समकालीन कहानी में महिला एवं बाल चित्रण

(डॉ. मधु संधु की कहानियों के सन्दर्भ में)
डॉ. दीप्ति

डॉ. दीप्ति 

सहायक प्रोफेसर, हिन्दू कॉलेज, अमृतसर (पंजाब)


साहित्य और समाज का दो-तिहाई से भी अधिक अंश महिला और बच्चों को उनके जीवन, उनकी समस्याओं, उनके रहन-सहन, उनके दृष्टिकोण, उनकी अस्तित्व चेतना को समेटे है। 'मनुस्मृति' में नारी के सन्दर्भ में कहा गया है, "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।"1 अर्थात जहाँ नारी की पूजा की जाती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। युगों-युगों से नारियाँ अपना सहयोग राजनीति, अर्थशास्त्र, आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक एवं युद्ध आदि क्षेत्रों में देती आयी हैं। मध्यकाल में श्री गुरु नानक देव जी ने नारी के सम्बन्ध में क्रान्तिकारी विचार प्रस्तुत करते हुए कहा, “सो किउ मंदा आखिए जितु जमे राजान।”2 गुरु जी के अनुसार जो नारी बड़े-बड़े राजाओं को जन्म देती है। उसे बुरा क्यों कहा जाये बल्कि उसे तो समाज में आदरणीय स्थान मिलना चाहिए। सृष्टि का आधार नारी को कहा जा सकता है क्योंकि वह गर्भधारण करके बच्चों की जन्मदात्री से लेकर उनकी प्रतिपालिका बनने का दायित्व बखूबी निभाती है। मानव की सम्पूर्ण जीवन यात्रा में बाल्यावस्था महत्वपूर्ण होती है। नन्हे-मुन्हे बच्चों में बड़ों को भोलेपन, वास्तविक सादगी, प्रसन्नता और आनंद की ओर ले जाने की क्षमता होती है।

समकालीन कहानी या साठ दशक के बाद की कहानी में स्त्री और बच्चों की पूर्ण सच्चाई और संवेदना, आर्ष मान्यताएँ और आधुनिकता, रूढ़ि विखंडन और प्रगति के साथ चित्रित हुए हैं। मन्नू भंडारी की 'रजनीगंधा', मोहन राकेश की 'पहचान', भीष्म साहनी की 'चीफ की दावत', उषा प्रियंवदा की 'वापसी 'में बच्चों और स्त्री के बिंदु मिलते हैं।

मधु संधु
इक्कीसवीं सदी के पंजाब के हिंदी साहित्यकारों में बहुमुखी प्रतिभा संपन्न डॉ. मधु संधु ने अपने 36 वर्ष के अध्यापन काल के दौरान 2 कहानी -संग्रहों, 3 सम्पादित ग्रंथों और 16 शोध-ग्रंथों की रचना के दौरान बड़े वेग और गाम्भीर्य से महिला एवं बाल चित्रण को अंकित किया है। प्रस्तुत शोध-पत्र में उनके कहानी-संग्रहों की कुछ चयनित कहानियों (पाबंदियों, म्यूज़ियम, लिफ्ट, मुन्ना, रिदा) में महिला एवं बाल चित्रण के विभिन्न आयामों को दिखाने का प्रयास किया गया है।

'पाबंदियाँ' कहानी में लेखिका ने नौकरीपेशा औरत को चिन्हित किया है जो सुखी पारिवारिक जीवन जी रही है। प्रस्तुत कहानी की नौकरीपेशा औरत नीरा अपने जीवन को संयमित और संतुलित बनाने के लिए तथा पारिवारिक जीवन के स्थायित्व के लिए अपने ऊपर अनेक पाबंदियाँ लगाती है। पुरानी कहानी की तरह उसके अंदर न उच्च पदस्थ होने का दर्प है और न अभिमान। प्रथम पाबन्दी वह खुद पर घर में एक ही नौकर रखने की लगाती है ताकि चीज के इधर-उधर होने का दायित्व एक ही नौकर पर रहे। अधिक नौकरों के घर में रहते एक बार तीन हज़ार रूपये और एक बार अंगूठी गँवा कर वह चौकन्नी हो जाती है। प्रोफेसर होने की अकड़ से मुक्त वह घर का काफी काम स्वयं कर लेती है। नीरा खुद पर दूसरी पाबन्दी सहेलियों के साथ शॉपिंग या पार्लर न जाने की लगाती है क्योंकि इस के चक्कर में एक बार पति की कज़िन घर आकर उसका इंतज़ार करती रही तो कभी उसका बेटा एक्सीडेंट के बाद अर्धविक्षिप्त सा उसका इंतज़ार करता रहा। “एक रोज़ ऐसे ही ममी लगातार फ़ोन खटखटाती रही और फिर फ़िक्र में कॉलेज ही फ़ोन कर दिया।... पूरा जलूस ही निकल गया नीरा का तो।”3

नीरा की तीसरी पाबन्दी खुद पर यह थी कि झूठी-सच्ची शान बखारने से इंकार। उसके अच्छे खासे कमाने वाले “पति के धन का प्रथम साहसिक सदुपयोग उसने शहर की अभिजात्य कॉलोनी में पचास लाख का घर खरीदकर किया। .....”4 परन्तु उसने लोगों से यही कहा कि कुछ डैडी से, कुछ बैंक से, कुछ बाज़ार से ऋण लेकर बहुत कठिनाई से पंद्रह लाख का घर लिया है। नौकरीपेशा औरत का घर की आर्थिक स्थिति में भी सहयोग रहता है जैसा कि आजकल चल रहा है। अपने बच्चों के भविष्य संवारने में जुटी नीरा आख़िरकार पढ़ाई में बिलो एवरेज 45% अंक लिए पुत्र को डिस्ट्रिक्ट ट्रांसपोर्ट ऑफिसर बनाकर सफलता प्राप्त करती है परन्तु अब उम्र के ढलते पड़ाव में उसे पाबंदियों की ज़रूरत महसूस नहीं हो रही है। पति नीलाभ जहाँ साइड बिज़नेस में व्यस्त है वहीं बच्चे दूर के नगरों में रह रहे हैं। अत: अब उसे घर पहुँचने की भी जल्दी नहीं होती। नीरा सोचती है- “ज़िंदगी बीत गयी घर और किचन सँभालते - अब तो सब ऑटोमैटिक मशीन-सा लगता है। जिन सम्बन्धियों के लिए वह खीझा करती थी, अब उन्हीं में अपनत्व दिखता है।....”निर्जन, शांत, लम्बी पगडंडियों पर वह अक्सर हर सांस अपने स्मृति कोषों के साथ भटकने लगती है।”5 'पाबंदियाँ' कहानी की नीरा सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक रूप में अपने जीवन को सफल बनाती है। सामाजिक रूप में सारे रिश्तेदारों से जहाँ मेलजोल बनाये रखती है, वहीं आर्थिक तौर पर घर खरीदती है। पारिवारिक रूप में नीरा अपने बच्चों को उच्च पदस्थ करती है। अत: 'पाबंदियाँ' की नीरा सुशिक्षित, समर्थ एवं पूर्ण सफल स्त्री परिलक्षित होती है।

'म्यूज़ियम' कहानी में दो बहनों चोजी और कोज़ी के माध्यम से पुरुष के धोखेबाज़ व् स्वार्थी रूप का अंकन है। प्रस्तुत कहानी की दोनों नारी पात्र चोजी और कोज़ी कठपुतली की तरह नहीं है। उन्हें न तो पिता और न ही पति नचा सकता है क्योंकि उनके पास नीर-क्षीर विवेक है। प्रस्तुत कहानी में “चोजी और कोज़ी के स्कूली टीचर पापा ने जैसे ही पंचायत का चुनाव जीत राजनीति में प्रवेश किया, वे राजा भोज बन गए।”6 कोज़ी के पुराने सहपाठी प्रेमी की आर्थिक स्थिति को कम आँकने वाले उसके पिता कोज़ी को घर में कैद कर देते हैं। दूसरों की समस्याएँ सुलझाने वाले उसके पिता अपनी बेटी के रागबोध, व्यथा को न समझते हुए उसके लिए घुटनभरी ज़िंदगी का चयन करते है परन्तु कोज़ी फिनायल पीकर इस घुटनभरी ज़िंदगी से हमेशा के लिए विदा ले लेती है। तत्पश्चात चोजी अस्तित्व सजग नारी के रूप में सामने आती है तथा कोज़ी पर हुए अत्याचारों को भुला नहीं पाती है। इसीलिए वह घर की अपेक्षा बाहर हॉस्टल में सुकून ढूंढती है। एक दिन उसे भी उसके पिता एक आवारा, बदचलन और फ़्लर्ट भूस्वामी के पल्ले में बांध देते है परन्तु थोड़ी देर बाद ही चोजी सोच लेती है कि “शादी के नाम पर शहीद होने कि कोई ज़रूरत नहीं। न उसने कोई मुआवज़ा माँगा, न परस्त्रीगमन का आरोप लगाकर उसके चेहरे का नकाब उतारा, फिर भी डाइवोर्स में छिपी मुक्ति भी उसके पास आँसुओं से तर होकर ही पहुंची।”7 प्रस्तुत कहानी में जहाँ कोज़ी पैतृक दबाव के कारण आत्महत्या करती है, वहीं उसकी बहन चोजी अस्तित्व सजग होकर अपना रास्ता स्वयं तय करती है। यहाँ तक कि वह भूस्वामी पति के निर्लज्ज, अय्याश जीवन को स्वीकार करने से इंकार करती हुई उसे छोड़ विदेश का रास्ता अपनाती है। कुछ समय पश्चात् चोजी विदेश से डिग्री, कुछ यन्त्र और बहुत सारे कमाए हुए पैसों से पार्लर और हैल्थ-क्लब खोलकर बढ़िया लाइफस्टाइल वाला जीवन व्यतीत करती है। “आज उसके वार्डरोब का बजट बीस हजार रुपया महीना है। उसके कांचघर का इंजीनियर विदेश रिटर्न है। ड्राइंग-रूम के अंदर जापानी ढंग का गार्डन है।”8 परन्तु सुन्दर,आधुनिक एवं फिट कोज़ी अतीत की कड़वाहट को भुला नहीं पाती जिसके परिणामस्वरूप आज उसके मन में अनेक पुरुष मित्रों के लिए कोमल भाव नहीं मौजूद है। “चोजी के जीवन के इस म्यूजियम में पुरुष पुरुष बनकर ही लटका है।”9 इस प्रकार लेखिका ने प्रस्तुत कहानी में जहाँ नारी जीवन के कटु यथार्थ को गहरी संवेदना के साथ चित्रित किया है, वहीं स्वतंत्रता और अस्मिता की रक्षा करने, आत्मनिर्भर बनने और समाज की महत्वपूर्ण इकाई बनने को विद्रोह और संकल्पशक्ति को रेखांकित किया है। डॉ. मधु संधु की 'म्यूज़ियम' कहानी की चोजी उस बेल की जैसी नहीं है जिसे बढ़ने-फूलने के लिए पुरुष का सहारा ज़रूरी है। वह अकेली प्रगति की राह पर निरंतर आगे बढ़ने की क्षमता रखती है।

“साहित्य अपने समय के सामाजिक यथार्थ को हमारे सामने प्रस्तुत करता है और उसका असली चेहरा उघाड़कर दिखाता है।“10 डॉ. मधु संधु की 'लिफ्ट' कहानी भारतीय समाज के एक गरीब परिवार की लड़की नीरू के सुख-दुःख से परिपूर्ण जीवन का दस्तावेज़ है। बिन माँ की बेटी नीरू प्रिंसिपल दीदी के यहाँ काम करते हुए बड़े आनंदपूर्वक, सुखी जीवन व्यतीत करती है। वहाँ बिताए अपने स्वर्णिम एवं स्वप्निल क्षणों को नीरू कभी नहीं भूलती है। प्रिंसिपल दीदी के पश्चात सुरभि के यहाँ काम करते हुए मेहनती नीरू दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेती है। कुछ समय पश्चात “अनुराग से विवाह के पश्चात परिपक्व नीरू में न फूहड़पन था और न उड़कर आँखों में पड़ने वाली लापरवाहियाँ। आत्मलोचन कर वह अपने को हर वातावरण के अनुसार ढालने की सामर्थ्य रखती थी, वह मनों बोझ पलकों पर उठा सकती थी, ...मौसी के स्नेहावरणों, घर के अपनत्व, दाम्पत्य के सुख के कारण नीरू ने ढेर सारे उत्तरदायित्व ओढ़ लिए थे।”11 एक बेटे की माँ बनकर वह मातृत्व का सुख भी भोगती है। कहते है कि बुरा समय कभी दस्तक देकर नहीं आता। ऐसा ही बुरा समय नीरू के लिए अपार दुःख लेकर आता है जब 1984 के ब्लूस्टार ऑपरेशन के तनावपूर्ण वातावरण में बच्चे को डॉक्टर के पास लेकर गए अनुराग की हत्या हो जाती है। “उसे लगा जैसे वह लिफ्ट से ऊपर जा रही थी कि बीच रास्ते में लिफ्ट के सारे इलेक्ट्रिक कनेक्शन्स फेल हो गए है और वह एक अँधेरी, तेज, दमघोटू कोठरी में हमेशा के लिए कैद कर दी गयी है।“12 प्रस्तुत कहानी में निराश्रयी बच्ची नीरू का जीवट ऊँचाइयों को छूने के दृढ़ निश्चय के साथ-साथ सभ्य संभ्रांत जीवन जीने का संकल्प परिलक्षित होता है परन्तु बिगड़ी हुई राजनीतिक स्थितियाँ उसके पति को छीनकर उसे बंद लिफ्ट के घुप अँधेरे में छोड़ आती है।

समाज व् साहित्य का एक महत्वपूर्ण अंग बच्चे हैं। निष्पाप और निर्मल मन के बच्चे ईश्वर की अदभुत रचना हैं। पारिवारिक वातावरण व् संस्कारों, पिता के अनुशासन, व् माँ की ममता एवं दोनों के लाड़-प्यार के साये में बच्चे की परवरिश होती है। बच्चे और बच्चों के बच्चों के स्वाभाविक मोह और बाल-क्रीड़ाओं पर लेखिका ने 'मुन्ना' कहानी लिखी है। इस कहानी में परिवार के सबसे मनपसंद व् प्रिय सदस्यों बच्चों की स्वभावगत विशेषताओं का चित्रण है। माँ-बाप के अटूट सम्बन्ध की सुदृढ़ कड़ी बच्चे दादा-दादी, नाना-नानी के अधिक लाड़ले होते हैं। प्रस्तुत कहानी में नानी का बच्चे के लिए वात्सल्य भाव स्पष्ट परिलक्षित होता है, “मुन्ना आता है तो मेरे घर में, मन में उत्सव सा उन्माद छा जाता है। मुन्ना बोलता है तो ठंडी बौछारें पड़ने लगती है, खिले-खिले फूलों की सुगंध हर ओर फैलने लगती है।”13 प्रस्तुत कहानी में मुन्ने की अकाट्य तर्कशक्ति का भी परिचय मिलता है। “खाना ऐसे फेंकते है? भगवान जी होते है इसमें।” ममा ने डांटा। चपाती की बाईट मुँह में डालते बोला - क्या मैं भगवान् जी को खा रहा हूँ?”14 इसी तरह बच्चों के मनपसंद रुझानों जैसे - पानी से खेलना, आग से खेलना, रेसिंग, साइकिल चलाना, सोने से पहले कहानी सुनना तथा खिलौनों के प्रति आकर्षण इत्यादि का यथार्थ व् सटीक अंकन मिलता है।

इसी तरह 'रिदा' कहानी में लेखिका ने परिवार की लाड़ली नन्ही सदस्या 'रिदा' के लिए माता-पिता तथा नानी का वात्सल्य भाव स्पष्ट परिलक्षित है। “घर का खिलौना रिदा रूम फ्रेशनर है, जिधर जाती है वहीं महक समा जाती है। रिदा परफ्यूम है,जिसे छू दे, वही खुशबू देने लगे। रिदा मंदिर की घंटी है, शांत मन का सृजन करने वाली। “15 दिन भर बातों से सबका मन लगाने वाली रिदा पढ़ने में भी उतनी ही होशियार है। एक शाम बैडमिंटन खेल रही रिदा के गिरने से उसकी बाजू फ्रैक्चर हो जाती है। उसकी पीड़ा व् वेदना को देख “रिदा की ममा का मन संत्रस्त था। आँखों का पानी सूखना भूल गया था। ममा की ही नहीं, रिदा नानी की भी लाड़ली है। उसका लय-ताल भरा शरमाता-शरमाता स्वर सुन नानी के रक्त को भी गति मिलती है।”16 प्रस्तुत कहानी में रिदा के टी.वी. का शौक, सेंसटिविटी तथा सोफिस्टिकेटेड आदतों का भी उल्लेख मिलता है। हँसती-खिलखिलाती रिदा जब टीन एजर होती है तो उसे जहाँ दर्पण से अधिक प्यार होता है, वहीं उसमें कैरियर की चेतना भी जागती है। “अपने में खोयी रहती रिदा के लिए होमवर्क, लर्निंग वर्क, ज़रा सा किचन, ज़रा सा टी. वी.- बस यही उसकी रूटीन थी।”17 कॉलेज जाते ही वह ट्यूशन्स में व्यस्त रहने लगती है। प्रोफेशनल कॉलेज में दाखिला लेकर वह कम्पीटीशन्स को ही जीवन का उद्देश्य बना लेती है। “जीवन संग्राम में छलांग लगाने का चुनाव उसका अपना है। चुनाव की क्षमता उसकी अपनी है। दूर-दूर तक आशान्वित संसार के सपने हैं। उनकी पूर्ति की सामर्थ्य की संचेतना है। अब वह गुड़िया नहीं, ग्रेट ब्रेव यंग गर्ल है, जिसका बिम्ब आज माँ को आंदोलित नहीं आश्वस्त करता है।"18 इस प्रकार प्रस्तुत कहानी में एक बच्ची रिदा के बचपन से लेकर यंग ब्रेव गर्ल बनने के सुहावने सफर को लेखिका ने बखूबी रेखांकित किया है।

  इस प्रकार कहा जा सकता है कि डॉ. मधु संधु की कहानियाँ सभ्य, संभ्रांत स्त्री की कहानियाँ हैं। उस आधी दुनिया की कहानियाँ हैं, जो परिवार को अपने रागबोध से बांधती और प्रगति पथ पर ले जाती है। इसके साथ ही सामाजिक रिश्तों की अनिवार्यता को समझती है, राजनैतिक षडयंत्रों को झेलती है और विदेश घूमकर भी स्वदेश लौटकर यहीं स्थाई जीवन व्यतीत करती है। यह कहानियाँ उन बच्चों की है जो पूरे परिवार को अपनी सुगंध से महका देते हैं जो एक नीर -क्षीर विवेक लेकर बचपन से किशोरावस्था और युवावस्था तक बढ़ रहे हैं।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची 

1. डॉ. सुरेंद्र कुमार, राजर्षि मनु और उनकी मनुस्मृति (दिल्ली: सुकीर्ति पब्लिकेशंस, 2011) पृ0 45
2. डॉ. अविनाश शर्मा, हिंदी साहित्य का इतिहास (अमृतसर: गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, 2003) पृ0 158-159
3. डॉ. मधु संधु, नियति और अन्य कहानियाँ, पाबंदियाँ (दिल्ली: शब्द संसार प्रकाशन, 2001) पृ0 45
4. डॉ. मधु संधु, नियति और अन्य कहानियाँ, पाबंदियाँ (दिल्ली: शब्द संसार प्रकाशन, 2001) पृ0 46
5. डॉ. मधु संधु, नियति और अन्य कहानियाँ, पाबंदियाँ (दिल्ली: शब्द संसार प्रकाशन, 2001) पृ0 47-48
6. डॉ. मधु संधु, नियति और अन्य कहानियाँ, म्यूज़ियम (दिल्ली: शब्द संसार प्रकाशन, 2001) पृ0 54
7. डॉ. मधु संधु, नियति और अन्य कहानियाँ, म्यूज़ियम (दिल्ली: शब्द संसार प्रकाशन, 2001) पृ0 56
8. डॉ. मधु संधु, नियति और अन्य कहानियाँ, म्यूज़ियम (दिल्ली: शब्द संसार प्रकाशन, 2001) पृ0 56
9. डॉ. मधु संधु, नियति और अन्य कहानियाँ, म्यूज़ियम (दिल्ली: शब्द संसार प्रकाशन, 2001) पृ0 57
10. महीप सिंह, साहित्य और सामाजिक उत्तरदायित्व, दैनिक जागरण,5 अक्टूबर, 2000
11. डॉ. मधु संधु, नियति और अन्य कहानियाँ, लिफ्ट (दिल्ली: शब्द संसार प्रकाशन, 2001) पृ0 70-71
12. डॉ. मधु संधु, नियति और अन्य कहानियाँ, लिफ्ट (दिल्ली: शब्द संसार प्रकाशन, 2001) पृ0 72
13. डॉ. मधु संधु, दीपावली @अस्पताल.कॉम, मुन्ना (नयी दिल्ली: अयन प्रकाशन, 2015 ) पृ0 50
14.डॉ. मधु संधु, दीपावली @अस्पताल.कॉम, मुन्ना (नयी दिल्ली: अयन प्रकाशन, 2015 ) पृ0 53
15.डॉ. मधु संधु, नियति और अन्य कहानियाँ, रिदा (दिल्ली: शब्द संसार प्रकाशन, 2001) पृ0 58
16.डॉ. मधु संधु, नियति और अन्य कहानियाँ, रिदा (दिल्ली: शब्द संसार प्रकाशन, 2001) पृ0 59
17. डॉ. मधु संधु, नियति और अन्य कहानियाँ, रिदा (दिल्ली: शब्द संसार प्रकाशन, 2001) पृ0 61
18. डॉ. मधु संधु, नियति और अन्य कहानियाँ, रिदा (दिल्ली: शब्द संसार प्रकाशन, 2001) पृ0 61-62

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