व्यंग्य: लॉकडाउन में दरबार

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

(महाराजा धृतराष्ट्र एवं महारानी गांधारी का दरबार में प्रवेश। सभी दरबारियों द्वारा समवेत जयघोष।)

धृतराष्ट्र: महारानी जी, दरबारी रत्नों, प्रजाजनों, आप सब मास्क धारण रखें और परस्पर चार हाथ की दैहिक दूरी रख कर अपना आसन ग्रहण करें। संजय, आज दरबार में दुर्गंध क्यों है?

संजय: नाथ, कोरोना काल में राजाज्ञा तोड़ने के अपराधी मजदूरों को पकड़ा गया है। ये शहरों से अपने गाँव के लिये पैदल-पैदल पलायन कर रहे थे। इन्हें सैनेटाइज कर दिया नाथ, पर कई दशकों का पसीना इनके बदन से चिपका है।

धृतराष्ट्र: महामंत्री विदुर, अभियुक्त और अपराध का वृतांत सुनाएँ।

विदुर: भूपाल, यह देवी आसन्नप्रसवा थी। शहर के निजी क्लीनिक बंद पड़े हैं। वहाँ देखरेख न मिलते देख यह रोटियों की गठरी बांध पलायन करने लगी। साथ में पति और दो साल का शिशु था। इसने राजमार्ग पर देश की दौलत को जन्म दिया। फिर, रक्त से लथपथ कपड़ों के साथ पुनः चल पड़ी। टीवी चैनलों की लॉटरी लग गई। नाथ, उन्होंने प्रशासन की खूब थू-थू की। इसे राजनिंदा के अपराध में...

गांधारी: (हस्तक्षेप करते हुए): देव, इसे क्षमा करें। इसे दंड देना एक दिन के अबोध शिशु को दंड देना होगा।

धृतराष्ट्र: अब से महारानी जी इसे अंतिम विनती समझें। आपने पाँच दिनों में जो बीस लाख करोड़ रुपये बाँटे हैं, उसके बाद भी मीडिया की ऐसी घिनौनी हरकत। यह सब पैसा कहाँ गया?

गांधारी: पैसा प्रॉपर चैनल से भेजा जा रहा है प्रजापति। बैंकों को भेजा है, प्रांतपालों को भेजा है, उद्योग घरानों को दिया है। व्यवस्थानुसार ऊपर से नीचे तक सबको बँटेगा और सबको मिलेगा।

धृतराष्ट्र: हम प्रसन्न हुए। अगला आरोपी।

विदुर: हे कृपानाथ, यह श्रमिक अपने परिवार को बैलगाड़ी पर लाद कर जा रहा था। इसके पास एक ही बैल था, तो दूसरे बैल की जगह कभी खुद जुत जाता या कभी पत्नी को जोत देता। फैक्ट्री मालिक बकाया तनख्वाह नहीं दे रहे थे और दानदाता खाना नहीं डाल रहे थे। कहता है, परिवार भुखमरी से मरे इससे अच्छा है सड़क पर मर जाए, बच गए तो गाँव पहुँच जाएंगे।

संजय: हे नाथ, मैं जो देख रहा हूं, सरकारी गोदामों में पाँच सौ उनचालीस लाख टन अनाज भरा है। नागरिक: होगा सरकार, पर मेरे आटे का डिब्बा कई दिनों से खाली है। उसमें आँकड़े भरकर तो रोटी नहीं बनती माई-बाप।

धृतराष्ट्र: महामंत्री, हमारे भाइयों-बहनों की यह हालत! उनके श्रम से यह देश बना है। ये प्रांतपाल नागरिकों तक दाना-पानी क्यों नहीं पहुँचाते?

विदुर: हे कृपानाथ, हमने मजदूरों से बार-बार अपील की कि वे जहाँ है वहीं रहें पर वे सड़क पर आ गए। हमने बताया कि प्रांतपाल घर-घर शराब वितरित करा रहे हैं, तुम्हारा नंबर जल्दी ही आएगा। कुछ विरोधी प्रांतपाल जरा भी सहयोग नहीं कर रहे। रेल्वे यार्डों में ट्रेनें तैयार खड़ी हैं पर ये प्रांतपाल अपने यहाँ ट्रेनें बुला ही नहीं रहे। वहाँ से मजदूर पैदल-पैदल भाग रहे हैं। आप व्यथित न हो, हम सबको ठीक कर देंगे।

धृतराष्ट्र: इन विरोधियों का समूल नाश आवश्यक है। ये आर्यावर्त की दुर्गति के मुख्य कारक हैं। ये रामराज्य लाने में बाधा हैं। अगला आरोपी।

विदुर: यह मालगाड़ी का ड्राइवर है। सुबह के पाँच बजे थे फिर भी यह जाग रहा था। इसने देखा कि आधे कोस दूर कुछ लोग पटरी पर सोये हैं। हे नाथ, इसने बिल्कुल नहीं सोचा कि भारतीय रेल की पटरियाँ फाइव स्टार होटलों के गद्दों जैसी हैं। इसने तुरंत ब्रेक लगाए। मालगाड़ी को पता था कि ये भाग रहे मजदूर हैं। जब सारा देश उनको कोरोना संक्रामक मानकर हमलावर है तो वह भी उन पर चढ़ गई। सोलह लोगों के सिर अलग, धड़ अलग। ड्राइवर का इसमें दोष नहीं है। नाथ, इसे जीवन दान मिले।

धृतराष्ट्र: महामंत्री जी, इनक्वायरी तो बिठाना पड़ेगी। एक रिटायर्ड जज को यहाँ लगा दो। हम सबको संसद में नहीं ला सकते। आप जानते हैं हमसे देखा नहीं जाता पर अब हमसे सुना भी नहीं जाता। इस देश की नियति में कैसे-कैसे धृतराष्ट्र लिखे हैं।
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