कहानी: कोरोना और करुणा

सुनील चौरसिया 'सावन'

प्रवक्ता, केंद्रीय विद्यालय, टेंगा वैली, अरुणाचल प्रदेश
चलभाष: +91 904 497 4084, +91 841 401 5182

अमवा बाजार गाँव को एक फुलवारी ही समझिए। जिसमें सभी रूप-रंगों और सुगंधों के पुष्प खिले हुए हैं। इन पुष्पों में एक पुष्प है माधुरी जो विधवा है। उसकी बड़ी बेटी मधु अभी छह वर्ष की ही है लेकिन माँ की मजबूरियों को समझती है। वह अपने छोटे भाई मुन्नू को गोद में बिठाकर समझाती है कि वह माँ को परेशान ना करें। मजदूरी करके जब माधुरी लौटती है तब उसके भूखे बच्चे चहक उठते हैं। मालकिन की कृपा से जो रूखी-सूखी रोटियाँ मिली होती हैं उन्हें ही खाकर वे रात गुजारते हैं। छोटा भाई कई बार तरकारी के लिए घर में कोहराम मचा देता है। तब बेबस माधुरी गुस्साकर एक-दो थप्पड़ जड़ देती है। बेचारी मधु मुन्नू को किनारे ले जाती है और चुप कराकर प्यार से नमक लगाकर रोटी खिला देती है।

जब दोनों बच्चे सो जाते हैं तब उनकी ओर देखते हुए चांदनी रात में वह यही सोचती है, "अगर मालकिन उसको अपने घर में बर्तन धोने का काम नहीं देती तो उसके दिन कैसे कटते!

कई बार उसकी तबीयत खराब हो जाती है तब मालकिन खुद उसकी झोपड़ी में आकर हालचाल पूछती हैं और दवा-दारू देकर बच्चों को खिला- पिलाकर जाती हैं। भगवान किसी को यदि धन दें तो ऐसा ही पावन मन भी दें। धनवान वह नहीं है जो धन का धनी है। अपितु धनवान वह है जो मन का धनी है।

वह पूर्णिमा की चांदनी में लेटे-लेटे सोचती है, "हे भगवान! काश दुनिया का हर इंसान उसकी मालकिन की तरह विशाल हृदय वाला होता जो गरीबों को भी दुर्दिन में गले लगाता।"

चार वर्ष पूर्व जब उसके पति का स्वर्गवास हुआ तब तो वह बिल्कुल टूट चुकी थी। जिंदगी बिलख रही थी। इस बहती हुई दरिया का न कोई सहारा था न कोई किनारा।

 आज भी माधुरी का जीवन एकदम निराधार है। न गाँव में घर है, न सरेह में खेत। उसकी जिंदगी है तपती हुई रेत। मालकिन ने प्रेम बरसाकर उसके जीवन को मधुमय कर दिया। आज यदि वह कभी-कभी मुस्कुराती है तो उन्हीं की कृपा से। उसके फूल से बच्चे भी खिलखिलाते हैं तो उन्हीं की कृपा से। उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया है कि मधु बेटी और मुन्नू बेटा को वही पढ़ाएंगी और एक समय आएगा कि माधुरी के जीवन का सारा दुख दर्द हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।

कभी-कभी माधुरी अपने स्मृतिशेष पति को याद करती है तब दोनों कपोल अश्रुवर्षा से नहा जाते हैं। माँ की तरह मालकिन उसके सिर पर हाथ फेरती हैं और समझा-बुझाकर तन-मन में धधकती हुई विरहाग्नि को बुझाती हैं और कहती हैं, "संतोषम् परमम् सुखम्"। जब जीवन में दुख की घड़ी आए तब निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि अर्धरात्रि की दुखद कालिमा के बाद ही भोर की सुखद लालिमा का शुभागमन होता है। माँ-बेटी जैसे इस सरस रिश्ते को देखकर अक्सर पड़ोसियों को आश्चर्य होता है लेकिन जहाँ सच्चा प्रेम होता है वहाँ दुनिया की टिप्पणियाँ और जलन खुद ही जलकर स्वाहा हो जाते हैं।

मधु बिटिया स्कूल से घर की ओर चल पड़ी। साथियों के साथ खुशी के मारे फूले नहीं समा रही थी। खुश तो होना ही था। एकाएक इतनी लंबी छुट्टी जो हो गई थी। घर में घुसते ही बोली, "मम्मी-मम्मी! आज से हम सब खूब मस्ती करेंगे।"

"क्यों?" उदास माँ ने धीरे से पूछा।

"क्योंकि कोरोना विषाणु के कारण हमारे विद्यालय में लंबी छुट्टी हो गई है। अब तो मौज ही मौज है माँ।" चहकती हुई मधु माँ को उदास देख कर चौंक गई, "माँ! तुम इतना उदास क्यों हो? माँ ने कहा, "तुम नहीं समझोगी मधु।"

बालहठ से आजिज आकर बताना ही पड़ा," बेटी! कोरोना विषाणु एक वैश्विक महामारी है, जिसके आगे एक से बढ़कर एक शक्तिशाली देशों ने घुटने टेक दिए हैं। सबसे गंभीर समस्या यह है कि इस बीमारी का कोई इलाज भी नहीं है। अब तक हजारों लोग कोरोना विषाणु की चपेट में आकर तड़प-तड़प कर प्राण त्याग चुके हैं।"

आश्चर्यचकित मधु ने पूछा, "तब इस कोरोना विषाणु से बचने का क्या उपाय है माँ?"

 माँ ने अपनी बेटी की जिज्ञासा को शान्त किया, "इससे बचने के उपाय हैं- संयम, संकल्प और सावधानी।" इसलिए हमारे प्रधानमंत्री ने संपूर्ण भारतवर्ष में संपूर्ण लॉक डाउन का ऐलान किया है। 22 मार्च 2020 को तो अपने देश में जनता कर्फ्यू भी लगा था।"

मधु ने लाकडाउन (ताला बन्दी) और कर्फ्यू के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की।

माधुरी ने बताया, "कोरोना विषाणु के प्रकोप से बचने के लिए एक दूजे के बीच में कम से कम 1 मीटर की दूरी आवश्यक है। इसीलिए संकट की घड़ी में सरकार कर्फ्यू या लॉक डाउन लगाती है। कर्फ्यू लगने पर हम घर से बाहर बिल्कुल नहीं निकल सकते हैं जबकि लॉक डाउन में जरूरी सामान जैसे सब्जी, दवा इत्यादि के लिए घर से बाहर निकला जा सकता है।"

"माँ! यह कोरोना बहुत ही शरारती है। क्या हमारे घर में भी आ सकता है?" कोरोना विषाणु के नाम से डरे हुए मुन्नू ने जब इतना भयानक प्रश्न पूछा तब माँ ने उसे गोद में बिठाते हुए समझाया, "नहीं बेटा। कोरोना बहुत ही स्वाभिमानी विषाणु है। यह बिन बुलाए हमारे घरों में नहीं आता है। जब कोई व्यक्ति असावधानी से बाहर जाता है तब वह उसके साथ उसके घर में प्रवेश करता है और धीरे-धीरे आसपास के सभी लोगों को अपनी चपेट में ले लेता है। इसलिए तुम लोग घर में ही खेलो और अपनी पढ़ाई-लिखाई करो।

 रोज सुबह-शाम बर्तन धोने के लिए मालकिन के घर जाती है माधुरी। आज ज्योंही काम के लिए दरवाजे तक पहुँची कि मधु ने माँ के आंचल को पकड़कर जिद करने लगी कि प्रधानमंत्री जी ने कहा है कि घर की लक्ष्मण रेखा को पार करने पर बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। 21 दिनों तक घर में ही रहो। बाहर निकलने का मतलब परिवार को 21 साल तक पीछे धकेलना है।"

मजबूर और मजदूर माँ ने बिटिया को समझाया कि यदि वह काम नहीं करेगी तो खाएगी क्या। बर्तन धोती है तभी तो बदले में दो रोटियाँ मिलती हैं।

लॉकडाउन होने के बाद भी उस मजबूर एवं मजदूर माँ को लक्ष्मण रेखा पार करनी ही पड़ी। शाम के समय अमवा बाजार गाँव की जिस सड़क पर पाँव रखने के लिए जगह नहीं रहती है। वहाँ सन्नाटा पसरा था। उस सन्नाटे को चीरते हुए मालकिन के दर पर पहुंची तो दरवाजा अंदर से बंद था। तीन चार बार खटखटाने के बाद अंदर से मालकिन की आवाज आई, "माधुरी! आज के बाद हम लोग खुद ही बर्तन धो लेंगे। जब तक कोरोना विषाणु का कहर है तब तक हमारे घर में किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है। तुम अपने बाल बच्चों के साथ अपने घर में ही कैद रहो। माधुरी! बुरा मत मानना। आज तुम्हें वापस जाना होगा क्योंकि आज खतरों से हमें कोई खतरा नहीं है। आज तो हर इंसान को हर इंसान से खतरा है।"

"वाह रे कोरोना विषाणु! मालकिन ने कभी भी ऐसे खाली हाथ वापस नहीं लौट आया था। आज खाली हाथ वापस जाऊंगी तो बच्चों को क्या खिलाऊंगी।" यही सोचते हुए घर की ओर चल पड़ी। आँखें नम थी। मन भारी था। जी करता था बैठकर रो ले। सोच रही थी,"कहीं किसी दुकान पर कोई काम कर लेगी तो दो-चार पैसे मिल जाएंगे और बच्चों की भूख मिट सकेगी। वह तो पानी पीकर भी सो जाएगी। कम से कम बच्चों के लिए तो दो कवर रोटी का जुगाड़ हो जाए। लेकिन काम करें तो करें कहाँ? सारी दुकानें बंद। सारी गलियाँ बंद। सभी घरों के दरवाजे बंद। विचारों के इसी भंवर जाल में फंसी थी तब तक एक पुलिस ने धमकाया, "अरे! तुम्हें मरना है क्या कोरोना से? जल्दी घर के भीतर जाओ वरना लाठियाँ बरसेंगी?"

रोज की भांति आज भी बच्चे माँ के पास दौड़ते हुए आए लेकिन आज माँ उदास थी और उसके हाथ खाली थे।

भूखे बच्चों के सूखे हुए होठों को देखकर विधवा माधुरी का कलेजा फट गया। मधु समझदार थी। मजबूरी को समझ गयी। उसने अनुज मुन्नू को समझाया, "कोई बात नहीं। एक दिन हम लोग बिना कुछ खाए सो जाएंगे तो मर नहीं जाएंगे। मत रोओ मुन्नू।" लेकिन नासमझ मुन्नू रोता रहा पैर पटक पटक कर...।

बेबस माँ ने कलेजे पर पत्थर रखकर खुद पानी पिया और मधु को भी पिलाया। भूख से तड़पता हुआ मन्नू पानी के गिलास पर ऐसा लात मारा कि गिलास छटक कर दूर चला गया। सिसकती हुई माँ ने सोने का नाटक किया। फिर गुमसुम मधु भी   पेट दबा कर सो गयी। रोते-रोते मुन्नू भी पता नहीं कब सो गया। अंतर बस इतना था कि माँ-बेटी पानी पीकर सोए और मुन्नू को आँसुओं के घूँट पी-पीकर सोना पड़ा। बात 1 दिन की नहीं थी 21 दिनों के लॉकडाउन की थी।

बच्चों की नजर में माँ माधुरी सो चुकी थी लेकिन उसके मानस-मंदिर में कोरोना विषाणुरूपी मृत्यु तांडव नृत्य कर रही थी। वह करवटें बदलती रही... कि अर्धरात्रि में दरवाजा खटखटाने की आवाज आई। बेचारी विधवा माधुरी तो डर के मारे सहम सी गई। आखिर इस रात में कौन दरवाजा खटखटा रहा है। सहमी सी आवाज में दरवाजा खोले बिना अंदर से उसने पूछा, "जी, कौन?"

"डरो मत माधुरी। दरवाजा खोलो" मालकिन की आवाज सुनकर माधुरी अचरज में पड़ गई।

दरवाजा खोलते हुए उसने पूछा, "आप इतनी रात में?"

"हाँ। तुम्हारी और बच्चों की बहुत याद आ रही थी। भला अपने लोग भूखे सो जायें? हो नहीं सकता..." एक मीटर दूर से ही बात करते हुए उन्होंने टिफिन उसके सामने रख दी।

भूखे बच्चे मालकिन की आवाज सुनते ही प्रफुल्लित होकर उठ बैठे। साबुन से हाथ धोकर टिफिन खोलकर खुशी से झूमते हुए गरम-गरम रोटियाँ खाने लगे।

भाव-विभोर माधुरी की आँखें नम थी। मालकिन ने मानो चारों धाम की यात्रा कर ली। प्रेम और करुणा के आगे कोरोना को झुकना पड़ा।

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