देखि दिनन को फेर

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी

हममें से अधिकतर लोगों ने कभी यह कल्पना भी न की होगी कि निकट भविष्य में कभी ऐसा नजारा भी देखने को मिल सकता है जिसमें विश्व का घटनाचक्र यकायक थम जायगा सिवाय संक्रमण के। विश्वयुद्ध  के दौरान प्रभावित देशों में भी ऐसा मंजर नहीं देखा गया। वैसे पहले भी महामारियों की विनाश लीला होती रही है और आगे भी यह संभावना बनी रहेगी। इस बार जो बात अलग है पहले की अपेक्षा वह है संक्रमण का अत्यंत त्वरित प्रसार एवं विस्तार। यह भी स्वाभाविक है क्योंकि प्रौद्योगिकी के विकास ने विश्व को छोटा कर दिया है और सभी देशों को अंतरंग रूप से जोड़ दिया है संचार एवं परिवहन की  आधुनिक प्रणालियों  की सहायता से। सामान्य जन भले ही इस तरह की त्रासदी की कल्पना न करते रहे हों लेकिन समय-समय पर ऐसी पुस्तकें सामने आती रही हैं जिनमें ऐसी संभावनाओं को आधार बनाकर लिखा गया है। सब मिलाकर यह कहना सही होगा कि मानव की विकास-यात्रा के कुछ ऋणात्मक पहलू भी हैं जो नजरअंदाज नहीं किये जा सकते और आने वाले समय में उनपर गंभीरता से चिंतन करना आवश्यक होगा।

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रहिमन चुप ह्वै बैठिये देखि दिनन को फेर
जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहैं बेर ।

बचपन से आज तक कवि रहीम की ये बात अंतर्मन की गहराइयों तक असर करती आई थी और  आज भी असरदार हैं। आज के हालात को देखते हुए पहली पंक्ति उतनी ही असरदार है जितनी पहले थी शायद पहले से कुछ और ज्यादा। जहाँ तक दूसरी पंक्ति में ‘नीके दिनों’ के आने की बात है वह पहले भी कुछ अनिश्चित थी आज भी है पर वह अनिश्चितता बहुत बढ़ चुकी है। सामान्यतया इन पंक्तियों का प्रयोग अधिकतर व्यक्ति या परिवार के संदर्भ में होता रहा था पर आज इसे वैश्विक संदर्भ में लागू किया जा सकता है। आज के हालात मे जब सारी दुनिया में संक्रमण पैर पसार चुका है लम्बे समय तक चुप होकर बैठने के अलावा कोई चारा भी नहीं दीखता, वैसे चुप होना उतना जरूरी नहीं पर बैठने की बात है कारगर। तालाबंदी (Lockdown) जिसका एकमात्र संभावित समाधान हो ऐसा शायद विश्व के इतिहास में पहली बार हुआ है। महामारियाँ पहले भी आई हैं और तबाही के मंजर पहले भी दिखे हैं पर अब और तब में एक  बड़ा फर्क हो चुका है, आज सारा संसार एक इकाई सा हो चुका है एक वैश्विक गांव जैसा, इसलिये उसका असर ज्यादा साफ और गहराई से देखा जा सकता है। अंग्रेजी की कहावत है जब तेज तूफान आ रहा हो और सुरक्षित जगह आसपास न हो तब झुकने या लेट जाने में ही भलाई है। शायद कवि का ‘चुप ह्वै बैठिये’ से यही तात्पर्य है। देखते-देखते सारा विश्व इस महामारी की चपेट में आ जायगा उसकी किसी ने कल्पना भी न की होगी यद्यपि चालीस साल पहले छपे एक उपन्यास [1] में कथावस्तु इसी तरह की रही है। विज्ञान कथाओं में आने वाली स्थिति के पुर्वानुमान के प्रयास पहले भी होते रहे हैं और आज भी हो रहे हैं। प्रौद्योगिकी के विकास के साथ भविष्य में संभावित खतरों का आकलन किया जाना स्वाभाविक है और कुछ हद तक अनिवार्य भी। मसलन आज प्रदूषण एक समस्या बन चुका है इस  विषय वस्तु को लेकर एक कुशल लेखक आने वाली संभावित परिस्थितियों का अच्छा वर्णन कर सकता है।

कुछ समय पहले समाचार में कुछ भारतीय छात्रों की चर्चा थी जो वुहान में ही रुके रहे और उन्होंने मीडिया से अपने अनुभव साझा किये। केरल के एक छात्र ने बताया कि कैसे 73 दिनों तक वे अपने कमरे में ही रहे। इतना ही नहीं उनके बगल के फ्लैट में एक परिवार था जिनके तीन बच्चे भी इतने लम्बे समय तक बाहर नहीं दिखाई दिये। बचपन भी संक्रमण की भेंट चढ गया। मानव के पूरे इतिहास में शायद यह पहली बार ही हुआ है जब विश्व एकदम थम सा गया सिवा संक्रमण के जो थमने का नाम नहीं ले रहा। विश्वयुद्धों के दौरान भी विश्व इस कदर थम नहीं गया था जैसा आज दीखता है एकदम निष्प्राण। हाँ यह कहना जरूरी होगा कि हमारा वायुमंडल, नदियाँ और पूरी धरती इस बंदी के दौरान किस कदर स्वच्छ एवं प्रदूषण रहित हो गये थे। यह भी पता चला कि वायुमंडल के ओजोन परत में प्रदूषण की वजह से जो छिद्र दिखने लगा था वह भी तालाबंदी के दौरान दिखना बंद हो गया यानि ओजोन परत में पुरानी स्थिति वापस आ गई थी। यह भी कैसी विड़म्बना है कि मानव का तथाकथित विकास प्रकृति के लिये इतना हानिकर है और दीर्घ परिसर में खुद उसके अपने लिये भी। प्रदूषण की समस्या के मूल में और उसके समाधान की कठिनाइयों में यह भी एक वजह है कि मानव का तथाकथित विकास पर्यावरण की गुणवत्ता की कीमत पर होता आया है।

वुहान में रुके जिन छात्रों की बात हो रही थी वे लाकडाउन के आरम्भिक दिनों में भारत लौट सकते थे सैकड़ों अन्य भारतवासियों की तरह, पर यह सोचकर कि लौटकर घर जाना परिवार के लोगों को खतरे में डाल सकता है यह कठिन और साहसी निर्णय लेना पड़ा। उन्हें यह मालूम था कि सारी समस्या का अगर कोई हल है तो यही कि किसी के सम्पर्क में नहीं आना और चुप होकर बैठना, ‘नीके दिनों’ के इंतजार में।

73 दिनों के बाद उनके ‘नीके दिन’ आते दिखाई दिये लेकिन तब तक अपने देश में संक्रमण पैर पसार चुका था।
आज की त्रासदी की बात करें तो यह कहना मुश्किल है कि सही मामले में ‘नीके’ दिन कब आयेंगे, या कि आयेंगे भी? यह भी संभव है स्वाइन फ्लू की तह यह भी एक सालाना आने वाली बीमारियों की फेहरिस्त में शामिल हो जाय। जो भी हो इस वैश्विक महामारी का प्रभाव काफी दूर तक असर करने वाला है वैसे ही जैसे पहले की कुछ महामारियों के बाद नजर आया था। यह त्रासदी अपितु कई आयामों में अपना असर छोड़ सकती है जिसमें मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक, सामाजिक और अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
जब बात निकल चुकी तब उसे दूर तक जाना ही होगा।

यूरोप का ब्यूबोनिक प्लेग
चले चलते हैं लगभग सात सौ साल पहले - सन 1350 के आसपास, जब यूरोप प्लेग की चपेट में आया था जिसे आज ब्लैक डैथ या ब्यूबोनिक प्लेग कहते हैं. इस त्रासदी ने चार-पाँच वर्ष के अंतराल में यूरोप की लगभग एक तिहाई आबादी को समाप्त कर दिया जो किसी भी आधार पर एक भयावह दृश्य प्रस्तुत करता है। एक तिहाई यानि उस समय करीब पाँच करोड़ आबादी का समाप्त हो जाना मामूली घटना नहीं है। मानव के इतिहास की यह पहली बड़ी महामारी थी जिसे इतिहास के पन्नों में विस्तार से दर्ज किया जा सका है यद्यपि इसके तार कहीं और जुड़े प्रतीत होते हैं।

एक और महामारी जिसने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई उसका भी संबंध यूरोप से ही था जबकि इस बार नुकसान जिनका हुआ वे कोई और थे। जब यूरोपीय देशों ने अमेरिकी महाद्वीप में अपने उपनिवेश स्थापित किये तब वहाँ के मूल निवासियों को दो तरह की मार झेलनी पड़ी: पहले बेरहमी से उनका संहार हुआ और पुरुष आबादी का एक बड़ा प्रतिशत समाप्त कर दिया गया। दूसरी त्रासदी अभी आना बाकी थी यूरोप के लोगों के साथ वे बीमारियाँ भी अपने पाँव पसारने लगी जो पहले अमेरिका में लगभग अज्ञात थीं जिनमें चेचक, इनफ्लुऐंजा जैसी बीमारियाँ मुख्य थीं। मूल निवासियों में इन यूरोपीय बीमारियों से बचाव की प्रणाली नहीं थी और नतीजा यह हुआ कि उनकी आबादी का एक बड़ा प्रतिशत समाप्त हो गया। पहले हथियारों की मार और फिर महामारी की – सदियों तक दोहरी मार झेल रहे मूल अमेरिकी आज विश्व के सर्वाधिक प्रताड़ित और शोषित लोगों में हैं जो अपने ही घरों में बेगानों की तरह जीने के आदी से हो गये हैं। इंसान द्वारा इंसान की प्रताड़ना और शोषण की मिसालें और भी बहुत हैं पर यह मिसाल भी अपने किस्म की है जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

बात आज की महामारी से आरम्भ हुई थी और चर्चा में कुछ अन्य बड़ी महामारियों का जिक्र निकल आया। यूरोप मे प्लेग महामारी के विनाश का जिक्र अक्सर सुनाई पड़ जाता है पर प्लेग का इतिहास इस से पुराना है और उसके तार मध्य एशिया से जाकर जुड़ते प्रतीत होते हैं। तेरहवीं सदी का समय था जब मंगोल सेनाएँ मध्य एशिया के चर्चित सिल्क रूट का प्रयोग किया करती थीं साथ ही इस मार्ग का प्रयोग व्यापार के लिये भी किया जाता रहा। प्लेग का संक्रमण संभवत: इस रूट का प्रयोग करने वालों के साथ हुआ। दूसरा प्रमुख कारण जहाजों में पाये जाने वाले चूहे भी माने जाते हैं। सन 1332 के आसपास चीन के हुबे क्षेत्र में प्लेग की महामारी फैल गई जिसमें इस क्षेत्र की 80 प्रतिशत आबादी काल कवलित हो गई। निश्चय ही यह एक बड़ी त्रासदी थी लगभग वैसी ही जैसी 1350 के आसपास यूरोप में देखने को मिली। चीन में महामारियों का प्रकोप 1200-1350 के कालखंड में इतना भयानक था कि उसकी आबादी अनुमानित 12 करोड़ से घटकर 6 करोड़ रह गई। इसके कुछ समय बाद यूरोप में प्लेग की विनाश-लीला देखने को मिली।

बाद की सदियों में भी प्लेग का प्रकोप होता रहा। भारत में उन्नीसवीं सदी के मध्य एवं उत्तरवर्ती दशकों में इस महामारी की विनाश लीला देखने को मिली और उसका आरम्भ भी चीन के युन्नान प्रांत से हुआ जिसने भारत सहित कई देशों को अपनी चपेट में लिया। यह महामारी लगभग दो दशकों तक अपना असर दिखाती रही और ब्रिटिश सरकार की लापरवाही ने इस त्रासदी की पीड़ा को और बढ़ा दिया और जन असंतोष भी बढता रहा। दो दशकों के अंतराल में लगभग डेढ़ करोड़ लोग मारे गये और कई गाँवों का तो नामोनिशाँ भी न रहा।

इसके कुछ ही दशक बाद पहले विश्व युद्ध से वापस लौटे सैनिक स्पेनिश फ्लू के वायरस के वाहक बने और फिर एक बार तबाही का मंजर देखने को मिला। यह महामारी भी विश्व के इतिहास की सबसे अधिक जानलेवा त्रासदियों [2] में गिनी जाती है जिसमें अनुमानित 5 करोड़ से अधिक लोगों की जानें गईं थीं। स्पेनिश फ्लू का वायरस काफी अलग किस्म का था जिसमें सबसे अधिक जानें 20 से 40 की उम्र के लोगों की गई।

आधुनिक परिद्दश्य: वुहान का दोहराता इतिहास
आज फिर वही हुबे क्षेत्र चर्चा में है जहाँ आज की महामारी की शुरुआत मानी जा रही है। वुहान इसी क्षेत्र  का नगर है जिसकी आबादी लगभग 1.2 करोड़ है। यहाँ से शुरू होकर पूरे संसार में फैल चुकी इस महामारी ने सभी जगह कहर ढाया। सबसे बड़ी त्रासदी झेल रहे हैं यूरोप और उत्तरी अमेरिका। लगभग 700 साल बाद वुहान फिर चर्चा में है । यह भी माना जा रहा है कि वुहान में विषाणुओं पर रिसर्च चलती आ रही थी और संभवत: वहीं से इस महामारी की शुरुआत हुई। यह भी माना जा रहा है कि चीन में नुकसान सरकारी आँकड़ों में दिखाई गई संख्या से बहुत अधिक हो सकता है। यही बात ईरान के बारे में कही जा सकती है जो दक्षिण एवं मध्य-पूर्व एशिया का सबसे अधिक प्रभावित देश है। 

दूरगामी प्रभाव
चौदहवीं सदी में यूरोप में फैले प्लेग के प्रभाव दूरगामी थे जिसके विस्तृत वर्णन इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। इस त्रासदी के कारण यूरोपीय परिदृश्य धीरे-धीरे काफी बदल गया। एक तिहाई आबादी कम होने से खेतों में काम करने वाले मजदूरों की संख्या बहुत कम हो गई और  उनकी मांग बढ़ी। दास-दासियों का मिलना उतना आसान न रहा और दास-प्रथा कमजोर होने लगी। मजदूरी में वृद्धि होती गई और कामगारों की हालत में कुछ सुधार होता दिखाई दिया। एक सदी के गुजर जाने पर जब जनसंख्या में वृद्धि हुई तब मजदूरों की हालत में लक्षित सुधार भी कम होता गया। एक और बदलाव परिलक्षित हुआ, मजदूर न मिल पाने के कारण उद्यमियों ने उनके विकल्प खोजना शुरू किया। यह वह समय था जब समुद्री अभियानों का युग आरम्भ हुआ और साथ ही यूरोपीय देश उपनिवेश स्थापित करने में जुट गये। सामाजिक और आर्थिक प्रभावों के अतिरिक्त इस त्रासदी के धार्मिक संदर्भ भी दिखायी देने लगे। इस महामारी में यहूदियों का नुकसान काफी कम हुआ ऐसे में बहुतों के मन में यह धारणा आने लगी कि इस घटनाक्रम के लिये वह समुदाय विशेष जिम्मेदार हो सकता है। यह भी दुष्प्रचार जोर पकड़ने लगा कि संभवत: यहूदियों ने जलस्रोतों को विषाक्त किया हो सकता है और उनको  प्रताड़ित किया जाने लगा। 

आज का परिदृश्य
आज की महामारी के दूरगामी प्रभावों का सही आकलन कुछ समय बाद ही हो सकेगा पर अनुमान तो लगाया जा सकता है। इस महामारी ने सारे मानव समाज को प्रभावित किया और उस से लड़ने में सभी को एक मंच पर आने की जरूरत महसूस होने लगी। सदियों से बँटते आ रहे इंसान को शायद पहली बार महसूस होने लगा कि कुछ ऐसा भी है जो सारे विभाजित करने वाले सूत्रों के बावजूद सभी को जोड़ सकने की क्षमता रखता है। प्रदूषण के स्तर में लाकडाउन के दौरान जो गिरावट दिखाई दी वह भी गौर करने लायक थी। दशकों से स्वच्छ वातावरण को तरस रहे महानगर निवासियों को जल एवं वायु के स्तर में अप्रत्याशित सुधार देखने को मिला।

दिल्ली में यमुना के जल की बात हो या यूरोप की नदियों की यह तो साफ हो गया कि प्रदूषण का सीधा संबंध आज के मानव की जीवन पद्धति और दिनचर्या से है। सारी धरती पर गंदगी फैलाने वाला जानवर अब भी चेतेगा इसमें संदेह है। संभवत: इस महामारी का प्रदूषण से सीधा संबंध नहीं है पर मानव की कुदरत से अनावश्यक छेड़खानी से  है। आने वाले समय में संभव है ऐसी महामारियाँ सामने आयें जो प्रदूषण से सीधा संबंध रखती हैं। वायरस की ही तरह प्रदूषण भी किसी सीमा रेखा को नहीं स्वीकारता और उसके प्रभाव भी दूरगामी हो सकते हैं। 

प्रदूषण एवं महामारी के इतर
पहले की महामारियों की तरह इस महामारी की विनाश लीला के प्रभाव दूरगामी होंगे इसमें संदेह नहीं और वे प्रभाव केवल भौतिक स्तर पर ही सीमित रह जायें यह नहीं प्रतीत होता। बहुत कुछ बदल रहा है आज ही हमारी आँखों के सामने और यह बदलाव समय के साथ अधिक तीव्र हो सकता है। मनोवैज्ञानिक प्रभावों की बात होना लाजमी है जो न केवल जीवन की गुणवत्ता से जुड़े हैं अपितु उसकी प्रासंगिकता और सार्थकता से भी जुड़ जाते हैं। कुछ उदाहरण:

बंदी के दौरान कुछ युवा मुंबई से पैदल चल अपने घर पहुँचते हैं वाराणसी। एक युवा के अपने लोग उसे अंदर आने की अनुमति नहीं देते, यहाँ तक कि दरवाजा भी नहीं खुलता। उस अभागे की 1,500 किलोमीटर की पैदल यात्रा की थकान पर मानवीय संवेदना का आभास तक नहीं। बात समझ तो आती है कि उस इंसान को दूरी बनाये रखते हुए और समय की नजाकत देखते हुए आवश्यक निर्देशों का पालन करने को कहा जाता लेकिन उसकी भूख-प्यास का भी ध्यान रखा जाता। हमारे दरवाजों से कोई भी भूखा नहीं लौटता इस बात का गर्व हुआ करता था हमें, कोई भी, एकदम अनजान भी। पर आज अपना घर ही इस कदर बेगाना हो जाता है तो सहसा विश्वास नहीं होता।

एक छात्रा अपने घर वापस आती है अमेरिका से। इसी बीच संक्रमण की शुरुआत हो जाती है। स्वास्थ्य विभाग की टीम दस्तक देती है और घर के बाहर खुले में घर के सदस्यों का सैम्पल लिया जाता है। इतना ही नहीं मुहल्ले के लोग उस परिवार को ऐसे देखते हैं जैसे वे अपराधी हों। यह तो तब हुआ जबकि वे संक्रमित नहीं पाये गये। जब भी वे अपनी बालकनी में खड़े होते तो लोग अंदर चले जाने के लिये कहने लगते।

कई डाक्टरों, नर्सों को उनके मकान मालिकों ने मकान खाली करने के लिये कहा जाने लगा। सरकार ने इस पर कार्यवाही की और ऐसे मालिकों को दंडित करने का प्रावधान बनाया। पर सरकार का नियम बना लेना एक बात है और उसका जमीनी हकीकत पर क्रिया‍न्वयन दूसरी। दहेज और बाल श्रम जैसे मामलों में कानून हैं पर इसके बावजूद दहेज जमकर लिया-दिया जाता  है और बालश्रमिक हर जगह देखे जा सकते हैं। 

बंदी के दौरान लाखों श्रमिकों को  पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर चलकर आपने घर की ओर निकलना पड़ा वह भी भीषण गर्मी के चलते। सैकड़ों लोग थकान और सड़क हादसों में मारे गये। 

सवाल यह उठता है कि मानवीय संवेदना के मामलों में हम इतने पिछड़े और गये-गुजरे क्यो् हैं? ऐसी बातें अमेरिका और इटली में भी नहीं सुनाई दी जहाँ महामारी की विनाश लीला से प्रभावित होने वाली आबादी हमारे यहाँ से बहुत अधिक है। क्या ऐसे सवालों पर कभी हम विचार करने का प्रयास भी करेंगे?

आत्म-मंथन की जरूरत
यह बात हमारे अंतरतम तक हमें आंदोलित कर जाती है जब इस त्रासदी से प्रभावित उस हर इंसान की  जगह हम खुद को या किसी खास अपने को देखते हैं। जैसा मैंने ऊपर जिक्र किया है जीवन की गुणवत्ता का अर्थ समझने की जरूरत है। क्या है वह क्वालिटी या गुणवत्ता, जरा सोचें तो लगता है वह न केवल प्रभावित हुई है अपितु उसका अवमूल्यन हुआ है और तब कवि ईलियट की वे पंक्तियाँ हमारे दर्द को कुछ ऐसे बयाँ करती हैं:

कहाँ खो दिया हमने ज्ञान मात्र सूचना में
कहाँ खो दिया विवेक मात्र ज्ञान संग्रह में
कहाँ खो दिया जीवन मात्र जिंदा रहने के प्रयास में? 

उस तथाकथित गुणवत्ता की अनुपस्थिति में जीवन मात्र जिंदा रहने भर की कवायद है और वह कवायद  अधिकतर लोग करते जा रहे हैं। यह बात खासकर हम लोगों पर अधिक सटीक लगती है क्योंकि हमारे देश व समाज में जीवन की गुणवत्ता को विशेष सैद्धांतिक महत्व दिया जाता रहा यद्यपि जमीनी हकीकत में वह कारगर कम ही हो पाया। कितने ही उदाहरण हमारे समाज में दिखाई पड़े जो हमारे सैद्धांतिक और नैतिक आचरण पर सवाल उठाते दीखते हैं। ये उदाहरण अपवादस्वरूप होने वाली एकल घटनाऐं नहीं थीं अपितु
समाज के बड़े हिस्से की मानसिकता को उजागर करती मानी जा सकती हैं।

आत्म-समुद्र-मंथन
अक्सर याद आती है समुद्र-मंथन की रोचक कथा जिसमें मंथन के बाद बहुत कुछ मिला साथ में अमृत भी था और विष भी। अमृत के लिये लूट मची पर विष लेने में रुचि किसी को न थी। और ऐसे में भगवान शिव ने उसे पीकर अपने कंठ में रोक लिया और वे नीलकंठ हो गये। आज की तारीख में वह विष भी हमें ही स्वीकारना होगा, उसके लिये स्वयं को तैयार करना होगा। पर वह सब अभी दूर की बात लगती है अभी तो हम मंथन के फलस्वरूप प्राप्त सुख समेटने में लगे हैं सोचते हैं कि विष हमारे भाग्य में क्यों? यह तो दूसरों के लिये होना चाहिये। हमें कुदरत द्वारा दी गई हर चीज चाहिये भले ही कुदरत की अपनी गुणवत्ता समाप्त हो जाय। आधुनिक विज्ञान के आरम्भिक चरणों में इसकी आधारशिला रखने वालों में फ्रांसिस बेकन भी थे जिन्होंने कुदरत के लिये साफ कहा था ‘उसे जंजीरों में बांधना और प्रताड़ित करना होगा जब तक वह अपने राज न उगल दे’; यह बात कुदरत यानि प्रकृति के लिये कही गई थी। राज जान लेने के लिये प्रयास करना ही विज्ञान है  पर प्रताड़ित करने वाली बात में अहंकार और विध्वंस है और यह इंसान की फितरत में साफ़ झलकता आया है। ‘माता भूमि:, पुत्रोहं पृथिव्या’ में जो भाव है वह नहीं दीखता अब सिर्फ दीखता है जिंदा रहने के लिये जरूरी सुविधाओं का संचय। बात जिंदा रहने भर की होती तो भी शायद कुदरत को स्वीकार्य होती पर बात उपभोक्ता की जरूरतें पूरी करने की है बात प्रकृति को अपने उपभोग की मात्र एक वस्तु समझने की मानसिकता को लेकर है बात जीवन की प्राथमिकताओं में उपभोक्ता-स्वरूप को हवा देने की है।

लेकिन वहाँ तो लूटपाट मची है धरती पर वन समाप्त होते गये नदियाँ सूखती गईं और उनका जल प्रदूषित होता गया। हवा का प्रदूषण क्या और कितना हो सकता है यह लाकडाउन के काल में पता चला। बातें बहुत हैं। बातें गहराई से समझने की हैं सवाल पूछने की है खुद से। मंथन फिर होना है बार-बार होना है सागर का ही होना है लेकिन अबकी बार वह सागर होगा अपने ही मन का सागर। हमें अंदरूनी भ्रमण-पथों पर निकलना होगा थोरो के शब्दों में अंदरूनी ब्रह्मांड की यात्रा पर जिसे वे inner cosmography कहते हैं। एक कायनात बाहर है तो एक अंदर भी है दोनों की बात समझनी होगी दोनों के बीच समन्वय एवं संतुलन प्राप्त करना होगा। मात्र उपभोक्ता धरती पर सिर्फ बोझ है और रहेगा। ऐसा बोझ बढ़ता ही जाएगा तब आधुनिक महामारी जैसे या उस से भी ज्यादा त्रासद हालात पैदा होते रहेंगे और जब-जब ऐसा होगा हम यह पूछ बैठेंगे उस नशेड़ी की तरह जो गटर मे पड़ा आँख खोलता है ओर सोचता है ‘मैं यहाँ कैसे आ गया?’ लेकिन अगले दिन वह फिर उसी तरह नशा करता है और गटर में पड़ा मिलता है। उसे आदत सी हो जाती है नशे की जिसे छोड़ना आसान नहीं। उसके लिये विशेष प्रयास की जरूरत होगी, पर वह तो दूर की बात है। यह हमारी विड़म्बना है कि इतनी बरबादी के बाद भी हम अंदर झाँकने का सार्थक प्रयास तक शुरू नहीं कर पाते।

बात की शुरुआत कवि रहीम के दोहे से हुई थी उसका समापन भी उसी से कर रहे हैं। सब मिलाकर हालात में सुधार तो होगा पर एकदम पुराने अच्छे दिन या नीके दिन वापस लौटेंगे यह निश्चित रूप से नहीं कह सकते। पर वर्तमान त्रासदी से मानव जीव को पूरी विनम्रता के साथ यह स्वीकारना होगा कि जिन विश्व-प्रक्रियाओं ने जैविक विकास के तहत उसका विकास किया है वे उन्हीं प्रक्रियाओं से उसका विनाश करने में सक्षम हैं। बस इतना ध्यान तो रखना ही होगा कि मानव स्वयं उस विनाश का माध्यम न बने।

संदर्भ
[1] Dean Koontz, The Eyes of Darkness, Pocket Books, USA, 1981.  
[2] Gina Kolata, Flu, the Story of the Great Influenza Pandemic of 1918,
     Ferrar, Straus and Giroux, USA, 2011. 

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