परिहास: मथुरादास जी अमरोहा वाले

जीतेन्द्र भटनागर

- जीतेन्द्र भटनागर

एक मुद्दत से आरज़ू थी फुर्सत की,
मिली तो इस शर्त से कि किसी से ना मिलो।
शहरों का वीरां होना कुछ यूँ ग़ज़ब कर गई,
बरसों से पड़े गुमसुम घरों को आबाद कर गई,
ये कैसा समय आया कि दूरियाँ ही दवा बन गईं।
ज़िन्दगी में पहली बार ऐसा वक्त आया,
इंसा ने जिंदा रहने के लिए कमाना छोड़ दिया।
घर गुलज़ार, सूने शहर, बस्ती-बस्ती में क़ैद हर हस्ती हो गई,
आज फिर ज़िन्दगी महंगी और दौलत सस्ती हो गई।
(अनुपम खेर)

  आज के ज़माने में जो महत्व कम्प्यूटर का है हमारी जवानी के दिनों में वो टाईपराइटर को हासिल था। हमारी तमन्ना थी टाइपिंग सीख कर कचहरी में टाइप बाबू बनने की। सुना था कचहरी में टाइप बाबू की अच्छी आमदनी हो जाती है। पर मिडल लाइन सीखने में ही हमने जवानी गँवा दी और टाइप बाबू बनने का सपना, सपना ही रह गया।
अब टाईपराइटर की जगह ले ली है कम्प्यूटर ने और बच्चे कम्प्यूटर का सिर्फ ‘की बोर्ड’ चलाना ही नहीं सीखते बल्कि कम्प्यूटर में महारत हासिल करके - क्या कहते हैं वो, देखो याद आया, आईटी, हाँ - आईटी कम्पनियों में ऊँची तनख्वाह पर काम करते हैं। दुनिया भर में डिमांड होने से काफी बच्चे विदेश चले जाते हैं और जो नहीं जा पाते वो नोएडा और बेंगळूरु जैसी जगहों में कम्प्यूटर पीटते रह जाते हैं। पीछे रह जाते हैं बेचारे माँ-बाप। इन बेचारे माँ-बापों में से एक हम भी हैं। हमारी कॉलोनी हम जैसे लोगों से ही आबाद है। सभी सीनियर सिटिज़न हैं जो बिना नागा, कभी-कभी सुबह लेकिन शाम को हमेशा, कॉलोनी के पार्क में पुलिया के इर्दगिर्द मिलते हैं और फुर्सत से गपशप करते हैं।
लॉकडाउन के चलते कालोनी के नागरिकों ने एक दूसरे के यहाँ आना-जाना, मिलना-जुलना बंद किया हुआ है पर हमारे पड़ोस में जो डॉक्टर साहब रहते हैं उन्होंने तो जैसे घर के बाहर कदम ना रखने की कसम खाई हुई है। तीन महीने होने को आए डॉक्टर साहब की शक्ल देखे। बस, फोन पर बात हो जाती है।
‘फुर्सत मिली तो इस शर्त से कि किसी से ना मिलो।‘
क्या खूब कहा खेर साहब!
पिछले हफ्ते हमारे शरीर पर कुछ लाल-लाल निशान हो गए थे। हम तो जानते थे कि कोई खास बात नहीं है, लेकिन श्रीमती जी घबरा गईं। बोलीं, “डॉक्टर की राय ले लो। क्या पता क्या है। आजकल कोरोना बहुत फैल रहा है।“
बहुत आनाकानी की हमने, टालने की कोशिश की पर एक ना चली। हथियार डालने पड़े। लिहाज़ा चल पड़े हम डॉक्टर साहब के घर की ओर। घंटी बजाने के दो मिनट बाद अंदर से आवाज़ आई, “छ: कदम पीछे हट जाएँ तो दरवाज़ा खोलेंगे।“ अजीब लगा, पर हमने तामील की। लकड़ी का दरवाज़ा खुला। जाली के तीन कदम पीछे से डॉक्टर साहब बोले, “कैसे आना हुआ?” शायद हमारी नक़ाब के कारण पहचान नहीं पाए वो हमें।
“डॉक्टर साहब, हम शंकर आपके पड़ोसी।“ हमने जवाब दिया।
“जानते हैं। पहचान लिया हमने आपको। कहिए, कैसे आना हुआ?”
धक्का लगा दिल पर। ना पड़ोस का ख्याल ना दोस्ती का। बात भी दूर से।
“जी, सीने पर कुछ लाल से निशान हो गए हैं। सोचा दिखा दें आपको।“
“आप ऐसा करें कि घर जाकर निशानों की तस्वीर हमें व्हाट्सऐप करके फोन पर बात करें। दवाई के नाम हम व्हाट्सएप कर देंगे।“
‘… दूरियाँ ही दवा बन गईं।‘
वल्लाह, क्या बात है खेर साहब! आपके फन के मुरीद तो हम शुरू से थे। आज शायरी के भी हो गए।
अपना सा मुँह लेकर घर वापस आए। मन में खटास आनी थी सो आई लेकिन दवा उनकी काम कर गई। बड़ा सकून महसूस किया हमने। श्रीमती जी को जो सुकून मिल गया था कि कोरोना नहीं है। हम तो पहले ही जानते थे।
लॉकडाउन में ढील मिल गई लेकिन सीनियर सिटिज़नों को अभी भी घर में रहने की सलाह थी सरकार की तरफ से। पर घर में कोई कितना बंद रहे? यूँ भी सुबह शाम सैर करने की आदत है हमें। सच पूछें तो सैर सिर्फ बहाना है। असली वजह है पुलिया पर होने वाली गपशप। वैसे भी इतने दिन केवल श्रीमती जी के साथ रहते-रहते, बात अपने तक ही रखिएगा, खासे बोर हो गए थे हम। लिहाज़ा जैसे ही मौका मिला, श्रीमती जी की आँख बचा निकल लिए हम एक दिन शाम को।
कम लोग होते हैं हमारी तरह ऐडवेन्चरस। इक्के-दुक्के पहचान वाले दिखे पर सभी दूरियों को दवा मानते हुए हमसे दूर रहे। कोफ्त हुई पर कर क्या सकते थे। वापस लौटने को थे कि किसी ने पीछे से नारा लगाया, ‘जय राम जी की’। पलटे तो देखा एक बुज़ुर्गवार चले आ रहे थे खुरामा-खुरामा। हाथ हिला कर हमने उनका नारा स्वीकार करते हुए अभिनन्दन किया। लगे हाथों जाएचा लेने का काम भी निबटाया। वाह, क्या हुलिया था! रंग इतना गोरा कि क्या अंग्रेज़ों का होगा। खाकी निक्कर, जिसके ऊपर सफेद कमीज, पैरों में कपड़े के सफेद जूते जो स्कूल के दिनों में हम शनिवार को पीटी के लिए पहनते थे। सफेद घने बालों से लटकती चाणक्य स्टाइल में गाँठ लगी लम्बी चोटी और, नक़ाब की गैरहाज़री में, चेहरे से झलकता हिन्दुत्व गवाही दे रहा था कि इस आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी का सम्बन्ध शाखा से अवश्य होगा। पास आकर उन्होंने तपाक से अपना दाहिना हाथ पेश किया। हाथ मिलाना! इस महामारी के टाइम में! राम का नाम लो, जो हम दोनों पहले ही ले चुके थे। घबरा कर दोनों हाथ जेबों के हवाले किए। मुस्कुरा कर अपना परिचय देते हुए वह बोले, “ठीक है भई, मत मिलाइए हाथ। हम मथुरादास, ए-18 वाले रामनाथ कपूर के ससुर। आपका इस्मेशरीफ, खाँ साहब?” “जी, मैं शंकर, यहीं ए-39 में रहता हूँ।“
“ओहो, माफ कीजिएगा। दरअसल आपकी दाढ़ी की वजह से गलतफहमी हो गई।“ कहा उन्होंने दाढ़ी था लेकिन सिर की तरफ इशारा करती तर्जनी बता रही थी कि हमारी चिकनी चाँद भी इस गलतफहमी के लिए बराबरी की जिम्मेदार थी। “बुरा तो नहीं माना आपने?”
हमने बुरा नहीं माना, इस बात का यकीन दिलाते-दिलाते पुलिया आ गई जिस पर पेंदी टिकाते हुए मथुरादास जी ने हमें भी बैठने का इशारा किया। सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल करते हुए हम भी पुलिया के दूसरे सिरे पर टिक गए।
“अपने बेटे के पास अमरीका जाने के लिए आए थे। पर कमबख्त लॉकडाउन की वजह से यहाँ बेटी के घर में फँसे रह गए। अब लॉकडाउन हटे तो जा सके तो अमरीका चले जाएंगे नहीं तो वापस अमरोहा।“ कितनी किफायत से अपने बारे में इतना कुछ बता गए वो। मन ही मन उनके चरण स्पर्श किए और बोले, “हम तो यहीं रहते हैं, ए-39 में।“
“हाँ, वो तो आप बता चुके हैं। अकेले रहते हैं?” मथुरादास जी ने जानना चाहा।
“ऐसी किस्मत कहाँ? श्रीमती जी के साथ रहना पड़ता है।“
“अच्छा मज़ाक कर लेते हैं आप”, मथुरादास जी मुसकुराते हुए बोले। “पर हमारा ये मतलब नहीं था। आपके बच्चे ...”
“जी, बाहर हैं।“ वाक्य पूरा होने से पहले ही हमने जवाब दे दिया।
“हमारे बेटों की तरह। अमरीका में होंगे?” अगला सवाल, और उत्तर का इंतज़ार किए बिना मथुरादास जी ने हम से ऐसे पूछताछ शुरू की जैसे वो थानेदार हों और हम मुजरिम। हमसे लेकर हमारे पड़दादा जी तक की जन्मपत्री टटोल ली उन्होंने। उसके बाद हमने हाथ खड़े कर दिए। हमें खुद ही पता नहीं था। कहीं पढ़ा था कि आक्रमण आत्मरक्षा का सर्वोत्तम उपाय है। सोचा आज इसे भी आजमा के देख लें।
“तो अमरोहा में रहते हैं आप? काफी टाइम से रह रहे होंगे। वाकफियत भी खूब होगी।“ हमने जवाबी हमला किया।
“शायद ही कोई शरीफ आदमी होगा पूरे अमरोहा में जिसे हम ना जानते हों।“ सीने का घेरा पहले ही छप्पन इंच का था इसलिए वो तो और नहीं बढ़ पाया लेकिन चेहरा उनका गर्व से पके टमाटर जैसा ज़रूर हो गया। “और जानेंगे क्यों नहीं। सारी ज़िंदगी अमरोहा में बिताई है। हम तो शंकर बाबू, जहां कुछ दिन रह लेते हैं, सबसे दोस्ती कर लेते हैं। यहाँ तो हम...“
आश्चर्य से हमारी आँखें फैल गईं। नहीं, नहीं ऐसा नहीं हो सकता। लॉकडाउन अभी पूरी तरह उठा नहीं है। हाल ही तो घर से बाहर निकलने की इज़ाजत मिली है। किस तरह हुई होगी इनकी दोस्ती यहाँ के बाशिंदों से?
“… किसी से मिल नहीं पाए हैं अभी तक वरना सबका शजरा हमारे पास होता।“ कहते-कहते वो हमारे पास खिसक आए। हम उठ कर खड़े हुए और चार कदम, लंबे वाले, लेकर पीछे हट गए। इस तरफ ध्यान ना देते हुए मथुरादास जी फुसफुसाने वाले अंदाज में बोले, “भई, अब आपसे क्या छुपाना। हम पुराने ख्यालात के हैं। सबसे मिलते-जुलते हैं सबका ध्यान रखते हैं। सबके दुख-सुख में शामिल होना अपना फ़र्ज़ मानते हैं। इलाके में क्या हो रहा है, किसकी किसके साथ दुश्मनी है, किन लड़के-लड़कियों में क्या चल रहा है, किन मियाँ-बीवी की बनती नहीं है, किस घर में कौन आता-जाता है, कहाँ क्या पक रहा है, किसने क्या नया खरीदा सब खबर होती है हमें। वैसे भी, बुज़ुर्ग होने के नाते सलाह लेने सब हमारे पास ही आते हैं। वक्ते-ज़रूरत सबके काम भी हम ही आते हैं।“
रश्क हुआ हमें। हमसे कोई सलाह नहीं लेता जबकि उम्र में हम मथुरादास जी से इक्कीस ही थे।
“क्या खूब, मथुरादास जी। आप जैसे लोग अब कहाँ मिलते हैं! इतने दिनों से आप वहाँ नहीं हैं। कैसे जी रहे होंगे बेचारे?“ मुँह से हमने कहा। मन में सोचा ‘जश्न मना रहे होंगे’।
“सो तो है”, मथुरादास जी ने मुस्कुरा कर प्रशंसापत्र ग्रहण किया और बोले, “हमारे एक अज़ीज़ हैं गुप्ता जी। उनके बेटा-बहू-बच्चे आए हुए थे अमरीका से। हमारा भी एक बेटा अमरीका में है। सो मिलने चले गए कि शायद जानते हों। बड़े अदब से मिला। कई घंटे खासी गप-शप रही। बहुत अच्छा लगा हमें। अब हम अक्सर शाम को वहीं चले जाते, गपशप, चाय-वाय के बाद ही घर लौटते। कुछ दिनों बाद क्या हुआ कि बेटा जी कुछ देर बैठते फिर अंदर जा कर चले जाते। बाद में गुप्ता जी अकेले ही मिलने लगे। उनका बेटा किसी ना किसी काम में होता या दोस्तों से मिलने गया होता। ठीक भी है भई, कई साल बाद आया था ना।
“शंकर बाबू हैरानी की बात है कि अमरीका रह कर हिंदुस्तानियों का हाजमा खराब हो जाता है। उन्हें यहाँ का पानी भी रास नहीं आता। जबकि यही पानी पी के बड़े हुए थे। अब ये पानी पानी नहीं रहा, ज़हर हो गया! खैर, कुछ दिनों में बेटे जी बीमार पड़ गए। उनको देखने जाना फ़र्ज़ था हमारा सो हम गए। हमें देखते ही उन्होंने आँखें मूँद लीं। तबीयत ज्यादा खराब मालूम पड़ती थी। अच्छा खासा देसी इलाज कर लेते हैं हम। गुप्ता जी को भी कुछ नुस्खे बता आए। पता नहीं उनके अमरीका-पलट बेटे ने हमारी सलाह मानी या नहीं। नहीं मानी होगी तभी तो दो-तीन दिन में उसका बुखार बहुत बढ़ गया। एक गजब का नुस्खा जानते हैं हम जो बुखार यूँ चुटकियों में उतार देता है। तेज बुखार था बेटा जी को। हम पहुंचे तो लाल-लाल आँखों से घूरते हुए बड़बड़ाने लगा, ‘ये बुड्ढा यहाँ क्यों आया है? मेरा दम घुटने लगा है। हटाओ इसे यहाँ से।‘ हमने चारों तरफ देखा। फिर बोले, ‘बुड्ढा, कौन बुड्ढा? बेटा यहाँ तो कोई बुड्ढा नहीं दिख रहा।‘ उसने हाथ पैर पटकने शुरू कर दिए। दोनों हाथों से सिर पकड़ लिया। ग़नीमत है बाल नोचने शुरू नहीं किए। पर बड़बड़ाना जारी रहा, ‘मुझे बचा लो। इस खूसट बुड्ढे को भगाओ यहाँ से।‘ शंकर बाबू, सरसाम में अक्सर ऐसा होता है। वो चीज़ें दिखने लगती हैं जो वहाँ नहीं होतीं। बेटे को अस्पताल ले जाने का मशवरा देकर हम घर आ गए।
“बाद में पता क्या होता है? बेटा घर नहीं लौटा ...”
“अरे! क्या वाकई? हमें लगा ...”
“और नहीं तो क्या।“ मथुरादास जी नाक सिकोड़ कर बोले। कुछ दिनों में बहू-बच्चों का दिखना भी बंद हो गया। गुप्ता जी भी कम दिखने लगे। कभी दिखे भी तो कन्नी काट कर निकल जाते। एक दिन हमने पकड़ ही लिया उन्हें तो उन्होंने बताया कि वो सब अमरीका वापस चले गए। बेटा जी ने घर आने की जहमत उठाने की बजाए बीवी-बच्चों को अस्पताल बुलाया और वहीं से निकल गए। क्या ज़माना आ गया है।” कहते हुए कानों को हाथ लगाया मथुरादास जी ने।
सही वक्त पर जेब में पड़े मोबाईल की घंटी बजी। “कहाँ ग़ायब हो तुम। कितनी बार कहा है कोरोना फैल रहा है। घर से बाहर मत निकलो। पर कोई सुने तब ना।”
गुप्ता जी के अमरीका-पलट बेटे की अक्ल और श्रीमती जी की टाइमिंग की दाद देते हुए थके कदमों से, उस मेमने कि तरह शेरनी की मांद का रुख किया।

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