त्‍वचादान - संक्षिप्‍त जानकारी और महत्‍व

अंजली खेर

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“त्‍वचा दान –एक जीवन दान”
मृत्‍योपरांत शरीर का तो खाक में मिलना तय हैं,
पर जब जीवनदान का संकल्‍प लिया
तो हमें मृत्‍यु से भला क्‍या भय है
“जीवन का दान देकर अब”
हुए हम तो अमर हैं,

जी हाँ, जानते हम सभी हैं कि हमारे जन्‍म के साथ ही हमारी साँसें विधिलिखित तयशुदा हैं, किंतु जिंदगी भर असीम उत्‍कंठा और आकांक्षाओं की पींगे ढ़ोते हम “मृत्‍यु’ के ब्रम्‍हसत्‍य को झुठलाने का असफल प्रयास करते हैं। बेशक हम खुद को वर्तमान कंप्‍यूटरीकृत युग के सुसंस्‍कृत और तथाकथित अत्‍याधुनिक होने का दावा करते हैं, पर विडंबना का विषय हैं कि बावजूद इसके हम अंधविश्‍वास की बेड़ियों की जकड़न से खुद को आज़ाद करने में नाकाम ही रहे हैं। शायद यही वज़ह हैं कि अंगदान की पहल करने वाले ऋषि दधीचि की पृष्‍ठभूमि वाले भारतीय इतिहास के कर्णधार होने के बावजूद हम मृत्योपरांत जीवनदान देने की कल्‍पनामात्र से ही सिहर उठते हैं।
हमारे जीवन की भागमभाग का एकमात्र उद्देश्‍य भौतिक सुविधाओं से रत जीवन के साथ अपने परिजनों, आश्रितों का जीवन सुखमय बनाना हैं, नि:संदेह समय कभी एक सा नहीं होता, उसमें रंक को राज़ा और राज़ा को रंक बनाने की प्रबल शक्ति होती हैं। यह बात सोलह आने सत्‍य हैं कि आज तूती उसी की बोलती हैं जिसके पास बेशुमार दौलत और अच्‍छा बैंक-बैलेंस हो, पर एक कटु सत्‍य यह हैं कि पैसों द्वारा दुर्लभ और महंगी से महंगी भौतिक वस्‍तु को तो खरीदा जा सकता हैं पर आज तक हममे से किसी ने यह नहीं सुना कि दुनिया के सबसे अमीरों को मौत ने न लीला हो, बेशक जिंदगी पैसों से नहीं खरीदी जा सकती। कई नामी-गिरामी हस्तियों को हमने उनके चहेतों की प्रार्थना से मौत के मुँह से वापस आते देखा हैं। फिर जब बात प्रार्थना की ही हो रही हैं तो इसमें कोई दो-राय नहीं कि प्राप्‍तकर्ता के दिल से निकली शुभभावनाओं के चलते दानकर्ता के जीवन से कई संकट समाप्‍तप्राय हो जाया करते हैं। दान तो कई प्रकार के होते हैं, समाज में कई लोग, कई संस्‍थाएँ अपनी-अपनी हैसियत और दृष्टिकोण से जरूरतमंद लोगों को जीवनयापन की आवश्‍यक सुविधाएँ उपलब्‍ध कराने हेतु साधन प्रदान कराते हैं, पर यहाँ हम उन सभी में “जीवनदान” को प्रमुख मानते हैं, नि:संदेह जिंदगी से बढ़कर तो कुछ भी नहीं, जीवन हैं तो सब संभव हैं।

इस कड़ी में हम “अंगदान” की महत्‍ता के प्रति जानकार हैं और इसकी आवश्‍यकता के प्रति चैतन्‍य भी, पर विडंबना हैं कि भारतवर्ष में प्रतिवर्ष लाखों की संख्‍या में जलने या फिर गहरी चोट के चलते शरीर के जख्‍मों में हुए संक्रमण की वजह से असमय काल के गर्त में जाने को मजबूर होते हैं। इस समस्‍या का एकमात्र कारण हमारी “त्‍वचादान” के प्रति नकारात्‍मक सोच अथवा अंधविश्‍वास से ओतप्रात कुंठित- पुरातनपंथी कूपमंडूप सोच ही हैं।
हमने मन में भ्रांतियाँ पाल रखी हैं कि अपने करीबी परिजन की मृतदेह से त्‍वचा निकालने की वजह से उसके अंतिमसंस्‍कार की विधि-विधान में बाधाएँ आएंगी, उनके अंदरूनी अंग बाहर आ जाएंगे, और भी न जाने क्‍या-क्‍या,। किंतु इस बाबत् डॉक्‍टर लोगों के मन-मस्तिष्‍क में उपजे उक्‍त तर्कहीन बातों पर व्‍यापक प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि मृतक की त्‍वचा निकालने के बाद संबंधित जगह पर ड्रेसिंग कर दी जाती हैं जिससे अपूर्णता का कोई प्रश्‍न ही नहीं होता।

विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन 2014 की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में हर साल जलने से 2 लाख 65 हज़ार लोगों की म़त्‍यु हो जाती हैं और भारत में एक लाख से ज्‍यादा लोग जलने से या शरीर पर लगी गहरी चोटों का शिकार होने से होती हैं। यदि लोगों “त्‍वचादान” के प्रति प्रेरित होवें तो बेशक उक्‍त मृत्‍युदर को 80 फीसदी कम किया जा सकता हैं। इसके अतिरिक्‍त कुछ शारीरिक व्‍याधियों यथा डायबिटिक व अल्‍सर के रोगियों को भी क्‍लीनिंग/ड्रेसिंग के लिए त्‍वचा की आवश्‍यकता होती हैं। फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्‍टीट्यूट में प्‍लास्टिक और रिकंस्‍ट्रक्टिव सर्जरी विभाग के निदेशक डॉ अनिल बहल के अनुसार “देशभर में स्किन बैंकों की संख्‍या बमुश्किल 8-10 ही हैं।” हमारे देश में व्‍यावसायिक रूप से जेनोग्राफ्ट (सुअर की त्‍वचा) नहीं हैं। कृत्रिम त्‍वचा अत्‍यधिक महंगी होने के कारण अधिकतर जले हुए मरीज इसका खर्च नहीं उठा पाते। हमारे देश में जरूरतमंद मरीजों के लिए एलोगाफ्ट का ही विकल्‍प बचता हैं।

यहाँ यह जान लेना बेहतर होगा कि आखिर “त्‍वचादान” की प्रक्रिया क्‍या हैं, कैसे संभव होती हैं एवं त्‍वचादान कौन कर सकता हैं, इस संदर्भ में ज्ञातव्‍य हो कि 18 बरस से अधिक आयु से अधिक कोई भी व्‍यक्ति त्‍वचादान कर सकता हैं। व्‍यक्ति की मृत्‍यु के 6-8 घंटे तक त्‍वचादान संभव हैं। इस अवधि में तीन मिलीमीटर मोटाई के साथ जांघ, पैर, पीठ में एपिडर्मी और डर्मी के कुछ हिस्‍से को निकाला जाता हैं। चेहरे, हाथों छाती या शरीर के ऊपरी हिस्‍से को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जाता हैं। साथ ही विदित हो कि दूसरे अंगों के प्रत्‍यारोपण की तुलना में त्‍वचा को बिना रक्‍त या ऊतक मिलान के दान किया जा सकता हैं। इससे रक्‍त भी नहीं निकलता हैं। ऐसे व्‍यक्ति जो एड्स, एच आई वी, हिपेटाइटिस बी-सी, टीबी, पीलिया, स्किन कैंसर, त्‍वचा की बीमारी या सेप्‍टीसीमिया से ग्रस्‍त हैं, वे त्‍वचादान नहीं कर सकते। त्‍वचादान के इच्‍छुक व्‍यक्ति के पैरों, दोनों जांघों, नितंबों और कमर से शरीर की ऊपरी त्‍वचा निकालने के बाद सबसे पहले उसे स्किन बैंक में जाँच के लिए भेजा जाता हैं, तत्‍पश्‍चात उसकी प्रोसेसिंग व स्‍क्रीनिंग की जाती हैं। उसके बाद ही निर्णय लिया जाता हैं कि त्‍वचा प्रत्‍यारोपित करने योग्‍य हैं अथवा नहीं। उक्‍त बैंकों में त्‍वचा को कोल्‍ड स्‍टोरेज में छ: माह से पांच वर्षो तक सुरक्षित रखा जा सकता हैं।

ज्ञातव्‍य हो कि जब उक्‍त स्‍टोर की हुई त्‍वचा किसी जरूरतमंद के जख्‍मी हिस्‍सों पर लगाई जाती हैं तो वह अस्‍थायी ड्रेसिंग की तरह ही काम करती हैं। यानि उपर से लगाई गई त्‍वचा पीडित के शरीर के अंदरूनी अंगों की बाहरी प्रदूषण से रक्षा करती हैं और इससे संक्रमण का खतरा समाप्‍त हो जाता हैं। तत्‍पश्‍चात जख्‍मों के भर जाने के पश्‍चात पीड़ित का शरीर स्‍वयं उस त्‍वचा को हटा देता हैं और शरीर स्‍वस्‍थ होने लगता हैं। शल्‍य चिकित्‍सा विभाग की पूर्व प्रमुख डॉक्‍टर मीना कुमार बताती हैं कि पीड़ित की चोट पर त्‍वचा रखने से महत्‍वपूर्ण प्रोटीन फ्लूड्स निकलना बंद हो जाते हैं जिससे संक्रमण रूक जाता हैं साथ ही रोज ड्रेसिंग करने की जरूरत भी नहीं होती और दर्द का आभास भी नहीं होता। उक्‍त संदर्भ में भारत के “स्किन बैंक” की बात करें तो हमारे देश में पहला स्किन बैंक “नेशनल बर्न सेंटर” के नाम से 05 अक्‍टूबर 2001 को मुंबई में शुरू किया गया था। डॉक्‍टर माधुरी गोरे अस्‍पताल में शल्‍यचिकित्‍सा विभाग प्रमुख थी। वे बताती हैं कि उन्‍होंने त्‍वचादान हेतु जगह-जगह कई भाषण दिये, लेख लिखे। कई बार जानकारी के अभाव में मृतक का परिवार त्‍वचादान की पहल नहीं कर पाता, इस हेतु व्‍यापक जागरूकता अभियान समय-समय पर आयोजित करना अत्‍यावश्‍यक हैं। विदित हो कि सायन अस्‍पताल को त्‍वचादान के काम में मुंबई स्थित संडे फ्रेंड्स नाम की समाजसेवी संस्‍था से बहुत मदद मिली।
इस बाबत् प्रशंसनीय तथ्‍य हैं कि वर्तमान में इंदौर देश का सबसे बड़ा अंगदान का शहर बन चुका हैं, जहाँ ग्रीन कॉरिडोर की संख्‍या लगातार बढ़ती जा रही हैं। इसके साथ ही जलने से जख्‍मी हुए मरीज की मदद के लिए काम करने वाली एसिड हमले की पीड़िता और अतिजीवन फाउंडेशन की संस्‍थापिका एवं सचिव प्रज्ञा प्रसूर बताती हैं कि उनके संगठन के प्रयासों से बेंगलूरू, चेन्‍नई और मुंबई जैसे महानगरों में करीब 50 स्किन डोनर्स ने अपना पंजीकरण कराया हैं। उनके संभाग में करीब 2000 एसिड हमला पीड़ितों और जलने से जख्‍मी हुए मरीजों की मदद की हैं। बेशक हम सामाजिक प्राणी हैं, इस हेतु से सहानुभूति, मानवता और इंसानियत के नाते से हमारा यह परम धर्म हैं कि जितना संभव हो, हम एक-दूसरे के काम आयें, मदद करें। आजीवन अपने दायित्व निभाने के संघर्ष में यदि हम चाहते हुए भी दान-कर्म में आगे नहीं आ पाते, पर क्‍या मृत्‍योपरांत किसी को जीवनदान देकर अपने हृदय के टुकड़ों के नाम जीवनदान पाने वाले की दुआएँ लिखने में आगे आने की पहल नहीं कर सकते।
यदि आप उक्‍त आलेख से “त्‍वचादान” के प्रति किंचित मात्र भी प्रेरित हुए हैं तो पहली फुर्सत में त्‍वरित विचारकर इस पहल में अग्रणी होकर अपना नाम दर्ज कराएँ। आपसे आगाज़ करती हूँ कि “इस पुण्‍यकर्म हेतु मैने तो भर दिया हैं फॉर्म, क्‍या इस फेहरिस्‍त में लिख दूँ अगला आपका नाम।”

8 comments :

  1. Aap ko bahut bahut badhaii ho...��

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  2. Bahut he gyanvardhak jaankari, aur bahut he nek punya kaary.

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  3. Sabhi ko inspire karne vala article hai .Bahut badiya & congratulations .

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  4. बहुत ही ज्ञानवर्धक आलेख।

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