यायावर की वापसी

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी


अरे यायावर, रहेगा याद?
                        (अज्ञेय)

आज इक्कीसवीं सदी के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर पीछे देखने पर अजीब सी अनुभूति होती है, कुछ आश्चर्य भी कि क्या मानव की सांस्कृतिक-यात्रा-कथा इतनी मुश्किल रही होगी? कभी यह लगता है कि जो हुआ वह तब सहज व सामान्य था असली मुश्किल तो आने वाले दिनों में होनी है जब इंसान अपनी ही करनी से उस संतुलन को नष्ट करने जा रहा है जो उसके जीवन व जीवन-यापन का आधार रहा है। जिस तेजी से पर्यावरण की गुणवत्ता में गिरावट आयी है वह आने वाले मुश्किल दिनों की झलक दिखाना आरम्भ कर चुका है लेकिन यह तो आगे की कथा है और उसका जिक्र आने वाले लेखों में होना बाकी है। इस लेख में चर्चा का विषय मानव की जीवन शैली में हो रहे परिवर्तनों और जीवन से जुड़ी उन विशेषताओं से है जो कुछ-कुछ इतिहास को दोहराने की कहावत से जुड़ता प्रतीत होता है। 

दरअसल यह कथा प्राचीन काल में मानव के यायावरी जीवन एवं उसी से मिलती-जुलती आधुनिक घुमक्कड़ जीवन-शैली की है।

यायावरी जीवन
कई हजार साल पहले जब कृषि की जानकारी उपलब्ध नहीं हुई थी मानव-जीवन वैसा नहीं था जैसी कि आज हम जानते हैं स्थायी निवास का जीवन। भोजन एवं सुरक्षा की तलाश में वह लगभग वैसे ही भटकता रहा था जैसे अन्य जानवर। इस तरह की जीवन-शैली लाखों वर्षों तक रही होगी; मोटे तौर पर दस-पंद्रह लाख सालों का अनुमान लगता है जब चिंपाजी की एक शाखा दो पैरों पर चलने की सफल कोशिश के बाद अपना एक अलग अस्तित्व निर्माण करने में सफल हुई और आधुनिक मानव-जीव की कहानी आरम्भ हुई। उन लाखों वर्षों में कुछ बदलाव आया जरूर जैसे कि जीवन-यापन को सुगम बनाने के लिये कुछ जरूरी जानकारी हासिल हो जाना, जैसे झोपड़ी बनाना, तीर-कमान एवं धारदार लकड़ी व पत्थर के हथियार से अपनी रक्षा करना और शिकार करना। कुछ और भी बदलाव धीरे-धीरे आता रहा  जिसमें सबसे खास था भाषा एवं भाषागत संचार का विकास। भाषा ही है जिस से हमारा सोच या विचार आगे बढ़ता है जब हम सोच रहे होते हैं तो वह भी एक तरह का संवाद ही है अपने आप से। बात थोड़ा अटपटी लगती है पर यह सही है कि सक्षम व समर्थ भाषा हमारे विचारों को गति देती है एवं कठिन भावों के सृजन व प्रेषण को भी प्रभावित कर सकती है। भाषा के बिना हम विचारों का आदान-प्रदान नहीं कर सकते यह तो हम जानते आये हैं पर बात इसके आगे भी जाती है, क्या भाषा के बिना सोच पाना संभव है? जीवन की सामान्य जरूरतों के बारे में बिना भाषा के भी शायद सोच सकते हैं। मसलन अगर भूख लगी तो खाने का चित्र सम्मुख आ हमें उसकी तलाश के लिये प्रेरित कर सकता है पर भाषा के बिना विचार-प्रवाह अधिक दूर तक नहीं जा सकता।  

चले चलते हैं लगभग चार हजार साल से पहले जब भोजन की तलाश में भटका करता था मानव। एक यायावर की दिनचर्या पर नजर डालते हैं भोजन की तलाश में दिन-भर की दौड़-भाग, मौसम की मार और रात से पहले सुरक्षित जगह पहुँचने का भरसक प्रयास। अपने अस्थायी पड़ाव में पहुँच थका हारा पथिक निद्रामग्न हो जाता है और विचरण करने लगता है सपनों की दुनिया में। स्वप्निल भावलोक में विचरण थके मन को भी राहत देता है और वह खो जाता है सपनों में; बड़ा अनोखा एवं सुंदर था बह सपना जिसमें उसने और उसके साथियों ने मिलकर एक खोज कर डाली, ऐसी खोज जो उन सबको जिंदगी की भाग-दौड़ से निजात दिला सकेगी जिसमें उनका सारा समय भोजन की तलाश में ही न निकल जाया करेगा। एक ही जगह पर रहकर वे अपनी जरुरत की चीजें माटी से उपजा सकेंगे।

खुली आँख, सपना टूट गया उसे टूटना ही था लेकिन वह सपना सच हो गया और वह स्वप्निल भावलोक हकीकत में बदलते देर न लगी। कृषि संबंधी जानकारी बढ़ती गई और धीरे धीरे स्थायी निवास का सुख मिल गया था लेकिन इसके बावजूद कभी वह जा पहुँचता फिर उन्हीं वनाच्छादित ढलानों पर जहाँ उसका यायावरी जीवन का कुछ समय बीता करता; शाम होते लौटना था जरूरी क्योंकि नहीं रहा अब वह इस जीवन का आदी लेकिन लौटते भी बार-बार मुड़कर उसने जी भर वह नजारा देखा जरूर; ऐसे ही किसी कवि ह्रदय यायावर ने उस नजारे और उस अनुभूति को पूरे सौन्दर्य में चित्रित कर  कहा:

मैंने आँख भर देखा।
दिया मन को दिलासा - पुन: आऊँगा।
(भले ही बरस-दिन-अनगिन युगों के बाद!)
क्षितिज ने पलक-सी खोली,
तमक कर दामिनी बोली-
'अरे यायावर! रहेगा याद?'
  (अज्ञेय की कविता दूर्वांचल से)

दामिनी को भी क्या मालूम कि वह मानव अब यायावर नहीं रहा वह स्थायी निवासी बन चुका है; या शायद उसे मालूम हो भी; कि वो अगर सही मायने में यायावर है तो आएगा जरूर। तन से भले ही स्थायी निवास बना लिया हो पर उसका मन यायावर ही रहेगा- शाश्वत यायावर। मानव मस्तिष्क का विकास जैसे भी हुआ हो उसके विस्तार में गये बिना भी इतना तो कहा जा सकता है मानव मन एक जगह रुक कर अधिक देर नहीं रह सकता और यह कि भटकना उसकी नियति है उसका जीवन-सारांश है।

कृषि-क्रान्ति – नयी जीवन-शैली
बात मानव के यायावरी जीवन की हो रही थी जिसमें कृषि-क्रांति के बाद बदलाव आया और स्थायी निवास का युग आरम्भ हुआ। यह घटना केवल जीवन-शैली के बदलाव के कारण ही महत्वपूर्ण नही् इसके अन्य पहलू भी है्। दरअसल जीवन शैली ही नहीं अब मानव की विचार-शैली भी बदलाव अनुभव करने लगी थी; विकसित मस्तिष्क होने के बावजूद पहले के लाखों वर्षों में उसका अधिक सार्थक उपयोग संभव न हो सका  जिसका कारण था उसका लगातार भटकते रहना एवं सुरक्षा व भोजन की तलाश मे सारा समय लग जाना। स्थायी निवास के साथ अब उसके पास समय था सोचने विचारने का, सवाल पूछने का और उनके संभावित उत्तर तलाशने का। रात में तारों भरा आकाश, मौसम मे आवर्ती बदलाव, आकाशीय बिम्ब, इन्द्रधनुषी रंग, हवाओं के रुख, बादलों के आकार-प्रकार – क्या-क्या नहीं था सोचने विचारने को और विचारशील मन ने भी कोई कोर-कसर नहीं रखी। कुछ ऐसे ही पहले प्रयासों में यह सवाल उठा कि यह सब जो नजारा है किसने बनाया, कब और क्यों बनाया? जो हम देख रहे हैं क्या वह हमेशा से इसी रूप में रहा होगा? बहुत पहले सब कैसा रहा होगा? सवालों के हुजूम और उत्तर नदारद; लेकिन वो भी कहाँ हारकर छोड़ने वाला था। उसने कल्पना की उड़ान भरी और कल्पित उत्तर भी सामने प्रस्तुत होने लगे। बस ऐसे ही पौराणिक कथाओं की शुरूत हुई होगी। यह पौराणिक कथा-साहित्य मानव के सांस्कृतिक विकास के आरंभिक चरणों का सजीव दस्तावेज है। अपने देश का पौराणिक कथा-साहित्य खास तौर पर अत्यंत विस्तृत और विविधता से पूर्ण है वेद, पुराण, उपनिषद इस भूभाग में पल्लवित सांस्कृतिक-विकास के दस्तावेज हैं जो उस आरंभिक काल में भी जीवन-यथार्थ से जुडे गहन प्रश्नों के मूल तक पहुँचने में प्रयासरत थे।

बात मानव के यायावरी जीवन से आरम्भ हुई जिसमें कृषि-क्रांति के बाद की सदियों में परिवर्तन हुआ और मानव को स्थायी निवास की जरूरत और सुविधा उपलब्ध हुई। यह स्थायित्व मात्र भौतिक स्तर पर था उसका चेतन-मन जो पहले के जीवन में भोजन व सुरक्षा की तलाश में सारा वक्त बिता देता अब वह स्वयं उडान पर था जिसकी एक झलक हम देख चुके हैं पौराणिक कथा साहित्य के विस्तार और वैविध्य में। देह को स्थायी निवास मिलते ही मन के पास समय और सामर्थ्य थी लम्बी उड़ान पर निकलने की। नतीजा यह हुआ कि मानव की विकास यात्रा में दूसरी बड़ी क्रांति [1] अठारहवीं सदी में आरम्भ हुई जिसे औद्योगिक क्रांति के नाम से जाना जाता है उसके साथ ही संचार एवं परिवहन में  भी क्रांति होना एक अनिवार्यता थी और  इंसान का यायावरी रूप अधिक मुखरित होने में मदद मिल गई।

यह भी ध्यान देने की बात है कि यह स्थायी निवास वाली बात सभी मानव समूहों पर चरितार्थ नहीं हो पायी और कई मानव समूह पुरानी खानाबदोशी जीवन-शैली से जुडे रहे जबकि उनके पास विकल्प थे। यह बताना मुश्किल होगा कि क्यों इन समूहों ने कठिन विकल्प चुना जब ऐसी मजबूरी नहीं थी। अपने देश मे बंजारे अब भी यायावरी जीवन जीते हैं। क्या ऐसा किसी मजबूरी के कारण है या उनके अवचेतन एवं अचेतन में पुरातन लाखों वर्षों की अमिट छाप गहरी समायी है? यूरोप में व अमेरिका में भी रोमा नामक बंजारों के समूह कई देशों में विद्यमान हैं जिनकी आबादी वर्तमान में दो करोड़ के करीब होगी; माना जाता है कि यह भारत से ही बाहर गये प्रवासी हैं।

फरवरी 2016 में भारतीय सांस्कृतिक संपर्क परिषद (Indian Council of Cultural Relations, ICCR) ने भारतीय मूल के बंजारों पर एक सम्मेलन आयोजित किया जिसका मुख्य फोकस रोमा पर ही था। उनके भारतीय मूल के होने की बात की पुष्टि डी एन ए परीक्षण से भी की गयी जो उत्तर भारत के कुछ समूहों से मेल खाते हैं। इसी प्रकार मध्य-पूर्वी देशों में बदयूं (Bedouin) खानाबदोश हैं जो भेड़ों और ऊंटों को लेकर भटकते रहते हैं और इनकी आबादी भी लगभग दो करोड़ है।

बात चाहे खानाबदोश जातियों की हो अथवा स्थायी निवासियों की, यह तय है कि यायावरी जीवन किसी न किसी रूप में इंसानी दिमाग की फितरत [2] है। सबसे बडा घुमक्कड तो मन ही है और पर्यटन का महत्व मानव की इसी जरूरत को दर्शाता है। जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी के विकास के साथ संचार व परिवहन क्रांति हुई  घुमक्कडी जीवन का जुनून बढता ही गया। सामान्य पर्यटन तो आम बात बन गई साथ ही कुछ अलग किस्म के अभियान सामने आने लगे। देखते-देखते पर्वतारोही अभियान आरंभ हो गये पर्यटन की रूपरेखा पर, और इक्कीसवीं सदी के पहले मात्र दो दशकों में विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर इतनी पर्यटकों की भीड इकट्ठा होने लगी कि लम्बी कतारें लग गयीं। माउंट एवरेस्ट के लिये टूर का प्रबंधन करने वाली एजेंसियाँ इस दिशा में प्रयासरत हैं। यह पर्वतारोही अभियान सामान्य पर्यटक के लिये नहीं, पर फिर भी इसे पर्यटन कह सकते हैं। पर्यटन के प्रकार और प्रयोजन भी विविध हैं। चिकित्सा-पर्यटन के बारे में अब काफी जानकारी हासिल है जिसमें चिकित्सा के मुख्य उद्देश्य से पर्यटक उन देशों की ओर रुख करते हैं जहाँ कम बजट में चिकित्सा सेवाएँ उपलब्ध हैं। कुछ देशों में स्वास्थ्य सुविधाऐं बहुत महंगी हैं जबकि भारत जैसे देशों में अपेक्षाकृत काफी कम। यह बात समझ में आती है लेकिन शायद किसी ने पहले कल्पना भी न की होगी कि किसी देश की मलिन बस्तियाँ यानि स्लम भी पर्यटक को आकर्षित कर सकते हैं; आज स्लम पर्यटन (slum tourism) के बारे में सुनकर किसी को आश्चर्य नहीं होता। कैसी फितरत है मानव मन की जिसमें अपना दारिद्र्य दिखाने और बेचने वाले भी हैं और उसे देखने वाले भी?

मन की गतिशीलता और संतुलन
मन की बात निराली है वह उडान पर है तो संयत है नियंत्रित है और स्थिर होने के प्रयास में संतुलन खोने लगता है। हम मन की तुलना एक साइकिल से कर सकते हैं जो रुकी होने पर संतुलित नहीं हो पाती पर चलते रहने पर यह संभव हो जाता है। याद आता है कभी स्कूलों में या अन्यत्र भी धीमी साइकिल दौड़ हु करती थी जिसमें बड़ा आनन्द आता क्योंकि यह निराली दौड़ हुआ करती जिसमें सबसे पीछे रहने वाला ही जीत पाता था। जरा सोचिये सबसे पीछे रहने वाले का प्रथम होना यानि कौशल्य अधिक रफ्तार का नहीं, धीमी का है। ऐसी दौड़ चौपहिया वाहनों के लिये नहीं की जाती क्योंकि असल बात कम गति में संतुलन की है। साइकिल में एक न्यूनतम गति चाहिये उसे संतुलन में रखने के लिये और कुछ यही बात मन के संतुलन के लिये कही जा सकती है। मन दौड़ता रहता है फुदकता रहता है एक विषय से दूसरे पर, दूसरे से तीसरे पर; उसे रोक कर देखो तो आटे-दाल का भाव मालूम हो जायगा। यौगिक क्रियाओं में यह संतुलन प्राप्त करना भी एक उद्देश्य हुआ करता है। इसे प्राप्त करने में शारीरिक और श्वसन क्रियाओं का भी योगदान संभव है और राज योग में यह चर्चा का विषय है। जेन पद्धति (Zen Practice)  जो जापान में प्रचलित है एक तरह की ध्यान पद्धति ही है मन पर नियंत्रण व संतुलन लाने के लिये। यह प्रयोग  साइकिल को लगभग रुकी अवस्था में संतुलित करने जैसा है।
 एक और उदाहरण लेना उपयोगी होगा जिससे हम परिचित हैं है पृथ्वी का सूर्य के चारों और चक्कर लगाना. ग्रहीय गति ही उसे सूर्य के सापेक्ष नियत कक्षा में बनाये रखती है जो सूर्य के गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करती है। गतिशील संतुलन का यह भी एक अच्छा उदाहरण है।

देह-मन द्वैत 
 आधुनिक प्रौद्योगिकी ने कुछ ही सदियों में विराट परिवर्तन संभव कर दिये हैं। संचार ने विश्व को सूचना के स्तर पर जोड़ दिया है और परिवहन में हुई क्रांति ने मानव की गतिशीलता को नये आयाम दे दिये हैं। मानव मन के यायावरी रुझान को जैसे पंख मिल गये और स्थायी निवास के बावजूद मन अपनी यायावरी प्रवृत्ति को नहीं छोड़ पाया। इस तरह आरंभ हुआ पर्यटन और देखते-देखते चह एक उद्योग के रूप में विकसित हो गया।
आज मानव का एक वर्ग किसी मजबूरी की वजह से नहीं अपितु अपनी खुशी के लिये भटकता है यात्री के रूप में या पर्यटक के रूप में; साथ ही वे भी हैं जो रोजगार की तलाश में भटकने के लिये मजबूर हैं। यात्री और पर्यटक का अंतर लेखक पाल थरू ने अपने लेखन में इंगित करने का प्रयास किया है। सामान्यतया पर्यटन में सुविधा और आरामदेह यात्रा की बात होती है जबकि यात्री वे भी हैं जो सुविधा या आराम पर ध्यान कम देते हैं और उनका लक्ष्य सुदूर स्थानों की भौगोलिक, सांस्कृतिक, आर्थिक जानकारी का भी हो सकता है। इसमें कई और बातें भी शामिल होती हैं कई तरह के लक्ष्य भी।

हम जिक्र करना चाहेंगे चीनी यात्री ह्वेन सांग की यात्रा का जिसने लगभग 1,200 साल पहले अनुमानत: दस हजार मील की कठिन यात्रा की और अपने दीर्घ प्रवास के बाद जब वे लौटे तब उनके पास एक विचारधारा थी एक संकल्प था उस विचार को अपनी जमीन पर अपनी तरह से विकसित करने का।

दूसरी ओर कोलम्बस की समुद्री यात्राऐं सुदूर भारत की खोज में उसे अमेरिका ले आयी। उस समय यूरोपीय देशों में ऐसे साहसिक अभियानों का जुनून था और उन अभियानों में जिस साहस और लगन का परिचय मिलता है वे निश्चय की काबिले-तारीफ हैं। पर वहाँ लक्ष्य कुछ और भी आ जुड़े, जो तारीफ के काबिल नहीं थे। अफ्रीका या अमेरिका में मानवीय स्वार्थलिप्सा का जो घिनौना रूप देखने को मिला वह भी हमें स्वीकारना होगा कि किस तरह अपेक्षाकृत निर्बल लोगों के साथ अमानवीय तरीके से निपटा गया और किस तरह साम्राज्यवाद का डंका बजता गया। ह्वेन सांग और कोलम्बस दोनों के अभियान साहसिक थे पर कितना अंतर था दोनों के तौर तरीकों में  और उद्देश्यों में।  

वापसी पर यायावर
आज एक अलग तरीके से यायावारी वापस लौट रही है। संयुक्त राष्ट्र के एक सर्वे के अनुसार (समाचार प्रकाशन, जनवरी 2016) लगभग 22 करोड़ लोग ऐसे हैं जो अपने जन्म के देश को छोड़ अन्यत्र जा बसे हैं और यह विश्व की आबादी का लगभग 3.5 प्रतिशत है। ध्यान देने योग्य है कि इनमें सबसे बड़ी संख्या भारतीय प्रवासियों की है जो लगभग 1.6 करोड़ हैं, दूसरी सबसे बड़ी प्रवासी आबादी  मेक्सिको वासियों की है लगभग 1.2 करोड़; अनुमान है कि आने वाली दो सदियों में प्रवासियों की संख्या विश्व आबादी का लगभग दस प्रतिशत तक पहुँच सकती है।

यायावरी परमाणु की
बात से बात निकलती है जब बात यायावरी की हो रही है तब एक कदम और बढ़ा लेते हैं। गौर करें हमारे शरीर को अस्तित्ववान करते कार्बन, नाइट्रोजन, आक्सीजन और हाइड्रोजन के परमाणु कहाँ से आये? हमारे शरीर ही नहीं पूरे भौतिक जगत को अस्तित्ववान करते सभी परमाणु कब कैसे और कहाँ से आये? लम्बी और लोमहर्षक है यह कथा भी। कभी-कभी यथार्थ भी कल्पना को पीछे छोड़ जाता है और हमें आश्चर्यचकित कर जाता है। विज्ञान की जानकारी ने हमें हमारी असलियत से रूबरू कराया है कई आयामों में। आज की खगोलीय जानकारी के आधार पर सृष्टि के आरम्भ में केवल हाइड्रोजन मौजूद थी शेष सभी परमाणुओं का निर्माण बाद में हुआ। लम्बी कहानी है किस तरह तारों का निर्माण हुआ और उनके केन्द्र में अत्यधिक ताप के कारण नाभिकीय संलयन प्रक्रिया (Nuclear Fusion) आरम्भ हो सकी जिसके कारण हाइड्रोजन के परमाणुओं का आपस में मिलकर हीलियम का कुछ बड़ा परमाणु बनाना संभव हुआ। यानि हाइड्रोजन के अलावा बाकी सभी परमाणु तारों के अंदर करोड़ों डिग्री के ताप पर निर्मित हुए हैं या यह कहा जाय कि तारों की भट्टी में पक कर निर्मित हुए हैं।

यह काया धूप में नहीं
अंगारों में पकी है
एक-एक परमाणु जन्मा है
नक्षत्रीय गर्भ में
और जला है अंगारे सा
तब जाकर ढली है ये कायनात!
विद्युत-चुम्बकीय बलों से उभरा
अणुवों का जटिल जैविक विन्यास
और किन्ही प्रोटीनी विन्यासों में
उभर कर आया है जीवन।

यों बडी लम्बी है दास्तान
कहीं की ईट, कहीं का रोड़ा
भानमती ने कहाँ-हाँ से जोड़ा
तपा कैसे-कैसे तापमानों में
फौलाद भी क्या तपा होगा
जैसे तपा और ढला है जीवन।

रह-रह कर सारी बात
रग-रग में घूम जाती है
कायनात अपनी ही करनी पर
रोती है कभी, तो कभी
झूम-झूम गाती है।
(सेतु, जुलाई 2018)

यायावरी हमारी रग-रग में है या उसके भी अंश हर परमाणु में है तब हमारे स्वभाव में इसकी मौजूदगी  नामुमकिन तो नहीं। वैसे तब और अब में फर्क है जरूर, तब मजबूरी की यायावरी थी अब स्वभाव की। वैसे आज भी रोजगार के लिये एक बड़ा वर्ग भटकता है जिसे पर्यटन नहीं कह सकते पर यायावरी तो वह है ही। जो भी हो आज इस बात के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं यह मानव मन का सहज भाव है नियति है और उस पर अंकुश लगाना अधिक समय तक संभव नहीं।
इसे अगर यायावर की वापसी कहा जाय तो अन्यथा न होगा और कवि अज्ञेय के शब्दों में ‘अरे यायावर रहेगा याद’ का समुचित सहज उत्तर होगा ‘हाथ कंगन को आरसी क्या’?

यायावर मन और प्रौद्योगिकी का कमाल
प्रौद्योगिकी ने संचार व परिवहन में जो क्रांति की है उसने धरती को एक गाँव सा बना दिया है। मात्र दो सदियों में पृथ्वी छोटी लगने लगी और भटकते मन की जिज्ञासा शांत करने के लिये काफी कुछ बचा नहीं; अंतरिक्ष की सैर अभी दूर ही है। मानव मन की यायावरी के लिये निकट भविष्य में क्या विकल्प हैं? भारत में एवं अन्यत्र भी प्राचीन काल से अंदरूनी भ्रमण पथों पर विचरण करने की बात होती रही है। आधुनिक समय में थोरो के शब्दों में:
अंदरूनी पथ पर चलो, देख पाओगे
मन के वर्णपट में छिपे हजारों क्षेत्र,
खोजे जाने हैं चलकर देखो,
खोज पावोगे एक और कायनात- एक और ब्रह्मांड।

धरती पर के बाहरी भ्रमण-पथ भले चुक जायें पर अनंत है अंदरूनी कायनात जिसमें विचरना आधुनिक प्रौद्योगिकी की सहायता से भी संघर्ष से भरा होगा। आज मन और उसकी पेचीदगियाँ समझने के जो प्रयास हो रहे हैं उनमें कई दिशाओं से प्रयास किये जा रहे हैं जिनमें मुख्य हैं- गणित, कम्प्यूटर साइंस, न्यूरोलाजी, भौतिकी और मनोविज्ञान। और चेतना का उदभव एवं विकास आज भी एक पहेली सा ही है जबकि मस्तिष्क संबंधी जानकारी बहुत कुछ प्राप्त की जा सकी है।

बात दोहरे भ्रमण की
हमने बात की है मानव के घुमंतू स्वभाव की और यह भी कि यह भ्रमण बाहरी जगत के साथ अंदरूनी भ्रमण पथों पर भी होता रहा है. पीरसिग की चर्चित पुस्तक ‘जेन और मोटरबाइक का रख-रखाव’ [‍3]
में रोचक कथा है जिसमें अपनी मोटरसाइकिल पर सवार होकर लेखक भ्रमण पर निकला है एक साथ उसका अंदरूनी भ्रमण भी जारी है जिसमें मानव की सांस्कृतिक-विकास-यात्रा के कुछ आयामों का भी जिक्र साथ-साथ चलता रहा। कुछ ऐसी ही चर्चा पहले के एक लेख [4] में की जा चुकी है। यह अलग अलग तरीकों से चलता रहेगा क्योंकि यहीं चलते रहना मूल स्वभाव है मन का, मानव का और उसे अस्तित्ववान करते परमाणुओं का। 

संदर्भ 
[1] Alvin Toffler, The Third Wave, William Collins and Sons, 1980.
[2] चन्द्रमोहन भंडारी, Back to Roots: Return of the Nomad, Setu-English, October 2018.
[3] Robert Pirsig, Zen and the Art of Motor-cycle Maintenance, Bantam New Age Book, 1981.
[4] चन्द्रमोहन भंडारी, हिमालय और हडसन के बीच-एक अंदरूनी भ्रमण पथ पर, सेतु पत्रिका, जून, 2019.


No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।