काव्य: लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव
तुम्हारे दर्द का एहसास...

तुम्हारे दिए दर्द का एहसास, 
जब जब भी मुझे होता है,
शब्द लेने लगते हैं आकार,
वाक्य विन्यास से कविता हो जाती है साकार,
तुम्हारे स्पर्श को जब भी महसूस करता हूँ,
हृदय से निकलने लगते हैं, 
शब्दों के ऐसे भाव,
जिन्हें कभी गीत कभी ग़ज़ल, 
कभी कविता की शक्ल में ढाल देता हूँ,
तुमसे तो मैंने किया था, 
सागर की गहराइयों सा अटूट प्रेम,
आख़िर क्या मैंने किया था कोई गुनाह,

क्यूँ! तुमने चुनी अलग राह,
अक़्सर अब रहता हूँ उदास,
जीने की बसी न आस,
इन्हीं तन्हाइयों में गुनगुनाता हूँ,
अब तो तुम्हारी याद को, 
शब्दों से सजाता हूँ,
एक नया रचना संसार बनाता हूँ,
कभी कभी लोगों को सुनाता हूँ,
तेरे दर्द के तड़प से सैकड़ों गीत लिख चुका हूँ,
अब तो इन्हीं के बीच तुम्हारे अक्स को पाता हूँ,
तुम न सही अब शब्दों से मुझे प्रीत है,
इन्ही से तुम्हारे प्रणय का बजता संगीत है,
सच में यही कविताएँ गीत ग़ज़ल मेरे मीत हैं,
यही गीत ग़ज़ल मेरे एहसास को समझते हैं,
अब अपने जैसे ही मुझे ये लगते हैं,
अब तो इसी में मेरे प्राण भी बसते हैं,
तुम्हारे दिए ज़ख्म पर मरहम जैसे लगते हैं...
★★★★★★★★★★★★★★★★     

 क्यूँ! न होता आख़िर परिवर्तन...

क्यूँ! न होता आख़िर परिवर्तन,
संविधान में जो लिखा है वर्णन
सपने जो देखे गांधी सुभाष ने
भारत को समृद्ध ख़ुशहाल बनाने का
समता मूलक समाज लाने का
चहुँओर दृश्य भ्रष्टाचार का नर्तन
क्यूँ! न होता आख़िर परिवर्तन...

हम सब हैं इंसान 
लाल वर्ण का रक्त है समान
धर्म जाति के विष-बेलि में मिट रहा है देश
अक़्सर क्षुद्र मसले पर करते इक दूजे से क्लेश
संस्कृति सभ्यता का का बंटाधार
निजस्वार्थवाद का है व्यापार
देश समाज के लिए न कोई करता चिंतन मनन
क्यूँ! न होता आख़िर परिवर्तन...

सरेआम सड़कों पर हैवानियत का हो रहा नंगा नाच
सामर्थ्यवान को न आती है कोई आंच
परत दर परत होती रहती है जाँच
साफ सुथरे बच निकलते हैं शक्तिवान
जो हैं सत्ता के करीब बलवान धनवान
कभी न फँसती है इनकी गर्दन
क्यूँ! न होता आख़िर परिवर्तन...

गरीब और अमीर का भेद मिटते नहीं
न्याय, सामाजिक और आर्थिक समता क्यूँ दिखते नहीं
प्रतिभा और अवसर के समता का है प्रावधान
व्यवहार में न लगते समान
क्यूँ! सबको सम उड़ने को न मिलता आसमान
जो सिद्धांत में है व्यवहार में न होते प्रचलन
व्यवस्था में कुछ लोग ही ख़ुश है
पर दुःखित रहता है आमजन
फिर भी क्यूँ! न होता आख़िर परिवर्तन...
★★★★★★★★★★★★★★★★

मैं करूँगा इंतज़ार...

सच तो तुम भी जानती हो,
पर झुठलाना क्यों चाहती हो,
हमारी यादों के गवाह हैं वो चाँदनी रातें, 
वो नित मुलाकातें, ख़त्म न होने वाली बातें,
वो पत्थर भी गवाह हैं हमारी मुहब्बत के,
जिन पर हम बैठ कर झील में ऊपर से गिरते हुए, 
जल प्रवाह को देखा करते थे,
हम कहते रहते थे ऐसे ही रहेगा हमारा प्यार,
जिसमें कभी न अंत होगा प्रेम प्रवाह का,
जब कभी प्रोजेक्ट के सिलसिले में, 
मैं बाहर चला जाता था,
तय समय से वापस न आता था,
तुम कई दिनों तक रहती थी नाराज़,
न सुनती थी मेरी कोई आवाज़,
चलता रहता था तुमसे मनुहार,
करता रहता था तुमसे घंटों प्रेम का इज़हार,
कई दिनों तक रूठना मनाना,
तब जाकर तुम्हारा मुस्कराना,
तुम्हारे चेहरे पर हँसी, आना तुम्हारा खिलखिलाना,
साथ में दौड़ लगाना, मेरा जान बूझ कर पिछड़ जाना,
तुमको जिताना, तुम्हारा मुझको चिढ़ाना,
क्या तुम्हें कुछ भी नहीं रहा याद,
हमारे पवित्र प्रेम का बेसुरा हो गया स्वाद,
कैसे तुम हमारे प्रेम को गई भूल,
हमारे प्रेम का कहाँ गया वसूल,
जो हमने मिल कर जंजीर से भी मजबूत बनाया था,
कैसे तुमने उस जंजीर को तोड़ दिया,
मुझे व हमारे निश्छल प्रेम को तुमने छोड़ दिया,
हमारा युगों युगों तक अमर रहेगा प्यार,
तुम्हारा अंतिम सांस तक मैं करूँगा इंतज़ार...
★★★★★★★★★★★★★★★★★★★

क्यों सूरज डूब जाता है...

तुम्हें स्मरण होगा जब हम सर्वप्रथम मिले थे,
जीवन में  ख़ुशियों के कितने फूल खिले थे,
एक दूसरे को देख कर मुस्कराना,
और फ़िर एक दूसरे के प्रति बढ़ता ही गया आकर्षण,
शिष्टाचार का हमने छोड़ दिया आवरण,
अनजान होने के बावजूद लगता, 
कि हम एक दूसरे को कितना जानते हैं,
जैसे वर्षों से पहचानते हैं,
एक दूजे का साथ बढ़ता गया,
एक दूजे के प्रति प्यार पनपता गया,
एक दूजे के आँखों की पढ़ लेते थे भाषा,
शायद यही थी सच्चे प्रेम की परिभाषा,
एक दूसरे के बिना न रहा जाता था,
रात भर का विछोह न सहा जाता था,
सुबह कॉलेज में मिलते ही कितना सुकूँ मिलता था,
और फिर पढ़ाई के एक दो घंटे छोड़ निकल पड़ते थे, 
जहाँ हो झील या नदी का हो किनारा,
एक दूसरे के जीवन के बनना चाहते थे सहारा,
घंटों नदी के किनारे बैठ कर पानी में पत्थर फेंकते थे,
अनगिनत न ख़त्म होने वाली बातें,
जीवन के प्रति कितना था उमंग,
इक नई दुनिया, इक नई उमंग,
हम सूरज के डूबने तक रहते थे संग-संग,
उसके बाद रुक न सकते थे,
भले ही हम बड़े हो गए थे,
पर घर रात होने के पहले, 
पहुँचने का फ़रमान रहता था,
इसीलिए चाहते थे सूरज न डूबे,
और हमें एक दूसरे से अलग न होना पड़े...
★★★★★★★★★★★★★★★★

तुम्हारी आँखें...

तुम्हारी झील सी आँखों को देखकर,
सबसे पहले मुझे हुआ प्यार का एहसास,
जीवन के लिए जी उठी जीने की आस,
तुम्हारी नीली आँखों में ख़ुद को, 
हमेशा के लिए बसाने की हसरत,
अपने प्रेम के लिए कई बार, 
असत्य की भी मैंने अपनाई फ़ितरत,
तुम्हारी आँखों में प्रेम की दिखती है, 
एक सम्पूर्ण अवर्णनीय परिभाषा,
चाहत की कितनी छुपी है आशा,
शायद अगर ये समुंदर जैसी, 
तुम्हारी आँखों में मैं न झाँकता,
तो हमारा प्यार न चढ़ता इतना परवान,
एक दूसरे से न होती स्पर्श की पहचान,
शुक्रगुज़ार हूँ इन सुंदर सी आँखों का,
जिसने मुझे चलना सिखाया,
'मैं' से 'हम' बनाया,
जीवन के सौंदर्य का बोध कराया,
एक दूसरे का साथ होने से हमारे जीवन में,
कितनी ख़ुशियाँ, कितनी उमंग,
हर तरफ़ खिले हों जैसे गुलाब के फूल,
आनंद के अनगिनत तरंग,
एक दूसरे के आँखों में झाँकने से,
एक अप्रितम सुखद अनुभूति 
और जी चाहता है सदैव हम रहे संग।
★★★★★★★★★★★★★★

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