कहानी: जन्मदिन

- भानु प्रताप


 इक्कीस सितम्बर की तारीख़ हर साल मयंक के जीवन में अंधेरा लेकर आती है। कितनी ही बार कोशिश की थी मयंक ने कि अंधेरे को चीर कर उसके पीछे छिपे हुए चहरे को देख सके लेकिन वह आज तक एक भी सफ़ल कोशिश नहीं कर पाया था,  जब भी वह अंधेरे के पीछे की छवि का दीदार करना चाहता था,  एक अंजान स्याह धुंध उस मूर्त होती प्रतिमा को धूमिल कर जाती। मयंक देखना चाहता था उस तस्वीर को,  बात करना चाहता था उससे, कितने ही सबालों के जबाब चाहिए थे मयंक को; “तू मुझे छोडकर क्यों गयी? तू मेरे पास क्यों नहीं है माँ?”
     मयंक जिस प्रतिमा को साकार करने में लगा हुआ था वह उसकी माँ का था जिसे उसने कभी नहीं देखा। बीस  साल पहले इक्कीस सितम्बर के ही दिन, मयंक के पैदा होते ही उसकी माँ का इंतकाल हो गया था। वह बहुत ही क्रिटिकल डिलेवेरी केस था, डॉक्टर्स की लाख कोशिशों के बाद भी वे मयंक की माँ को बचा न सके। 
    आज इक्कीस सितम्बर है,  मयंक का जन्मदिन। मयंक अपने जन्मदिन को एक काला दिन मानता है और न मानने के लिए उसके पास वज़ह भी तो नहीं है। इक्कीस सितम्बर सितम का पर्याय बना हुआ है,  इस दिन ने कितनी ही जगहों को खाली छोड़ दिया, जो माँ की ममता के लिए आज भी रिक्त है। 
    मयंक के पिता ‘मिस्टर गरेवाल’ एक ‘मल्टीनेशनल कंपनी’ के मैनेजिंग डाइरेक्टर क्या हुए मयंक कि सारी ज़िम्मेदारी भूल गए,  वो ये भी भूल गए कि उनके बेटे को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है। मयंक को सम्हालने के लिए मिस्टर गरेवाल ने दूसरी शादी जरूर की थी पर नई माँ मयंक से सामंजस्य नहीं बैठा पाई,  शायद इसीलिए समाज बाप की दूसरी पत्नी को विमाता कहता है। “मयंक खाना खा लो ठंडा हो रहा है”  माँ के बुलाने पर जब मयंक कुछ देर नहीं आता तो रूखेपन से कहती “खाना हो तो खा लो, रखा हुआ है,  मैं ज़बरन तो खिलाऊंगी नहीं।”
  ‘क्यों नहीं खिला सकतीं आप’? बार बार यही प्रश्न उठता था मयंक के मन में। कितनी ही बार जब उसका खाने का मन नहीं करता तो किसी ने उसे अपने हाथ से बिस्तर पर आके उसके न-नुकुर करने कर पर भी निवाले ज़बरदस्ती उसके मुँह में नहीं ठूँसे थे,  माँ यही तो करती है। मयंक ने कई बार अपने दोस्त ऋषभ की माँ को देखा था कि वह कैसे ऋषभ को ज़बरन खाना खिलाती है। कभी कभी तो ऋषभ की माँ में ही वह अपनी माँ की छवि तलाशने की निरर्थक कोशिश किया करता था। 
   नाश्ते कि टेबिल पर माहौल हमेशा शांत रहता है। समय के अभाव में अगर मिस्टर गरेवाल को मयंक से बात भी करनी पड़ जाए तो वह केवल मशीनी औपचारिकता मात्र होती। मयंक अपने पिता से बात करना चाहता था पर उस समय भी मिस्टर गरेवाल के पास कुछ न कुछ काम बना रहता था। 
“पापा आप कल पैरेंट्स मीटिंग में नहीं आए,  प्रिन्सिपल सर पूछ रहे थे आपके बारे में” मयंक ने खामोशी को तोड़ते हुए कहा। मिस्टर गरेवाल फाइल्स को पढ़ते हुए बोले “हाँ ठीक है” मयंक के पिता ने उसकी बात को अनसुना कर दिया। 
“पापा मैंने आपकी टेबिल पर अपना रिपोर्ट कार्ड रखा था,  वो आपके सिग्नेचर चाहिए थे”। 
“ओह! सॉरी बेटा मैं भूल गया। नाव इट्स टू अरजेंट,  बाद में देख लूँगा।” पिता जी ने लगभग जाते हुए कहा। 
“पापा आज मेरा जन्मदिन है” मयंक ने अपने शब्दों के साथ पिता के पैर स्पर्श करने की बेतरतीब कोशिश की। मयंक को सुनकर मिस्टर गरेवाल एकदम से रुके और पलट कर आशीष देने लगे। 
“ये लो कुछ पैसे है,  दोस्तों के साथ जाकर मस्ती करना और हाँ खास बात, रात को मेरा इंतज़ार मत करना, मैं देर से आऊँगा।”
मयंक को पता था कि आज भी वह पिछले जन्मदिन की भांति अकेला रहने वाला है। यह पहली बार नहीं था। अकेलेपन में मयंक अपनी माँ को याद करता, यही बेबुनियाद यादें ही उसकी ज़िंदगी का एक हिस्सा बन चुकीं हैं,  वह हिस्सा जिसमें केवल दुख है। मयंक को अपनी ज़िंदगी एक ट्रेजडी से कम नहीं लगती,  वह हर एक बात में अपने दुख का कारण खोज लेता है। यदि कोई उसे प्यार जताए तो उसे लगता कि वह उससे सहानुभूति दिखा रहा है,  वह सहानुभूति जो अक्सर बिन माँ के बच्चों से दिखाई जाती है,  यदि कोई उसे डांटता डपटता तो अपने प्रति स्नेह न होने का बोध कराता। मयंक के दुख उसका स्वभाव बन गए थे और उसने भी इन्हें अपना नसीब समझ कर आत्मसात कर लिया था। 
  नई माँ के रूखे वरताव और अकेलेपन का बोझ काफ़ी थे उसके घर पर ज्यादा न रुकने के लिए। बिना किसी उद्देश्य के बाज़ारों में भटकना,  सिनेमा घर पर लगे पोस्टर को घंटों निहारना, पार्क की बेंच पर बैठकर आने जाने वाले लोगों को देखना, मयंक के पसंदीदा काम बन गए थे। उसे स्कूल से निकलते बच्चे, बसों के यात्री सभी खुश जान पड़ते थे। वह अपने आपको सभी से ज्यादा दुखी पाता। 
   रोज़ की तरह आज भी मयंक चौक कि तरफ चला जा रहा था कि पास में सिनेमाघर के पास कुल्फ़ी के खोमचे के सामने खड़े एक लड़के को देखा,  लड़का करीब दस या ग्यारह साल का होगा। लड़के ने एक नीले रंग की शर्ट,  जिसका रंग शर्ट पर लगे मैल की वजह से मुश्किल से पहचान में आ रहा था,  उसकी पेंट की जेब से फटा कपड़ा बाहर लटक रहा था पहने हुए था। लड़का एक टक कुल्फ़ी को लालच भरी दृष्टि से देखे जा रहा था। मयंक ने पास जाकर लड़के से कहा “कुल्फ़ी चाहिए”। 
लड़का बिना नज़र हटाये बोला “तेरे कू कटरीना कैफ  चाहिए” 
मयंक- कुछ समझा नहीं।
लड़का- औकात से बाहर की चीज़ चाहने से नहीं मिलती साहेब,  मेरे पास पैसे नहीं हैं। 
मयंक- मैं दिलाऊँगा तुझे कुल्फ़ी 
मयंक की बात सुनकर लड़के ने मयंक की तरफ देखा और कहा “रहने दो न साहेब अपुन सब जानता है,  अमीर लोग फोकट में किसी को सलाह न दें, आप मेरे को कुल्फ़ी देगा,  बदले में नंबर दो का काम करने का है तो रहने दो,  अपुन भी फिलम देखता है न साहेब”
लड़के की बात सुनकर मयंक के चहरे पर एक मुस्कान दौड़ गयी, कितने ही दिनों बाद आज मयंक मुस्कराया था। 
“नहीं-नहीं मुझे बदले में कुछ नहीं चाहिए।” मयंक ने कहा 
तब लड़के ने होठों पर जीभ फिरते हुये कहा “ठीक है दो ले लो।”
“पर दो क्यों?  मैं नहीं खाऊँगा।” मयंक ने कहा 
लड़का बड़ी-बड़ी आँखें करके बोला “जमायला तेरे कु कौन बोलता है खाने कु,  अपुन अकेलेच दो खाएगा।”
मयंक ने दो कुल्फ़ी लेकर लड़के को थमा दी। लड़का बारी बारी दोनों कुल्फ़ी को खाने लगा, लड़का कुल्फ़ी खाते हुए बोला “तू अपुन को एक बात बता, अपुन को कुल्फ़ी कैको खिलाया” 
“वो क्या है की आज मेरा जन्मदिन है, मेरे ज्यादा तो दोस्त है नहीं तो सोचा तेरे कु ही पार्टी दे डालूँ” मयंक ने अभी अभी जो कहा था उसमें लड़के की भाषा के  कुछ अंश आ गए थे। अंजाने में ही सही लेकिन मयंक लड़के के बेवाक अंदाज़ से प्रभावित हो गया। 
“अभी जन्मदिन भी एक नई बला होतीं होयांगी” लड़के ने कंधे उचकाये और कहा 
“सच में तुम जन्मदिन के बारे में कुछ नहीं जानते?” मयंक ने आश्चर्य से पूंछा 
“नहीं” यह नहीं का स्वर लड़के के मुँह में ठंडी कुल्फ़ी की भांति घुल गया 
मयंक ने समझाते हुए कहा “साल के दिनों में किसी एक दिन जिस दिन कोई पैदा होता है उसी दिन प्रत्येक साल जन्मदिन मनाया जाता है”
“और जन्मदिन वाले सभी लोग पैदा होते है?” लड़के ने एक और प्रश्न दाग दिया 
“हाँ, सभी लोग जिनको हम देख रहे है सब पैदा होके ही तो धरती पर आए है” मयंक ने समझाया 
लड़के ने फिर प्रश्न किया “जन्म देता कौन है?”  
“माँ, हम सबको हमारी माँ ने जन्म दिया है, वह बहुत महान होती है,  हम सबको कष्ट सह कर जन्म देती है”  मयंक ने माँ का उल्लेख ऐसे किया मानो वह अपनी माँ को देख पा रहा हो। 
“झूठ.... सब कुछ झूठ हर पैदा होने वाले का जन्मदिन होता है तो मेरा क्यों नहीं है? और माँ तो बिलकुल भी महान नहीं होती क्योंकि अपनी औलाद को पालिथीन में रख कर कूड़ेदान में फेंकना तो महानता हो ही नहीं सकती। मेरे अनाथाश्रम के मास्टर जी ने मुझे बताया था कि वह मुझे कचरपट्टी से उठाकर लाया था,  मुश्किल से पाँच दिन का रहा होऊंगा, लेकिन अपुन बहुत खुश है,  अपनी जिंदगी में न बाप का लफड़ा न माँ की टेंशन, मामू लोगों की बिरयानी खाता हूँ, फिलम देखता हूँ, बिंदास रहता हूँ। साहेब थोड़े पैसे मिल जाते तो फिलम देख ली जायेगी।”   लड़के ने अपनी बात समाप्त करते हुए लंबी सांस ली। 
मयंक ने पर्स निकाल कर लड़के के हाथ में कुछ पैसे रख दिये। लड़का पैसे लेकर खुशी से झूमता हुआ सिनेमा की तरफ भागा चला जा रहा था। मयंक स्तब्ध सा खड़ा लड़के को जाता हुआ देखता रहा जबतक लड़का आँखों से ओझल नहीं हो गया। 
   मयंक जो कि अपने आप को सबसे बड़ा ट्रेजडी किंग समझता था, आज उसे पता चल गया था कि उससे बड़ी ट्रेजडी वाले लोग भी हैं और उससे कहीं ज्यादा खुश हैं। यह दस साल का लड़का जिसको अपनी माँ कौन है पता नहीं, पिता कौन है मालूम नहीं, जिसके लिए जन्मदिन एक पहेली है, वह लड़का अपनी ज़िंदगी से कितना खुश है। आज मयंक को पता चल गया है कि खुशियाँ ढूंढने से मिलतीं हैं। अच्छा बुरा सबके साथ होता है,  अतीत के बुरे वक्त को वर्तमान करने से केवल दुख प्राप्त होता है। हम सारी ज़िंदगी उसका रोना रोते हैं जो हमारे पास नहीं था लेकिन भूल जाते हैं हमारे पास क्या क्या है। आज वह बेबाक लड़का मयंक को खुशियों का मंत्र दे गया था। मयंक के लिए जन्मदिन का तोहफ़ा, इससे अच्छा भला क्या हो सकता है?

लेखक परिचय: 

पता – ग्राम पिपरा पो॰ बघेरा तहसील टहरोली, जिला झाँसी उत्तर प्रदेश (भारत गणराज्य)
संपर्क- +91 735 539 6319; ईमेल- wetsetbhanu@gmail.com
शिक्षा – बीए, एमए (हिंदी), NET/JRF, पीएचडी (हिंदी) जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर, मध्य प्रदेश


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