मक उपलब्धियाँ: हंस, कथादेश, वागर्थ, पाखी, साखी, अहा जिन्दगी, साहित्यनामा आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

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