कविता: कुसुम वीर

सन्नाटा 


उत्खलन, होता क्षरण,
निर्दय हृदय के घात से
सिसकती धरती यहाँ थी
कराह सुनता कौन है

स्तब्धता छाई चहुँ दिश
निःशब्द सा आकाश है
वेदना सृष्टि के उर की
मुखरित हुई क्यों आज है

है सशंकित, हृदय कम्पित
काल में क्या घट रहा है
वातावरण में जब उदासी
छा रही, मन क्लांत है

अनमना जगता सवेरा
सूरज किरण भी मौन है
लालिमा बिखरी उषा की
विकल लखता व्योम है

नीरव मलय निःसृत हुई
सरसराते पात हैं
चहचहाते पाखी पूछें
कोलाहल क्यों शान्त है

दिन में सन्नाटा है पसरा
सहमी हुई हर साँझ है
समय की है धार अद्भुत
शोर भी गुमसुम खड़ा है

सुर नहीं सजते कोई अब
रागिनी भी मौन है
ओढ़ कर सुमनों का आँचल
सुरभित चमन ख़ामोश है

नज़दीकियाँ छिटकी यहाँ
अब दूरियों का राज है
मुँह ढँक चले, अब सब यहाँ
एक अजब सा यह रोग है।
***


परिवर्तन


किरण सूर्य स्वर्णिम सी दिखती, निरख धरा विस्मित हो रहती
शाखों से लिपटें नव किसलय, शान्त पवन मलयित हो बहती
कोई झकोरा जब-तब आकर शाखों को सहला जाता है
मधुप मधुर गुँजन करता सुमनों से प्रणय जता जाता है।

गंगा-यमुना होती मैली, दूषित होता उसका पानी
बहती आज है निर्मल धारा, प्रदूषण मुक्त हुआ जग सारा
कलकल झरने हँसते बहते, पर्वत शिखर मुक्त मन रहते
आत्म विभोर मेघा हैं गरजें, दामिनी मुख मोहित हो दमके।

घर मुंडेर पर बैठी कोयल मीठी कूक सुना जाती है
वातावरण उदासी में वह, नया रंग भर जाती है
स्व गर्व और सामर्थ्य के दम पर आत्म बल से जीतें जंग
हर ग़म को आज भुला दें फ़िर, चलो कुछ गुनगुनाएँ  हम।

आपदा जब भी आती है, अपना रूप दिखाती है
संघर्षों से जीतें कैसे, पथ में बढ़ना सिखलाती है
बेशक होता है ह्रास बहुत रोजी-रोटी के उपक्रम का
हर रात के बाद सुबह होगी, यह सोच के मन मुदित उसका। 

परिवर्तन जग का मूल मंत्र है, उसकी सत्ता का यही तंत्र है
द्वंद्वमयी है सृष्टि सारी, दिवस- रात्रि का सतत चक्र है
मैंने 'मैं' को अब जाना, संयम, धैर्य को अपनाना
कण-कण में जिसका वास रहा, अपने भीतर भी वह माना।

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