काव्य: प्रीति गोविन्दराज

प्रीति गोविन्दराज
डाक घर

अब सन्देश-सफर चला जिस ओर
वहाँ हर रास्ता नया है;
चहुँ दिशा शोरगुल है
कौन आया, जाने कौन गया है!
व्यस्त हम, व्यर्थ हम देखे
लोगों की आवाजाही
सब मिला और किसी से सब छिना,
सूचियाँ हैं बड़ी किताबी!
जब छोटे गाँव में रहती थी
मीलों यात्रा पर किसी से मिलती
उसकी आँखों की प्रसन्न-रश्मि
में वर्षों मैं सजती-चमकती!
डाकिया चिट्ठी लाता बड़ी देर में जब,
प्रतीक्षा में मन डूबता, उभरता था जब!
शहर में फ़ोन की लपकी फिर तारें
बात करने को लम्बी कतारें
दूसरे शहर तक दूरी तय करते
दिल की दरक भर लेते।
कभी दौड़ते अंकों पर टिकी नज़र
‘बजट’ वाक्य समेट लेते!
फिर ईमेल जग को देखा
विश्व को लगा रंग चोखा,
बोझ लादे पूंजीपतियों ने
भार उठाये निर्धन देशों ने।
फिर कोई हाथों में मोबाइल थमा गया
क्या कमी थी इसी की जीवन में,
सब कुछ दिखा बटन दबते ही
वास्तव में नभ छुपा था ज़मीन में!
ट्विटर, इंस्टाग्राम और जाने क्या
घंटे-घंटे आँखें थका कर
नींद की लय उल्टा कर
रूठूँ स्वयं, निरर्थक जग-जगा कर!
जहाँ देखूँ, टिमटिमाता गतिशील कोई
पर मेरी कोठरी में तो रात हुई,
सूने घर में मशीनी दुनिया के पीछे
आयु झुठलाती हुई दौड़ने लगी
सहसा हाँफती, रुकी
जाने डाक-घर को किसकी नज़र लगी?
***


अस्वीकृत रचना

तुम आज उपेक्षित श्रेणी में
खड़े हो, लेकर प्रश्नसूचक दृष्टि
सजल नेत्रों से निहारते उसे
जिसमें हुई थी तुम्हारी सृष्टि!
अपेक्षाएँ बंध ही जाती हैं
परोसा तुम्हें, मैंने बन अन्वेषक
उत्पति तुम्हारी, हृदय-स्वैछिक
नहीं तुम प्रशंसा प्रमाण इच्छुक!
सहसा यह बोध, तुम प्रिय नहीं
टीस भीतर तक अनुभव
तुम शिथिल, थका तन
मन पर घाव अभिनव!
मेरी कल्पना, मेरी संतान हो
संताप तुम्हारा, मेरा है एक
मेरे ही जोश में उदित तुम
आज हममें लुप्त श्रद्धा विवेक।
अपने पुत्रों की भांति समझाऊँ
हृदय मेरा जलता-छिलता
त्रुटि मेरी है, तुम्हारी नहीं;
रचना हिम है कुछ पिघलता
वो इस स्पर्धा में उतरा नहीं
उतारा था जननी ने उसे
जिसमें परीक्षा-भय नहीं
वही सभा भाये उसे!
सुनाऊँ, तुम्हें उत्पति-कथा
विश्राम से, तरु-छाँव में,
परिचय उस संतोष का जो
तरंगित मचला मेरे पाँव में।
तुम आत्म-विभोर हो निडर-से
मंच पर, लहराओ
अभिभूत मैं नृत्य में, लय में
कण-कण में समाओ ।
यदि कीर्ति मिली तो सौभाग्य
अपने आराध्य को नमन करुँगी
यदि न मिली, तो रचना को स्नेह से
अपने आँचल में भरूंगी!
***


धूप 

तुमने भूरे-मैले पत्ते देखे
तो कुछ घबरा गई,
सोचा, कितनी क्रूरता से
हरियाली को नमी खा गई!
जल्दी से उसे नरम थपकी देकर
पुराने गमले से तुमने हटाया
रेतीले मिट्टी में मिलाकर
घर में, नए गमले में बिठाया।
चार दिनों बाद पौधा वही
धूप-जल के संतुलन में निखरा।
मुरझाए पत्तों के झुर्रियों
से उदित जीवन हरा!
भीतरी बाँहों में सिमटकर
उजाले सोखती खिड़की से वो अब
स्नेह- स्वीकार्य से, देखभाल के
चमत्कार से, खिली वो तब!
मेरा विश्वास करते हुए
काश तुम भी मुझे अपना लेते,
पूछते नहीं बिखराव की वजह
बस मुझे सीने से लगा लेते ।
किन्तु मैं पौधा नहीं थी इसलिए
मेरी मिट्टी की पनीली आँखें
बहती रही, धूप मांगती रही
पर तुमने कोठरी में बंद
किया और मुझे भूल गए!
***


सहमी बातें 

क्या कीमत चुकानी पड़ेगी
एक मानसिक क्रांति के लिए
चुपचाप रहनेवाले चेहरों की
बोलती आँखें पढ़ने के लिए
सहमी मासूम किस्सों को
सुनने की लालसा लिए,
नियमों की दुनिया में
अनियमितता का
दर्द कौन समझेगा?
हल्की-हल्की उड़ती बातों
को हवा कहाँ ले जाएगी
क्या उसकी महक किसी
दिल की तहों में समाएगी?
कर्कशता से दबी, ये बातें
क्या तुम्हें सुनाई देंगी?
या कोने में बैठी-बैठी ये
एक दिन दम तोड़ देंगी?
***

विश्व हिंदी सचिवालय की कहानी प्रतियोगिता 2019 में अमेरिका क्षेत्र में प्रथम स्थान पाने वाली प्रीति गोविन्दराज वर्जीनिया में रहती हैं। वे व्यवसाय से मैं कैंसर नर्स हैं और कई वर्षों से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी में मूलत: कविताएँ और कहानियाँ लिख रही हैं। उन्होंने अपने कुछ संस्मरण भी कहानियों के रूप में लिखे हैं।

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