कहानी: प्लान

अमित कुमार मल्ल
अमित कुमार मल्ल

बात उस समय की है जब केन्द्रीय विश्वविद्यालय बहुत कम हुआ करते थे। तब युवा छात्रों की बेचैनी अक्सर फूट पड़ती थी - कभी फीस को लेकर, कभी भाषा को लेकर, कभी अन्य कारणों से।
ऐसे ही किसी बेचैन रात का किस्सा है। दिन में युवाओं के उग्र प्रदर्शन को रोकने के लिये सुरक्षा बलों ने लाठीचार्ज किया था। छात्र तितर बितर हो गए। समस्या थी कि रात कहाँ कटे - होटल लायक पैसे नहीं थे। अपने होस्टल के रूम में जा नहीं सकते थे। यह कला संकाय का होस्टल था। उग्र प्रदर्शन इसी संकाय के छात्रों ने किया था, इसलिए आशंका थी कि कला संकाय के छात्रावासों में रात में पुलिस की रेड पड़ सकती है। किसी अन्य संकाय  यथा विज्ञान संकाय के छात्रावास में छापा पड़ने की संभावना नहीं थी। बी.ए. ऑनर्स का छात्र होने के कारण, आदित्य के लगभग सभी दोस्त कला संकाय वाले ही थे। विज्ञान संकाय के छात्रावास में नेताजी का कमरा था। फिर नेताजी, इस समय छात्रसंघ के अध्यक्ष थे- दोनों लिहाज से रात को रुकने के लिये नेताजी का कमरा ही सुरक्षित था।

विश्वविद्यालय के बाहर की गुमटियों में सजी रेस्टोरेन्ट टाइप की दुकानों में भात, दाल, रोटी, सब्जी छोड़कर, बहुत कुछ रहता था, खाने लायक। आदित्य ने जेब में रखे पैसे को ध्यान में रखकर, एक बन को सेंकवा कर, उसे बीच से काटकर, उसमें एक समोसा रखकर, धीरे-धीरे से खाया। इत्मीनान से पानी पिया। पेट भी भरना था और समय भी बिताना था। नेताजी - अध्यक्ष जी 10 बजे के पहले, अपने रूम पर नहीं पहुँचते थे।
आदित्य साढ़े दस बजे तक नेताजी जी के कमरे पर पहुँचा। नेताजी अभी तक लौटे नहीं थे। वह पहले की भांति, होस्टल के लॉन में बैठकर नेताजी का इंतजार करने लगा। होस्टल के लॉन में बैठे कई अन्य लड़के दिखाई पड़े, जो अक्सर नेताजी के यहाँ आते जाते दिखते थे। आदित्य ने अनुमान लगाया कि ये लड़के भी कला संकाय के छात्र जान पड़ रहे हैं। संभावित रेड के वजह से होस्टल नहीं जा रहे हैं। लगता है नेताजी के रूम में, आज छात्रों का जमावड़ा रहेगा।
नेताजी, विश्वविद्यालय के शोध छात्र थे। फोर फर्स्ट क्लास थे, यानी कि हाई स्कूल, इंटर, स्नातक ओर परास्नातक- सब फर्स्ट क्लास। उन्हें इस होस्टल में कॉमन रूम के बगल वाला कमरा दिया गया, जो अन्य कमरों की तुलना में बड़ा कमरा था। हॉस्टल का चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी खदेरू, हॉस्टल के लड़कों से अधिक, नेताजी की सेवा करता।
नेताजी 11 बजे के बाद ही अपने होस्टल के अपने रूम पर लौटे। हॉस्टल के लॉन में बैठे आदित्य की नजर, नेताजी के रूम पर थी। जैसे ही नेताजी के रूम की लाइट खुली व दरवाजा खुला होना दिखा, आदित्य नेताजी के रूम की ओर चल पड़ा। वहाँ काफी संख्या में छात्र बैठे थे, जो शायद आदित्य की भांति, कला संकाय के अपने हॉस्टल न जाकर, यहाँ रात गुजारना चाह रहे थे। नेताजी के सेवा में खदेरू पहुँच चुका था। खदेरू से नेताजी बोले, "खदेरू!"
"जी।"
"कुछ खिलाओगे?"
"मेस तो बंद हो गया है लेकिन आपका खाना वहाँ रखा है।"
"ठीक है... खाना लाओ। सम्भव हो तो एक्स्ट्रा खाना भी लाना, यहाँ कई छात्र बैठे हैं।"
"जी... देखता हूँ... आपके लिये तो खाना रखवा दिया था... एक्स्ट्रा खाना रखा होगा तो, देखता हूँ?"
नेताजी ने अपने स्वभाव के मुताबिक सभी से पूछा, "सबने खाना खा लिया है?" एक छात्र को छोड़कर सबने हाँ कहा।
"खदेरू... इसके लिये खाने की जुगाड़ करो।"
जी बोलकर खदेरू कमरे से निकल गया। नेताजी बारी-बारी से सबकी खोज खबर लेने लगे कि इतनी रात को यहाँ कैसे? सबने एक ही बात बताई कि कला संकाय के हॉस्टल पर रेड की आशंका के चलते सब लोग रात बिताने के लिये इधर आ गए।

खदेरू दो थाली खाना लाया।  जिस थाली में अधिक खाना था, उसे नेताजी जी ने सम्हाला और कम रोटी वाली थाली उस छात्र को दी, जिसने बताया था कि उसने खाना नहीं खाया है। नेताजी खाने पर जुटे रहे, खदेरू पानी की व्यवस्था में लगा रहा। खाना खाने के बाद नेताजी खदेरू से बोले, "और... इन लोगों के सोने की क्या व्यवस्था हो सकती है... किसी खाली रूम की चाभी है?"
"कितने छात्र हैं?" खदेरू ने पूछा
"एक...दो...नौ... चौदह लोग हैं।" नेताजी ने सभी छात्रों को गिनकर बताया।
खदेरू ने कहा, "एक रूम से क्या होगा?"
"तब?"
"रात भर की बात है... कुर्सी मेज बाहर करके इसी कमरे में दरी बिछा दूंगा। आप बेड पर लेट लीजियेगा... बाकी लोग दरी पर बैठकर... लेटकर... उल्ह मेल्ह कर रात काट लेंगे।"
"ठीक है।" कहकर नेताजी बेड पर लेट गए। आदित्य समेत बाकी छात्र दरी पर बैठ गए। रात काटनी थी - बैठकर काटनी थी। बातचीत में समय काटना एकलौता तरीका था। एक छात्र ने पूछा, "यह हुआ क्यों?"
नेताजी चुप रहे। तब तक दूसरे छात्र ने कहा, "छात्र न जाने क्यों हट ही नहीं रहे थे।"
"लेकिन यह उम्मीद तो नहीं थी कि लाठीचार्ज होगा।"
"भइया कह रहे थे कि ऊपर बात हो गयी है। पहले अरेस्टिंग हो जाएगी, फिर पुलिस लाइन ले जाकर दो घंटे बाद वहाँ से छोड़ देंगे।"
"लेकिन... ऐसा हुआ तो नहीं।"
"अध्यक्ष जी को सब पता है... लेकिन लगता है सो गए, इसलिये नहीं बोल रहे हैं।"
"जगा हूँ... तुम लोगों की बातें सुन रहा हूँ..." नेताजी बोले।
"तो बताइये कि लाठीचार्ज क्यों हो गया?"
"तय हुआ था कि खाली नारेबाजी होगी तो ढेलाबाजी नहीं होनी चाहिए थी।" नेताजी ने कारण बताया।
"मैं तो उस जुलूस में आगे था... ढेलाबाजी किसने शुरू... पता ही नहीं... चला।" एक छात्र बोला।
नेताजी ने सिर घुमाकर पूछा, "अरुण... तुम जुलूस में थे?"
"जी, मैं तो आगे ही था।"
"दिखे नहीं।"
"आप भी... नहीं दिखे।"
"मैं तो जुलूस में ही था... बीच में था... बताओ... मैं तो अध्यक्ष हूँ... मुझे तो रहना ही था।"
आदित्य की पीठ व सिर को, कमरे की दीवार की टेक मिल गयी। थकावट महसूस हो रही थी। आँखें बंदकर, सिर दीवार पर टिकाकर सोने की कोशिश करने लगा। नींद तो नहीं आयी लेकिन उसका मन अतीत की ओर चला गया, जब उसने इस केंद्रीय विश्वविद्यालय में एडमिशन के लिये सोचा था। गाँव में खेती-बाड़ी का भविष्य असुरक्षित था। खेती में पैसे बच नहीं रहे थे। लोग काम की तलाश में शहर भाग रहे थे। आदित्य के पिताजी अक्सर कहते, "पढ़ लिख कर आदमी बन लो... गाँव में रहोगे तो गोबर उठाओगे। खेती किसानी में समस्या ही समस्या है। कभी सूखा, कभी बाढ़, कभी पाला, कभी आँधी। सबका असर पड़ता है। फिर खेत-मेड़-खलिहान का झगड़ा अलग।"

उन्होंने अपने खर्च में कटौती करके आदित्य को पढ़ने के लिये, जिला मुख्यालय वाले शहर भेजा। शहर में रहकर पढ़ने और ट्यूशन के बाद भी आदित्य को इंटर में 54% अंक ही मिले। उसने आई0 आई0 टी0 की प्रवेश परीक्षा दी, रुड़की की प्रवेश परीक्षा दी, एस0 सी0 आर0 ए0 परीक्षा दी - किसी में कामयाबी नहीं मिली। मेरिट के आधार पर रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन होने का नियम था, मेरिट कम होने के कारण वहाँ भी एडमिशन नहीं हुआ और राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज में भी एडमिशन नहीं हुआ।

इण्टर के बाद का यह समय छात्र के जीवन का बड़ा महत्व पूर्ण समय होता है। परिवार व समाज उम्मीद करता है कि छात्र कोई लाइन पकड़ ले। छात्र के पूरे जीवन में पहली बार प्रश्न उठता है - अब, क्या करोगे? आदित्य के प्राप्तांक विज्ञान विषयों में प्रवेश पाने की दृष्टि से बहुत कम थे।

पिताजी ने कहा, "अब तुम बड़े हो गए हो। अब तुम निर्णय लो कि तुम क्या पढ़ोगे, कहाँ एडमिशन लोगे, कैसे दाखिला होगा, यह सब तुम्हारी जिम्मेदारी है। इंटर तक मैंने इन सबमें अगुआई की लेकिन अब यह सब तुम्हें खुद करना है। तुम्हें यह खुद देखना है कि तुम्हारा भविष्य क्या होगा? उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये क्या पढ़ना है, कहाँ पढ़ना है... यह सब खुद देखो, खुद ही प्रयास करो।"

आदित्य ने मित्रों, रिश्तेदारों, और परिचितों से परामर्श किया। कुछ लोगों ने आर्ट लेने का परामर्श दिया। लेकिन गाँव में यह मान्यता थी कि जो विज्ञान, गणित, और अंग्रेजी नहीं पढ़ता, वह कुछ नहीं पढ़ता। बाकी विषयों का पढ़ना, न पढ़ना, सब बराबर है।

कुछ लोगों का कहना था कि चाहे जो पढ़ो, अच्छे विश्वविद्यालय से पढ़ो। विषय महत्वपूर्ण नहीं है, संस्था महत्वपूर्ण है। अच्छे संस्थान से पढ़ने पर व्यक्तित्व निखरेगा, कॉन्टैक्ट बनेंगे, समाज दुनिया की समझ बढ़ेगी। आदित्य ने साइंस छोड़ने की सोची किंतु उसका विकल्प तय नहीं कर सका। उसने इस केन्द्रीय विश्वविद्यालय का बहुत नाम सुन रखा था। लोग बताते थे कि इस विश्वविद्यालय में अनेक प्रकार के कोर्स है, जिन्हें करने के बाद रोजगार मिल ही जाता है। कैम्पस सलेक्शन होता है। इस विश्वविद्यालय का दूर दूर तक नाम है। इस विश्वविद्यालय में व्यक्तित्व निखर जाता है। आदमी दुनिया की चुनौतियों से लड़ने लायक हो जाता है। फलाँ-फलाँ इस विश्वविद्यालय से निकले थे, ... जिन्होंने देश में नाम रौशन किया। इस विश्वविद्यालय के एक-एक डिपार्टमेंट की बिल्डिंग, कई विश्वविद्यालयों से बड़ी है।

विश्वविद्यालय के प्रोस्पेक्टस को पढ़ कर उसे ज्ञात हुआ कि वह साइंस साइड की जगह, वह कौन-कौन से विषय चुन सकता है। आदित्य को एक कॉम्बिनेशन समझ में आया - गणित, सांख्यिकी और अर्थशास्त्र। गणित की पढ़ाई भी रहेगी और आर्ट साइड भी रहेगा। यह महत्वपूर्ण कॉम्बिनेशन था और केवल इसी विश्वविद्यालय में उपलब्ध था। इस कॉम्बिनेशन से बी0 ए0 करने पर, नौकरी की संभावना बढ़ जाएगी। आर्थिक युग में इस कॉम्बिनेशन का भविष्य उज्ज्वल लगा। एडमिशन फॉर्म भर दिया लेकिन, जब एडमिशन सूची निकली तो ज्ञात हुआ कि मेरिट उसके प्राप्तांकों से 1% अधिक पर रुक गयी। अब क्या होगा?

आदित्य ने पहले तो दूसरे विषयों के बारे में सोचा। फिर उसे लगा कि गाँव जवार के लोग क्या कहेंगे? हँसेंगे कि यह पढ़ नहीं पाया। पट्टीदार लोग क्या कहेंगे? फिर यदि समाज की दृष्टि में गैर महत्वपूर्ण विषय ही पढ़ना है, तो गाँव के पास का डिग्री कॉलेज क्या बुरा है? गाँव से इतनी दूर, इस केंद्रीय विश्वविद्यालय में आने की क्या जरूरत है?

यदि इसी कॉम्बिनेशन में इसी विश्वविद्यालय में एडमिशन लेने है तो, आदित्य समझ गया कि रास्ता लंबा है, लगातार प्रयास करना होगा और बहुत भाग दौड़ करनी होगी, जुगाड़ लगाना होगा।

उस बड़े शहर में कोई ऐसा रिश्तेदार नहीं था जिसके यहाँ वह ठहर सके। होटल में ठहरने लायक पैसे नहीं थे। गाँव के लोगों ने बताया था कि इस बड़े शहर के, बड़े चौराहे के पास वाली गली में एक धर्मशाला है जहाँ 10 रुपये रोज पर कमरा मिल जाएगा जिसमें एक चौकी पड़ी रहती है। अपनी एक चादर ले जाओ, ओढ़ लेना। टॉयलेट कंबाइंड है - खाना किसी भी होटल में खा लो।

आदित्य गाँव से पैसेन्जर ट्रेन से इस शहर में आता और इस धर्मशाला में रुकता और केन्द्रीय विश्वविद्यालय में एडमिशन के लिये प्रयास करता। खाली चौकी पर सोकर, चलताऊ होटल में खाना खा कर, प्रयास करने के बाद भी एडमिशन नहीं हुआ तो उसने सोचना आरम्भ किया कि मेरिट न होने पर भी, केन्द्रीय विश्वविद्यालय में ई एम एस ग्रुप (अर्थशास्त्र, गणित व सांख्यिकी ) में एडमिशन कैसे हो? डीन ऑफिस, रजिस्ट्रार आफिस का चक्कर काटने के बाद, वहाँ के बाबुओं से घिघियाने के बाद, यह जानकारी हुई कि छात्रसंघ के अध्यक्ष जी / नेताजी चाहेंगे तो एडमिशन हो जाएगा। लेकिन नेताजी चाहेंगे क्यों? नेताजी तो आदित्य को जानते भी नहीं। अब आदित्य, नेताजी से मिलने की जुगाड़ ढूंढने में लगा। एडमिशन चाहने वाले अन्य लड़कों से इतना पता चला कि नेताजी का मूल गाँव, आदित्य के जिले में स्थित है और उनकी बहन आदित्य के गाँव के बगल के गाँव में ब्याही है। नेताजी के जीजा जी बगल के गाँव के बड़े किसान हैं।

 गाँव लौटकर आदित्य ने अपने पिता को सारी बात बताकर अनुरोध किया कि यदि वेे नेताजी के जीजाजी से एक रिकमंडेशन पत्र ले सकें तो एडमिशन हो जाएगा।

"मैं उनको जानता हूँ। कल बात करके, चिठ्ठी लिखवाने का प्रयास करूंगा।" आदित्य के पिताजी बोले। अगले दिन, आदित्य के पिताजी, नेताजी के बहनोई से पत्र लिखाकर लाये। पत्र में आदित्य का परिचय था और अपेक्षा थी कि वे अपने प्रयासों से आदित्य का एडमिशन करा दे। पत्र पाने के दो दिन बाद आदित्य बड़े शहर के लिये निकल लिया। पैसेंजर ट्रेन से शहर पहुँचा। उसी धर्मशाला में समान रखकर रात में सोया। सुबह नहा धो कर, चौराहे की दुकान पर कचौड़ी सब्जी खाकर शेयर ऑटो से केन्द्रीय विश्वविद्यालय पहुँचा और छात्रसंघ भवन में, नेताजी से मिलकर परिचय दिया, "मैं आदित्य, गाँव का हूँ। आपके जीजाजी के बगल के गाँव का।"
"हूँ?" नेताजी ने तटस्थ भाव से आदित्य की ओर देखा।
"उन्होंने आपके लिये एक चिट्ठी दी है।"
"हूँ।" नेताजी ने चिठ्ठी पढ़कर पूछा, "कहाँ रुके हो?"
"धर्मशाला में।"
इच्छित कक्षा, विषय आदि के बारे में पूछने के बाद नेताजी ने पूछा, "क्या दिक्कत हो रही है?"
"मेरे मार्क्स इकोनॉमिक्स, मैथ्स एंड स्टैट्स की एडमिशन मेरिट से 1% कम है।"
"फिर कैसे होगा?" नेताजी ने पूछा फिर कहा, " ... चलो कुछ सोचता हूँ, कल आओ।"
अगले दिन मिलने पर नेताजी ने पूछा, "एन0 सी0 सी0, या एन0 एस0 एस0 का कोई सर्टिफिकेट है?"
"नहीं।"
"तब तो एडमिशन मुश्किल है।"
"आपकी बात एडमिशन कमेटी वाले नहीं टालेंगे।"
"मेरे कहने पर कोई आग में थोड़े कूद जाएगा? ... ऐसा करो 15 दिन बाद आओ, तब तक कुछ जुगाड़ लगाता हूँ।"

आदित्य धर्मशाला लौटकर आया। ट्रेन पकड़कर गाँव पहुँच गया। पंद्रह दिन बाद, फिर छात्रसंघ भवन पहुँचा। नेताजी बोले, "कैसे हो? कब आये?"
"सुबह आया। ठीक हूँ।"
"अभी तो मैं व्यस्त हूँ। कल आ जाओ।"

आदित्य अगले दिन पहुँचा तो नेताजी नहीं मिले। छात्रसंघ भवन में ही किसी ने बताया कि वे अपने छात्रावास के कमरे पर सुबह 9-10 तक जरूर रहते हैं। उन्हें वही पकड़ो। आदित्य अगले दिन सुबह नेताजी के छात्रावास के रूम पर पहुँचा तो देखा कि पूरा कमरा लड़कों से भरा हुआ है। नेताजी लुंगी और कुर्ता पहने बेड पर अधलेटे थे। वे बारी बारी से पूछते, लोग अपना काम बताते। कुछ को रोकते, कुछ को जाने को कहते, कुछ को आगे के दिनों में बुलाते। बीच बीच में चाय चलती रही। अंत में आदित्य के पास पहुँचे, "कब आये?"
"मैं तो यही हूँ।"
"मुझे लगा कि तुम अपने गाँव लौट गए।"
"गाँव जाकर क्या करता? गाँव जाओ तो सब लोग एडमिशन के बारे में पूछना शुरू कर देते हैं।"
"हूँ... अच्छा रुकना तुम। तैयार होकर चलते हैं।" नेताजी तैयार होकर मेस में गए। कई अन्य छात्रों के साथ पीछे पीछे आदित्य भी गया। नेताजी ने जब तक नाश्ता किया, बाकी लोग खड़े होकर उनका इंतजार करते रहे। होस्टल के बाहर आकर उन्होंने आदित्य को एक छात्र की बाइक पर बिठाया और बोले, "साथ चलो।"

नेताजी खुद एक दूसरी मोटरसाइकिल के पीछे बैठे। नेताजी वाली मोटरसायकिल के पीछे पीछे, चार मोटरसाइकिलें चल रही थीं, जिसमें से एक के पीछे आदित्य बैठा था। नेताजी पहले कृषि विभाग गए, फिर मैनेजमेंट विभाग, रजिस्ट्रार आफिस और अंत में कला संकाय के डीन आफिस पहुँचे। सभी लोगों को बाहर खड़ा कर, नेताजी भीतर गए। घंटे भर बाद लौटे और आदित्य को किनारे बुलाकर पूछने लगे, "कोई स्पोर्ट्स, किसी गेम का सर्टिफिकेट नहीं है?"
"न।"
"कुछ खेलते नहीं हो क्या?"
"नहीं।"
"तब तो एक ही रास्ता है..."
"क्या?"
"एस टी का सर्टिफिकेट लगवा दिया जाय। इस कैटगरी में बच्चे नहीं आते हैं इसलिये कोई दिक्कत नहीं होगी। एडमिशन भी हो जाएगा, फीस भी माफ हो जाएगी। जो वजीफा मिलेगा उसकी पार्टी हो जाएगी।"
"लेकिन... मैं एस0 टी0 तो हूँ नहीं।"
"जानता हूँ। लेकिन बाबू लोग कह रहे हैं कि इसके अलावा कोई उपाय नहीं है।"
"फ़र्ज़ी सर्टिफिकेट मैं नहीं लगाऊंगा।"
"फिर कोई रास्ता नहीं दिख रहा है।"
"कोई तो दूसरा रास्ता देखिये।"
"ठीक है, मैं कुछ सोचता हूँ... 15 दिन बाद आओ।"

जी बोलकर आदित्य गाँव लौटा। अगले 15 दिन बाद पहुँचा तो नेताजी ने बताया, "अभी कोई रास्ता नहीं मिला है। प्रयास कर रहा हूँ... कुछ रास्ता मिलता है तो बताता हूँ... तुम 15 दिन बाद आओ।" जी कहकर आदित्य गाँव लौट गया। अगली बार जब आदित्य पहुँचा तो नेताजी किनारे बुलाकर बोले, "अब एक ही रास्ता बचा है। तुम्हारे कॉम्बिनेशन में जितनी सीट निर्धारित है उनमें और 5 सीट बढ़वा दी जायें। तब तुम्हारा काम मेरिट से हो जाएगा।"
"यह तो बहुत अच्छी बात है।"
"लेकिन यह इतना आसान काम नहीं है... वे कहेंगे कि क्लास में जगह ही नहीं है। पहले तो टीचर ही नहीं मानेंगे... इन सबके बाद डीन को मनाना, फिर वाइस चान्सलर को मनाना पड़ेगा। बहुत कठिन प्रक्रिया है। फिर भी... कह दिया है तो प्रयास करता हूँ। पंद्रह दिन के बाद आओ।"

आदित्य 15 दिन बाद गाँव से लौटा तो नेताजी ने कहा, "उम्मीद है, बात बन रही है। लेकिन 15 दिन और लगेंगे। बाद में आओ।"

आदित्य लौट गया। जब अगली बार पहुँचा तो नेताजी ने कहा, "-तुम्हारे इस एडमिशन के कारण, पहले सीट बढ़ाने का औचित्य बनाना पड़ा... फिर उसे सिद्ध करना पड़ा... कई मामलों में वाईस चांसलर को छोड़कर डीन का एहसान लेना पड़ा, कई पापड़ बेले तब जाकर इस कॉम्बिनेशन में पाँच सीटें बढ़ी हैं, जिससे तुम्हारा नाम एडमिशन लिस्ट में आ गया है।"
"जी, बहुत बहुत धन्यवाद।" आदित्य ने आभार व्यक्त किया।
नेताजी एक लड़के की ओर इशारा करके बोले, "इसको फीस दे दो... यह जमा करके तुम्हें रसीद कल दे देगा।"
जी कहकर आदित्य ने फीस के पैसे उस लड़के को पकड़ा दिये। अगले दिन जाने पर एडमिशन फीस रिसीट मिल गयी। नेताजी ने कहा, "डीन ऑफिस जाकर आई कार्ड बनवाकर क्लास करना शुरू करो।"
"जी। रहने के लिये... होस्टल का रूम भी अलॉट कराना होगा।"

"एडमिशन के लिये कितने पापड़ बेलने पड़े हैं, तुम नहीं जानते। तुम्हारे कारण चार लोगों का और भला हो गया। अब हॉस्टल का भी कुछ करता हूँ।"

नेताजी जी सही कह रहे थे। इस एडमिशन के लिये आदित्य ने महीनों चक्कर काटे। धर्मशाला की ठूंठ चौकी पर कितनी रातें गुजरीं। कई बार तो चौकी वाला रूम नहीं मिला, फर्श पर अखबार बिछाकर सोया। कई दिनों तक दोनों टाइम खाना नहीं मिला। छात्रसंघ भवन और नेताजी के हॉस्टल वाले कमरे के इतने चक्कर काटे कि नेताजी के सभी खास लोगों से जान पहचान हो गयी। आदित्य गाँव पहुँचा तो घर वाले यह जानकर बहुत खुश हुए कि बेटे का केंद्रीय विश्वविद्यालय में वांछित विषय में प्रवेश मिल गया।

नेताजी के प्रभाव व प्रयास से कला संकाय का हॉस्टल भी अलॉट हो गया और एक खाली रूम पर कब्जा भी हो गया। उस होस्टल में मेस ही नहीं था। नेताजी ने जुगाड़ लगाकर बगल के होस्टल के मेस में आदित्य के खाने की व्यवस्था कराई। लगभग 8 माह बीतने के बाद पढ़ने का संयोग बना और आदित्य ने बी0 ए0 की पढ़ाई शुरू की ताकि अच्छी पढ़ाई कर, अच्छी नौकरी प्राप्त कर, गाँव-गोबर से मुक्त हो सके और पिताजी का मेहनत सफल हो। आदित्य पूरी निष्ठा, संवेदनशीलता व मेहनत से पढ़ाई में जुट गया। एक महीना क्लास चलने के बाद विश्वविद्यालय में झगड़ा हुआ और विश्वविद्यालय में साइन डाई हो गया। आदित्य को पहली बार साइन डाई का अर्थ मालूम हुआ कि सभी छात्रावास खाली कर दिये जायें और विश्वविद्यालय अनिश्चित समय के लिये बंद हो जाय। आदित्य को इसमें भी बड़ा मजा आया कि अधिकृत रूप पढ़ने से छुट्टी मिल गयी।

कुछ समय बाद विश्वविद्यालय खुला। पढ़ाई शुरू हुई। आदित्य पढ़ाई में लग गया। छात्रसंघ का अगला चुनाव घोषित हो गया। नेताजी ने सभी पदों के लिये उम्मीदवार घोषित किये जिन्हें चुनाव जिताने में आदित्य भी लग गया। लगभग रोज दोपहर 11 बजे से रात 10 बजे तक नेताजी के प्रत्याशियों का प्रचार होता। प्रचार बीसियों दिन चला। नेताजी क एहसान उतारने का समय आ गया था। ऐन चुनाव के पूर्व दो प्रत्याशियों के गुट में हिंसक झगड़ा हुआ। छात्रसंघ का चुनाव रद्द हो गया और विश्वविद्यालय में फिर से साइन डाई हो गया। मजबूरन नेताजी, अध्यक्ष बने रहे।

2 माह बाद विश्वविद्यालय खुलने पर नए वाईस चांसलर ने कार्य भार सम्हाला। उन्होंने परिश्रम कर वार्षिक परीक्षाएँ कराईं। सत्र नियमित करने का प्रयास शुरू किया। व्यवस्था को पारदर्शी व नियमित करने का प्रयास किया लेकिन कुछ महीनों बाद ही छात्रों के जुलूस पर यह लाठीचार्ज हो गया।

यादों में न जाने कितना समय बीत गया। जब आँख खुली तो आदित्य ने खुली आँखों से देखा, नेताजी अधलेटे हाँ-हूँ कह रहे थे। लड़के बता रहे थे कि किसको एक लाठी पड़ी, किसको दो। तभी किसी ने पूछा, "अब क्या होगा?"
"विश्वविद्यालय बंद होगा।" नेताजी चैतन्य होकर बैठते हुए बोले।
"फिर... तो होस्टल भी खाली होंगे।" दूसरे छात्र ने पूछा।
"ऐसे तनावपूर्ण माहौल में तो साइन डाई ही होगा।" नेताजी कुछ चिंतन मनन करते बोले।
आदित्य बोला, "ढाई साल में 3 साइन डाई। पढ़ाई का क्या होगा? सत्र कितना पीछे हो जाएगा?"
दूसरा छात्र बोला, "कितना नाम है, इस विश्वविद्यालय का।"
तीसरा छात्र बोला, "इसीलिये तो लोग कितनी दूर-दूर से यहाँ पढ़ने आते हैं।"
गंभीर स्वर में नेताजी बोले, "सही कह रहे हो... लेकिन नया वाईस चांसलर मनमानी कर रहा था, किसी को कुछ समझता ही नहीं था... उसे सबक सिखाना जरूरी था।"
आदित्य समेत सभी छात्र स्तब्ध नेताजी का मुँह देखते रह गए।

एक दो घंटे बाद भोर होने पर आदित्य जब नेताजी के छात्रावास से बाहर निकला तो विश्वविद्यालय की ओर से, जीप पर लाउडस्पीकर से घोषणा हो रही थी कि विश्वविद्यालय अनिश्चित काल के लिये बंद कर दिया गया है। सभी छात्र छात्रावासों को छोड़कर अपने-अपने घर चले जायें।

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