काव्य: मैं हिंदू हूँ, तुम मुसलमान (पण्डित नरेंद्र शर्मा)

पंडित नरेंद्र शर्मा
मैं हिंदू हूँ, तुम मुसलमान; पर क्या दोनों इंसान नहीं?

मैं तुम्हें समझता रहा म्लेच्छ, तुम मुझे वणिक या दहक़ानी!
सदियों हम तुम साथ रहे, यह बात न अब तक पहचानी -
दोनों ही धरती के जाये, हम अनचाहे मेहमान नहीं
मैं हिंदू हूँ, तुम मुसलमान; पर क्या दोनों इंसान नहीं?

हैं अलग-अलग हम दोनों के व्यवहार-मान जीवन-दर्शन;
सांस्कृतिक स्रोत दोनों के दो, करते दो भावों का सिंचन
पर दो होकर भी मिल न सके तो दोनों का कल्याण नहीं
मैं हिंदू हूँ, तुम मुसलमान; पर क्या दोनों इंसान नहीं?

तुममें देशांतर की समष्टि, मैं कालांतर का दृष्टिदीप
जीवन सागर के दो मोती, हैं देशकालगत युगल सीप
मोती को हम मिट्टी समझे, क्या दोनों का अज्ञान नहीं?
मैं हिंदू हूँ, तुम मुसलमान; पर क्या दोनों इंसान नहीं?

इस्लामपूर्व की संस्कृतियाँ भाषाएँ तुमने अपनाईं
इस्लामपूर्व के शाहों की गाथाएँ कवियों ने गाईं
फ़ारस-तुर्की को अपनाया, क्या अपना हिंदुस्तान नहीं?
मैं हिंदू हूँ, तुम मुसलमान; पर क्या दोनों इंसान नहीं?

काफ़िर थे फिर भी अपनाये, इस्लामपूर्व के ईरानी
तुमने मंगोलों से सीखी रणचतुराई औ' ख़ाकानी
इस्लामपूर्व के हिंद देश की क्यों तुमको पहचान नहीं?
मैं हिंदू हूँ, तुम मुसलमान; पर क्या दोनों इंसान नहीं?

मैं हिंदू हूँ, बोदा हिंदू, करता था तुमसे असहयोग
था छूत-भूत से दबा हुआ, घरघुसनेपन का रहा रोग
मेरी जागृति का अमृत किंतु होगा तुमको विषपान नहीं
मैं हिंदू हूँ, तुम मुसलमान; पर क्या दोनों इंसान नहीं?

अब तो सदियों की नींद खुली, इतिहास ज्ञान-विज्ञान मिले
मुरझाये थे जो प्रेम-फूल, कर नव-जीवन-रसपान खिले
ग़ुल-कमल खिलेंगे साथ-साथ, यह हिंद अभी वीरान नहीं
मैं हिंदू हूँ, तुम मुसलमान; पर क्या दोनों इंसान नहीं?

मैं देशांतर-व्यापी मुस्लिम, इतिहास करूंगा हृदयंगम
पहले भी तो यवनों के संग था, हुआ हिंदियों का संगम
क्या हम दोनों, दोनों का ही, कर सकते हैं सम्मान नहीं?
मैं हिंदू हूँ, तुम मुसलमान; पर क्या दोनों इंसान नहीं?

तुमको प्यारी है खुद्दारी, मुझको विनम्रता आभूषण
तुम आसमान के अभिलाषी, मुझको प्रिय हैं धरती के कण
पर क्या भू में न मिलती देह? नभ में खो जाते प्राण नहीं
मैं हिंदू हूँ, तुम मुसलमान; पर क्या दोनों इंसान नहीं?

जन-क्रांति जगाने आयी है, उठ हिंदू! उठ, ओ मुसलमान
संकीर्ण भेद-संदेह त्याग, उठ महादेश के महाप्राण
क्या पूरा हिंदुस्तान न यह? क्या पूरा पाकिस्तान नहीं?
मैं हिंदू हूँ, तुम मुसलमान; पर क्या दोनों इंसान नहीं?

मैं हिंदू हूँ, तुम मुसलमान; पर क्या दोनों इंसान नहीं?

3 comments :

  1. बहुत सुंदर। आज भी उतनी ही सामयिक जितनी दशकों पहले थी।

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