नारी संवेदनाओं की व्याख्याता- डॉ. शैलजा सक्सेना

डॉ. सुधांशु कुमार शुक्ला
सुधांशु कुमार शुक्ला

चेयर हिंदी, आई.सी.सी.आर., वार्सा यूनिवर्सिटी, वार्सा पोलैंड चलभाष: +48579125129


       डॉ. शैलजा सक्सेना किसी परिचय की मोहताज़ नहीं हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध महाविद्यालय की प्रोफ़ेसर रहीं और अब कनाडा में रची-बसी कवयित्री, कहानीकार, साक्षात्कारा और अन्य सांस्कृतिक सामाजिक कार्यक्रमों को एक मुकाम तक ले जाने वाली डॉ. शैलजा से मेरा परिचय लगभग चार-पाँच महीने का ही है और विश्वविद्यालय स्तर पर कहूँ तो हम एक ही परिवार के हैं अर्थात् दोनों ही दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े हुए हैं। इनकी तीन कहानियों चाह, कागज की कश्ती और शार्त्र की समीक्षा मैं पहले लिख चुका हूँ, जो साहित्य कुंज ई-पत्रिका में छपी हैं और लोगों ने इन्हें पसंद भी किया है। निश्चित रूप से डॉ. शैलजा लेखन प्रतिभा की धनी हैं। वे मानवीय रिश्तों की, मानव-मूल्यों की अद्भुत व्याख्याता भी हैं। इनकी दो कहानियाँ उसका जाना और थोड़ी देर और इसके सशक्त उदाहरण हैं। डॉ. शैलजा उन महिला कहानीकारों में से हैं, जो मन्नु भंडारी, जय वर्मा, अर्चना पैन्यूली और प्रोफ़ेसर नीलू गुप्ता की तरह कर्तव्य और अधिकार की व्याख्या बहुत ही बारीकी से करती हैं। पाठक इनकी कहानियों को एक बार पढ़ना शुरू करने पर बीच में चाह कर भी छोड़ नहीं सकता है। भारतीय लोगों का विदेशों के प्रति महामोह किस प्रकार अच्छे खासे परिवार को नरक बना देता है, उसका जाना कहानी में दिखलाई देता है।

डॉ. शैलजा सक्सेना
       विदेशों से आए लोगों द्वारा वहाँ की भव्यता का गुणगान और झूठी प्रशंसा से बनाए हवामहल में ना जाने कितने भारतीय परिवार अपनी आर्थिक तंगी के कारण बहक जाते हैं। केवल और केवल धन-उपार्जन हेतु अपने देश की बहुत खूबियों को, अपनों को भूलकर विदेशों में नरकीय जीवन जीने को मजबूर हो जाते हैं। उसका जाना कहानी विदेशों में रह रहे ऐसे प्रवासी भारतीयों की सच्चाई को बयाँ करती है। कनाडा के परिवेश में प्रवासी भारतीयों की यह कहानी है। यह कहानी एक परिवार की नहीं है, अपितु उस समाज का प्रतिनिधित्व करती है, जो भारत से बदहाल जीवन कनाडा में जी रहे हैं। भाषा की सीमा, गरीबी की मार, अकेलेपन की पीड़ा, जिनके सहारे आए, उनका नदारद हो जाना, ऐसे में उपजे क्रोध तिरस्कार से नारी-बच्चों का शोषण दर्शाया गया है। डॉ. शैलजा ने एक साथ कई बिंदुओं को बहुत बेहतरीन ढंग से उजागर किया है। उन्हें मानवीय मूल्यों, रिश्तों की कहानीकार कहना अनुचित न होगा।

       वैसे तो कनाडा में भारतीय मूल के विभिन्न प्रान्तों के लोग यहाँ रह रहे हैं, परंतु पंजाब निवासी बहुतायत  देखने को मिलते हैं। यहाँ आकर कम पढ़े-लिखे और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान न होने वाले लोगों की स्थिति को दर्शाया गया है। कनाडा से आया चंदर अपने जीजा को कनाडा की भव्यता से वशीभूत करके कनाडा नौकरी के लिए राजी करता है। उसकी बातों और दरियादिली, पैसों की गर्माहट से चंदर के जीजा वंशीधर अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ कनाडा पहुँचते हैं। चंदर की बहन अर्थात् लीला भाई के कहने पर ना चाहते हुए भी कनाडा पहुँचती है। सबसे बड़ी बहन और अपने ही गाँव में ब्याही होने के कारण भाई चंदर के ना होने पर भी माता-पिता की देखभाल करने वाली लीला चंदर की प्यारी बहन को कनाडा पहुँचने पर ही पता चलता है कि चंदर तो शादी भी कर चुका है। कुछ दिनों की आवभगत के बाद, साले के बदलते रंग के बाद वंशीधर को ड्राइवर का असिस्टेंट या क्वीनर की नौकरी मिल जाती है। अंग्रेजी का ज्ञान न होना और धन की कमी के कारण उन्हें यही काम करना पड़ता है। गाँव की क्लर्की और पढ़े-लिखे लोगों में पहचाने जानने वाले की नियति एक क्लीनर बन कर रह गई। लाने वाला साला भी अर्थात् चंदर उन्हें एक बेसमेंट में रहने का सुझाव देकर, अपने दायित्व से मुक्त हो जाता है। लीला का ऐसा शोषण तो भारत में भी कभी नहीं हुआ होगा। आए दिन पैसों की कमी, रिश्तों की कडुवाहट और पति की तनावग्रस्त स्थिति में पीने की बुरी लत की मार लीला को ही सहनी पड़ती। बच्चों के सामने पिटना, पति का जबरदस्ती संभोग करना और बीमार हो जाना, डॉक्टरों की सलाह पति से दूर रहने की इत्यादि घटनाओं का घटित होना लीला की दर्दनाक शोषण अर्थात् घरेलू शोषण हिंसा को बयाँ करता है।

लीला की बड़ी लड़की अर्थात् बेला का बचपन घरेलू शोषण के कारण नष्ट हो जाता है। वह ही केवल माँ लीला के साथ दिन-रात खड़ी रहती है। थोड़ी-बहुत अंग्रेजी जानने के कारण माँ को अस्पताल ले जाने, डॉक्टरों से बात करने का हौसला वही करती है। बेला का मन पिता के अत्याचार, मारपीट से, माँ की असहनीय पीड़ा से द्रवित हो जाता है। एक बालिका माँ के साथ, उसकी वेदना में मित्र के रूप में सहायक बनती है। कनाडा में किस प्रकार अस्पतालों में डॉक्टर काम करते हैं, घरेलू हिंसा के प्रति जिम्मेदारी निभाते हैं और लीला को उसके घर से निकालकर उसका उपचार करते है, यह सराहनीय कार्य दिखलाया गया है। लेखिका ने बहुत ही सुंदर तरीके से भाषा की बाध्यता और उसके परिणामों को वर्णित किया है, इसके साथ साथ पुरुष प्रधान समाज के स्वयंभू समझने वाले पुरुषों के अमानवीय व्यवहार को चित्रित भी किया है। अपनी चाहत, अपनी मर्जी से आने वाले वंशीघर जैसे लोग अपनी पत्नी की नहीं सुनते हैं। काम ना बनने पर मायके वालों को दोष देकर अपनी पत्नी के साथ दुर्व्यवहार करते हैं। अपनी मर्जी से ही संभोग करना और पत्नी की बीमारी पर, पत्नी को ही दोषी ठहराना समाज में कैसा मज़ाक है? कैसी विडंबना है? यह दर्शाया गया है।

यह कहानी मात्र एक परिवार की नहीं है, यह कहानी उस पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करती है जो घरेलू हिंसा के शिकार हैं। जहाँ पर केवल और केवल पुरुष मन की महत्ता को स्थान दिया जाता है। केवल लीला को ही सब कुछ त्यागना पड़ा, प्यारी सी जेठानी जो मित्र की तरह थी। विदेश में केवल बेटी बेला ही उसकी लाठी बनी, माँ ने बेटी के बचपन को भी न खुशियों से भरा कभी देखा। सावित्री जैसी लीला पति-परमेश्वर वंशीधर के प्यार को बदलती हिंसा में पाकर बीमार-तनावग्रस्त हो गई, डॉक्टरों की आश्रम स्थली में चली गयी। बेटी को उसका जाना पीड़ा दायक और आशान्वित लगा कि माँ शायद वहाँ ठीक हो जाए। मानवीय-रिश्तों में आई कडुवाहट को दर्शाने वाली यह कहानी परिवेशजन्य कारणों को भी दर्शाती है।

       लेखिका ने पुरुष प्रधान समाज की मानव मनोवृति को सुंदर तरीके से चित्रित किया है। संवादों की ताज़गी नए आयामों पर रोशनी डालती है। इसके तीन उदाहरण हैं जैसे-
  • तेरा भाई है, सपने दिखाकर लाया था, यहाँ ट्रक का क्लीनर हूँ मैं, वहाँ आठ आठ लोग सलाम ठोंकते थे, यहाँ मैं उस ड्राइवर की बातें सुनता हूँ। क्या साली जिंदगी बनाई है साले ने?
  • तेरी माँ खुद कुछ क्यों करती, यहाँ भाई के देश में आकर साली रानी बनी फिरती है, न काम की न काज की, ढाई मन आनाज की।
  • और किसी को बुला ले अपनी पैरवी करने को, कहाँ छुपा बैठा है तेरा यार, उसे भी बुला ले, साली हरामजादी मुझे मना करती है।


आगे लेखिका ने घरेलू हिंसा से ग्रस्त लीला को यह मंत्र देकर उसका आत्मबल बढ़ाया 'चूल्हे की आग अब दिल में जला के लीला, रास्ते के अंधरे आप ही हट जायेंगे, बस हिम्मत से चली चल आगे।' घरेलू हिंसा-शोषण को दर्शाती यह कहानी परिवेशजन्य कारणों और परिणामों को भी उजागर करती है। कनाडा में ऐसी महिलाओं को किस प्रकार आत्मविश्वास से भरकर उपचार हेतु ले जाया जाता है। यह कहानी भारतीय और विदेशी दोनों संस्कृतियों को, भाषायी संकट और आत्मबल को चित्रित करती है। निश्तिच रूप से यह कहानी मानवीय रिश्तों की परत दर परत खोलने में कारगर सिद्ध हुई है।

       थोड़ी देर और कहानी यहूदियों पर हुए अत्याचार की गाथा है। कई देशों में यहूदियों पर अत्याचार हुए, उन्हें क्रूरतापूर्वक मारा ही नहीं गया, उन्हें अपने लिए इस्लामी और अन्य देशों से भागना भी पड़ा। एक ऐसे देश की तलाश में, एक ऐसी ज़मीन की तलाश में जहाँ यहूदियों को अपना देश कहने का गौरव मिल सके। यह कहानी लेबनॉन देश पश्चिमी एशिया का देश, जहाँ से यहूदियों को मुसलमानों ने 1945 में खदेड़ा था। यह कहानी डॉ. शैलजा के भौगोलिक ज्ञान और इतिहास की समझ को भी दर्शाती है। घटनाओं और परिवेशजन्य स्थितियों का ताना-बाना एक यहूदी माँ को अपने बेटे के इंतजार में रुकने का घटना क्रम दिखाया गया है। अत्याचारों की मार, घर छोड़ कर भागने, छुपने वाले यहूदी परिवार मि. बेन-अब्राहम और उनकी पत्नी मिसेज बेन-अब्राहम के घर कुछ अन्य उनके रिश्तेदार सुरक्षित स्थान समझकर रूके हुए थे। तभी रात्रि के 11 बजे बदहवास सी एक 15 साल की अनजान लड़की दरवाजा खटखटाती है। मौत के साए में रह रहा यह परिवार दरवाजा खोलता है, एक लड़की अपना नाम अलुश्का बताती है और यह भी बताती है कि वह अपनी जान बचाते हुए यहाँ आई है, आपके ही बेटे सिमहा ने मुझे यह पर्ची दी थी और मैं उसकी दोस्त हूँ।

       कहानी का यह प्रारंभ ही जिज्ञासापूर्ण है। एक माँ के लिए बेटे के हाथ की लिखी चिट्ठी और उसके बेटे की दोस्त बहुत मायने रखती है। उसका बेटा तीन साल पहले ब्रिटिश फौज द्वारा जबरदस्ती फौज में भर्ती कर लिया गया था। उसका कोई पता नहीं था। बस बेटे के कहने मैं आऊँगा माँ का हृदय लेबनॉन छोड़कर जाने को नहीं कर रहा था। मिसेज बेन-अब्राहम उस लड़की को दूध गर्म करके देती है और सोने के लिए कंबल। थकी हारी, बदहवास सी वह लड़की मि. बेन-अब्राहम के यह पूछने पर कि 'तुम कब चली थी?' वह जुम्मे के दिन बोल जाती है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वह लड़की मुस्लिम है। तब मि. बेन-अब्राहम उससे डाँटती हुई सच-सच कहने को कहती है। तब वह अपना असली नाम यास्मीन बताती है, वह कहती है कि तीन साल पहले बेरूत में फौजी ट्रेनिंग में उसके बेटे से वह मिली थी। उसका भाई भी फौज़ में ले जाया गया था। सिमहा बहुत सीधा और शर्मीला है, वह मेरे भाई का दोस्त है। उसी ने मुझे यह चिट्ठी देकर कहा था कि कभी भी मेरे घर तुम जा सकती हो। मेरा नाम अलुश्का है। मेरे चाचा-पिता को सुन्नियों ने मार दिया, उन्होंने सुन्नियों का विरोध किया था कि वे यहूदियों को इस प्रकार न मारे-पीटे और न ही भगाएँ। उन्हें जाने का मौका देना चाहिए। आगे वह कहती है कि युद्ध समाप्ति की ओर है सिमहा अवश्य घर लौटेगा।

       कहानी का अंत और भी रोचक बन गया, जब मि. बेन-अब्राहन अपने रिश्तेदारों के सामने उसे अपने बेटे की मंगेतर और अलुश्का को यहूदी बताने के लिए तैयार हो जाती है। रिश्तेदारों को यह बताने के लिए कि तीन साल पहले सगाई हुई थी और उसे एक अंगूँठी उसको पहना देती है। मि. बेन-अब्राहन को अपनी बहू के रूप में स्वीकार करके बेटे के आने का इंतजार करने लगी जिंदगी को कुछ देर और पकड़े रहने का एक नया बहाना दोनों को मिल गया, इसी से शायद वो दोनों निश्चिंत होकर लेट गई।

नारी मनोविज्ञान की बेहतरीन व्याख्या इस कहानी में देखने को मिलती है। आदमी तो फिर दाढ़ी से पहचाने जाते हैं पर औरतों के पास तो ऐसा कोई निशान होता नहीं है। वैसे भी औरतों की एक जात होती है, औरत। आदमी का नाम, जाति, काम और धर्म होते हैं, औरत का एक ही धर्म है, औरत होना और सारी सांस्कृतिक अपेक्षाओं की पूरी करना! आदमी लड़ता है और जीती जाती है औरत। आदमी योजनायें बनाता है और उन योजनाओं के पहियों का तेल बनती है औरत, आदमी मरता है और उजड़ती है औरत! औरत जब प्रश्न करती है तो झिड़कियाँ खाती है, सलाह देती है तो बेवकूफ कहलाती है। यह कहानी भयावह परिवेश से उपजी घटनाओं में एक आशा की किरण दिखती है। साथ ही अलुश्का और सिमहा के चंद घंटों की बातचीत से उपजे मानवीय व्यवहार को बयाँ करती है। यह सहजता प्रेम को भी दर्शाती सी लगती है। जो माँ को अद्भुत सहारा देती है।

       निश्चित रूप से यह कहानी भी कहानी के तत्वों के आधार पर उम्दा है। लेखिका की भाषा और कहानी पर अच्छी पकड़ है। दोनों ही कहानियाँ मानवीय रिश्तों की विशद् व्याख्या करती हैं। नायिका प्रधान कहानी या फिर नारी-मन की जीती जागती फिल्म सी लगती है। ये कहानियाँ साहित्य की अमूल्य निधियाँ हैं, ऐसा मेरा विश्वास है।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।