आओ हिंदी सीखें - भाग 7

डॉ. सत्यवीर सिंह

सत्यवीर सिंह

सहायक आचार्य (हिंदी)
ला. ब. शा. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोटपूतली (जयपुर) 303108, राजस्थान, भारत
चलभाष: +91 979 996 4305; ईमेल: drsatyavirsingh@gmail.com

हिंदी और उसका शब्द भण्डार

भाषा, मनुष्य के भाव एवं विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम हैहम जब संवाद या विचार विनिमय मौखिक या लिखित रूप में करते हैं, उस समय किसी न किसी भाषा का सहारा लेते हैंइस वाचिक (मौखिक) या लिखित अभिव्यक्ति के मूल में शब्द होते हैंसंरचना (रचना) की दृष्टि से  शब्द भाषा की सबसे छोटी (लघु) एवं स्वतंत्र इकाई हैप्रत्येक भाषा इन शब्दों का भंडार होती है लेकिन ये सभी शब्द एक नहीं होतेकुछ शब्द व्यक्तियों, वस्तुओं आदि के नाम बताने वाले होते हैं; उन्हें संज्ञा कहा जाता है। कुछ  शब्द कार्य (कर्म), घटना को व्यक्त करते हैं, वे क्रिया कहलाते हैं, तो कुछ शब्द व्यक्ति, वस्तु की विशेषता बताते हैं, वे विशेषण या क्रिया विशेषण कहलाते हैं। इससे दीगर कुछ ऐसे शब्द, जो अन्य भाषाओं से हिंदी में शामिल हुए हैंइस तरह से भाषा में प्रयुक्त होने वाले इन विभिन्न प्रकार के शब्दों को शब्द-समूह कहते हैंहिंदी भाषा की यह जीवंतता और उदारता रही है कि उसने अपने संपर्क में आने वाली विभिन्न भाषाओं के शब्दों को ग्रहण किया हैहिंदी की इस विशेषता के कारण आज उसके को में अनुमानित गणना के आधार पर दो लाख के आसपास शब्द सम्मिलित हैं
हिंदी के शब्द-भण्डार में शामिल शब्द और शब्दावली का वर्गीकरण निम्नलिखित दृष्टियों से किया जा सकता है -
 (). अर्थ की दृष्टि से
 (). प्रयोग की दृष्टि से
 (). इतिहास या भाषा स्रोत की दृष्टि से
 (). रचना की दृष्टि से
 (). व्याकरणिक विवेचन या प्रकार्य की दृष्टि
उपर्युक्त वर्गीकरण में सम्मिलित शब्द विवेचन निम्नलिखित है-

(क) अर्थ की दृष्टि से हिंदी शब्दों का वर्गीकरण -

 अर्थ के स्तर पर 'शब्द' भाषा की लघुतम स्वतंत्र इकाई हैप्रत्येक शब्द का एक अर्थ होता है, जिसे उस शब्द का मूल अर्थ या मुख्य अर्थ कहा जाता हैयह मूल अर्थ हमारे मन में संकल्पना के रूप में विद्यमान रहता हैसाथ ही समाज, संस्कृति, संदर्भ तथा वक्ता की मानसिक स्थिति के कारण शब्दों के अन्य अर्थ भी प्राप्त होते हैंइस प्रकार अर्थ के आधार पर शब्दों को चार वर्गों में विभाजित कर सकते हैं -
1. एकार्थक शब्द - इस कोटि (श्रेणी) में वे शब्द सम्मिलित होते हैं जिनका एक ही अर्थ, अर्थात् वाच्यार्थ प्रकट होता है। व्यक्तिवाचक संज्ञा शब्द इस श्रेणी में आते हैं; जैसे - राम, श्याम, मोहन, सोहन, राजीव, भीमराव अंबेडकर, महात्मा गाँधी, गंगा, सोमवार, बुधवार, जनवरी, हिंदी, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, पुस्तक, घर आदि। इन शब्दों को एकार्थी शब्द भी कहते हैं।
2. अनेकार्थक शब्द - अनेक अर्थों का बोध कराने की स्थिति को 'अनेकार्थकता' कहा जाता है। इन्हें अनेकार्थी शब्द भी कहा जाता है। ये वे शब्द हैं जिनके एक से अधिक (एकाधिक) अर्थ होते हैं। कतिपय अनेकार्थक शब्दों के उदाहरण देखें- अलि = भ्रमर, सखी, कोयल; अंबर = वस्त्र, आकाश; अमृत = अन्न, दूध, पारा, स्वर्ग, जल; अब्ज = कमल, शंख, कपूर, चंद्रमा; कनक = सोना, धतूरा (एक वनस्पति, जो मादक होती है); कल = आगामी दिवस, अतीत दिवस, मधुर ध्वनि, मशीन; कर = किरण, हाथ, टैक्स, सूंड, क्रिया रूप (करना)
ध्यातव्य रहे, अनेकार्थक शब्दों का एक भेद समरूपी शब्द नाम से है। समरूपी  शब्द वे शब्द हैं, जो रूप की दृष्टि से तो समान हैं परंतु अलग - अलग स्रोतों की दृष्टि से भिन्न-भिन्न अर्थ रखते हैं। जैसे - 'बस' (अंग्रेजी) - एक वाहन का नाम; बस (संस्कृत) - वश (नियंत्रण); बस (फारसी) - पर्याप्त। 'काज' शब्द के स्रोत के आधार पर अर्थ हैं- काज (तद्भव) - कार्य; काज (विदेशी) बटन के काज, छेद; काज (तत्सम) - काम, कामदेव'पर' शब्द के भी अनेक अर्थ हैं, परपंख, लेकिन, ऊपर। 'आम' शब्द के अनेकार्थक हैं, आम - आम्र (एक फल), सामान्य।
3. समानार्थक शब्द - ये अनेकार्थी शब्द से बिल्कुल विपरीत है। वहाँ एक शब्द के अनेक अर्थ होते हैं और यहाँ एक ही अर्थ को बताने (प्रकट) करने वाले अनेक शब्द होते हैं। इन्हें पर्यायवाची शब्द भी कहते हैं। जैसे, 'आकाश' - गगन, नभ, व्योम, अंबर, शून्य, आसमान, अंतरिक्ष आदि। 'अश्व' - हय, तुरंग, घोड़ासैंधव, वाजी घोटक आदि। 'अमृत'- सुधा, अमिय, पीयूष, सोम आदि। 'अग्नि' - आग, पावक, हुताशन, वह्नि, वैश्वानर, दहन, अनल, कृशानु आदि। 'इंद्र' - सुरपति, देवेश, देवेंद्र, सुरेंद्र, सुरेश, देवराज, शचीपति, शक्र आदि। 'आँख'- चक्षु, नेत्र, लोचन, नयन, दृग, अक्षि आदि। 'कमल'- जलज, पंकज, नीरज, वारिज, अंबुज, पद्म, कंज, सरोज, अरविंद आदि। 'पानी'- जल, नीर, वारि, अंबु, सलिल, जीवन, तोय,पय आदि। 'बादल' - जलद, वारिद, अंबुद, मेघ, घन, जलधर आदि। 'भगवान' - ईश्वर, परमात्मा, प्रभु, परमेश्वर आदि'कामदेव' अनंग, मनोज, मनसिज, मदन, काम, पंचशर, मन्मथ, कंदर्प, रतिपति आदि। 'गंगा' - देवनदी, सुरसरिता, भागीरथी, त्रिपथगा, जाह्नवी, देवपगा,अलकनंदा आदि। 'सूर्य' - दिनकर, दिनेश, रवि, आदित्य, भानु, भास्कर, मार्तण्ड, दिवाकर आदि। 'स्त्री' - नारी, कामिनी, वामा, वनिता, सुंदरी, कांता, महिला, रमणी, अबला, औरत आदि
4. विपरीतार्थक शब्द - इन्हें विपरीतार्थी, विलोमार्थी या विलोम शब्द का अभिधान भी प्राप्त हैविलोम का अर्थ है - उलटा, विपरीत। इस प्रकार विलोम वे शब्द हैं जो कि प्रयुक्त शब्द का ठीक विपरीत (उलटा) अर्थ व्यक्त करे। जैसे, अथ - इति, प्राचीन- अर्वाचीन, कुख्यात- विख्यात, गुण - दोष, आमिष - निरामिष, मूक - वाचाल, उचित - अनुचित, आर्द्र - शुष्क, गणतंत्र - राजतंत्र, पाप - पुण्य, गरल - सुधा, अंधकार - प्रकाश, उपकार - अपकार, उद्घाटन - समापन, अँधेरा - उजाला, जीवन - मरण, अमर - मर्त्य, गृहस्थ - संन्यासी, सुख - दुख, ऊँच - नीच, उग्र - सौम्य, जड़ - चेतन, अमीर - गरीब, एकाग्र - चंचल, अज्ञ - विज्ञ, गृहीत - व्यक्त, विधवा - सधवा, ओजस्वी -निस्तेज, कोप - कृपा, आकर्षण - विकर्षण, ऋजु - वक्र, कृत्रिम - नैसर्गिक, अपेक्षा - उपेक्षा, कृतज्ञ - कृतघ्न, पाश्चात्य - पौर्वात्य, दाता - सूम, ध्वंस - निर्माण, विधि - निषेध, स्वप्न - जागरण, व्यास - समास, थोक - फुटकर, जंगम - स्थावर, जवान - वृद्ध, नेक - बद, निंद्य - वंद्य, संधि - विग्रह आदि।

(). प्रयोग की दृष्टि से शब्दों का वर्गीकरण -

प्रयोग क्षेत्र की दृष्टि से शब्द मोटे तौर पर तीन प्रकार के होते हैं-
1. सामान्य शब्द 2. तकनीकी या पूर्ण पारिभाषिक शब्द 3. अर्द्ध तकनीकी या अर्द्ध पारिभाषिक शब्द।
1. सामान्य शब्द - सामान्य जनजीवन तथा उससे जुड़े क्रिया - व्यापारों; जैसे- रहन-सहन, खान-पान, घूमना-फिरना, लेन-देन, विभिन्न शारीरिक, मानसिक चेष्टाएँ आदि तथा घर, परिवार, समाज, राष्ट्र, प्रकृति आदि से संबंधित सामान्य शब्दों का प्रयोग दिन - प्रतिदिन उस भाषा समुदाय के सभी व्यक्तियों द्वारा किया जाता है, वे समस्त शब्द इस कोटि में आते हैं। जैसे- पानी, सूरज, हा-पैर, माँ - बाप, ईश्वर, रोटी, चावल, दाल, आँख, जीभ, दाँत, कान, चलना, बैठनाउठना, सोना, जाना, अच्छा, बुरा, सच्चा, झूठा, तेज, घर, द्वार, कहाँ, वहाँ, कब, कैसे, नहीं, मत आदि।
2. तकनीकी या पूर्ण पारिभाषिक शब्द - इन शब्दों को पारिभाषिक शब्द इसलिए कहा गया है कि इन शब्दों का अर्थ पूरी परिभाषा देकर या स्पष्टीकरण देकर ही समझा जा सकता हैपूर्ण पारिभाषिक या तकनीकी शब्द वे शब्द होते हैं, जिनका प्रयोग केवल उसी विषय क्षेत्र में किया जा सकता है जिस क्षेत्र विशेष के लिए ये निर्मित किए गए हैंजैसे - साहित्य तथा व्याकरण के क्षेत्र में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, क्रिया - विशेषण, पदबंध, उपवाक्य, संधि, समास, पर्यायवाची, उपमा, रूपक, दीपक, दोहा, छंद, अलंकार, आदि पूर्ण पारिभाषिक शब्द हैइसी तरह से अपील, के, खारिज, मुकदमा, सम्मन, कुड़की, सजा, फरयादी, गवाह आदि कोर्ट - कचहरी की भाषा में प्रयुक्त होते हैं।
इसी प्रकार से ज्ञापन, निविदा, सूचना, अधिसूचना, आदेश, कार्यालय आदेश, विज्ञप्ति, विज्ञापन, टिप्पणी, अनुदान, प्रारूपण आदि शब्द कार्यालयी भाषा में प्रयुक्त होते हैं तथा घनत्व, प्रतिबिंब, परावर्तन, आवर्तन, घर्षण, आपेक्षिक घनत्व, गुरुत्वाकर्षण, संवेग, बल आदि शब्द भौतिक विज्ञान के अंतर्गत प्रयुक्त होने वाले पूर्ण पारिभाषिक शब्द हैं
3. अर्द्ध तकनीकी या अर्द्ध पारिभाषिक शब्द - इसके अंतर्गत वे शब्द आते हैं जो साधारण व्यक्ति भी प्रयुक्त करते हैं और विशेषज्ञ भीअंतर बस इतना है कि विशेषज्ञ का अर्थ परिभाषित और ठीक बंधा हुआ होता है जबकि सामान्य व्यक्ति का अर्थ शिथिल होता हैउदाहरण के लिए सामान्य बोलचाल की हिंदी में गति, चाल, वेतीनों शब्द प्राय: स्पीड के अर्थ में प्रयुक्त होते है लेकिन जब ये तीनों शब्द भौतिक शास्त्र में प्रयुक्त होते हैं, तो अलग-अलग speed, velocity तथा motion अर्थों में अपना-अपना अर्थ देते हैंकुछ अन्य उदाहरण
रस - आम का रस तथा साहित्यिक रस। 
कार्य - भौतिकी में कार्य तथा साधारण कार। 
अक्षर - वर्ण, भाषा विज्ञान में विशिष्ट अर्थ वाला। 
अर्द्धसैनिक बल - बी.एस.एफ. तथा सामान्य फोर्स।

(). इतिहास या भाषा स्रोत की दृष्टि से शब्दों का वर्गीकरण -

हिंदी का शब्दकोश संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश आदि पूर्व प्रचलित आर्य भाषाओं तथा अरबी, फारसी, तुर्की, अंग्रेजी आदि विदेशी भाषाओं के शब्दों से निर्मित हुआ हैकालक्रमानुसार कुछ शब्द नवीन अर्थों की व्यंजना के साथ हिंदी में प्रयुक्त हुए जो उसकी निजी संपत्ति के रूप में स्वीकार किए जा सकते हैंइन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए स्रोत के आधार पर हिंदी शब्दों को निम्नलिखित पाँच वर्गों में बाँटा जा सकता है - 1. तत्सम शब्द 2. तद्भव शब्द 3. देशज शब्द 4. विदेशी शब्द 5. संकर शब्द।
1. तत्सम शब्द - तत्सम शब्द का अर्थ है - तत् + सम अर्थात् उसके (संस्कृत के) समान। ये संस्कृत के वे शब्द हैं जो हिंदी में ज्यों के त्यों के तुम प्रचलित हैहिंदी में राशियों, ग्रह - नक्षत्रों, धार्मिक संस्कारों और पशु-पक्षियों के नाम भी प्राय: तत्सम रूप में ही प्रचलित हैं। तत्सम शब्द दो प्रकार के हैं - परंपरागत तथा निर्मितपरंपरागत शब्द वे शब्द हैं जो संस्कृत भाषा और साहित्य में उपलब्ध है तथा हिंदी में ग्रहण कर लिए गए हैंनिर्मित शब्द वे हैं जो ज्ञान-विज्ञान की आवश्यकतानुसार नए विचारों और व्यापारों को अभिव्यक्त करने के लिए संस्कृत व्याकरण के अनुसार समय-समय पर गढ़ लिए गए हैं। चूँकि संस्कृत हिंदी भाषा की जननी हैइसलिए स्वाभाविक रूप से संस्कृत के अनेक शब्द हिंदी में घुल-मिल गए हैं, ऐसे शब्द हैं - अग्नि, दूग्ध, कर्म, कक्ष, सर्प, धर्म, ग्राम, कार्य,सूर्य, कक्षा, कर्ण, कृमि, क्रीड़ा, अक्षर, अभिषेक, अभीष्ट, अंक, वायु, धूम, चंद्रमा, तारक, पशु, वणिक, यव, पुष्प, पुस्तक, बालक, कन्या, विद्या, साधु, आत्मा, तपस्वी, विद्वान, राजा, पृथ्वी, नेता, ममता, अहंकार, नवीन, सुंदर, सहसा, नित्य, शनैः शनैः, अकस्मात्, आकाशवाणी, दूरदर्शन, आयुक्त, उत्पादनशील, कृषि, शक्ति, प्रौद्योगिकी, केंद्र, यवन, नीर, मर्कट, रात्रि, गंगा, कदली, तांबूल, मुद्रा, कमल, सत्य, दिन, शैय्या, कवि, रि, शत्रु, मति, प्रशासक, अधीक्षक, अभियंता, पर्यवेक्षक, प्राध्यापक, निदेशक, पत्राचार, प्रभाआदि। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का निबंध साहित्य, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की राम की शक्ति पूजा, यशपाल की दिव्या, जयशंकर प्रसाद का नाट्य तथा कथा साहित्य तत्सम शब्दावली में प्रयोग के उत्तम उदाहरण हैं।
अर्द्धतत्सम शब्द - इस कोटि के शब्द तद्भव न होकर संस्कृत के अधिक निकट होते हैंकहने का अभिप्राय है कि अर्द्ध तत्सम शब्द वे हैं जो आधुनिक काल में ग्रहण किए गए संस्कृत शब्दों से विकसित हैं जैसे - कृष्ण >किशन, चंद्र > चन्दर, लग्न > लगन, अग्नि > अगिन, मुहूर्त > मुहूरत, लक्ष्य > लचछ, अक्षर > अच्छर, कृपा > किरपा, वर्षा > बरखा, ज्ञान > ग्यान, आदि। पंजाबी के के प्रभाव से हिंदी में अर्द्ध तत्सम शब्दों की प्रचुरता बढ़ रही है।
 सामान्यतः तत्सम के पश्चात् तद्भव शब्दों की बात की जाती है, लेकिन इन दोनों के मध्य इस तीसरे रूप की चर्चा होनी चाहिए। इससे हमें तत्सम से तद्भव तक की शब्दयात्रा का पता चलता है।
2. तद्भव शब्द - तद्भव का अर्थ है - तद = उससे, भव = उत्पन्न, निर्मित। अर्थात् उससे यानि संस्कृत से उत्पन्न। तद्भव ऐसे शब्द जो मूलतः संस्कृत के हैं लेकिन हिंदी में वह ज्यों के त्यों प्रचलित न होकर परिवर्तित रूप में प्रचलित हैं। ऐसे शब्दों को तद्भव शब्द हा जाता हैवास्तव में तद्भव शब्द हिंदी भाषा के मेरुदंड हैंक्योंकि हिंदी शब्द भंडार मुख्यतः तद्भव शब्दों से ही भरा हैभारतेंदुकालीन कथा साहित्य और मैथिलीशरण गुप्त का काव्य तद्भव शब्दावली के प्रतिमान कहे जा सकते हैं।
तद्भव शब्दावली को तत्सम शब्दों के साथ रखकर कतिपय उदाहरण प्रस्तुत हैं- गाँव (ग्राम), आग (अग्नि), दूध (दूग्ध), साँप (सर्प), बरात (वरयात्रा), घर (गृह), भगत (भक्त), कान (कर्ण), आँख (अक्षि), सात (सप्त), मुँह (मुख), हाथी (हस्तिन), काज (कार्य), अँधेरा (अंधकार), खीर (क्षीर), कुम्हार (कुंभकार), नींद (निद्रा), पीठ (पृष्ठ), भाई (भ्रातृ), मोर (मयूर), भैंस (महिषी), दही (दधि), जीभ (जिह्वा), जेठ (ज्येष्ठ), अटारी (अट्टालिका), सच (सत्य), पक्का (पक्व), धुआँ (धूम), भीख (भिक्षा), मक्खी (मक्षिका), रात (रात्रि), सास (श्वश्रु), ससुर (श्वसुर), चिड़िया (चटका), कौआ (काक), आज (अद्य), काठ (काष्ठ), अहीर (आभीर), लौंग (लवंग), हल्दी (हरिद्रा) आदि।
3. देशज शब्द - हिंदी के वे शब्द जो लोक भाषा में प्रचलित हैं लेकिन उनकी उत्पत्ति का कोई भाषा वैज्ञानिक स्रोत नहीं मिलता, देशज शब्द कहलाते हैं। ये  शब्द अनुकरण, प्रतिध्वनि तथा स्वर अथवा व्यंजन भेद के कारण बन गए हैं - भोंदू, झाड़ू, झंझट, भोंपू, अटकल, टट्टी, पगड़ी, लोटा, झकझक, टाँग, थप्पड़, ठोकर, तेंदुआ, ठेस, ठसाठस, टनाटन, कबड्डी, थोथा, लुटिया, डिबिया, धाम (काम-धाम), अड़ोस (अड़ोस-पड़ोस), टाबर, भायला (मित्र), रुँख (पेड़), सुपड़ा, पों-पों, चूँ-चूँ आदि।
4. विदेशी या आगत शब्द - आगत शब्द का अर्थ है (कहीं से) आया हुआ। अर्थात् वे शब्द जो दूसरी भाषाओं से आए, आगत या विदेशी  शब्द कहे जाते हैंभारत में युगों से अनेक भाषा - भाषी लोग आकर घुल-मिल गएइनमें अरबी, फारसी, पुर्तगाली, अंग्रेज प्रमुख थेहिंदी में इन भाषाओं के अनेक शब्द ऐसे मिल गए हैं कि यह कहना तक मुश्किल है कि यह शब्द हिंदी के अपने नहीं हैंहिंदी में मुख्य रूप से निम्नलिखित विदेशी भाषाओं से आए - अरबी, फारसी, पोर्तगीज, अंग्रेजी, फ्रेंच, तुर्की, यूनानी, इटालियन, श्तो, चीनी, रूसी आदि
 1. अरबी शब्द - हिंदी में अरबी के कुछ बहुप्रचलित शब्दों की पेशकश है - किताब, अदालत, मुकदमा, फैसला, हलवाई, अमीर, कलम, हिरासत, मुंसिफ, वजीर, हज, ईद, मोहर्रम, बलगम, मौका, रहीम, नतीजा, तकदीर, तमाशा, नकद, मकान, रिश्वत, औजार, औरत, इलाज, नक्शा, मीनार, मुरब्बा, लिफाफा, हलवा, हुक्का, दिमाग, जहाज, जवाहर, जनाब, आदमी, औलाद, इस्तीफा, कानून, कसूर, खतरा, खबर, गदर, गबन, गरीब, तोता, तहसील, दुकान, नहर, नकद, नमाज, फकीर, मल्लाह, मतलब, मुफ्त, माल, मुसाफिर, लिहाफ, काफिला, किस्म, कुरान, किस्मत, कीमत, कुर्सी, कसरत, खत, कर्ज, कत्ल, अमीर, अल्ला, आखिर, आसामी, एहसान, ऐश, अकल, गजब, गुलाम, जनाब, नकल, फायदा, फसल, फौज, फव्वारा, बहस, बजाज, बाकी, ऐनक, मदद, रद्दी, अर्क आदि।
 2.फारसी शब्द - भारत में मध्यकालीन राजाओं के राज्य काल में फारसी राजभाषा के पद से विभूषित थी। लंबे समय तक जन व्यवहार के कारण फारसी शब्द हिंदी में शामिल हुए। इनमें कतिपय बहुप्रचलित शब्दों की बानगी पेश है - पाजामा, शहर, देहात, मरीज, बुखार, हकीम, दवा, शरम, सब्जी, अंगूर, अगर, अनार, आइना, सरकार, हुक्म, खजांची, नायाब, कुल्फी, कमीज, किशमिश, ईमानदार, उस्तरा,कस्बा, कलाकंद, हजामत, हैजा, हमेशा, शादी, नायाब, चश्मा, दरबार, जिला, चुकन्दर, खून, चीलम, बलवा, शिकार, वकील, शलवार, रुमाल, बेईमान, बवासीर, बर्फ, पोदीना, दलाल,जुलाहा, जलेबी, चरबी, चपरासी, चन्दा, तीर, जमादार, जादू, नमक, नगीना, हवलदार, सिपाही, कमान, हमला, सिफारिश, गुलाबजामुन, बर्फी, मिष्ठान, बदाम, सेब, मुनक्का, पिस्ता, तरकारी, खरबूजा, कद्दू, मोजा, साफा, चादर, रजाई, मुहल्ला, परगना, सुरमा, तख्त, मेज, इत्र, मजहब, खुदा, दरवाजा, दीवार, मंजिल, नासूर, जुकाम, नब्ज, खुद, फलाँ, खरीदना, फरमाना, आखिर, बेशक, बदनाम, बेकार, बेहया, ज्यादा, कम, नरम, नाखुश, जादू, दर्जी, नाशपाती, बाग, बरामदा, बाजार, बालूशाही, बीमा, बुनियाद, मुर्दा, रसीद, रंगीन, रोशनदान, लगाम, लकवा, शहतूत, शेर, समोसा, सर्राफ, सादा आदि।
 3. अंग्रेजी शब्द- आंग्ल भाषा के शब्द न केवल हिंदी बल्कि भारत की अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में ऐसे रम गए जैसे पानी में नमक। कतिपय आंग्ल शब्द दृष्टव्य हैं - कोर्ट, अपील, कलक्टर, रेल, इंजिन, शर्ट, पैंट, सूट, बिस्किट, आइसक्रीम, कैमरा, होस्टल, स्टेशन, स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, अफसर, कम्पनी, क्रीम, लेडी, कोट, रिपोर्ट, स्वेटर, बैंक, बैटरी, डॉक्टर, फुटबॉल, फिल्म, नर्स, डायरी, टैक्सी, टैक्स, गैस, डेस्क, पुलिस, ट्यूब, सिनेमा, ग्लास, फीस, कापी, एजेंट, कन्डक्टर, ड्राइवर, क्रिकेट, गाटर, चाक, जज, जनवरी, जुलाई, अगस्त, मैनेजर, प्लांट, प्लेटफॉर्म, फोटो, बजट, पाउडर, पंचर, फ्राक, माचिस, लालटेन, सरकस, सिगरेट, तारकोल, कम्पाउंडर, थर्मस, पेट्रोल, पिन, फेल, बोर्ड, लाटरी, लैम्प, सूटकेस आदि हैं।
 4. पोर्तगीज शब्द - पुर्तगाली, फ्रांसीसी और अंग्रेज तीनों भारत पर साम्राज्य स्थापित करना चाहते थे। यह समय 18वीं शती का था। अंततः सफलता अंग्रेजों को मिली। हिंदी में पोर्तगीज शब्द शामिल हैं। ऐसे बहुप्रचलित पोर्तगीज शब्द हैं - इस्त्री, कनस्तर, गमला, चाबी, आलमारी, आलपिन, गोदाम, कॉफी, तम्बाकू, बोतल, संतरा, पपीता, कप्तान, नीलम, पादरी, बालटी, साबुन, आया, गोभी, तौलिया, तिजोरी, पशु, परात, पीपा, फीता, फालतू, फ्रांसीसी, मिस्त्री, साया आदि।
 5. यूनानी शब्द - यूनान और भारत के संबंध चंद्रगुप्त मौर्य काल से रहे हैं। दोनों ही देश सांस्कृतिक दृष्टि से विश्व मेँ अग्रणी रहे हैं। कतिपय यूनानी शब्द जिनका हिंदी में बहुत प्रयोग होता है - एकेडमी, एटलस, ट्राम, ऐटम, टेलीफोन, ग्रामोफोन, दमड़ी, सुरंग, कस्तूरी, डेल्टा, बाइबिल आदि।
 6. फ्रांसीसी शब्द - फ्रेंच शब्द हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में घुलमिल गए। कतिपय फ्रांसीसी  शब्द- मशीन, मास्टर, एडवोकेट, कप, कूपन, डीलक्स, कालर, मैम, अंग्रेज, पिकनिक, लैम्प, कारतूस, बेसिन, काजू, कर्फ्यू, कार्टून, टेनिस, पेंसिल, मीटर आदि।
 7. तुर्की शब्द - भारत में आए प्रारम्भिक मुस्लिम शासकों तक मध्य एशिया में तुर्की ही मुख्य भाषा थी। उस समययह व्याकरणिक नहीं ले पायी इसलिए फारसी ने भारत मे राजभाषा का स्थान प्राप्त किया। तुर्की के कुछ शब्द जो हिंदी में प्रचलित हैं - बीबी, बहादुर, बेगम, कैंची, कुर्ता, दरोगा, तोप, चम्मच, गलीचा, लाश, सुराग, आका, उर्दू, कुली, मुगल, बुलबुल, चेचक, चाकू, चारपाई, तलाश, बारूद, मुचलका, लफंगा, सौगात, खान, काबू आदि।
 8. इटैलियन शब्द - इटैलियन शब्द भी हिंदी शब्द भण्डार में शामिल हैं - लाटरी, राकेट, स्टूडियो, मलेरिया, बालकनी, रेजिमेंट, डेस्क, ग़जट, अलार्म, कर्नल, मॉडल आदि।
 9. पश्तो शब्द - पठान, अखरोट, गुणडा, अचार, डेरा, गड़बड़, नगाड़ा, हमजोली, पटाखा, जमालगोटा, मटरगश्ती, लुच्चा आदि पश्तो शब्द हिंदी में बहुप्रचलित हैं।
 10. अन्य शब्द - उपर्युक्त भाषाओं के शब्दों के अलावा हिंदी शब्द भण्डार में कुछ अन्य विदेशी भाषी शब्द बहुप्रचलित हैं, देखें - रिक्शा, जूलूस (जापानी), सिंदूर, चाय, लीची (चीनी), तुरुप, पम्प, स्काउट, ड्रिल, बम (डच), ट्रेन, बैंगन, सेमीनार (जर्मन), जार, टुन्ड्रा, स्पुतनिक, रूबल (रूसी), एजेंडा, केतली, राशन, पेंशन, मिल, पार्लियामेंट (लैटिन), लामा (तिब्बती) आदि।
5. संकर या संयुक्त शब्द - हिंदी में कुछ शब्द ऐसे भी शामिल हैं, जो दो भिन्न भाषाओं के शब्दों एवं प्रत्ययों के योग से निर्मित हुए हैं, जैसे -
 ● फारसी + हिंदी- बेडौल (बे + डोल), खून पसीना (खून + पसीना) आदि।
  हिंदी + फारसी - पानदान (पान + दान), छायादार (छाया + दार) आदि।
 ● अंग्रेजी + फारसी - जेलखाना (जेल + खाना), सीलबंद (सील + बंद) आदि।
 ● अंग्रेजी + हिंदी - टिकटघर (टिकट + घर), रेलगाड़ी (रेल + गाड़ी) आदि।
 ● अरबी + फारसी- तहसील + दार (तहसील + दार), फिजूल खर्च (फिजूल + खर्च) आदि।
 ● पोर्तगीज + हिंदी - पावरोटी (पाव + रोटी) आदि।

(घ). रचना (संरचना) की दृष्टि से हिंदी शब्दों का वर्गीकरण - रचना की दृष्टि से शब्दों के तीन भेद किए गए हैं-

1. रूढ़ या मूल शब्द 2. यौगिक या संयुक्त शब्द 3. योगरूढ़

1. रूढ़ या मूल शब्द - वे शब्द जिनका निर्माण अन्य शब्दों से मिलकर नहीं हुआ। अर्थात् अन्य किसी शब्दों के मेल से नहीं बने हों, उन्हें रूढ़ या मूल शब्द कहा जाता है। जैसे - दिन, रात, घर, गधा, उल्लू, तारा, नाग, हरि, गाय आदि।
2 यौगिक या संयुक्त शब्द - यौगिक शब्द वे शब्द हैं जिनकी रचना एकाधिक शब्दों से मिलकर हुई है। यौगिक या संयुक्त शब्दों का निर्माण आपस में दो रूढ़ शब्दों के मिलने से या रूढ़ शब्दों में प्रत्यय तथा उपसर्ग के माध्यम से होता है। उदाहरणार्थ -
दो रूढ़ शब्दों का मिलनप्रधानमंत्री, घुड़सवार, कालीमिर्च, पाठशाला, विद्यालय, जलावृत्त, वसंतोत्सव, पुस्तकालय, वाचनालय, चिकित्सालय, डाकघर, चिड़ियाघर आदि।
रूढ़ शब्दों में प्रत्यय तथा उपसर्ग का मिलन - प्रत्यय के माध्यम से; बुढ़ापा, नमकीन, लड़कपन, ईमानदार, धनवान, यादव, राघव, मित्रता, सुंदरता, नम्रता, पशुता, मानवता आदि। उपसर्ग के माध्यम से- असुंदर, बेघर, सुशील, अनपढ़विनम्र, विदेश, स्वदेश, स्वजन, बदबू, खुशबू, अजेय आदि।
3. योगरूढ़ - इनकी निर्मिति यौगिक शब्दों जैसी होती है लेकिन इनसे निसृत अर्थ रूढ़ शब्दों की तरह प्रकट होता है। अतः इन्हें योगरूढ़ कहा जाता है, जैसेपंकज, जलज, चतुरानन, पंचानन, दशानन, जलद, पीताम्बर, लंबोदर, घरवाला, अक्षर, अमृत आदि।
ध्यातव्य रहे यौगिक और योगरूढ़ शब्दों में अंतर यह है कि जहाँ यौगिक शब्द अपनी निर्मिति के मूल शब्दों की अर्थ छटा को समेटे हैं, वहीं योगरूढ़ शब्द दोनों शब्दों को गौण करके किसी तीसरे अर्थ की प्रतीति करवाते हैं और यह तीसरा अर्थ ही मुख्य होता है जो किसी विशेष अर्थ के लिए रूढ़ हो जाता है।

(). व्याकरणिक विवेचन या प्रकार्य की दृष्टि से शब्दों का वर्गीकरण-

इस दृष्टि से शब्द के दो भेद हैं - 1. विकारी  शब्द 2. अविकारी शब्द
1. विकारी शब्द - हिंदी म़े संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया शब्दों में लिंग, वचन, काल, कारक, पक्ष, वृत्ति, वाच्य आदि के कारण शब्दों के मूल रूप में परिवर्तन या विकार आ जाता हैऐसे शब्दों को विकारी शब्द कहा जाता है। लड़का, गाय, पशु, मानव, बकरी, अच्छा, मोर, काला आदि।
2. अविकारी शब्द - जिन शब्दों में लिंग, वच, काल, कारक आदि के कारण कोई विकार या परिवर्तन न हो वे अधिकारी शब्द कहलाते हैं। इनके अंतर्गत क्रिया विशेषण, संबंध बोधक, समुच्चय बोधक और विस्मयादिबोधक शब्द आते हैं। इन्हें अव्यय भी कहते हैं अर्थात् जिनका व्यय (परिवर्तन) न हो, जैसे- आज, यहाँ, और, अथवा, लेकिन, इसलिए, किंतु, या, अरे, हमेशा, इधर-उधर, नीचे, ऊपर, अतएव, आह, उफ्, ओह आदि। अतः उपर्युक्त शब्द भेद से स्पष्ट है कि हिंदी में शब्दों के आठ भेद हैं। चार विकारी तथा चार अविकारी शब्द भेद। इनका विस्तृत विवरण आगे के आलेख में किया जाएगा। यहाँ तो इनका संक्षिप्त वर्णन है

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