मेरे केपलर, हम इस ऊँचे दर्जे की बेवकूफी पर हँसेंगे: गैलिलियो

मेहेर वान

- मेहेर वान

गैलिलिओ गैलिली का जन्म पीसा, इटली में सन 1564 में हुआ और उनकी मृत्यु फ्लोरेंस में अपने ही घर में कैद की स्थिति में सन 1642 में हुयी। जोहनस केपलर सन 1571 में जर्मनी के स्टुट्गार्ट के पास जन्मे और सन 1630 में रीगंसबर्ग में यात्रा करते समय उनकी मृत्यु हुई। दोनों न सिर्फ समकालीन थे बल्कि अपनी वैज्ञानिक क्रियाकलापों के ज़रिये धार्मिक स्तर पर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे थे। हालांकि दोनों अलग-अलग ईसाई आस्थाओं वाले थे, गैलिलिओ रोमन कैथोलिक चर्च को मानने वाले थे और केपलर लूथेरान धर्मशास्त्र के अध्येता थे। इसके बावजूद दोनों को बराबर धार्मिक विरोध झेलने पड़े। टाईको ब्राहे के संपर्क में आने के कारण केपलर का कार्यक्षेत्र गणितीय खगोलशास्त्र था जबकि गैलिलिओ टेलेस्कोप की मदद से प्रयोगों पर आधारित खगोशास्त्र के अध्येता रहे।

गैलिलिओ गैलिली
केपलर और गैलिलिओ एक-दुसरे से संपर्क में तब आये जब सन 1597 में गैलिलिओ को केपलर द्वारा भेजी गई स्वलिखित लिखित किताब “Mysterium cosmographicum” प्राप्त हुई। जवाब में गैलिलिओ ने अपने कोपर्निकन विचार केपलर को लिखे। केपलर की किताब में ग्रहों की गति का कारण सूरज को माना गया था। बाद में केपलर की किताब के 21वें अध्याय से ग्रहीय पिंडों की दूरी और गति के सम्बन्ध में कुछ आंकड़े अपने शोधपत्र में शामिल किये थे। सन 1609 में केपलर ने “इनर्सिया” शब्द का इस्तेमाल पिंडों की उस प्रवृत्ति के बारे में किया था जिसके कारण वह स्थिर अवस्था में स्थिर और गतिमान अवस्था में गतिमान रहते हैं जब उन पर कोई बाहिरी बल न लगाया गया हो। केपलर की इसी किताब में सूरज के अपनी धुरी पर घूमने की परिकल्पना भी की गई थी। गैलिलिओ द्वारा “Sidereus nuncius” के प्रकाशन के बाद केपलर ने गैलिलियो को एक पत्र लिखा था। जिसमें लिखा था कि “केंद्र में सूरज है, ब्रह्माण्ड के दिल में, प्रकाश पुंज, ऊष्मा, जीवन का मूल और ब्रह्माण्ड की गति का जनक”। एक पत्र में केपलर ने गैलिलिओ को याद दिलाया था कि पाँच ग्रहों के केंद्र में सूरज ही है। इसलिए यह भी संभव है कि पृथ्वी की गति के केंद्र में भी सूरज ही है।”

जोहनस केपलर
गैलिलिओ ने उस समय अपने दो-इंच व्यास वाले साधारण से टेलेस्कोप की सहायता से बृहस्पति और उसके चार उपग्रहों को देखा था। इसी बीच गैलिलिओ का विरोध होना शुरू हो गया और यह विरोध लगातार काफी बढ़ता गया। घार्मिक लोग गैलिलिओ की बातें मानने को तैयार नहीं थे, क्योंकि तब तक यह धारणा थी कि पृथ्वी सारे ब्रह्माण्ड के केंद्र में है। इन्ही विरोधों के बीच गैलिलिओ ने केपलर को एक पत्र लिखा जिसका एक हिस्सा यहाँ पेश है। ऐसा प्रतीत होता है कि केपलर को यह पत्र लिखते समय गैलिलिओ काफी गुस्से में थे- 

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गैलिलियो का कैपलर के नाम पत्र

अगस्त 19, 1610
“आप पहले और लगभग इकलौते इंसान हैं जिनके दिमाग के खुलेपन और बुलंद प्रतिभा के कारण, एक सरसरी तहकीकात के बाद भी आपको मेरे द्वारा दिए गए सारे बयानों का श्रेय दिया जा सकता है.....। हम बृहस्पति ग्रह और अन्य बड़े पिंडों की खिलाफत और बौने पिंडों के बारे में कुछ न कहकर, बेकार में लड़ते हुए इतनी अधिक मात्रा में मिल रहे अपशब्दों से खुद को परेशान नहीं करेंगे। बृहस्पति को स्वर्ग में टंगा रहने दीजिये, और इन अंधभक्तों को उसके ऊपर भौंकने के लिए छोड़ दीजिये, क्योंकि वह भौंकेगे ही। पीसा, फ्लोरेंस, बोलोग्ना, वेनिस और पडुआ में कई लोगों ने इन ग्रहों को देखा है; लेकिन सबने दुविधा में इस विषय पर चुप्पी साधी हुयी है, इनमें से अधिकतर संख्या ऐसे लोगों की है जो न तो बृहस्पति को पहचानते हैं न ही मंगल को, वह शायद चन्द्रमा को ग्रह समझते हैं। वेनिस में एक आदमी ने मेरे विरोध में शेखी बघारते हुए कहा कि वह बहुत ही निश्चितता के साथ बृहस्पति वाले (मेरे द्वारा देखे गए) ग्रहों को जानता है, जो कि उसने भी कई बार देखे भी हैं। वह ग्रह नहीं हैं (बल्कि उपग्रह हैं) क्योंकि वह हमेशा बृहस्पति के साथ देखे गए हैं, और उनमें से कुछ या तो सभी अब भी उसके साथ हैं और आगे निकल गए हैं। क्या किया जाए? हम किसका पक्ष लें डेमोक्रेट्स का या हेराक्लिटस का?

मेरे हिसाब से, मेरे कैपलर, हम इस ऊँचे दर्जे की बेवकूफी पर हँसेंगे। तुम यहाँ ऊँचे दर्जे के अग्रणी दार्शनिकों को क्या कहोगे? जिन्हें मैंने हज़ार बार अपने अध्ययन से जुड़े दस्तावेज़ दिखाने की पेशकश की है, लेकिन आलस्य की पराकाष्ठा में अपना ही मल खाकर जिंदा रहने वाले धूर्त अजगरों की तरह इन लोगों ने भी- न कभी ग्रह देखे, न ही उपग्रह, और न ही इन्होनें दूरदर्शी देखा! असल में, जिस प्रकार सँपोले अपने कान बंद कर लेते हैं उसी प्रकार ये आदमी सत्य के प्रकाश के सामने अपनी आँखें बंद कर लेते हैं।

यह महान मामले हैं; फिर भी इन्हें लेकर कोई आश्चर्य नहीं होता। इस प्रकार के लोग यह सोचते हैं कि दर्शन कोई ऐनेड (AEneid) या ओडिसी जैसी किताब है, और यह कि सच को ब्रह्माण्ड में या प्रकृति में खोजकर नहीं बल्कि (उनके ही शब्दों में) धार्मिक किताबों में लिखी बातों से मिलान करके पाया जा सकता है! 

तुम किस प्रकार से हँसोगे यदि तुम्हें वह बातें सुनने को मिले जो पीसा की अध्ययन पीठ के दार्शनिक ने मेरे विरोध में महान ड्यूक के समक्ष कहीं, जिनमें उसने तार्किक शास्त्रार्थ के ज़रिये और जादुई कसमों के साथ यह पेश मेरे तर्कों को तार-तार करने कोशिश की और यह दलील पेश की कि नए ग्रह स्वर्ग में हैं।” 

Source: Karl Von Gebler, Galileo Galilei, p. 26 (1879).
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1 comment :

  1. समस्या इसलिए जन्मी क्योंकि सौर-मंडल के तीन निदर्श लोगों के सामने थे
    पहला अरस्तु-टॉलमी का निदर्श (मॉडल)
    दूसरा निकोलस कोपरनिकस का निदर्श
    तीसरा टायको ब्राहे का निदर्श

    मध्यकाल के लोग विज्ञान की इस शैली के अभ्यस्त नहीं थे कि एक विषय-वस्तु के एक से अधिक निदर्श

    http://www.basicuniverse.org/2015/10/GrahonkiGatiKeplerkeNiyam.html

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