उपकार का दंश – मानवीय करुणा दर्शाती कहानियाँ

पुस्तक: उपकार का दंश
लेखिका: डॉ करुणा पांडे
प्रकाशक: आधारशिला प्रकाशन, नैनीताल
मूल्य: ₹ 250.00 रुपये
पृष्ठ: 168

समीक्षक: नितिन सेठी


डॉ करुणा पांडे का नवीनतम कहानी संग्रह “उपकार का दंश”अपनी पंद्रह कहानियों के माध्यम से सामाजिक यथार्थ को पाठकों के समक्ष रखता है। प्रस्तुत संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ समसामयिक मुद्दों और परिस्थितियों का सटीक शब्दांकन करती हैं। बिखरते पारिवारिक रिश्ते, दरकता विशवास, झूठा प्रेम, नृशंसता जैसे तत्वों को डॉ करुणा पांडे ने बड़ी ही शिद्दत के साथ इन कहानियों में शब्दांकित किया है। बहुत हद तक वह मुद्दों को समाज के सामने लाने में सफल भी कही जा सकती हैं। कहानी वैसे भी घटनाओं, परिघटनाओं का समूह होती है, जिसके माध्यम से लेखक एक बड़े फलक को अभिव्यक्ति देता है। संवेदनशीलता का गुण इसे पाठकों से जोड़ता है। लेखक की यही सबसे बड़ी जीत कही जा सकती है कि वह कितनी गहराई से अपनी अभिव्यक्ति को पाठकों तक पहुंचा पाता है। डॉ करुणा पांडे अपने प्रस्तुत प्रयास में पूर्णतया सफल जान पड़ती हैं।

माँ-बेटे के दरकते रिश्तों का चित्रांकन है “मुझे माफ़ कर दो”। शरद अपनी बीमार माँ को बोझ समझकर उनका निरादर करता है। अनेक नाटकीय तत्वों से पूर्ण प्रस्तुत कहानी आज की संतान पर एक प्रश्न चिन्ह भी है। “सुखमनी” में आदिवासी समाज की कथा है। मातृत्व की छाया से हीन सुकमनी अपने नाम के अनुरूप ही अपने क्षेत्रवासियों की कठिनाइयों को दूर करती है। आदिवासी समाज आज भी अपने अंधविश्वास और संकीर्णताओं की सीमारेखाओं में जीवन यापन को अभिशप्त है, इस बात को प्रस्तुत करती यह कहानी खुद में एक दस्तावेज़ है। लेखिका ने बहुत ही गहराई से पूर्ण शोध करने के बाद इस कहानी का ताना-बाना बुना है। एक स्त्री अपने घर परिवार के विकास के लिए अपना पूरा जीवन होम कर देती है। “और पेन्टिंग जीत गयी”में सुहासिनी अपने पति की इच्छाओं के समक्ष अपनी चित्रकला को तिलांजलि देकर पारिवारिक दायित्वों में संलग्न हो जाती है। लेखिका द्वारा प्रेरित करने पर अंत में सुहासिनी की कला की प्रशंसा टी.वी.पर भी होती है पुरुषप्रधान समाज में ऐसी घटनाएं हमें खूब देखने को मिलती हैं। यथार्थ की मार्मिक अभिव्यक्ति यहाँ दृष्टव्य है। इसके ठीक उलट “माँ की थपकी” कहानी अपने आभिजात्य के खोखले प्रदर्शन में व्यस्त माँ की कहानी है, जो दर्शाती है कि अपने सामाजिक प्रदर्शनों में कोई माँ कैसे अपनी संतान को एकाकी बचपन का उपहार देने की गलती कर रही है। इन कहानियों में कहीं न कहीं स्वयम लेखिका का व्यक्तित्व झलकता है। लेखिका स्वयं उच्च शिक्षित भी हैं और अपने पारिवारिक दृष्टिकोण के प्रति सजग भी।

“छुपा रुस्तम” प्रेम संबंधों पर आधारित कहानी है। जिसमें पारिवारिक संस्कारों और मर्यादा का ध्यान रखते हुए अमन अपनी पसंद की लडकी से प्रेम विवाह करता है। हालांकि कहानी की थीम पुरानी है, पर प्रस्तुतिकरण नया है। “अभिनव प्रयोग” कहानी सचमुच एक अभिनव प्रयोग है लेखिका का। चार सेवा-निवृत लोग अपना एक नया संसार बसाते हैं, एक दूसरे का ध्यान रखते हैं और समाज में आनन्दमय जीवन जीते हैं। प्रस्तुत कहानी वर्तमान सामाजिक परिदृश्य की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता को इंगित करती है। बिखरे संबंधों को जोड़ने में “ इस ज़ज्बे को सलाम” कहानी सहायक है। विकलांगता को अपनी ढाल बनाकर समर्थ और संध्या अपने बड़े भाई-भाभी के भी प्रिय बनते हैं। रिश्ते का वितान और उनके प्रयोगों की कसौटियों को कहाने “बाईनेरी सिस्टम” में दर्शाया गया है। संबंधों का रख-रखाव आज के विज्ञान प्रधान युग में किस तरह से डिजिटल हो गया है, यहाँ दृष्टव्य है। इनपुट-आउटपुट की दुनियां में कैद आज का इंसान मशीनी हो गया है। लेखिका शकुन्तला चाची के माध्यम से कटु सत्य को सामने लाती हैं।

विज्ञान जहाँ अभिशाप बना, वहीं अनेक नयी-नयी खोजें भी मानव जीवन को सुविधाजनक बनाती हैं। ऐसी ही एक सुविधा है –“सेरोगेसी”। ‘किराए की कोख’, जहाँ दंपत्ति को कुछ सुविधा देती है, वहीं नैतिकता के तकाजे पर अनेक प्रश्नचिंह भी छोड़ जाती है। जिज्ञासा का जीवन शादी के बाद सही दिशा में है लेकिन सेरोगेसी की पुराणी रस्सी उसके गले की फांस बनकर उभरी है। पति-पत्नी का अंतर्द्वंद्व और सामाजिक बंधन यहाँ भावपूर्ण ढंग से अभिव्यक्ति पाते हैं। “लाल साड़ी”में रजनी की दिवंगत माँ की पुरानी लाल साड़ी और रजनी का उसके प्रति मोह, एक रहस्य स्थापित करता है। एक बेटी की अपनी माँ की चीजों के प्रति दीवानगी कहानी का मूल उत्स है। दलित वंचित वर्ग आज भी दो वक्त की रोटी के लिए तरसता है। “भूख” कहानी में मनसाराम की चिंता मंदिर के महात्मा जी करते हैं। इस कहानी के द्वारा सामाजिक समरसता की सुदृढ़ स्थापना लेखिका ने प्रस्तुत की है। “कराहते वजूद” कहानी में मारिया नामक चरित्र के माध्यम से लेखिका ने दंगों के दर्द को दिखाया है। प्रस्तुत कहानी कालचक्र का मार्मिक प्रभाव दिखाती है। भाग्यवादी बनना इंसान की नियति बन जाती है। एक अकेली लड़की एक साथ हिन्दू, मुस्लिम, सिख, और ईसाई के अलग-अलग वजूदों में विभक्त होती है और अंत में उसे अपनी परिस्थितियों का गुलाम बनना पड़ता है। “मुआवजा” कहानी हिन्दू-मुस्लिम के धार्मिक उन्माद और उससे उपजे बुरे परिणाम की मार्मिक अभिव्यक्ति करती है। “दयामयी माँ” कहानी में स्त्री शोषण और धर्म के नाम पर बाह्य आडम्बरों को लेखिका ने दर्शाया है। शीर्षक कहानी “उपकार का दंश”एक सशक्त कहानी है जिसमें हुस्ना नामक वैश्या के उदात्त चरित्र का रेखांकन है। अपने प्राण देकर भी वह गोपाल के प्राण बचाती है। मानवीय करुणा और समर्पण का मोहक चित्रांकन इस कहानी में मिलता है। प्राय: वैश्या के चरित्र को निम्न दिखकर उसे समाज से अलग, एक लालची और स्वार्थी रूप में प्रस्तुत करते हैं, परन्तु लेखिका ने इस कहानी के माध्यम से यह सिध्द किया है कि वैश्या में भी मानवीय संवेदनाएं हमारी तरह ही होती हैं और उन्हें समाज से तिरस्कृत नहीं करना चाहिए। संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से भी इसे रखा जा सकता है।

डॉ करुणा पांडे लम्बे समय से कहानियाँ लिखती आ रही हैं। आपकी कहानियों में मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक परिस्थितियों का सफल चित्रांकन होता है। प्रस्तुत कहानी-संग्रह में भी वे विभिन्न कथानकों के माध्यम से मानसिक अंतर्द्वंद्व, आत्मीय पीड़ा, संकीर्णता, भावुकता, भागनाशा, साहचर्य, विश्वासघात जैसे तत्वों को पाठकों के समक्ष लाती हैं। जीवन के चक्र का शब्दांकन इन कहानियों को स्वाभाविक गति प्रदान करता है। अपनी पात्र योजना में लेखिका पूर्णतया सजग हैं। सभी पात्र यथास्थान अपनी महत्ता रखते हैं। दैनिक बोलचाल की शब्दावली का प्रयोग इन सभी कहानियों की संप्रेक्षणीयता बढाता है। कहानी केवल कुछ घटनाओं को लेकर क्रमबध्द रख देना ही नहीं है, अपितु कोई न कोई सन्देश देने की कला भी है। डॉ करुणा पांडे प्रस्तुत प्रयास में पूर्णतया खरी उतरी हैं। कथ्य की विविधता और विशिष्ट प्रस्तुतिकरण ‘उपकार का दंश’ कहानी संग्रह की कहानियों को पठनीय भी बनाता है और संग्रहणीय भी। डॉ करुणा पांडे इस प्रयास में एक महत्वपूर्ण कहानी संग्रह साहित्य जगत में लेकर आयीं हैं।


नितिन सेठी
सी-231 शाहदाना कालोनी, बरेली -243005

चलभाष: +91 902 742 2306

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