हिंदी सिनेमा के गीतों की सार्वभौमिकता

हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद
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‘हिन्दुस्तान में सिनेमा उतना ही पुराना है जितना कि सिनेमा। जन्म लेते ही यह नई खोज भारत भी आ पहुँची थी।’रवि कुमार सिंह अपने ब्लाग में लिखते हैं कि ‘भारतीय सिनेमा में हम गीतों की बात करें तो इसकी शुरुआत तब हुई जब से हिंदी सिनेमा में आवाज़ का आगमन हुआ।’ और हिंदी  सिनेमा का उद्भव और विकास सन 1930 के आसपास हुआ है। उस वक्त भारत की राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर स्थिति संक्रमण काल की थी। राजनीति में गाँधीवाद का बोलबाला था, तो सामाजिक स्तर पर मेहनतकशों की मजदूर पार्टी का भी उदय एक साथ हो रहा था। समकालीन समय में सिनेमा भी समाज का एक अंग बनने को तैयार हो गया था। आज़ादी की लड़ाई के साथ लोगों में एक मूल्य का होना अनिवार्य था। वे मूल्य थे मानवता, इंसानियत, ईमानदारी, देशभक्ति आदि। साहित्य के साथ सिनेमा में भी वादों का प्रभाव भी दिखाई पड़ता था। कभी ‘दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ’ वाले नारे फिल्मों के केंद्र में हुआ करते थे, जिससे यह साफ़ जाहिर था कि उस समय मार्क्सवाद की विचारधारा के साथ साम्यवाद का बढ़ता कद भी सबके सामने था।
हिंदी सिनेमा की विकास यात्रा को देखा जाय तो कुंदनलाल सहगल एक ऐसे अभिनेता के रूप में उभर कर सामने आए थे जहाँ से सिनेमा ने नई चाल धारण की थी। तत्कालीन प्रचलित दादरा, ठुमरी जैसी शैलियों से हटाकर वे गीतों की ओर लोगों को ले गए।उन्होंने अभिनेता और गायक दोनों का काम किया था। ‘जब दिल ही टूट गया हम जी के क्या करेंगे/ उल्फत का दिया हमने इस दिल में जलाया था/ उम्मीद के फूलों से इस घर को सजाया था।’ सहगल साहब के ये गीत उस समय की परिस्थितियों से उपजे हुए थे जब राजनीति में अराजकता फ़ैली हुयी थी, भारतीय मानस निराश और हताश हो चला था तब उनके इस गीत के माध्यम से समय को आवाज दी गयी थी। अंधकार के समय में उनके ये गीत एक रौशनी बनकर सदा पथ प्रदर्शन करते रहेंगे।
भारतीय मध्यवर्ग के उद्भव के साथ भारतीय मूल्यों एवं परम्पराओं की मजबूत कड़ी भी समाने आती है जो उसे जीने का एक सहारा देती है। ‘बालम आय बसो मोरे मन में’ जैसे गीतों के माध्यम से प्रेम की फुहार भी बरसाई थी। उनके गीतों में जालिम जमाने की भी खबर ली गयी थी। जमाने में हर समय प्रेम संबंधों पर पाबंदी तो रही ही है, स्वार्थपरकता भी कम नहीं थी, आज की तरह वह भी समय था जब काम, क्रोध, लोभ,मोह, मद, मत्सर आदि अवगुण विद्यमान थे। कुंदनलाल सहगल का यह गीत उसी ओर इशारा करता है ‘गम दिए मुस्तकिल/ कितना नाजुक है दिल/ ये न जाना/ हाँ ये हाँ ये जालिम ज़माना।’
बढ़ते हुए बाजारवाद और पूँजीवाद ने व्यक्तियों को शहर की ओर पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया था। प्रमुख व्यापारिक स्थानों को केंद्र में रखकर जिन गीतों का निर्माण किया गया आज भी वे लोगों के जेहन में वैसे ही ताजा है। ‘मेरे पिया गए रंगून किया है वहाँ से टेलीफून/ पिया की याद सताती है/ जिया में आग लगाती है।’ एक तरफ विरहिणी पत्नी का विरह है तो दूसरी ओर जीविका के लिए परदेश जाना भी जरूरी है। उसी समय के एक प्रचलित मुहावरे “झुलनिया में लागा धक्का/बलम कलकत्ता निकल गए।” कलकत्ता, रंगून आदि शहरों में व्याप्त आधुनिकता और उसमें रोजगार के साधन के साथ जुड़ी होती थी इज्जत। आज की तरह अर्थ हर युग में प्रधान था।
सिनेमा समय की आवाज है। साहित्यकार राही मासूम रजा ने लिखा कि “सिनेमा एक ऐसा आर्ट है जो बिन्दुओं को चलती फिरती, सोती-जागती, हिलती-डुलती तस्वीरों में परिवर्तित कर उन्हें समझने का काम आसान कर सकता है” जैसे साहित्य में कालखंड के भीतर विशेष ढंग की विचारधारा काम कर रही थी वैसे ही सिनेमा में भी। गीतों ने उस ओर इशारा किया भी है। ‘सर पे टोपी लाल हाथ में रेशम का रुमाल’ एवं ‘मेरा जूता है जापानी/ये पतलून इंग्लिस्तानी/सिर पर लाल टोपी रूसी/फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी।’ साम्यवादी देशों के साथ भारतीय मजदूरों का एका और उसके साथ मजदूरों, कामगारों को सिनेमा में स्थान भी मिलने लगा। सन उन्नीस सौ सैंतालीस के दौर में देश विभाजन से उभरी त्रासदी में भी गीत गाये गए और उन गीतों ने समाज के दर्द को बहुत संजीदगी से उकेरा भी था।सम्प्रदायवाद से उपजी हुयी विपरीत स्थितियों को भी ‘धूल का फूल’ गीत के द्वारा अभिव्यक्त किया गया है ‘तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा/इंसान की औलाद है इंसान बनेगा’ फिल्म शहीद का गीत ‘वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हों’ यह एक प्रेरणा दायक गीत के रूप में आज भी गुनगुनाया जाता है। राजनीति की त्रासदी को गीतकारों ने अपने ढंग से बयां की थी ‘क्या हमने बिगाड़ा है क्यों हमें सताते हो’ साफ़ जाहिर है कि उस समय भी पुलिस, प्रशासन, नेताओं की कारस्तानी की वजह से आमजन ही सताया जाता था, उसी की अभिव्यक्ति गीतों में पायी जाती है। इसीलिये इस अबूझ और रहस्यमय दुनिया को गीतकारों ने एक दर्शन के तौर पर भी देखा ‘जीवन है इक कहानी दुनिया भी एक कहानी।’
कुंदनलाल सहगल युग बीत जाने के बाद नई सुबह ‘रफ़ी’ के गीतों से हुयी। यह 1947 से लेकर 1970 के आसपास का दौर था। जिसमें भारत कई पड़ावों से गुजर रहा था। तब मुल्क दो टुकड़ों में बंट गया था। एक बड़े देश के दोनों कन्धों पर खून की धारा बह रही थी। ऐसे में गीतों में उन परिस्थितियों का जिक्र भी किया गया है।बढ़ती हुयी खाद्यान्न समस्या और फैक्ट्रियों के कारण किसान, मजदूरी को विवश हो गया था। फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ का गीत ‘धरती कहे पुकार के/ बीज बिछा ले प्यार के/ मौसम बीता जाय।’ यही मजदूर जब शहरों को गये तो शहर उसे आश्चर्य से भरा लगा, ‘हो मोरे रामा अजब तेरी दुनिया।’ इन गीतों में मार्क्सवाद का सहारा लेकर किसानों-मजदूरों ने महलों को ललकारा भी है। इस वक्त के गीतों ने मुखर रूप से पूँजीपतियों के विरुद्ध विरोध जताया था। ‘छोटी सी बात न मिर्च मसाला/ कहके रहेगा कहने वाला/दिल का हाल सुने दिल वाला’, ‘पानी रे पानी तेरा रंग कैसा’, ओ रमैया वस्ता वैया/ मैंने दिल तुझको दिया’ इन गीतों के माध्यम से जन भावनाओं को कलमकार ने समेट लिया था। दूसरी ओर‘मेरा रंग से बसन्ती चोला/ माई रंग दे बसन्ती चोला’से प्रेरित होकर भारत की युवा पीढ़ी बसन्ती चोले में रंगकर दुश्मनों के सम्मुख हाजिर होना चाहती है। जिस पर भारत गर्व करता है।
पूरब और पश्चिम की साँस्कृतिक टकराहट भी साफ़ देखी जा सकती है। आज़ादी के बाद जब नई पीढ़ी योरोपीय देशों में अध्ययन एवं रोजगार के लिए गयी तो उसे योरोपीय समाज को समझने का अवसर मिला। ऐसे में गीतकारों ने गीतों के माध्यम से अपने देश की संस्कृति और धरोहर को उनसे श्रेष्ठ पाया। फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ का यह गीत जो सभी को रोमांच से भर देता है ‘है प्रीत जहाँ की रीति सदा/ मैं नित नित शीश झुकाता हूँ/ भारत का रहने वाला हूँ/ भारत की बात बताता हूँ।’
साथ ही प्रेम के नए कलेवर या कहें अंदाज भी गीतों में सुनने को मिले। ‘मुग़ल-ए-आजम’ फिल्म के गीत ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ या ‘तेरी महफ़िल में किस्मत आजमा के हम भी देखेंगे’, प्रेम की राह में कुर्बान होने की प्रेरणा अनारकली के द्वारा गाये गये गीतों से मिलती थी। जो जमाने की बिना परवाह किये अपने उद्देश्य में कुर्बान होने को तैयार थी। प्रेम की सुंदर और कालजयी अभिव्यक्ति भी नित होने लगी थी।‘ये कली जब तलक फूल बनकर खिले/ इंतिजार इंतिजार इंतिजार करो’, ‘तुम मगर साथ देने का वादा करो/ मैं यूँही मस्त नगमें सुनाता रहूं’,‘दिल की ये आरजू कि कोई दिलरुबा मिले’, ‘छू लेने दो नाजुक होंठों को।’ आदि गीतों में यदि प्रेम और बिरह की बात थी, तो दूसरी ओर स्त्री बेबसी पर भी गीत लिखे गए। स्त्रियों की अपनी एक ख्वाहिश थी, शिक्षित होकर वह समाज को बदलने का सपना भी देखा करती थी। किन्तु भारतीय पितृसत्तात्मक  व्यवस्था उसे अभी भी रोक रही थी। ‘निकाह’ फिल्म का वह गीत सारे दर्द को उकेर कर रख देता है-‘दिल के अरमा आंसुओं में बह गए/हम वफ़ा करके भी तन्हा रह गए।’ क्या इस गीत में सदियों पुरानी स्त्रियों की वफादारी की अभिव्यक्ति नहीं मिल जाती है? मिल जाती है! स्त्री आज भी अपनी वफादारी समय-समय पर पेश करती रहती है, फाँसी के फंदे से झूल कर, कुंएं में कूदकर, ट्रेन के कटकर, जहर खाकर आदि प्रकार से। क्या पुरुष कभी वफादार होने का स्वांग रचता है? शायद कभी नहीं! इसीलिये ‘मदर इण्डिया’ को विवश होकर कहना पड़ता है ‘दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा/ जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा।’फिल्म ‘ठोकर’ में तलत साहब की आवाज में यह गीत शायद एक सीमा रेखा खींचता दिखता है ‘ऐ गमे दिल क्या करूँ, वहशते दिल क्या करूँ?’
1970 से 1990 तक के गीतों में एक नया कलेवर सामने आता है। देश की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक परिस्थितियों में बहुत बदलाव आया था। साथ ही सिनेमा के स्वरूप में बहुत बदलाव आ गया था। समय सापेक्ष गीतों ने मार्ग बदलकर लोगों के दिलों पर दस्तक देना शुरू कर दिया था।‘जिन्दगी इम्तिहान लेती है/दोस्तों की जान लेती है।’ ऐसे ही संघर्षों से उपजा नौजवान जब अपने वतन को छोड़कर परदेश में रोटी की खातिर गया तो उसे वहाँ भी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। ‘जिन्दगी हर कदम इक नई जंग है।’ घर से बाहर कमाने पुरुष निकलते थे तब स्त्रियाँ उनके लौटने की आस लागए रहती थीं। ‘जाते हो परदेश पिया जाते ही ख़त लिखना।’ जिन्दगी की दौड़ भी बहुत अजब-गजब होती है। फिल्म ‘दौड़’ का गीत, ‘अजब दौड़ है गजब दौड़ है/ ये जीना यारों दौड़ है।’ बढ़ता पूँजीवाद और बाजारवाद, एक स्थान से दूसरे स्थान पलायन दौड़ ही तो है। जो गीतों उभरकर सामने आया है।
सन 1990 के बाद के गीतों में आधुनिकता कूट-कूट के भर गयी। भारत की आर्थिक स्थिति पहले से बहुत बेहतर होती चली गयी।जिसका परिणाम हुआ कि फ़िल्में कार्मसियल हो गईं और गीत भी वैसे ही होने लगे। अब राष्ट्रवाद भी गीतों में उभरकर आने लगा। पूंजीपतिवर्ग देश के प्रति भक्ति भावना से भरने लगा। विदेशों में गए और वहीं के नागरिक होकर रह गये भारतीयों में देश के प्रति मोहब्बत छलकने लगी तो गीतों ने भी उनकी ताल से ताल मिलाने की कोशिश की।‘मेरा मुल्क मेरा देश मेरा ये वतन/ शान्ति का उन्नति का प्यार का चमन।’ अथवा ‘भारत हमको जान से प्यारा है।’ एनआरआई या कहें अप्रवासी भारतीयों के लिए भारत दूसरे रूप में दिखा तो वीर सैनिकों के लिए गीत प्रेरणा बनते गए। ‘माँ तुझे सलाम’ एवं ‘चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी प्यारे वतन से’ और ‘संदेशे आते हैं हमें तड़पाते हैं/ कि घर कब आओगे कि घर कब आओगे’ अपने घर द्वार से दूर रहकर परिवार वालों को याद करते हुए सैनिकों को सहारे के रूप में ये गीत सदा-सदा के लिए लोगों के दिलो दिमाग पर छाये रहने वाले वाले हैं। इन गीतों में जितनी संवेदना और अपनत्त्व भरा है परदेश रहने वाला हर व्यक्ति उससे अपने को जोड़ लेता है।
आज के समय में जब मोटरकार, रेल, हवाई जहाज आदि के द्वारा आवागमन की सुविधा हो गयी और शिक्षा ने भी पर्याप्त बदलाव किया तो पुराने प्रतिमान टूटने लगे। उत्तर आधुनिकता ने बदलाव के प्रतिमानों को उलटा-पलटा ही नहीं नया स्थापित भी किया है। बेटियों को जंजीरों में जकड़ के रखने वाला समाज जब यह गुनगुनाता है कि, ‘मेरी बन्नो होशियार सायकल पे सवार/ चली जाती सिनेमा देखने को’ तब समाज में आये बदलाव को सहज ही महसूस किया जा सकता है।
अब तो इश्क एक गरम मसाला हो गया है। ‘इश्क तेरा गरम मसाला’ तो लोगों को अब बिना इश्क जीने का मकसद भी नहीं रह गया है। ‘इश्क बिना क्या जीना यारों/ इश्क बिना क्या जीना/ यारों इश्क बिना क्या मरना यारों’ की पुकार मची तब ‘इश्क दी गली विच नो इंट्री’ भी लगने लगी।’
            साल 2011 के बाद महंगाई, हत्या, लूट खसोट भी तेजी से बढ़ने लगा। पैसा का मूल्य निरंतर कम होता गया।पैसा पैसा क्या करती है तूपैसों पे क्या मरती है क्या होता हैक्या होता है पैसा/ पैसे की लगा दूँ ढेरी’ जैसे गीत बढ़ती अराजक पूंजी की ओर इशारा कर रहे हैं तो ‘सखी सैंया तो बहुत ही कमात हैं/ मंहगाई डायन खाए जात है।’ एक तरफ पैसे का अंधाधुंध दुरुपयोग, अमीरों, साहूकारों की ऐयाशी, भारतीय अर्थव्यवस्था का निरंतर विदेशी पूंजी में तोला जाना है और समाज के इलीट क्लास की ऐयाशी है वहीं दूसरी ओर मंहगाई के प्रकोप से ग्रामीण जन, गरीब-मजदूर बदस्तूर परेशान है। गीतों में व्याप्त यह अंतर्द्वंद्व अपने समय और समाज को लांघ कर सदा चर्चा के विषय बने रहने वाले हैं।
आज का समय और समाज व्यक्ति परक होता जा रहा है। गीतों के माध्यम से उसकी अभिव्यक्ति भी होती रही है। जिस भी समय में गीतों ने अपना स्थान बनाया वे उस समय की आवाज बन गए थे। उनके माध्यम से हम उस परिवेश को समझ सकते हैं। गीतों ने बहुत सी विचारधाराओं को भी अपनाया है।‘जय संतोषी माँ’ से लेकर ‘पानी रे पानी तेरा रंग कैसा’,‘ईश्वर अल्ला तेरो नाम सब को सम्मति दे भगवान्।’ सार रूप में कवि नीरज की पंक्ति में कहा जाय तो - ‘समय ने जब भी अँधेरों से दोस्ती की है/ जला के अपना ही घर हमने रौशनी की है।’ गीतों के माध्यम से गीतकारों ने समय की रोशनी के लिए अपनी कलम का सहारा लिया है।

संदर्भ ग्रन्थ सूची
1 फिल्म का सौंदर्यशास्त्र और भारतीय सिनेमा : सं प्रो कमला प्रसाद, शिल्पायन प्रकाशन-नई दिल्ली, संस्करण 2010
2 सिनेमा और संस्कृति : राही मासूम रजा, वाणी प्रकाशन-नई दिल्ली, द्वितीय आवृत्ति, 2009
3 सिनेमा, कल और आज : विनोद भारद्वाज, वाणी प्रकाशन-नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2006
4 सिनेमा के सौ बरस : सं मृत्युंजय, शिल्पायन प्रकाशन-नई दिल्ली, तृतीय संस्करण 2011
5 भारतीय चित्रकला का इतिहास : फिरोज रंगूनवाला, राजपाल एन्ड संस-नई दिल्ली, संस्करण 1975
6 https://www.youtube।com/watch?v=zwkhufUZvwU, साभार 08/01/2018. 10:20 PM

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