काव्य: यामिनी नयन गुप्ता

यामिनी नयन गुप्ता
माँ की याद 

माँ के ना रहने पर
मायके जाकर
अब नहीं उठती है तलब चाय की
जैसे कि पहले होती थी
केतली भर चाय लेकर
नाश्ता करने बैठ जाती थीं हम तीनों बहनें
और माँ से बतियाती थीं
दोपहर में खाने का वक्त होने तक;
पापा जो कि जल्दी खाना खा लेते हैं
कभी नहीं बोले "अभी तक खाना नहीं बना"
चुप हो जाते थे हमें अपने दुनिया में मगन देखकर
अब मायके में सुबह की धूप उजली नहीं होती
चिड़ियों ने भी मुँह फेर लिया है
पापा को समय पर खाना देती हैं भाभी
पर भूख हो गई है कम
माँ बिन सूना घर धीरे-धीरे मर रहा है
घर उदास है
अक्सर फोन करती हैं बेटियाँ
बजती है मोबाइल की घंटी
पापा कभी-कभी फोन नहीं भी उठाते हैं
बेटियाँ समझ जाती हैं ___
सुबह या सांझ की आरती के साथ
पापा कर रहे हैं माँ को याद
और तुलसी के नीचे रोज एक दीपक धरकर
पापा दे रहे हैं आँसुओं का अर्घ्य
जबकि असमय तुलसी को जल देना है निषेध
पर बेटियाँ ही जानती हैं
अकेलेपन से जूझते पिता के मन का भेद।
***


प्रेम में हूँ मैं

मैं  अक्सर ...
अपने आधे सच और
आधे सपने से बुन लेती हूँ
एक अक्स प्रेमी का
और गढ़ती हूँ एक कविता,
चंद एहसास और आवाजों का पीछा करते-करते
जुड़ जाते हैं शब्द कई।

प्रात: की किरणें बुनती हैं
नित नए चटख बेबाक रंग,
हवाओं के गले मैं कुछ थरथराता है
मिट्टी के कण कुछ सरसराते हैं ;
नदी का पानी भी कुछ गुनगुनाता है
हँस पड़ी टहनियाँ,
फूलों की कोपल ने आँखें झपकाईं।

अपने, किसी बेहद अपने का
'न होना' भी चलता है मेरे साथ-साथ,
निस्सीम को बाँहों में बांध लेने का एहसास
टूटकर चाहे जाने का उन्माद,
बिखरते उन पलों में प्रेम की रुबाई
मगर अफसोस!
वह सुबह ही नहीं आई।

प्रेम, नेह और देह का त्रिकोण
पाकर भी रीते रह जाने की अनुभूति
मधुर-मिलन के यह गीत
व्याकुल मन का संगीत,
पर फिर भी लगता है तुम्हें कि
प्रेम में हूँ मैं, तो हाँ
प्रेम में ही हूँ मैं!

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