आधुनिक हिंदी कविताओं पर गांधी दर्शन का प्रभाव

बृजेश प्रसाद (शोधार्थी)

मास्टर्स – जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी नई दिल्ली
एम.फिल – गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय
पीएचडी- प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी कोलकता
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हिंदी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल चेतनायुक्त, तर्कयुक्त और प्रगतिशील साहित्य रहा, क्योंकि आधुनिक काल में साहित्य लेखन का आधार मानवतावाद से जुड़ने लगा। इस काल में रची गई ज्यादातर रचनाएँ समाज में व्याप्त कुरीतियों, छुआ-छूत, अंधविश्वास, शोषण-उत्पीड़न और बोझिल हो गयी परंपरा, गुलामी, रूढ़िवाद आदि को तोड़ने की ओर रुख की। अतः हिंदी साहित्य में इस तरह की चेतना और तर्कयुक्त के कारण यह काल नवजागरण या पुनर्जागरण काल के नाम से भी जाना गया।

आधुनिक हिंदी साहित्य की शुरुआत वैसे तो सन् 1857 ई. से मानी जाती है। परंतु आधुनिक हिंदी साहित्य में नवचेतना का विशिष्ट और व्यापक रूप सन् 1900 ई. के आस-पास दिखाई देने लगा था। सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के बाद भारत में अंग्रेजों की राजनैतिक व्यवस्था दृढ़ हो गयी और सन् 1885 ई. में कांग्रेस की स्थापना के बाद भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में तेजी आ गयी 

 इस तरह के राजनैतिक गतिविधियों के कारण सन् 1900 शताब्दी में हुए सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलनों के कारण भारत में वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न हुआ। अंग्रेजों द्वारा लाई गयी पाश्चात्य संस्कृति की प्रतिक्रिया में भारतीयों में भारतीय संस्कृति के प्रति गौरव की भावना उत्पन्न हुई। साथ ही पाश्चात्य ज्ञान के आलोक में भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की व्याख्या की आवश्यकता भी समझी गयी। पुनर्जागरण से बुद्धिवाद, वैज्ञानिकवाद, समानता, सहिष्णुता, न्यायप्रियता, मानवतावादी दृष्टिकोण जैसे मूल्यों की स्थापना से आधुनिक हिंदी साहित्य में एक लोकोन्मुखी दृष्टि का विकास हुआ।

गौर किया जाना चाहिए बीसवीं शताब्दी विश्व को अपने विचारों से सबसे ज्यादा प्रभावित किया। इस दौर में अपने विचारों से लोगों को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले महापुरुषों में महात्मा गांधी का नाम विशिष्ट रूप से लिया जा सकता है। आधुनिक हिंदी साहित्य पर गांधी दर्शन का प्रभाव सन् 1920 ई. के बाद से दिखाई देने लगता है। हिंदी साहित्य में यह समय ‘द्विवेदी युग’ था। गांधी जी सन् 1915 ई. के प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भारत आये और सक्रिय रूप से राजनीतिक क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह साउथ अफ्रीका से पढ़ाई पूरा करने के बाद जब वापस भारत आये और भारतीय जनता पर अंग्रेजों द्वारा शोषण और उन पर हो रहे अत्याचारों को देखा तो व्याकुल हो उठे। इसी शोषणकारी नीतियों एवं अंग्रेजो के चंगुल से भारतीय को आजाद कराने के लिए वह अपने को देश की आजादी के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिए। धीरे-धीरे भारत में गांधी के व्यक्तित्व का प्रभाव लोगों पर प्रबल होने लगा। इनके नायकत्व में आम जनता आंदोलनों से जुड़ती चली गई और उनकी आवाज राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप ले लिया। अब वे आम लोगों के बीच बड़ी शख्सियत के रूप में उभरने लगे। गांधी जी अपने विचारों से लाखों लोगों को राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय स्वतंत्रता के प्रति जागरूक बनाया। इसके अलावा उन्होंने भारतीय जनता को शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए और अपने अधिकारों के प्रति सचेत एवं मानवीय व्यवहार का व्यावहारिक रास्ता भी सुझाया। जैसा कि हम सब जानते हैं कि गांधी जी के चिंतन का मुख्य आधार सत्य और अहिंसा था। उनका यह विचार न सिर्फ भारत बल्कि सम्पूर्ण विश्व के समक्ष एक नया मार्ग प्रशस्त किया।  

देखा जाये तो बीसवीं सदी में गांधी का व्यक्तित्व और उनका विचार साहित्य और समाज में सबसे ऊँचे पायदान पर खड़ा नजर आता है। पूरी दुनिया में शांति, अहिंसा, सत्य, ईमानदारी, पवित्रता और करुणा के प्रति उनका लगाव समूची आबादी को एकजुट किया। भारत को गुलामी से मुक्त कराने तथा दुनिया को नया रास्ता दिखाने के लिए गांधी जी ने अपने विचारों, अपने व्यक्तित्व, अपनी भाषा, अपने कार्यक्रमों, विशेषकर अपने भाषणों एवं लेखन के सशक्त माध्यम से भारतीय लोगों में मूलतः लेखकों, साहित्यकारों, पत्रकारों एवं समाज में सत्य-अहिंसा, प्रेम-एकता, शांति-सद्भावना जागृत किया।  महात्मा गांधी महान साहित्यकार तो नहीं थे, परन्तु भारत के लगभग सभी साहित्यकार उनके विचारों से सन् 1920 ईस्वी से लेकर आजादी के बाद तक प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से उनसे प्रभावित हुए। 

आजादी की लड़ाई की मुहिम में आधुनिक हिंदी साहित्यकार गांधी जी के संपर्क में आये। कवियों ने गांधी के अभिनव प्रयास में आस्था प्रकट करते हुए अपनी रचनाओं में उन्हें स्वर प्रदान की और अपनी लेखनी का माध्यम गांधी के विचारों को बनाना शुरू किया। कई बार यह साहित्यकार गांधी के नाम के माध्यम से तो कई बार उनके विचारों को माध्यम बना कर अपना साहित्य सृजन किया । इस तरह आधुनिक लेखकों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय जन को एक राष्ट्रीय भाषा सूत्र में बाँधने की कोशिश करते थे। महात्मा गांधी राजनीतिज्ञ होने के साथ ही कला, साहित्य और संस्कृति के भी मर्मज्ञ थे। उनकी दृष्टि में कला और साहित्य दोनों का उद्देश्य मानव जीवन को उन्नत बनाना था। शिक्षा के माध्यम के रूप में उन्होंने मातृभाषा का समर्थन किया। हिंदी के प्रयोग पर उन्होंने विशेष बल दिया। वे अच्छी तरह जानते थे कि हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जो पूरे देश को जोड़ने का कार्य कर सकती थी। इसलिए आजादी की लड़ाई में उन्होंने हिंदी को अपनाया। समाज के विविध पक्षों को महात्मा गांधी ने अपनी दृष्टि प्रदान की और उनके इन्हीं विचारों को साहित्य और समाज में गांधीवाद के नाम से अभिहित किया गया।

महात्मा गांधी की मानवतावादी विचारधारा ने जिस प्रकार समाज के विविध पक्षों को प्रभावित किया ठीक उसी प्रकार हिंदी का साहित्यकार भी उनसे अछूता नहीं रह सके। हिंदी की गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर गांधीवादी विचारधारा का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। इस दौर के अधिकांश कवि महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुए और अपने विचारों की काव्यम अभिव्यक्ति की इन कवियों में अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिओध’, सियारामशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, सोहनलाल द्विवेदी, मैथलीशरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, रामनरेश त्रिपाठी, भवानी प्रसाद मिश्र, बालकृष्ण शर्मा नवीन, आदि का नाम लिया जा सकता है। कुछ और भी साहित्यकार थे जो गांधी से प्रेरणा लेकर साहित्य रचना कर रहे थे। ऐसे साहित्यकारों में प्रसाद, पन्त, मुंशी प्रेमचंद, रेणु, जैनेन्द्र, विष्णु प्रभाकर, नरेन्द्र शर्मा आदि प्रमुख थे। 

भारत का सम्पूर्ण स्वतंत्रता संग्राम गांधी जी के अगुवाई में सत्य और अहिंसा पर टिका था। आधुनिक हिंदी कवियों ने भी इसे अपने रचनाओं का माध्यम बनाया। सनेही जी कहते हैं - 
“सत्य सृष्टि का सार, सत्य निर्बल का बल है,
सत्य सत्य है, सत्य नित्य है, अचल है, अटल है।”

माखनलाल चतुर्वेदी जी ने स्वतंत्रता आंदोलन को सक्रिय प्रेरणा देने की प्रवृत्ति काव्य में ही नहीं दिखाई अपने जीवन में भी उसका पालन किया। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारन उनको कई बार जेल यात्रा भी करनी पड़ी, लेकिन वह उनके लिए प्रिय अवसर था। देश के हित के लिए जेल जाना गौरव की बात थी –
“क्या? देख न सकती जंजीरों का गहना 
हथकड़ियाँ क्यों? यह ब्रिटिश राज का गहना।”

सत्य की तरह ही इस समय के कवियों ने अहिंसा का भी समर्थन किया। महात्मा गांधी का मानना था कि हिंसा से हिंसा का अंत कभी नहीं हो सकता है। उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया सदा चलती रहेगी। सियाराम शरण गुप्त गांधी जी इन्हीं विचारों को कविता के माध्यम से अभिव्यक्त करते हुए कहते हैं -
“हिंसा से शांत नहीं होता हिंसानल 
हिंसा का है, एक अहिंसा ही प्रत्युतर।”

प्रथम विश्व युद्ध के समय से ही गांधी जी युद्ध विरोधी हो गये उनका मानना था कि किसी भी समस्या का समाधान युद्ध नहीं हो सकता है इसलिये वे कहते हैं-
“अणु बम से है नहीं,
 अहिंसा से है जग कल्याण।”

गांधी जी के इस विचार ने पूरी दुनिया को अपनी और आकर्षित किया। यह क्रांति इतिहास में एक नए युग की शुरुआत कर रही थी। इसकी महत्ता को स्पष्ट करते हुए नरेन्द्र शर्मा लिखते हैं–
“क्रांतियाँ जग में हुईं अब तक कई,
पर अहिंसक क्रांति की संज्ञा नई, शैली नई।”

महात्मा गांधी ने अपने विचारों से सामाजिक चिंतन को सबसे ज्यादा महत्व दिया। हिन्दू-मुस्लिम विवाद पर गांधी जी साफ-साफ कहना था – “हिंदुस्तान में चाहे जिस धर्म के आदमी रह सकते हैं, उससे एक राष्ट्र मिटने वाला नहीं है। जो नए लोग उसमें दाखिल होते हैं, वे उसकी प्रजा को तोड़ नहीं सकते, वे उसकी प्रजा में घुलमिल जाते हैं। ऐसा हो तभी कोई मुल्क एक राष्ट्र माना जायेगा। ऐसे मुल्क में दूसरे लोगों को समावेश करने का गुण होना चाहिए। हिन्दुस्तान ऐसा था और आज भी है।” हिंदी कवियों ने अपने साहित्य में समाज कल्याण को प्रमुखता से स्थान दिया। समाज में इस तरह का भेद-भाव मिटा कर जिस तरह से गांधी सबको एक सूत्र में बंधना चाहते थे। उसको आधार बना कर सोहनलाल द्विवेदी लिखते हैं-
“हिन्दू-मुस्लिम, सिक्ख-ईसाई 
क्या न सभी हैं भाई-भाई?
जन्मभूमि है सबकी माई।”

नारी कल्याण की बात गांधीवाद का एक महत्वपूर्ण पक्ष था। उनका स्पष्ट मानना था कि नारी किसी भी रूप में पुरुष से कम नहीं है। इसलिए नारी कल्याण के लिए उन्होंने नारी शिक्षा पर बल दिया। स्वाभाविक भी है जब नारी पुरुष कि सहचरी है। तब उसके पिछड़े रहने पर स्वस्थ समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। आधुनिक हिंदी कवियों ने नारी पक्ष को ज्यादा महत्व दिया। स्त्री जाति की प्रगति और स्वतंत्रता की राह में गांधी जी दहेज़ को बहुत बड़ा रोड़ा मानते हैं। सोमा वीरा ने गांधीजी के स्वर में स्वर मिलाकर ‘अधूरी गांठ’ और ‘राख की पुड़िया’ में दहेज़ कुप्रथा की तीव्र भर्त्सना की।  मैथलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, उपेन्द्रनाथ अश्क, रामेश्वरी चकोरी और इस युग के लगभग सभी कवियों ने नारी को अपनी लेखनी में जगह दी। गुप्त जी नारी के महत्व के बारे में लिखते हैं –
“एक नहीं दो-दो मात्राएँ 
नर से भारी नारी।”

उनका विचार था कि ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, और छुआछूत, अन्याय, उत्पीड़न तथा किसी भी प्रकार कि हिंसा न हो और देश के सभी नागरिक शांतिमय जीवन यापन कर सके। गांधी जी किसी भी शर्त पर अमानवीय व्यवहार पसंद नहीं करते थे। वे इस तरह की कुप्रथा का विरोध करते हैं –
“खोल दो ये द्वार मंदिर के पुजारी 
द्वार पर यह जन खड़े हैं 
द्वार पर हरिजन खड़े हैं,
बिना इनके अधूरी है ये पूजा तुम्हारी।”

महात्मा गांधी ने भारत भूमि की स्वाधीनता के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। वे जनमानस में सत्य, अहिंसा, प्रेम, एकता, शांति, सद्भाव, समानता एवं मानवता की भावना जागृत करने के लिए सतत् संघर्षशील रहे। आधुनिक हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री महादेवी वर्मा ने गांधी को धारा का अमर पुत्र बताते हुए लिखा  –
“हे धारा के अमर पूत, तुमको अशेष प्रणाम 
जीवन के अजस्त्र प्रणाम, मानव के अनंत प्रणाम।”

इस युग के लोगों में सांप्रदायिकता का लोप, एकता का आग्रह, स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेकर जेलयात्रा करना, जेल जीवन की यातना के बावजूद मधुरता, आत्मीयता, आत्मबली शहादत की प्रेरणा, देश भक्ति के लिए छटपटाहट और उसके अंतरद्वंद्व का मनोहर चित्रण अत्यंत प्रभावशाली ढंग से आधुनिक हिंदी कविताओं में हुआ है। 

इस प्रकार देखा जाये तो महात्मा गांधी ने अपने विचारो से समाज के उन सारे पहलुओं पर अपनी बात रखी जो समाज के लिए हितकारी था। वह एक ऐसे समाज का निर्माण का सपना देख रहे थे जो शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से स्वस्थ हो। मेरे विचार से साहित्य का लक्ष्य भी यही होता है। साहित्य हमारे समाज के लिए वह मशाल है जो हमें जीवन में आगे कि ओर उन्मुख होने का रास्ता दिखाता है। अर्थात साहित्य और समाज सिक्के के दो पहलू हैं। जो एक दूसरे के बिना नहीं चल सकता। यही कारण है कि गांधी के विचारों से आधुनिक साहित्यकार प्रभावित हुए और उनके विचारों को अपने साहित्य में विशेष भूमिका के रूप में स्थान दिया। आज भी हमारा समाज विपरीत परिस्थितियों में गांधी को एक बार जरूर याद करता है। अंत में कहना चाहूँगा समाज में वह सब उपयोगी विचार है, जो समाज के हित में है। इसलिए जबतक यह समाज और हम है तब तक गांधी जी के विचार हमारे बीच समावेश होता रहेगा।

संदर्भ ग्रंथ सूची
1. आधुनिक हिंदी कविता, राजेंद्र प्रसाद मिश्रा, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली 
2. आधुनिक हिंदी काव्य की मुख्य प्रवृत्तियां, डॉ. नगेन्द्र, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली 
3. आधुनिक हिंदी काव्य पर गांधीवाद का प्रभाव, डॉ. जगन्नाथ आर्य, शिल्पी प्रकाशन, इलाहाबाद
4. अनघ, मैथलीशरण गुप्त, जयभारती प्रकाशन, इलाहाबाद 
5. आत्मोसर्ग, सियारामशरण गुप्त, जयभारती प्रकाशन इलाहाबाद 
6. हिंदी की राष्ट्रीय काव्य धारा, डॉ. देवराज शर्मा, इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन, नई दिल्ली 
7. हिंदी स्वराज, सस्ता साहित्य, दिल्ली 
8. हिंदी साहित्य की प्रवृत्तियाँ, डॉ. जयकिशन प्रसाद खण्डेलवाल, विनोद पुस्तक मंदिर
9. हिंदी कविता जगत में गांधीवादी विचारधारा (लेख) – डॉ. पठान रहीम खान, शोध ऋतु, (सितम्बर-अक्टूबर अंक -2015)
10. समय से मुठभेड़ – अदम गोंडवी, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2010


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