ताना-बाना: मूल्यों, अभिप्रायों का - सामयिक संदर्भ में

चंद्र मोहन भण्डारी

प्रौद्योगिकी एवं सामाजिक विकास

आज सूचना-प्रौद्योगिकी का युग है और हमारे पास वे साधन हैं जो लाखों-करोड़ों लोगों तक कोई सूचना या विचार मिनटों में पहुंचा सकते हैं। यह एक बड़ी उपलब्धि है पर यह कहना मुश्किल है यह समाज के विकास को किस तरह प्रभावित कर रहा है या आने  वाले समय में करेगा। इंसान के हाथ में कोई भी ताकत एक दुधारू तलवार है जो दोनों तरफ काट सकती है। कोई भी प्रौद्योगिकी समाज का सार्थक विकास करने में सहायता नहीं कर सकती अगर उसका प्रयोग करने वाले बौद्धिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर परिपक्व नहीं हैं। आग जीवन के लिये जरूरी है पर वह विनाश भी कर सकती है। चाकू रसोई में रोजाना कितने काम की चीज है पर उसे किसी को नुकसान पहुंचाने के लिये भी प्रयोग किया जा सकता है। इसी तरह सूचना प्रौद्योगिकी का सही या गलत इस्तेमाल हो सकता है और होता भी है। जब हम सामाजिक विकास की बात करते हैं तब ध्यान अधिकतर जीवन से जुड़ी भौतिक जरूरतों पर चला जाता है और जो बात खास है उसे दरकिनार कर दिया जाता है। विकास कुछ सीमा तक भौतिक संसाधनों एवं उपकरणों से परिभाषित किया जाता रहा है पर उसका असली आधार उन मूल्यों एवं आदर्शों में निहित है जो मानव के सांस्कृतिक विकास को परिभाषित करते रहे हैं और करते रहेंगे। ये मूल्य व आदर्श देश-काल के साथ थोड़ा बहुत बदल सकते हैं पर कुछ हैं जिन्हें सार्वभौमिक माना जा सकता है और इनका भौतिक सम्पन्नता के स्तर से कुछ लेना-देना नहीं।

आधुनिक सामाजिक-राजनीतिक परिद्दश्य की बात करें जो हमारे लिये प्रासंगिक है। देश व समाज के प्रबंधन के संदर्भ में एक आधुनिक और विकसित निकाय लोकतंत्र को माना जा सकता है जो क्रियान्वयन में अक्सर अपेक्षा के अनुरूप खरा नहीं उतर पाता पर सैद्धांतिक आधार पर मानव के सांस्कृतिक विकास में एक मील का पत्थर है और इसमें क्रमिक विकास की गुंजाइश बनी रहती है। पर सारी अच्छाइयों के साथ यह भी समझ लेना जरूरी होगा कि निहित स्वार्थों के लिये इसके दुरुपयोग की संभावना बनी रहती है और सारे सैद्धांतिक प्रावधानों के बावजूद जमीनी हकीकत में अक्सर कोई दोषपूर्ण प्रणाली लोकतंत्र के नाम पर काम करने लगती है। हम जानते आये हैं लोकतंत्र के तीन स्तंभ हैं- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका; इनके अपने प्रभाव-क्षेत्र व अधिकार हैं और सीमाऐं भी। आज के युग में एक और घटक है जो लोकतंत्र का स्तंभ न होते भी अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाता रहा है  और उसकी भूमिका भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। हम बात कर रहे हैं मीडिया की जिसे कुछ लोग लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानते हैं। पहले तीन प्रमुख घटकों के आपसी संतुलन का असर लोकतंत्र की गुणवत्ता निर्धारित करता रहा है और आज भी कर रहा है। निश्चय ही यही संतुलन की गुणवत्ता है जो एक लोकतंत्र को दूसरे से अलग दिखा सकती है अन्यथा सैद्धांतिक स्तर पर सभी काफी समान दिखाई देते हैं।

कथित तीन स्तंभ और मीडिया सैद्धांतिक आधार पर लोकतंत्र को परिभाषित कर सकते हैं और उसकी गुणवत्ता को समझने में आंशिक रूप से कारगर हो सकते हैं। अगर हम दुनिया भर के लोकतंत्रों पर नजर डालें तो जमीन-आसमान का फर्क भर दिखाई दे जाता है। सामान्यतया अगर चुनाव द्वारा सरकारें बनती हैं उसे लोकतंत्र कह सकते हैं और अगर निश्चित अवधि में चुनाव होते रहें, और सरकारें चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा चलाई जाती रहें तब मान लेते हैं कि लोकतंत्र की बुनियाद पुख्ता है।

मीडिया की भूमिका

दो सौ साल पहले मीडिया का मतलब केवल पत्र-पत्रिकाएँ ही हुआ करती थीं। लेकिन तब भी वह अपनी भूमिका बखूबी निभा सकती थी अगर समाज का घटक यानि औसत नागरिक अपने अधिकार और दायित्व समझता हो। मीडिया का अच्छा उपयोग अमेरिकी संविधान की रूपरेखा तैयार करने में किया गया जब  पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से लगभग एक सौ लेखों के जरिये विचारकों, समाज से जुड़े लोगों ने अपने विचार साझा किये और काफी प्रयत्नों के बाद उनमें से संविधान की रूपरेखा तैयार करने में मदद ली गई। तब से आज तक के इन दो सौ सालों में सूचना-क्रांति ने सही मामलों में विश्व को एक गांव में बदल दिया। दस हजार मील की दूरी पर जो घट रहा हो उसे हम तुरंत जान सकते हैं। वेस्ट इंडीज में खेला जा रहा क्रिकेट मैच हम टेलीविजन स्क्रीन पर देख लेते हैं। लंदन मे हो रही ओलंपिक की गतिविधियां भी हमारे सामने साकार हो जाती हैं। यह एक विराट उपलब्धि है सूचना-क्रांति से जुड़ी।

यह एक विराट शक्ति है जो हमारी समझदारी और विवेक की अनुपस्थिति में विध्वंस भी कर सकती है अलग-अलग रूपों में और इसका उपयोग समाज के अहित में भी उतनी ही आसानी से किया जा सकता है जितना कि हित के लिये। यह ठीक है कि नियमावली में अलग-अलग घटकों के शक्ति और अधिकार अंकित हैं और उनके बीच संतुलन की रूपरेखा भी स्पष्ट रहती है पर उस मानवीय कमजोरी से निबटना सबसे मुश्किल काम है जो निहित स्वार्थ सिद्धि के लिये शक्ति का दुरुपयोग करने पर आबद्ध हो जाता है।

एक और स्तंभ: आम आदमी

हमने लोकतंत्र के तीन स्तंभों और मीडिया की बात की है यानि समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिये जरूरी  इकाइयां और उनका आपसी ताल-मेल। पर हम भूल जाते हैं कि लोकतंत्र के पहियों को मशीनें नहीं चलातीं हांड-मांस के पुतले चलाते हैं और उनकी औसत क्षमता, रुझान और गुणवत्ता सबसे महत्वपूर्ण हैं लोकतंत्र की गुणवत्ता को परिभाषित करने में। यह जान लेने के बाद समझना आसान हो जाता है कि दुनिया भर के लोकतंत्र एक-दूसरे से इतना अलग क्यों हैं? असली इकाई पर अक्सर हमारा ध्यान नहीं जाता और वह है हमारा दर्शक, पाठक या श्रोता, यानि हम आप जैसे सामान्य जन या आम आदमी। सामान्य औसत जन की रुचि की गुणवत्ता वास्तव में निर्धारित करती है कि लोकतंत्र के पहले चार घटक किस तरह कार्य करेंगे। सामान्य जन की अच्छाइयां एवं बुराइयां आवर्धित होकर इनके कामकाज में परिलक्षित होंगी। वैसे यह भी सही है कि यह गुणवत्ता निर्धारण दोनों दिशाओं में क्रियाशील रहता है। एक सक्षम और निष्पक्ष कार्यपालिका दीर्घकाल में जनमानस की कार्यशैली को प्रभावित करती है। जैसे शरीर के अंग अलग होते हुए भी एक दूसरे से जुड़े होते हैं कुछ वैसे ही उपरोक्त पांचों घटक अलग परिभाषित होते हुए भी आपस में अंतरंग रूप से जुड़ जाते हैं। मात्र कुछ अंगों का जोड़ जिंदगी को परिभाषित नहीं करता उसके लिये उसमें प्राण और चेतना भी जरूरी है। कुछ वैसे ही मात्र ये सभी घटक --  विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका,मीडिया, जनता – लोकतंत्र को सही मायनों में परिभाषित नहीं कर सकते अगर उनमें आवश्यक तालमेल और संतुलन नहीं है। उसे नाम हम भले लोकतंत्र का देना चाहें पर वह होता कुछ और है। दुनिया के अधिकतर तथाकथित लोकतंत्र इसी श्रेणी में आते हैं।

सामयिक घटनाक्रम

इस बात को संक्षेप में कुछ सामयिक घटनाओं के संदर्भ में देखना आवश्यक होगा। एक युवा अभिनेता की मृत्यु के बाद का घटनाक्रम लोकतंत्र की गुणवत्ता के बारे में बहुत कुछ बता सकता है बशर्ते हम कुछ आत्म मंथन की भी हिम्मत जुटा सकें। देश कोरोना के संकट के दौर से गुजर रहा है, करोड़ों लोग बेरोजगार हैं, अर्थव्यवस्था  संकट के दौर से गुजर रही है, शिक्षण संस्थान लगभग सभी बंद पड़े हैं, चीन की गुस्ताखियां बढ़ती जाती हैं पर टी वी पर सबसे अधिक देखा जाने वाला कार्यक्रम एक लड़की का मीडिया-ट्रायल है जो सबसे चर्चित विषय है। ऐसा लगता है टेलीविजन पर एक सनसनीखेज सीरियल चल रहा है। इस सारे ट्रायल में हम पहले ही अभियुक्त को अपराधी मान चुके हैं और उन हालात में इस बात से बेखबर हैं कि उसपर और उसके परिवार पर क्या बीत रही होगी। या शायद जो उनपर बीत रही है उसे देख हमें एक आनन्द की अनुभूति होती है क्योंकि दूसरे की यंत्रणा देख हमारा मनोरंजन होता है।  एक त्रासदी को मीडिया बेच रहा है और हम खरीद रहे हैं। मीडिया और हम दोनों गुनहगार हैं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं संकल्पों से न मीडिया का सरोकार है, न हमारा और न उन घटकों का जिनपर लोकतंत्र की बुनियाद टिकी मानी जाती है। सबके अपने निहित स्वार्थ हैं जिनकी पूर्ति में वे जी जान से लगे हैं और मूल्यों की बात महज एक छलावा है। और अंत में अधिकतर लोग निराश दिखाई देते हैं कि अरे यह क्या, वह लड़की न तो हत्यारन निकली और न ही करोड़ों की लूट मचाने वाली। इस तरह की बातें न केवल एक स्वस्थ सामाजिक परिवेश की अनुपस्थिति को दर्शाती हैं अपितु तथाकथित सांस्कृतिक विकास की धज्जियां उड़ा देती हैं।

एक स्वस्थ सामाजिक परिवेश में जरूरी है जांच एजेंसियां अपना काम करें और कानून अपना; जागरूक नागरिक होने के नाते हमें और सजग मीडिया को जिस बात पर अधिक ध्यान देने की जरूरत थी वह यह कि वे परिस्थितियां कौन सी हैं जो किसी प्रतिभावान, कुशाग्र और संवेदनशील युवा को अवसाद के गर्त में पहुंचा देते हैं जब उसे आत्महत्या ही एकमात्र विकल्प दीखने लगता है। आज की प्रतिस्पर्द्धात्मक जिंदगी और एक संवेदनहीन सामाजिक परिवेश इस तरह की मनोवैज्ञानिक समस्याओं में वृद्धि ही कर रहे हैं, जबकि जरूरत इस बात की है कि समस्या की शुरूवात और उसका विकास समय रहते पहचान में आ सके और उसके समाधान की दिशा मे प्रयास किये जाते रहें।  इस तरह की समस्या किसी भी परिवार में आ सकती है इसलिये इसपर मानवोचित संवेदनशील द्दष्टिकोण न अपनाकर उस इंसान पर किसी तरह का लांछन या दोष मढ़ना या उपहास करना भी कारण बन जाता हैं जिसमें पीड़ित व्यक्ति अपनी समस्या भी बताने में संकोच करता है। अवसाद महज एक रोग की तरह है जिसका निदान खोजे जाने का प्रयास करने की दिशा में प्रेरित करने का माहौल बनाना एक सभ्य समाज की पहचान है।

पर अक्सर होता कुछ और है। हमारी आदत सी पड़ जाती है मीडिया सनसनीखेज बातों को मिर्च-मसाला लगाकर परोसता है और हम चटखारे लेकर खाते जाते हैं। और अगर ऐसा करने में कुछ लोग या परिवार उजड़ जाते हैं तो क्या फर्क पड़ता है? सांस्कृतिक विकास को हमने भौतिक सुख-सुविधा जुटाने तक सीमित कर लिया, मूल्यों-संकल्पों से कोई सरोकार न रखा। यह भौतिक विकास भले ही कहा जा सके पर विकास न होकर यह सांस्कृतिक गिरावट का एक छोटा सा नमूना है। मोबाइल, टेलीविजन, लैपटाँप हमारे भौतिक विकास को भले ही परिभाषित करते हों सांस्कृतिक संदर्भों से इनका कोई लेना-देना नहीं।

यह महज एक उदाहरण है जिसका जिक्र करने का कारण उपरोक्त घटना की सामयिकता और पेचीदगी है। केवल मीडिया ही नहीं, जनता की एवं लोकतंत्र के पहले तीन घटकों की भी भूमिका इस तरह की स्थिति पैदा कर सकती है। लाकडउन के दौरान लाखों युवाओं के सामने बेरोजगारी का संकट आ गया और निराशा व बेबसी ने कइयों को आत्महत्या के लिये मजबूर कर दिया। ऐसे ही माहौल में किसानों द्वारा लगभग हर साल होने वाली आत्महत्याऐं हमारे लिये अजानी नहीं हैं। ऐसी और भी कई घटनाऐं हैं जिनपर चिंतन की जरूरत   है। कुछ ही महीने पहले जमात के लोगों के प्रति भी एक गहन संवेदनहीनता देखने को मिली थी जिसमें जमातियों को कोरोना संक्रमण के प्रति लापरवाही बरतने और उसके प्रसार में उनकी भूमिका के लिये दोषी माना गया था और इसमें मीडिया की भी जिम्मेदारी रही थी। बाद में लगभग सभी मामलों में अदालत ने उनकी बेगुनाही पर मुहर लगा दी।

आशा की किरण

लेकिन इस दौरान संख्या में कम भले हों ऐसे लोग भी थे - मीडिया में और जन सामान्य में - जिन्होंने इस सरकस में भाग नहीं लिया और इस प्रकार के मीडिया ट्रायल का विरोध किया। संवेदनशून्य, विगलित मानसिकता के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद करना नहीं छोड़ा। उनका विवेक और संवेदनशीलता वह आशा की किरण है जिसके प्रकाश में हम इस घने अंधेरे के बीच रास्ता खोज सकते हैं। अगर इसपर आत्ममंथन करें तो कोई रास्ता निकलेगा इस दलदल से बाहर निकलने का, इसका मुझे विश्वास है। इस प्रकार का मंथन एकबारगी न होकर एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो हमें धीरे-धीरे एक स्वस्थ एवं सुसंस्कृत समाज के निर्माण में सहायता कर सकती है।  

जहां विचारों की निर्मल धारा
विलीन न हो जाती हो 
विगलित आचारों की मरुभूमि में
जहां मन सदा निर्देशित होता हो   
निरंतर विस्तृत होते चिंतन व कर्म में
स्वतंत्रता के ऐसे ही स्‍वर्ग में हे प्रभु
जाग उठे मेरा देश।

(रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता से; अनुवाद लेखक द्वारा)

सेतु, सितम्बर 2020

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