कहानी: होनहार - आचार्य नीरज शास्त्री

आचार्य नीरज शास्त्री
गर्मी का मौसम, उसमें भी अगस्त का महीना, उमस के कारण पसीने का रह रहकर रिसना; कितना विचित्र लगता है यह सब। इस स्थिति से निजात पाने के लिए मैं छत पर आ बैठा। आधी रात बीत चुकी थी। नींद आने का नाम ही नहीं ले रही थी।
          रात्रि 11:00 बजे एक विचार गोष्ठी से लौटा था, तब से भरसक प्रयत्न करने पर भी सो नहीं सका। आकाश की तरफ मेरी दृष्टि टिक गई। झिलमिलाते तारे दिखाई दिए। एक प्रश्न मन में आया कि क्या सघन अंधकार इन चमकीले सितारों का शत्रु है?  मेरी चेतना ने कहा, "नहीं, सघन अंधकार ही सितारों के चमकने के लिए उपयुक्त होता है। अंधकार के अभाव में सितारों की चमक का एहसास नहीं होता। ठीक इसी तरह होनहार व्यक्तित्व विरोधी परिस्थितियों में ही अपने होने का एहसास कराते हैं।"
        मैं एकाकी चिंतन में लीन था। तभी एक चिर परिचित आवाज ने मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। मैं विद्युत गति से उठा। मेरे पैर आवाज की दिशा में चल पड़े ।गौख से झांक कर देखा, आचार्य विवेक थे। मैं नीचे उतरा और दरवाजा खोला। आचार्य विवेक अंदर आए। वे कांपते हुए होठों से बोले, "विनय जी! अनर्थ हो गया।"
मैंने पूछा, "क्या हुआ विवेक जी!" वे सिसकते हुए बोले, "अमरजीत नहीं रहा!"
 सुनकर मैं अवाक रह गया।
 मेरा हृदय इस सत्य को स्वीकार नहीं कर पा रहा था। मैं उन दिनों की यादों में खो गया जब वह दसवीं कक्षा का छात्र था। मैं ही उसकी कक्षा का अध्यापक था।
        अमरजीत शांत स्वभाव का गंभीर बच्चा था। उसे देख कर मुझे लगता था कि कोई दर्द उसने अपने सीने में दफन कर रखा है। धीरे-धीरे मैंने उसके हृदय में छिपे राज को जानने की कोशिश की। वह बोला, "पिताजी नहीं है ।मां कहती हैं कि मुझे उनका नाम रोशन करना है। दादी गाली-गलौज करती हैं। वे कहती हैं कि मुझे काम-धाम करना चाहिए, पढ़ाई नहीं। मैंने उसे समझाया, "बेटा! तुम मन लगाकर पढ़ो, एक दिन माँ और पिताजी का नाम अवश्य रोशन करोगे। "
       उस दिन से वह अपने दुख-सुख की बातें मुझे बताने लगा। मैंने भी उसका उचित मार्गदर्शन किया। दसवीं कक्षा में पास होने के बाद अमरजीत ने पढ़ाई छोड़ दी। बहुत दिन बाद एक बार मुलाकात हुई। बड़ा खुश था, वह। मुझे देखकर दौड़ते हुए आया और मेरे  पैर छू लिए। मैंने पूछा, "अमरजीत कैसे हो बेटा! इतने दिन बाद मिले हो।"
 वह चहकता हुआ बोला, "सर! मुझे फायर ब्रिगेड में नौकरी मिल गई है। आपके आशीर्वाद से एक दिन जरूर  मैं माँ और पिताजी का नाम रोशन करूंगा।
मैंने कहा, "होनहार हो तुम! एक दिन जरूर तुम्हारा सपना साकार होगा।"
 तब से फिर वह नहीं मिला। यह सोचते हुए मेरी आंखें नम हो गई। मुझे भी याद आने लगे वे दिन जब भाषण, वाद-विवाद एवं निबंध प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर वह मेरा गौरव बढ़ा रहा था। सही मायने में वह मेरी पहचान बन चुका था। मैं अतीत की उन सुखद स्मृतियों में खोया था। तभी अचानक आचार्य विवेक ने मेरे विचार प्रवाह को तोड़ा।
मैंने पूछा, "क्या हुआ उसे?"
विवेक जी बोले, "याद है! एक बार उसने कहा था कि यह धरती बलिदानों से ही पवित्र हुई है। इसलिए प्रत्येक देशवासी को देश पर बलिदान होने के लिए तत्पर रहना चाहिए।"
मैंने कहा, "हाँ, मुझे याद है।"
आचार्य विवेक बोले, "बलिदान हो गया वह! मुंबई में पोस्टिंग थी उसकी। आतंकवादी हमले में होटल ताज महल में लगी आग से एक छोटे बच्चे को बाहर निकालते समय आतंकवादियों की गोली का शिकार हो गया।"  यह सुनकर मेरी आँखों से आँसू झर-झर गिरने लगे। मैं सोचने लगा, "होनहार था अमरजीत! इसलिए अमर हो गया। काश! इस देश का प्रत्येक नागरिक अमरजीत की तरह ही होनहार होता।"

6 comments :

  1. मेरी मौलिक कहानी-'होनहार' के प्रकाशन हेतु प्रतिष्ठित पत्रिका 'सेतु मग' के संपादक मंडल को हार्दिक बधाई एवं कोटि-कोटि साधुवाद।
    आचार्य नीरज शास्त्री
    अध्यक्ष
    तुलसी साहित्य संस्कृति अकादमी न्यास
    मथुरा

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  2. बहुत ही प्रेरणादायक ।बहुत बहुत साधुवाद व बधाइयाँ।

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  3. आदरणीय आपकी यह कहानी वास्तविकता को समझने में स्पष्ट भूमिका निभाई है बहुत ही मार्मिक एवं गम्भीर चित्रण किया है सादर अभिवादन सहृदय धन्यवाद।

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  4. वैसे भी नीरज शास्त्री की कहानियां सौद्देश्यपूर्ण और प्रेरणाप्रद होती हैं, उनमें ही यह कहानी भी गिनी जा सकती है । बधाई एक विदेशी स्तरीय पत्रिका 'सेतु मग'
    में स्थान पाने पर । ---डा.राजेन्द्र मिलन,
    आगरा। 9808600607

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  5. बहुत सुंन्दर

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