अहिंसक सभ्यता के लिए चुनौती है मिथ्यालाप

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


मनुष्य अपने स्वभाव से स्वयं बहुत अधिक परिचित होता है। ऐसी मान्यता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको बहुत अच्छे से जानता है। जानने की यह प्रक्रिया उसे ईश्वर की ओर से मिली है। किन्तु विडंबना यह है कि मनुष्य ही स्वयं को जानते हुए, स्वयं के लिए अनभिज्ञ बना रहता है। बौद्ध धर्म में कहा गया है-अप्प दीपो भव। इसके पहले भी भारतीय शास्त्रों में इसकी बार-बार चर्चा मिलती है कि हमारे ऋषियों, मुनियों और धर्मगुरुओं ने भारतीय शास्त्र की रचना करते हुए स्वयं को जानने पर ज्यादा बल दिया। यह व्यक्ति के स्वयं के जानने की प्रक्रिया किसी अच्छे गुरू से ही प्राप्त होती है, इसका भी उल्लेख हमारे यहाँ मिलता है। स्वयं को जानने की प्रक्रिया में ‘अंतस को टटोलना’ और ‘आत्म-परीक्षण’ करने की बात की जाती है। ‘आत्मविद्याः’ यानी आत्मा-परमात्मा की विद्या, परमात्मा के साक्षात्कार की विद्या। जो लोग योगविद्या एवं आत्मविद्या का अभ्यास करते हैं, लौकिक विद्या के अच्छे-अच्छे रहस्य से परिचित हो जाते हैं। उपनिषदों में ‘आत्मानं विद्धि’ का उपदेश दिया गया, तो पश्चिमी परंपरा में नो दाईसेल्फ (स्वयं को जानो) के रूप में ऐसे उल्लेख मिलते हैं। इससे यह पता चलता है कि यह जानने की परम्परा विश्वव्यापी है। जिसे गुरू नहीं मिला उसके बारे में भी यह कहा जाता है कि वह स्वयं को भलीभांति जानते हैं। इंडीजेनस पीपुल्स-यानी देसज लोगों को यह ज्ञान परम्परा प्रकृति प्रदत्त है। वे अपने सभी ऊँच-नीच, हानि-लाभ और यहाँ तक कि रोग-व्याधि के बारे में जानते हैं। वे अपने को पहचानते हैं।

मिथ्यालाप करने वाला भी मनुष्य रहा है। जानने की प्रक्रिया में अपनी मान्यता विशेष जानकार के रूप में की जाने लगी। इसमें ऐसे मिथ गढ़े गए कि वह सबकुछ अपने बारे में जानता है और दूसरों के बारे में भी उसे पता है। यह मिथ्यालाप मनुष्यों को भारी पड़ा। कहते है कि भूत-प्रेत या जादू-टोने और तांत्रिक आचार-व्यवहार की उत्पत्ति इन्हीं आधार पर हुई जो बाद में मनुष्य समाज के लिए ही दुष्कर साबित होने लगी। मिथ्यालाप मनुष्य की झूठी-प्रवृत्ति को जन्म दिया। इससे मनुष्य के नैतिक विकार आये और इस मिथ्यालाप की वजह से छोटी और बड़ी घटनाएँ घटने लगीं। बाद में यही मिथ्याचरण की प्रवृत्ति ने बड़े अपराधों को जन्म दिया। झूठ या मिथ्यालाप या असत्य वचन हमारे यहाँ हिंसा के कारण रहे हैं। मनुष्य स्वयं को जानने के दंभ में असत्य का आग्रही बन गया। इसे जीवन का हिस्सा मानने लगा और असत्य को भी पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म की कसौटी पर देखने लगा। यद्यपि सही मायने में देखा जाए तो असत्य सर्वदा असत्य है और हिंसा के बुनियाद पर ही वह टिका हुआ है। महाभारत में एक आख्यान आता है युद्ध क्षेत्र का। कौरवों और पाण्डवों के बीच लड़े जा रहे युद्ध में मिथ्यालाप का सहारा लेकर युद्धिष्ठिर ने गुरू द्रोण को बताया-अश्वत्थामा मारा गया-नरो वा कुंजरो। यह एक बड़ा झूठ था, मिथ्यालाप था। किन्तु श्रीकृष्ण ने कहा कि धर्म के लिए बोला गया असत्य कभी भी अधर्म नहीं होता युधिष्ठिर। इसका परिणाम यह हुआ कि पुत्र वध की भयानक सूचना से व्यथित द्रोणाचार्य का अंत हुआ किन्तु वहाँ एक गहरी हिंसा हुई, उस मिथ्यालाप से, यह भी देखा गया है। इसलिए मिथ्यालाप की बुनियाद कभी भी नैतिक हो ही नहीं सकती, यह कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होती। महाभारत में एक असत्य, कर्ण के बारे में भी मिलता है। वेद व्यास ने इस कथा को इस प्रकार कहा है कि कर्ण ने परशुराम के साथ मिथ्यालाप किया जिसकी वजह से उसे शाप मिला और वही उसकी मृत्यु का कारण बन गया। परशुराम किसी भी क्षत्रिय को अपना शिष्य नहीं स्वीकारते थे। कर्ण ने ब्राह्मण के वेश में परशुराम से शिक्षा लेनी शुरू की। एक बार परशुराम जी कर्ण की गोद में सिर रखकर विश्राम कर रहे थे। उसी समय किसी विषैले जीव ने कर्ण को डस लिया। रक्तस्राव होने लगा। कर्ण यह नहीं चाहता था कि परशुराम जी की निद्रा उसके कारण भंग हो। उसकी अखण्ड गुरुभक्ति ने उसे असह्य पीड़ा सहने के लिए विवश किया। अचानक परशुराम की नींद खुली तो उन्होंने देखा कि कर्ण रक्तरंजित होकर भी अपनी पीड़ा को प्रकट नहीं किया। परशुराम ने सोचा कि यह संवेदना और पीड़ा सहन करने की शक्ति निःसंदेह किसी ब्राह्मण पुत्र में नहीं हो सकती। उन्होंने उससे सत्य प्रकट करने का हठ किया और यह संदेह प्रकट कर कि वह किसी क्षत्रिय का पुत्र है, कर्ण को शाप दे दिया-जो विद्या मैंने तुम्हें विप्रपुत्र समझकर दी है, यदि यह मिथ्याचरण से तुमने अर्जित की होगी तो अंत समय में यह सभी विद्या काम न आएगी। कथा यह भी है कि कर्ण जब महाभारत युद्ध में अर्जुन से महायोद्धा के रूप में लड़ रहा था, उस समय विद्या-विस्मृति के कारण अपने सही शस्त्र का प्रयोग न कर सका और वीरगति को प्राप्त हुआ। इसी प्रकार महाभारत के ही एक लग आख्यान को लें तो जिस दुर्योधन को अन्यायी और अधर्मी के रूप में जाना गया है उसने मिथ्यालाप का प्रतिरोध किया, यह भी कथा। है। अश्वत्थामा ने जब पाण्डवों के पांच पुत्रों का वध कर दिया और उन सभी के सर को लेकर दुर्योधन के पास पहुँचा और बोला कि मैंने पंचों पाण्डवों की हत्या कर दी, अब मित्र दुर्योधन तुम युद्ध जीत गए हो। और वे सारे सिर पाण्डवों के नहीं निकले अपितु वे सिर पाण्डवों के पुत्रों के निकले तो वही दुर्योधन उसके मिथ्यालाप को धिक्कारता है और अश्वत्थामा के कृत्य की निंदा करता है। इस प्रकार महाअधम व्यक्ति भी भारतीय भावभूमि में मिथ्यालाप का इतना बड़ा प्रतिरोध करता है। उस पर पश्चाताप करता है, भारतीय धर्मग्रंथों में मिलता है, अन्यत्र कदाचित मिले। ऐसी अनेक कथाएँ मिलती हैं और चरित्र हमें भारत में देखने को मिलते हैं जिन्होंने असत्य का प्रतिरोध किया और मिथ्यालाप का प्रतिकार किया।

भगवान् विष्णु जी के बारे में यह कहा जाता है वे अपने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अवतार में इस घोर मिथ्यालाप को मिटाने हेतु स्वयं को विभिन्न पैमाने पर खड़ा करते हैं। उन्होंने स्वयं के साथ ऐसे अचार-विचार की कसौटी बनायी जिससे मनुष्य मर्यादा का वरण करे। वह मिथ्यालाप, मिथ्याचार और ऐसे सभी आचरण से दूर हो। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम सत्य के पर्व के रूप में जाने जाते हैं। वे सदाचारी और भद्र जीवन के अनुष्ठान के महान प्रवर्तक के रूप में स्वयं को स्थापित करते हैं। इसीलिए सम्पूर्ण पृथ्वी पर भगवान् श्रीराम जैसा कोई व्यक्तित्त्व किसी भी शास्त्र, समय और परम्परा में नहीं मिलता। वे सदैव सत्यानुरागी और आदर्श पुरुष के रूप में स्मरणीय हैं। यदि सम्पूर्णता में देखें तो श्रीराम सदृश विरले ही हैं इस संसार में। उनकी छवि धारण करना तो है इस जगत में कदाचित सम्भव है क्योंकि मिथ्याचरण और झूठ मनुष्य का जन्मजात स्वभाव आज के समय में बन गया है।

फिर हम अगर अपने पूर्ववर्ती जीवन-जगत की पड़ताल करें तो पूर्ववर्णित आख्यानों को पढ़कर यह पता चलता है कि यह मिथ्यालाप मनुष्य सदियों से करता आ रहा है। तो क्या यह माना जाय कि मिथ्यालाप और मिथ्याचरण मनुष्य के स्वभाव का अभिजीत व्यवहार है? क्या इसके बिना मनुष्य जीवन पूर्ण नहीं हो सकता? लोग असत्य क्यों बोलते हैं? लोगों को असत्य बोलने से कितने सुख मिलते हैं? यदि इन सवालों की पड़ताल करें तो मनुष्य स्वयं इसकी व्याख्या जानकार स्वयं से घृणा करेगा किन्तु ऐसा वही कर सकेगा जो मिथ्यालाप में व्यव्हार नहीं करता है। एक बात और आती है कि धरती पर ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो मिथ्यालाप न करता हो। आंशिक करे या घोर मिथ्यालापी हो। यदि ऐसी धारणा सत्य है तब तो मनुष्य के ईश्वरीय तत्व को भी एक चुनौती है।

अब जैसा कि असत्य को एक गहरी अंतर्निमित मानव विशेषता के रूप में पहचाना जाने लगा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि झूठ से सत्य को अलग करने के लिए एक समाज के रूप में हमारी क्षमता अभूतपूर्व खतरे में है। सामाजिकवैज्ञानिक अध्येताओं और न्यूरो-वैज्ञानिकों ने इस असत्यवादिता की प्रकृति और व्यवहार की जड़ों को जानने की कोशिश की है। हम झूठ कैसे और कब सीखते हैं? बेईमानी के मनोवैज्ञानिक और न्यूरो-बायोलॉजिकल आधार क्या हैं? और मनुष्य को सार्वभौमिक रूप से एक दूसरे को धोखा देने के लिए कैसी प्रतिभा रही? इस पर अभी तक अनुमान ही व्यक्त किया गया है कि भाषा के उद्भव के लंबे समय बाद व्यवहार के रूप में असत्य बोलना उत्पन्न हुआ होगा। शारीरिक बल का उपयोग किए बिना दूसरों को संशय व भ्रमित करने की क्षमता ने संभवतः इस स्वभाव को जन्म दी हो। जानवरों में छलपूर्ण रणनीतियों के विकास के समान छल या तो मनुष्य सीखा या मनुष्यों को प्राकृतिक रूप से उसकी चालाकी ने उसे दिया। अगर असत्य के कारणों को पहचाने जायं तो यह देखने में आया है कि कुछ लोग असत्य का सहारा लेते हैं और व्यक्तिगत आपाराधिक लक्ष्य को पूर्ण करते हैं तो कुछ लोग असत्य का सहारा आर्थिक लाभ के लिए करते हैं। व्यक्तिगत लाभ भी झूठ या मिथ्यालाप से मिलता है इसलिए भी इसका वरण करते हैं। दूसरों पर स्वयं की छाप डालने के लिए या हास्य के लिए मिथ्यालाप होता रहा है। कुछ लोग परोपकारी व सामाजिक हित में असत्य को अपनाते हैं। दुर्भावनापूर्ण व्यवहार और दूसरे और भी अनेक कारण हैं जो मिथ्यालाप के कारण रहे-जैसे दूसरों को आहत करने की प्रवृत्ति, दूसरों उपेक्षा, सत्य की अवहेलना करने की कोशिश किन्तु इन सभी अध्ययन से एक बात स्पष्ट होती है कि मिथ्यालाप मनुष्य के नकारात्मक छवि को ही ज्यादा गढ़ते हैं और मनुष्य जाति की अधिकांश संख्या असत्य का वरण इसलिए करती है क्योंकि उसे स्वयं को साबित करना होता है। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि राजा-महाराजा और मंत्रियों द्वारा मिथ्यालाप किया गया और अपनी जनता को छला गया। अब राज्य भी वही मिथ्यालाप का सहारा लेकर अपनी जनता के साथ षड्यंत्र करते दीख रहे हैं। राजनीतिक दांव-पेंच के लिए किया जा रहा मिथ्यालाप न केवल मनुष्य के लिए खतरा है अपितु मानवीय स्वभाव के लिए विषैला भी है जिससे सभी समाज और व्यवस्था की कल्पना नहीं की जा सकती।

मेरी दृष्टि से यदि गंभीर आंकलन किया जाय दुनिया के युद्धों और संघर्षों का तो हिंसा के लिए सबसे ज्यादा उत्तरदायी मिथ्यालाप और भ्रामक असत्य षड्यंत्र हैं। राज्य इसे धड़ल्ले से अपना रहे हैं, सबसे बड़ी बात यह है और इसीकारण लोकतंत्र, सुशासन और मानवाधिकार खतरे में हैं। यदि इसे नैतिकता की संवेदनशील वृत्ति के रूप में परिभाषित किया जाये तो कोई अतिश्योक्ति न होगी।

संत कबीर ने कहा है कि आवश्यकतानुसार यथोचित बोलना, मितभाषी और मधुर बोलना, मिथ्यालाप और वाद-विवाद न करना एवं आवश्यकता होने पर मौन धारण करना श्रेष्ठ पुरुष के गुण हैं। किन्तु क्या आपने झाँक लिया या नहीं? यदि अपने अंतस को नहीं देखा तो वह व्यक्ति ऐसे गुणों को धारण ही नहीं कर सकेगा। मन के सिद्धांत के रूप में जाना जाता अंतस की खोजबीन। यह तेज योग साधना से आता है और संयमी लोग मिथ्या से बचते हैं। इसे हम दूसरों के विश्वासों, इरादों और ज्ञान को समझने के लिए हासिल करते हैं। झूठ बोलने के लिए सबसे आवश्यक है कि मस्तिष्क कार्य करे लेकिन योजना, ध्यान और आत्म-नियंत्रण के लिए आवश्यक क्षमताएँ मिथ्यालाप से नहीं आतीं उसके लिए तो विशुद्ध रूप से मनुष्य को आत्मसाक्षात्कार आवश्यक है। इसीलिए यह कहा जाता है कि मनुष्य इस आत्मसाक्षात्कार से अपनी पड़ताल ज्यादा कर सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस नैतिक आत्मा का मिथ्यालाप से दमन है उससे मनुष्य अपने स्वत्व को खो देता है और उसके भीतर केवल जीने का आग्रह भी मिथ्या होता है भले उसका वह सत्य सबके सामने प्रकट करे अथवा न करे। ऐसे मनुष्यों के समुच्चय से बना समाज और राज्य किस प्रकार का होगा इसकी कल्पना कोई भी सात्विक व सत्यानुरागी व्यक्ति या समाज कर सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह भावना व्यक्ति के भीतर भरी नहीं जा सकती अपितु यह तो स्वतः प्रेरणा से व्याप्त होती है और दूसरों के लिए प्रेरणादायक होती है।

इसके लिए एक बार विचार करें कि क्या एक झूठ दूसरे और दूसरे झूठ तीसरे को जन्म दे सकता है? नैतिक होने में यह प्रश्न आपकी मदद करेगा। वैसे देखें तो हम विशेष रूप से झूठ या मिथ्यालाप को स्वीकार करने के लिए प्रवृत्त हैं। यह हमारे विश्वदृष्टि या सार्वभौमिक मान्यता के रूप में पुष्टि हो रही है। तकनीक ने हमारे मिथ्यालाप या असत्य या झूठ को ज्यादा संचारित कर दिया है। भरोसेमंद लोग और देश स्वयं के बीच सदियों पुराने संघर्ष में 21 वीं सदी के आज के इस मोड़ को जोड़ते हुए, धोखे के लिए एक नया मोर्चा खोल दिया है, ऐसा कहा जाय तो कोई गलत बात न होगी। अंततः यह हिंसा की एक महागाथा की ओर हम सबकी कूच है। अहिंसक समाज तो अंतस में मिथ्यालाप आने ही नहीं देगा जो भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम राम की भांति आदर्श स्थिति है। चिंतापूर्ण बात यह है कि मिथ्यालाप का व्यापार इतना भयावह हो चुका है कि मनुष्यता ही खतरे में है। अहिंसक आचार-व्यवहार वाली सभ्यता मिथ्यालाप से मनुष्य को यदि नहीं निकाल सकी तो एक समय ऐसा भी हो सकता है कि अविश्वास भयानक रूप ले ले और यह सभ्यता के लिए संकट बन जाए।


पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।