कहानी: बकरा

अमित कुमार मल्ल
अमित कुमार मल्ल

उस समय की कहानी है जब दुबई शहर में पेट्रोलियम बूम के कारण वहाँ सब कुछ नया व नए तरीके से बसना शुरू हुआ था। वहाँ निर्माण कार्य में मदद करने के लिये मुम्बई के कारीगरों की मांग बढ़ गई। पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार क्षेत्र के कारीगर, जैसे बढ़ई, दर्जी, मेकैनिक, आदि, जो कारीगर मुंबई में रहकर काम कर रहे थे,को कंपनियों ने मुंबई से दुबई ले जाकर, निर्माण कार्य / नया कार्य कराने लगे। उस समय दुबई में काम ही काम था।दुबई में पैसा ही पैसा था। मुंबई से 10 गुना से लेकर 15 गुना दर पर मजदूरी मिलने लगी।हालांकि वहाँ पर गर्मी बहुत अधिक थी, पीने के पानी की कमी थी,कड़े नियमो में रहना पड़ता था लेकिन 10 गुनी मजूदरी के आकर्षण ने, सारी दिक्कतों को इगनोर करने का हौसला दिया।वहाँ से यह कारीगर व मजदूर लोग भरपूर पैसा कमाकर गाँव में लाने लगे।

 पहले ये कारीगर व मजदूर जब मुंबई में रह कर कार्य करते थे और वहाँ से आया करते थे तब 36 घंटे की ट्रेन से यात्रा करके आते थे। स्लीपर क्लास में बैठ कर आते थे। अधिकतर स्लीपर क्लास का रिज़र्वेशन नहीं मिलता। तब कुली से सेटिंग करना पड़ता था। कुली गारंटी लेता था कि वह डिब्बे के भीतर घुसा देगा - चलकर या सामान के रूप में- वह यह नहीं बताता था।कुली जब पैदल चलाकार बोगी में नहीं घुसा पाता था तो आदमी को बैग बनाकर दरवाजे या खिड़की से बोगी मे फेंक देते थे।फिर इसी तरह जो समान रहता था उसे भी, बोरी के तरह, बोगी के भीतर फेंक देते थे।

 कारीगर,ऐसी यात्रा करके जब गाँव पहुँचते तो चेहरा मर्लिन रहता था, आत्मविश्वास कम रहता था, कपड़े गंदे रहते थे,सामान पोटली की तरह बंधा व मैला कुचैला दिखता। गाँव में आने के बाद, जो पैसा बचा के लाए होते थे,उस पैसे से घर पर चढ़े कर्जे को उतारते थे, बीमार बीवी का जरूरी इलाज कराते थे,जो नेवता हकारी रह जाती, वह पूरा करते थे।उस समय गाँव के समाज में इन कारीगरों की सामाजिक स्थिति निम्न रहती थी,जिन लोगों ने कर्ज़ दिया था वह लोग मौके मौके पर उनके परिवार को जताते रहते थे। कर्जा कई तरह का होता था - नगद, खेती बारी में बीज खाद लिया गया उसका कर्ज, दुकान से जो सामान खरीदा गया उसका कर्जा, और भी अवसरों पर लिया गया कर्ज़। बम्बई से लौटकर कारीगर सारे कर्ज़े उतरता।

 दुबई से जब यह कारीगर लोग लौटने लगे तो स्थिति बिल्कुल भिन्न थी। इस बार लोगों के चेहरे पर चमक थी। इनके भीतर आत्मविश्वास था। कपड़े अच्छे थे। ट्रेन की बजाय हवाई जहाज से आए थे और रेलवे स्टेशन से गाँव बस में बैठकर आने के बजाय, एयरपोर्ट से गाँव, टैक्सी करके आए थे। पहले पोटली झोला लेकर आते थे, इस बार अटैची लेकर आए थे। पहले कम पैसे लाते थे इस बार ज्यादा पैसे लाए।

 ऐसे ही लोगों में पश्चिमी बिहार के एक जिले के एक गाँव के दिनेश और रमेश भी थे जो लोग पहले मुंबई कमाते थे और अब दुबई चले गए थे और वहाँ से 1 साल रहकर कमाकर लौटे थे। रमेश और दिनेश ने पुराने दिन भी देखे थे जिसकी पुरानी कसक थी, कड़वाहट थी, पीड़ा थी, उसको दूर करने की प्रबल इच्छा, उनके मन में जागृत थी।
 इस बार यह लोग, स्वयं कर्जदारों के घर पर जाकर पूछ रहे थे कि कितना कर्जा बाकी है और वहीं हाथों-हाथ चुकता कर दे रहे थे।लाला के यहाँ से दुकान का जो बकाया था उसकी दुकान पर जाकर के चुकता कर दिया।
यह बिल्कुल पहले से भिन्न था। पहले कर्ज़ देने वालों को लेनदार को पीछे भागना पड़ता था। उल्टा-सीधा बोलना पड़ता था। फिर हिसाब में किच किच होती थी। तब जाकर रोते गाते कर्जा पूरा चुकाया जाता था।इस बार इन लेनदारों के यहाँ दोनों स्वयं गए। कोई खिच खिच नहींं की। जो बताया तुरंत दे दिया और अगर कुछ फुटकर रह भी गया तो कह दिया,
- भाई रख लेना।
 इस बात की चर्चा तुरंत गाँव के बाजार में फैल गई कि, रमेश और दिनेश ने इतना पैसा कमाया है कि लेनदारों के मुँह पर उन्होंने पैसा मार दिया। किसी से दबे नहींं। किसी से झुके नहींं,यह होती है कमाई।

 रमेश और दिनेश बहुत टी-शर्ट लाये थे जो दुबई में बहुत सस्ती बिकती थी। ये लोग यह सोच कर उठा कर लाये थे कि उसे अपने दोस्तों में,जो उनकी अनुपस्थिति में उसके घर परिवार का ख्याल रखते हैं,बाँट देंगे तो दोस्त खुश हो जाएंगे और उसकी अनुपस्थिति में उसके परिवार की सेवा और मन से करेंगे।
दिनेश ने अपने ऐसे सभी दोस्तों को बुलाया और सबको एक-एक टी-शर्ट पकड़ा दी।यही कार्य रमेश ने भी किया।इस बात की भी खबर पूरे गाँव में फैल गई कि गाँव में कमानेवाले तो बहुत है लेकिन यह पहले दो लोग हैं, जो कमा के लौटने के बाद,घरवालों के साथ साथ अपने दोस्तों को भी टी शर्ट दे रहे हैं।
यह बिल्कुल एक नए तरह का स्थिति थी।इसमें बाहर से कमाकर खाने वाले लोग गाँव की व्यवस्था में निचले पायदान पर नहींं थे।ना ही वे कमजोर थे,ना हीं उनका मनोबल गिरा था, नहींं वह आर्थिक रूप से कमजोर थे,इसके उलट वे लोग पैसे वाले थे। वे काफी पैसे लेकर आए थे,जो कर्जा चुकाने के बाद भी उनके पास, सरप्लस पड़े थे।उनके पास शराब की बोतलें थी -विदेशी महंगी।उनके पास अच्छे सेंट था।उनके पास अच्छे टी शर्ट्स,पेंट्, जूते थे।उनके पास अच्छे कंपनी का चश्मा था और वह अपने दोस्तों को मुफ़्त में टी शर्ट बांट रहे थे। उन लोगो ने मोटरसाइकिल भी खरीद ली।उस समय, मोटरसाइकिल गाँव के कुछ ही लोगो के पास था।
 गाँव का अलग समाजशास्त्र होता है,और गाँव के बाजार का एक अलग तरह का समाजशास्त्र होता है और उसका अलग नजरिया होता है।गाँव के बाजार में समाजशास्त्र के साथ साथ अर्थशास्त्र का प्रभाव होता है, जबकि गाँव का समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र पर प्रभावी होता है।इसके अतिरिक्त गाँव का बाजार,गाँव को बाकी दुनिया से जोड़ता है।
दुबई से कमा कर लौटे दिनेश और राजेश का यह व्यवहार सबसे पहले,गाँव के बाजार में चर्चा का विषय बना।
 गाँव के बाजार में के सबसे प्रसिद्ध चाय पकौड़ी की दुकान पर 8 घंटे बैठने वाले रमई के लिए यह यक्ष प्रश्न बन गया कि इन दोनों के पास इतना पैसा आया कहाँ से? और आ भी गया तो ऐसे कौन खर्च करता है?
कुछ दिन भी नहींं बीते होंगे कि दिनेश व रमेश को लगने लगा कि बाजार के लोगों में उनका मान सम्मान बढ़ गया है।गाँव के बाजार के दुकानदार,बिना तुरंत पैसा लिए खिलाने लगे। कहने लगे,
- पैसा बाद में, एक साथ ले लूंगा।..... पैसा कही भाग नहीं रहा है।
गाँव के बाजार के सबसे प्रसिद्ध चाय पकौड़ी की दुकान पर जब यह बात होने लगी तो, यह बात वहाँ मौजूद लोगों तक ही सीमित नहींं रही वरन एक दूसरे के मुँह से उनके सम्पन्नता की तारीफ पूरे क्षेत्र में फैलने लगी। गाँव व गाँव के बाहर पड़ने वाले अधिकतर फंक्शन में, जाने अनजाने लोग द्वारा बुलाया जाने लगा। यहाँ पर फिर लोग की नई मोटरसाइकिल से जाने लगे जहाँ उन्हें इज्जत मिलने लगी।
 गाँव के वर्तमान प्रधान के दरवाजे पर उन्हें बुला कर,बैठा कर के चाय पिलाए जाने लगा।यह सबके लिये बड़ा ही अचंभा करने वाली बात थी,जहाँ पर मुम्बई के कारीगरों व मजदूरों को केवल खड़ा रखा जाता था। वहाँ पर, दुबई से लौटे कारीगरों व मजदूरों को कुर्सी मिलने लगी।ऐसी अवसरों को यादगार बनाने के लिए दिनेश व रमेश कभी घड़ी,कभी सेंट, कभी टीशर्ट और कभी दारु की बोतल ले जाकर प्रधान जी को गिफ्ट करने लगे।
 उन दोनों का गाँव के बाजार की दुकान पर खाता खुल गया और जब वे लोग घर से निकल कर बाजार में पहुँचते से मिलने वालों की लाइन लग जाती सब लोग उनके साथ चाय पकौड़ी खाते और सब लोग कुछ ना कुछ मांगते, कोई टी शर्ट मांगता।चाय पकोड़ी का खर्च यही दोनों वहन करते।
बाजार की प्रसिद्ध चाय की दुकान का सबसे बड़ा गाहक था। वह दिन भर वही बैठकर चाय पकोड़ी खाता, लेकिन उसका भुगतान कोई दूसरा करता।इस कार्य मे दमरी की मदद कुछ लोग करते। ये लोग भी अधिकतर चाय की दुकान पर रहते। यह लोग दमरी की हा में हा मिलते बदले में दमरी चाय पकोड़ी खिलाने के लिये बकरा ढूंढता।
उसके गोल वालो ने कहा,
- दमरी भाई, ये दोनों कहाँ से खजाना लेकर आये हैं।
- समय की बात है।
- हम लोगो को न तो बोतल मिली, न घड़ी। टी शर्ट भी नहीं मिली।
- हूँ।
- हम लोग तो चाय पकोड़ी के लिये ही बकरा ढूंढने में रह गए।
- हूँ....
- अब तो चाय पकोड़ी का भी अकाल हो गया है।
- कुछ करता हूँ।
- यार जब दिनेश व राजेश यहाँ है तो किसी अन्य को बकरा बनाने की क्या जरूरत है।
- रोज खिलायेगा।
- हा, जब तक दुबई नहीं जाता।
चाय पकोड़ी तो खिला देगा .... लेकिन भइया उसके पास बहुत सामान है।
- अगर तुम लोग कुछ मदद करो तो कुछ न कुछ तो मिलेगा।
- ठीक है।
योजना बन गई।
चाय पकोड़ी की प्रसिद्ध दुकान पर चाय पकोड़ी खा कर लोग,इन दोनों - दिनेश व राजेश की तारीफ करते। अगले दिन,
एक ने कहा,
- गाँव में पैसा तो बहुत लोग कमाए लेकिन दिनेश और राजेश ने जो कमाया,.. कोई उनके पास भी नहीं पहुँच पायेगा।
रमई बोला,
- अपने लिये तो पैसा, बहुत लोग कमाए, अपने ऊपर खर्च किये। गाँव में पहली बार दो लोग ऐसे हैं जो अपनी कमाई मित्रो दोस्ती पर भी खर्च कर रहे हैं।
राजेश व दिनेश की नज़र में रमई का स्थान महत्वपूर्ण था, वे जानते थे कि वह बैठकबाज है, उसको कई गाँव के लोग जानते हैं। रमई, सबके सामने उनकी तरफ कर रहा है, उन्हें अपना दोस्त बता रहा है। जज्बाती होकर,राजेश बोला,
- रमई भाई! सही कह रहे हैं। अपने परिवार के लिये तो सब लोग कमाते हैं....
दिनेश ने बात बढ़ाई,
- इसीलिए रमई भाई। जो हम लोग से बनता है, अपने दोस्तों के लिये करते हैं।
- देखे आप लोग ! मैं तो पहले से कह रहा था दोनों हीरा हैं हीरा! इनके जैसे इस गाँव में ही नहीं, पूरे जवार में कोई नहीं है कोई नहीं है जो गाँव वालों के लिये, दोस्तों के लिये कुछ करता है।
रमई बोला।
रमई के साथ वाला बोला,
- आपकी बात सोलहो आने सच होती गर.....
रमई चीखा,
- सोलह आने में कौन कमी है?
- आपकी बात सही है, लेकिन गाँव वालों के लिये करते क्या है? प्याज की 4 पकौड़ी खिला दी या एक कुल्हार चाय पिला दी, जबकि इनके पास कितना भरा है, रुपया पैसा, टी शर्ट, सेंट, शराब ... और न जाने क्या क्या। अब तो मोटरसाइकिल भी खरीद लिया।
रमई नरम पड़ते हुए, दिनेश राजेश की ओर देखकर बोले,
- बात में तुम्हारे भी कुछ दम है, लेकिन ज्यादे नहीं।\ इन लोगो ने टी शर्ट भी बांटा है, शराब भी बांटा है, सेंट भी बांटा है...
रमई के साथ वाले ने आवाज ऊंची कर बोला,
- शराब व सेंट दिया, प्रधान के परिवार को.... घड़ी दिया लेखपाल को,.. टी शर्ट दिया उन दोस्तो को... जो लोग इनके दुबई रहने पर इनके घर का ख्याल रखते हैं.... उसी को दिया जिससे मतलब है।
दिनेश व राजेश का चेहरा फक्क पर गया, जैसे किसी ने सरेराह इज़्ज़त और सम्मान के मीनार से नीचे गिरा दिया।प्रशंसा के गुब्बारे में पिन चुभा दिया हो।पहली बार तो उन दोनों को इतना सम्मान मिलना शुरू हुआ था और अभी इतना जल्दी.......।
 दोनों की नजरें आपस मे मिली। उतरते मिजाज ने चिड़चिड़ापन पैदा किया।दिनेश ने तमतमाते हुए कहा,
- ऐसी बात नहीं है।..... हम लोगो ने बिना काम के भी कई लोगों को सेंट, कपड़े दिए हैं।
राजेश, दमरी से हुंकारी भराने के लिये, झूठ बोला,
- क्यो दमरी भाई? मैंने आपको सेंट, टी शर्ट नहीं दिया?
दमरी राजेश की ओर देखने लगा। राजेश ने इशारा किया कि इज़्ज़त की बात है, हुंकारी भरो।
संतुष्टि पूर्ण ढंग से दमरी बोला,
- भाई लोग.... मुझे दुनिया का तो नहीं पता..... लेकिन मुझसे तो.... दोनों ने यह कहा था कि जब तक यह लोग दुबई नहीं जाते.... चाय पकौड़ी उनकी ओर से रहेगी।....इन लोगो ने सेंट दिया है..... आज ही टी शर्ट और शराब की बोतेल देने के लिये कहा है. .. मुझसे इनका कौन काम है?
आश्चर्य मिश्रित भाव से राजेश, दमरी को देखने लगा कि ये सब तो उसने कहा ही नहीं।
दमरी ने बात आगे बढ़ाई,
- इंनके टक्कर का कोई नहीं है, जो गाँव वालों के लिये बिना बात के करे।
उनके साथ वाला बोला,
- जब दमरी भाई को, ये लोग, इतना किये हैं, तब तो शक नहीं होगा कि ये लोग बिना स्वार्थ के गाँव वालों पर खर्चा कर रहे हैं।
उपस्थित लोगों ने सिर हिलाकर स्वीकारा।
दिनेश व राजेश ने कृतज्ञ भाव से दमरी को देखा। जब वे दुकान से जाने लगे तो उनलोगों ने दमरी को फुसफुसाते हुए धन्यवाद दिया तथा फुसफुसाते हुए ही कहने लगे,
- सेंट, टी शर्ट, शराब - कल तीनो घर दे जाऊंगा।
दुकान से दमरी व उसके साथवाले जब घर जाने के लिये निकले तो रास्ते मे साथवाले ने पूछा,
- सेंट,कब मिला?
- नहीं मिला।
- टी शर्ट मिला?
- नहीं।
- शराब?
- नहीं।
- चाय पकोड़ी की बात हुई थी?
- नहीं।
- फिर क्यो सबके सामने स्वीकारा?
हँसते हुए दमरी बोला,
- इतनी आसानी से कहाँ फसता है.....बकरा।


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