मेहा गोदारा की लोकतात्विक दृष्टि

  डॉ रामस्वरूप


         हिंदी साहित्य का मध्यकालीन काव्य अपनी व्यापकता, मोहकता, गंभीरता और प्रभाव की दृष्टि से भारतीय काव्य मंजूषा का एक अद्भुत एवं अमूल्य रत्नाहार है। वस्तुतः मध्ययुगीन हिंदी भक्ति काव्य अनेक रूपों में प्राचीन परंपरा से जुड़ा हुआ है। यह मूलतः भारतीय संस्कृति का स्वाभाविक विकास है, हजारों वर्षों के प्राचीन भारतीय चिंतन का प्रतिफल है। इसे अधिक तीव्र और गतिशील बनाने में युगीन सामाजिक,राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक परिस्थितियों का बड़ा योगदान माना जाता है। 'आठवीं शताब्दी से प्रारंभ इस आंदोलन का न केवल धार्मिक अपितु सांस्कृतिक एवं सामाजिक महत्व है। भाषा और विचार दोनों दृष्टिओं से संपूर्ण धार्मिक आंदोलन लोकाभिमुख हो रहा था। सामाजिक दृष्टि से यह न्याय और समता का आंदोलन है।'1

हिंदी साहित्य के आदि से लेकर आधुनिक काल तक की रचनाओं का प्रतिपाद्य की दृष्टि से यदि सिंहावलोकन किया जाए तो, हमें यह स्वीकार करना होगा कि सर्वाधिक ग्रंथ विष्णु अवतार राम और कृष्ण के लौकिक चरित्र या उनकी लौकिक लीलाओं को आधार बनाकर सृजित किए गए हैं। हिंदी साहित्य का मध्ययुग विशेष रूप से चमत्कारों का युग था। उस युग में हताश मानव समुदाय को ईश्वरीय तत्वों की ओर अग्रसर करना आवश्यक था। जनता (जनसामान्य) को भक्ति में लीन करने या ईश्वर की ओर प्रेरित करने के लिए शास्त्रज्ञ, पंडित, विद्वान एवं संतकवि आदि भरसक प्रयत्न कर रहे थे। 'ईश्वर को प्रधानता देते हुए भक्त कवियों एवं संत कवियों ने भक्ति की जो अजस्र धारा प्रवाहित की उसमें अवगाहन कर मनुष्य आज भी अपने को धन्य मानता है।'2

 'धर्म का प्रवाह कर्म,ज्ञान और भक्ति इन तीनों धाराओं में चलता है। इन तीनों के सामंजस्य से धर्म अपनी पूर्ण सजीव दशा में रहता है।'3 उपर्युक्त तीनों तत्वों में सामंजस्य स्थापित करने हेतु संत कवियों का सर्वाधिक योगदान माना जाता है। संत कवियों द्वारा विरचित काव्य रचनाओं में ईश्वर के समस्त स्वरूपों के अंतर्गत अवतारवाद को सर्वाधिक महत्व मिला है। 'अवतारवाद को स्वीकार कर लेने के फलस्वरुप सगुण भक्ति को एक साकार आलंबन मिल जाता है, जिसके कारण उसे सामान्य अशिक्षित व्यक्ति भी सहज ही स्वीकार कर सकता है।'4 उस युग के संतकवि अपने आराध्य की स्मृति स्थाई रखने व सरल विश्वासी जन- सामान्य की आध्यात्मिक प्रगति का उद्घाटन करने के उद्देश्य से अनेक प्रकार की रोचक एवं प्रभावशाली कथाओं की रचना किया करते थे। इस प्रकार की लोक कथाओं की परंपरा हमारे देश में प्राचीन काल से चली आ रही है। रामायण और महाभारत प्राय: उसी परम्परा के   प्रमाण हैं। वस्तुतः प्राचीनों  के समक्ष जीवन के रहस्यों का उद्घाटन ही संतकवियों का चरम उद्देश्य था। रामायण को आदि महाकाव्य एवं इसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि आदिकवि माने जाते हैं। इस महाकाव्य में हिंदू धर्म एवं संस्कृति के परम् संरक्षक भगवान् श्री राम के संपूर्ण जीवन का वर्णन है। 'संसार के समूचे साहित्य में इस प्रकार का लोकप्रिय काव्य-जातीय ग्रंथ नहीं है। समूचा भारतवर्ष एक स्वर में इसे पवित्र-आदर्श काव्यग्रंथ मानता है और संपूर्ण भारतीय का आधा इस महाकाव्य के द्वारा अनु प्रमाणित है।'5 'इस लौकिक साहित्य रत्नग्रंथ में वाल्मीकि ने रामकथा का  मुख्यतः लोकवार्ता से संग्रह किया और काव्यत्व के लिए उपयुक्त  उसके अंशों को ग्रहण कर एक मार्मिक प्रबंध काव्य का सृजन कर दिया।'6 कहने का भाव यह है कि महर्षि वाल्मीकि ने इस रामायण को एक काव्य के रूप में निबंध किया था, उससे बहुत पूर्व ही यह रामकथा लोक में गाथा के रूप में लोक गायकों द्वारा गाई जाती थी। महर्षि वाल्मीकि ने इसे एक सुव्यवस्थित रूप देकर लोक में प्रस्तुत किया। 'लोक और साहित्य के मूल में एक ही तत्व है। लोक से अनुप्राणित होकर ही साहित्य समृद्धिशाली बनता है।'7 रामकथा काव्य लोक में अपनी सहस्त्रों वर्षों की यात्रा करते हुए मध्ययुगीन संतकवियों का भी आलंबन बना। मध्ययुगीन संत कवियों ने राम और कृष्ण को आधार बनाकर विपुल साहित्य सृजन किया। विभिन्न धर्म, संप्रदाय,पंथ-वर्ग आदि का इस युग में प्रवर्तन हुआ। इसी युग श्रृंखला में उत्तर भारत के राजस्थान प्रांत में गुरु जांभोजी द्वारा विश्नोई पंथ का प्रवर्तन  किया गया। उनकी शिष्य परंपरा में मेहोजी गोदारा नामक विश्नोई संतकवि हुए,जिन्होंने राजस्थानी लोक भाषा में रामकथा काव्य का प्रणयन किया। यह रचना लोग एवं समाज में मेहा रामायण के नाम से प्रसिद्ध एवं प्रचलित हुई। मेहा गोदारा का जन्म विक्रम संवत् 1540 में राजस्थान के बीकानेर जिले के भोजास गांव में हुआ था।'8 इनकी एकमात्र कृति है-रामायण। जिसकी रचना मेहा गोदारा ने अपनी 35 वर्ष की अवस्था में यानी संवत् 1575 में की थी।'9 मेहोजी गोदारा कृत रामायण राजस्थानी रामकथा विषयक प्रथम आख्यान काव्य है।'10 मेहा गोदारा अपने युग के सर्वाधिक प्रतिभा संपन्न साधक एवं प्रगतिशील विचारक थे। उन्होंने अपनी सृजनात्मक प्रतिभा के द्वारा लोक(जन सामान्य) में युगों से श्रुति परंपरा से चली आ रही रामकथा को लोक भाषा में छंदोबद्ध किया। रामकथा विषयक यह लोक साहित्य अभिजात्य संस्कारों से अलग,छंद शास्त्रीय नियमों की परिधि से परे, व्यष्टिगत अभिव्यक्ति को समष्टिगत अभिव्यक्ति में समाहित कर लोकमानसी वृत्तियों के संवाहक के रूप में सतत् लोक कंठों पर विराजमान रहा है। अपनी मौखिक परंपरा में होने के कारण इसमें निरंतर परिवर्तन परिवर्द्धन एवं निखार आता रहा है। वस्तुतः 'लोकसाहित्य जनता के भावों का उद्गार है, जो विभिन्न उत्सवों, त्योहारों एवं ऋतुओं के आगमन पर नैसर्गिक रूप में प्रस्फुटित होता है।'11 इसमें लोक संस्कृति, सभ्यता, दर्शन की अमिट छाप रहती है। लोक साहित्य भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता का वेद है। डॉ वासुदेव शरण अग्रवाल के शब्दों में 'लोक हमारे जीवन का महासमु द्र है। उसमें भूत, भविष्य, वर्तमान सभी कुछ संचित रहता है।'12'लोक साहित्य में लोक की आर्थिक नीति धार्मिक एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि प्रकट होती हैं।'
13 स्पष्ट है कि किसी भी राष्ट्र या राज्य की तत्कालीन लोक संस्कृति, लोक जीवन एवं मूल्य  मर्यादा का स्वाभाविक एवं यथार्थ रूप युगीन साहित्य में प्रमुखता से मुखरित होता है। मेहा रामायण पर भी यह बात सत्य साबित होती है।

        मेहा गोदारा कृत रामायण विक्रम की 16 वीं शताब्दी में रचित एक सफल एवं श्रेष्ठ आख्यान काव्य है।जिसकी कथा मूल रूप से वाल्मीकि रामायण पर यह आधारित है। इस प्रबंध काव्य में मेहा गोदारा ने राम के संपूर्ण जीवन चरित्र को सर्गों या खंडों में विभक्त नहीं करके एक प्रवाह क्रम में कथा को गति प्रदान की है। विश्नोई पंत की रामकथा विषयक प्रथम काव्य कृति है। इस पर पंथ प्रवर्तक गुरु जांभोजी की विचारधारा का प्रभाव पूर्ण रूप से दृष्टिगोचर होता है। यह रामायण 261 छंदों की रचना है, जो भुंवरो, सुबह, धनासी,  रामगिरी, हंसौ, मलार तथा जैतसरी आदि  देशी राग- रागिनियों में गेय हैं। 'राजस्थान में रचित साहित्य में रामकृष्ण आख्यान कवियों की लंबी परंपरा है । पंद्रहवीं शताब्दी से लेकर 20वीं शताब्दी तक इन काव्य की रचना बराबर होती रही है। मुक्तक रचनाएं भी बहुत बड़ी संख्या में उपलब्ध है। जीवन की विविध घटनाओं का वर्णन, मध्ययुगीन समाज के विभिन्न पक्षों का सुंदर निरूपण इन ग्रंथों में मिलता है।'14 मेहा रामायण में विवेचित  रामकथा ठीक वही राम कथा नहीं है, जो परंपरागत है।  मेहा गोदारा ने इसमें मध्यकालीनीकरण किया है। तत्कालीन समाज में परिव्याप्त  धार्मिक आदर्शों तथा अवधारणाओं, सांस्कृतिक चेतना, लोक- मूल्यमर्यादा,युगीन सामाजिक जीवन,भौगोलिक परिवेश, लोक मनोविज्ञान एवं जीवन पद्धति का चित्रण किया है। वेद शास्त्र से अनुप्राणित होते हुए इस कथा काव्य में शिष्ट संस्कृति को लोक मानस की सहज एवं स्वाभाविक पद्धति के रूप में वर्णित किया है। मेहा रामायण लोकमत प्रधान काव्य ग्रंथ है। जिसमें जन समुदाय की वृत्तियाँ, विश्वास, शकुन, आस्था, अभिव्यक्ति, रीति-रिवाज,त्योहार, लोक -कल्याणकारी कार्य आदि का सुंदर एवं सजीव चित्रण हुआ है। तत्कालीन सामाजिक जीवन की व्यापक दृष्टि अपनाई गई है। कथा के प्रधान नायक राम यहाँ केवल परब्रह्म के अवतार या राजा का जयेष्ट पुत्र ही नहीं है,अपितु उनके प्रत्येक कर्म में लोक - धर्म की अमिट छाप है। इस रामायण में मध्ययुगीन सामाजिक काव्यरसों,लोक- विश्वास एवं परंपराओं का सूत्रात्मक शैली में दिग्दर्शन मिलता है। स्त्री-चरित्र, मुहूर्त,शकुन-विचार,त्रिय- हठ, वचन-पालन,ब्राह्मण और गाय की रक्षा का धर्म,पशु हरण, सगाई- रिश्ता,दहेज,पूर्व जन्म के कर्म- फल में विश्वास,व्रत-उपवास, तीज-त्योहार आदि सामाजिक मान्यताओं एवं लोक परंपराओं का समावेश हुआ है। मेहा रामायण में वर्णित लोकमत, विश्वास,कला,कर्मण्यता, शोभायात्रा,मान - प्रतिष्ठा आदि सम-सामयिक एवं लौकिक है। विश्नोई संतकवि मेहा गोदारा की किसी लोकतात्विक दृष्टि का विश्लेषण प्रस्तुत आलेख में करने का एक स्तुत्य प्रयास है।

        हिंदी साहित्य के प्रबुद्ध साहित्यकारों के अनुसार- 'लोक मनुष्य समाज का वह वर्ग है,जो अभिजात्य संस्कार, शास्त्रीय और पांडित्य चेतना और अहंकार से शुन्य है और जो एक परंपरा  के प्रकार में जीवित रहता है।'15 डॉ हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार 'लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है, बल्कि नगरों और गांवों में फैली वह समूची जनता है जिसके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियां नहीं है।ये लोग नगर में परिष्कृत रूचि संपन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल तथा अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रूचि वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारता को जीवित रखने के लिए जो भी वस्तुएं आवश्यक होती हैं उनको उत्पन्न करते हैं।'16 डॉ श्याम परमार के अनुसार - लोक साधारण जन- समाज हैं, जिसमें भू-भाग में फैले हुए समस्त प्रकार के मानव सम्मिलित हैं। यह शब्द वर्ग-भेद रहित व्यापक एवं प्राचीन परंपराओं, समाज में नागरिक एवं ग्रामीण दो भिन्न संस्कृतियों के कल्याणमय विवेचन का द्योतक है।'17 डॉ एस डी चारण ने स्वाभाविकता, सहजोद्रेकता एवं सरलता को लोक साहित्य के प्रधान गुण बताते हुए कहा है कि इसके प्रत्येक शब्द में हृदयस्पर्शीणी अद्वितीय शक्ति है। विद्वानों के वैचारिक जाटिल्य से अनवगत भाव- जगत् का निवासी जन ही 'लोक' हैं।'18 लोक अनुभूत सत्य तथा ज्ञान का भंडार है। 'सामान्य जन में उच्छवसित भावनाओं और विचारों तथा प्रचलित रीति-रिवाजों और संस्कारों का उद्घाटन लोक तत्व का केंद्र बिंदु है।जनमानस के सहज नैसर्गिक जीवन की अभिव्यक्ति 'लोकतत्व' की विशेषता है। अतः यह केवल ग्राम्यता या मूढ़ विश्वासों का ही प्रतीक न होकर उन समस्त विधि विधानों का द्योतक हैं, जो शास्त्र सम्मत नहीं है।'19 मेहा गोदारा ने रामायण कथाकाव्य में वेद के साथ लोक का उचित प्रयोग किया है।संतकवि ने शास्त्रोक्त नियम एवं नीतियों के साथ लोक-प्रचलित मान्यताओं और परंपराओं को विशेष महत्व दिया है। वे न केवल अतीत से ही बंधे हुए थे,अपितु वर्तमान के प्रति भी यथेष्ट सचेत है। मेहा गोदारा की लोकतात्विक दृष्टि का विशद् विवेचन-विश्लेषण उनकी एकमात्र काव्य कृति रामायण में मिलता है। इस दृष्टि का परिचय उनके कवि कथ्य और शिल्प तथा शैली और भाषा में समान रूप से मिलता है। मध्य युग में वही व्यक्ति बड़ा संतकवि या लोकचेता बना है, जिन्होंने लोक भाषा (जन सामान्य की भाषा) में समाज को मानवता की राह प्रशस्त करते हुए, मानवीय मूल्यों को प्रतिस्थापित किया। भाषा के प्रति व्यापक और उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए लोकमंगल की भावना से प्रेरित काव्य रचना- रामायण ही संतकवि की लोक हितैषणाका प्रमाण है। राजस्थानी की  विभिन्न बोलियों के साथ अरबी,फारसी जैसी विदेशी भाषा व संस्कृत,अपभ्रंश,डिगल आदि के शब्दों का समावेश उनकी प्रगतिशीलता का परिचायक है। उनकी भाषा तत्कालीन मरुस्थल के लोक अर्थात जन सामान्य की प्रतिनिधि भाषा है।उन्होंने जिस समाज को अपना संदेश दिया,उस जन-सामान्य की सरल-सुबोध एवं लोक प्रचलित शब्दावली को काव्य में स्थान दिया, तभी यह रचना जन-जन का कंठहार बनकर लोग एवं समाज की आदर्श बनी।उन्होंने रामायण की रचना जन-भाषा में की,जिससे यह रचना जनता के लिए सुगम बनी। मेहा गोदारा ने शिल्प- विधान एवं काव्य रूप के रूप में शास्त्र सम्मत और लोक प्रचलित पद्धति का समन्वय किया है। उनके काव्य का नायक राम है,जो सगुण-निर्गुण से परे लोक के रक्षक एवं मंगलकर्ता है।उनके राम परब्रह्म, परमेश्वर होते हुए भी लोक सामान्य की पीड़ाओं से अभिभूत हैं। राजस्थानी लोक परिवेश के अनुसार राम,लक्ष्मण और सीता के द्वारा लोक कल्याणार्थ किए गए कार्यों के विषय में कवि का कथन है कि-

राम खंणावै रांमसर,लछमण बांधे पाल्य।
सिरि सोनै रो बेवडौ  सीतलदे पण्यहारि।।20

  राम वन में तालाब खुदबातें हैं, लक्ष्मण उसकी पाल बांधते हैं तथा सीता सिर पर बेहडो (दो स्वर्ण कलश) लेकर पानी भरने जाती है।संतकवि ने इसके माध्यम से मरूप्रदेश में जलाभाव की सार्थकता के संदर्भ में राम, लक्ष्मण और सीता के द्वारा लोक कल्याणकारी कार्यों के माध्यम से कर्मण्यता एवं श्रमशीलता की ओर संकेत किया है। कवि ने हनुमान के माध्यम से जनता में पराक्रम,कर्मठता ,कर्तव्यपरायणता,यश, पुरुषार्थ, चतुरता और बुद्धिमता जैसे मानवीय गुणों की ओर संकेत किया।मानव मात्र में एकता, समानता और बंधुत्व का भाव स्थापित करते हुए संतकवि ने संकट के समय पिता एवं भाई को इस प्रकार याद किया है-

 दशरथ हुवै तो जांणजै, कै भरथि भाजै  भीड़।
 अजोध्या अळगी रही, अब कुंण पैसे पीड़।।21

     एक आदर्श पति अपनी पत्नी के वियोग में एक नानागुण संपन्न नारी रत्न के प्रति इस प्रकार विलाप भी करते हैं-

'निबोलडी चूसियां क्यौ वीसरै दाख,
चंदण क्यौ वीसरै घट मळी राख।
कांबळ औढ्या क्यौं वीसरै चीर,
सीता क्यौ वीसरै लाखणां वीर।'
22
   -जैसे नीम की निंबोलिओं को चूसने से दाख, शरीर पर राख का लेप करने से चंदन और कंबल ओढ़ने से रेशमी वस्त्र नहीं भुलाया जा सकता है, वैसे ही हे!भाई लक्ष्मण सीता को कैसे भुलाया जा सकता है? यह प्रसंग मध्ययुगीन स्त्री के प्रति आदर सम्मान का द्योतक है।

     जैसा कि इस आलेख के मध्य में कहा जा चुका है कि मेहा गोदारा ने रीति-रिवाजों,विवाह आदि संस्कारों, सामाजिक- पारिवारिक प्रथाओं एवं लोक मान्यताओं को भी मान्यता प्रदान की है। मेहा रामायण में इससे संबंधित कुछ पद द्रष्ट्व्य है।

राम सीता का पाणिग्रहण संस्कार संबंधी पद-
सोवन कळस रचावियो,मांडो  मोती चाव।
सीता परणी रामचंद्र, जानी  लाखण राव।
सातूं  सायर दायजो, लाखे कियौ  प्रसाव।
आणंद मंगल गाव्यजै, वाजै विरध बवाल।।23

   कवि ने शकुन-अपशकुन जैसी लोक रूढी  की ओर भी संकेत किया है-

अह डावौ खर दांहिवौ, सांम्हौ पुषळे सुंनार।
आप ठगांवा  बांह ठगां, कहि  भोजला विचार।।24

 रास्ते में साँप बायाँ गधा दायाँ और सुनार सामने आता हुआ मिलने पर सभी अपशकुन माने जाते हैं। काव्य में वर्णित लौकिक रूढ़ियों और इन अंधविश्वासों का प्रस्तुतीकरण मेहा गोदारा को लोककवि के धरातल पर प्रतिष्ठित करता है।

      भारत एक कृषि प्रधान देश है। राष्ट्र की अधिकांश जनता की आजीविका कृषि पर आधारित है। मेहा गोदारा ने रामायण में पात्रों के आचार-विचार, क्रिया-कलाप तथा खेत -खलिहानों  को लोक-कहावतों एवं उपमानों के द्वारा इस प्रकार चित्रित किया है-

"सोवन लंका खल्टळो कर गाहो" सोने की लंका को खलिहान की तरह गहा देना तथा सीता के माध्यम से किसान के द्वारा अपनी कंबल बूटै पर रखने का लौकिकरण  किया है-"बूटै  ऊपरि कांबळी, जे कोई लियै उठाय।"।26

  खेत की बुवाई, गुड़ाई, निराई, सिंचाई तथा हरिणों द्वारा खेतचर  जाने की चर्चा का निरूपण इस प्रकार हुआ है-

'दांमणौ मरवो बाहियौ बारि।
सेहळऊं साळऊ करूं बणराय।
सोवनों मिरघलो चरि-चरि जाय।'27
'चंपौ मरवौ केवडौ,सींचे छै वणराय ।।'28

   कवि ने इन पदों के माध्यम से रामकथा का ग्राम्यीकरण किया है। मेहा रामायण के अनुसार राम और सीता दोनों ही वस्तुत: विष्णु व लक्ष्मी के अवतार हैं, सीता स्वयं लक्ष्मी- स्वरूपा और महासती है। धर्म, नीति और न्याय की प्रतिमूर्ति रामराज्य के लोक कल्याणकारी आदर्श के प्रतिष्ठापक  मानते हुए कवि ने वैदिक-लौकिक सामंजस्य किया है । पाबासर थी तीजणी,जळ जोगणी, मानसरोवर हंस, मंडप- मैडी, रावळो बाग, देवी मठ, हीरै  हीरो बांध्यो, धरती ऊपर आभतळ,आडा डूंगर  विंझ वन, गहरी सुण जै गाज जैसे साहित्यिक शैली-सूचक लौकिक शब्दों का प्रयोग कवि के लोक के प्रति गंभीर ज्ञान का परिचायक है।  इस कृति में लोक- विषयक नीति कथनों का समावेश भी हुआ है, जो लोग तत्व को  मुखरित करता है, वे इस प्रकार है-

काज पराया सीळवां,ज्यां दुखै ज्यां पीड़।
कहो पराई जे सुणै, ज्यां सिर नांही कांन।
थूक्या पाछै कुण गिलै।
पोह बिन पूरी नंह पड़ै,पग बिन पंथ न होय।
राजगह बाळगह  तयो न मेटयो जाय ।। (मेहा रामायण से उद्धृत)

    मेहा रामायण मूलतः एक संवाद प्रधान काव्य रचना है। इसमें निहित नीतियां वर्तमान में भी जन सामान्य की आचार- संहिता है। रामायण में दशरथ- कैकेयी,सीता-भोज, सीता-लक्ष्मण, राम -लक्ष्मण, अंगद-हनुमान, हनुमान-सीता, रावण-हनुमान, मंदोदरी-सीता आदि संवादों के माध्यम से कवि ने जो संदेश दिया है, वह सार्वकालिक एवं सार्वजनिक है। इसके अलावा मेहा रामायण में लोक मर्यादा, शालीनता, संयुक्त परिवार की तत्कालीन लोक संस्कृति व विशेषता ग्रामीण संस्कृति के जो सांस्कृतिक चित्र उकेरे हैं वह आज भी किसी न किसी रूप में लोक-प्रचलित है। कवि ने रचना के अंत में जीवन को समग्रता के साथ पूर्ण औदात्य  एवं उत्कर्ष प्रदान करने के निमित्त इस रचना को  अड़सठ तीर्थों का पुण्य प्रदान करने वाली मेहनीय कृति बताया है। इसके श्रुतिफल को लोकार्पित करते हुए कवि कहते हैं-

 'अड़सठ तीरथ जो पुनं न्हाया, सुणौ रांमायणं कांनै।
 पढ़िया नै मेहो समझावै, धापो धरम धियानै।।'29

संदर्भ ग्रंथ सूची
1. तुलसीदास - (संपा.) डॉ. वासुदेव सिंह, पृष्ठ-173, अभिव्यक्ति प्रकाशन, इलाहाबाद संवत् -2010
2. रामसनेही संत स्वामी देवदास कृतित्व एवं व्यक्तित्व -डॉ. शैलेंद्र स्वामी,जूना रामद्वारा चांदपोल, जोधपुर, संस्करण- 2007, पृष्ठ-174
3. हिंदी साहित्य का इतिहास- आचार्य रामचंद्र शुक्ल, प्रकरण-1, पृष्ठ -139, यूनिक ट्रेडर्स, जयपुर
4. हिंदी साहित्य का इतिहास- (संपा.) डॉ. नगेंद्र, डॉ. हरदयाल, मयूर पेपरबैक्स ,नोएडा -2016, पृष्ठ -107
5. हिंदी साहित्य की भूमिका- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ- 163,
6. पौराणिक आख्यान का विकासात्मक अध्ययन- डॉ. उमापति राय चंदेल, कोणार्क प्रकाशन-1975, पृष्ठ -48
7. रामायण आख्यान-डॉ. धर्मेंद्र नाथ शास्त्री, परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली 1996, पृष्ठ -01
8. जांभोजी, विष्णोई संप्रदाय साहित्य-डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, भाग-2, पृष्ठ-19,कलकता-1970
9. मेहोजी कृत रामायण (संपादक) डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृष्ठ -15,सत् साहित्य प्रकाशन, कलकत्ता,प्रथम संस्करण-1984
10. राजस्थानी काव्य में रामकथा- डॉ. मदन सैनी,कथाराज प्रकाशन,श्री डूंगरगढ़, पृष्ठ- 161
11. हिंदी लोक साहित्य में हास्य और व्यंग्य -डॉ. बैरिस्टरसिंह  यादव, पृष्ठ- 04
12. राजस्थानी लोक साहित्य- नानूराम संस्कर्ता, पृष्ठ -19
13.राजस्थानी लोक साहित्य अध्ययन के आयाम- डॉ रामप्रसाद दाधीच,पृष्ठ- 06
14. राजस्थानी आख्यान काव्य परंपरा और जांभाणी साहित्य   डॉ.रामस्वरूप (अप्रकाशित शोध आलेख)
15. लोक साहित्य विज्ञान -डॉ. सत्येंद्र, पृष्ठ -30
16. जनपद- डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, वर्ष- 1,अंक- 1, पृष्ठ-65 17. भारतीय लोक साहित्य-डॉ. श्याम परमार, पृष्ठ-10
18. राजस्थानी लोक साहित्य का सैद्धांतिक विवेचन- डॉ. एस डी चारण, पृष्ठ-7
19. तुलसीदास-(संपा) डॉ. वासुदेव सिंह, पृष्ठ 7
20. मेहोजी कृत रामायण- पद संख्या- 62
21. उपरिवत, पद संख्या- 209
22.  उपरिवत, पद संख्या -109
23. उपरिवत, पद संख्या-31-32
24. उपरिवत, पद संख्या- 49
25. उपरिवत, पद संख्या- 259
26.उपरिवत, पद संख्या-42
27. उपरिवत, पद संख्या-71
28. उपरिवत, पद संख्या- 64
29. उपरिवत, पद संख्या-261


संपर्क: ग्राम पोस्ट-जैसला,तहसील-बाप, जिला-जोधपुर, राज.342311 दूरभाष-97820 05752

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