कहानी: उलझते धागे


आशा पाण्डेय
   ट्रेन छूटने में पन्द्रह मिनट का समय अब भी बाकी है। मैं खिड़की  की ओर पीठ टिकाकर बैठी हूँ।
   “आ ऽ ई – ओ ऽ ऽ आई, दो ऽ न ऽ ऽ कुछ खाने को” कहते हुए किसी ने मेरी पीठ को हल्के से ठोंक दिया। मैं चौकन्नी होकर सीधी बैठ गई। खिड़की के उस पार से एक बच्चा उचक-उचक कर खाने के लिए कुछ माँग रहा है।  सात-आठ साल की उम्र होगी इसकी। शरीर पर कपड़े के नाम पर बस एक फटा नेकर है। बाल बेतरतीब ढंग से बढ़े हुए तथा गन्दे हैं। पेट इतना पिचका हुआ है कि पसलियों की हड्डियों को भी आसानी से गिना जा सकता है । चेहरे पर धूल मिट्टी नाक थूक का अजीब मिश्रण, जिसे देखकर उबकाई आ जाये।
   वह मुझसे कुछ दे देने की गुहार कर रहा है । उसकी दयनीय आँखें मुझे द्रवित कर रही हैं ।  उसे देखकर  मेरे  दिल में उतर आई दया को शायद वह पढ़ और समझ रहा है इसलिए मेरे सामने  बार-बार भूख-भूख कहकर अपना पेट थपथपा रहा है। मैं पर्स खोलने लगी किन्तु, उसी समय पति ने उसे जोर से डाँट कर वहाँ से भगा दिया और मुझे उसको कुछ भी देने से मना किया। मैं किसी प्रकार का कोई तर्क करती उसके पहले ही वह लड़का डर के मारे वहाँ से भाग गया।
   यूँ इस तरह की डाँट-डपट के ये अभ्यस्त होते हैं। एक ही बार डाँट खाकर ये भागते भी नहीं बल्कि झुंझला देने की हद तक ये अपनी माँग दोहराते रहते हैं पर पति की आवाज में न जाने ऐसा क्या था कि बच्चा उसे सुनकर पल भर भी वहाँ नहीं रुक सका।
   पति कह रहे हैं, “इन बच्चों को कभी भूलकर भी भीख नहीं देनी चाहिए। भीख देकर हम उन्हें भिखारी बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इतनी आसानी से पैसा, खाना मिल जायेगा तो ये मेहनत क्यों करेंगे भला। ... भीख माँगने की लत पड़ जायेगी इनकी।”  सामने की सीट पर बैठे यात्री पति की बात से सहमत हैं । सोचती तो मैं भी कुछ ऐसा ही हूँ, किन्तु, उस बच्चे की आँखें बहुत उदास थीं। जरूर भूखा था। उसे बिना कुछ दिये भगा देना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है।
   मेरी नजरें खिड़की से हट कर जाते हुए उस डरे सहमें बच्चे का पीछा कर रही हैं। प्लेटफॉर्म के उस पार रेलवे स्टेान की दीवार से लगकर बीस-पच्चीस लोगों का झुण्ड अपने माल-असबाव के साथ बैठा है। आस-पास कई चूल्हे जल रहे हैं, कई अब भी खामोश हैं। शायद इन चूल्हों की मालकिन लकड़ी, आटा, दाल की तलाश में अब तक भटक रही हो।
   जिस जगह जाकर वह लड़का खड़ा हुआ है वहाँ एक औरत अपने बच्चे को गोद में लेकर लापरवाही से दूध पिला रही है। आँचल सरका हुआ है उसका। उस औरत के सामने एक पुरुष मैले-कुचैले गट्ठर पर सिर रख कर अध लेटा पड़ा है। उसका पैर पालथी मारकर बैठी औरत के घुटनों के पास तक फैला है। बीच-बीच में वह अपना पैर उठा कर दूध पीते बच्चे के मुँह के पास तक ले जाकर हिला देता है। बच्चे के मुँह से माँ की छाती छूट जाती है। बच्चा कुनमुनाता है फिर दूध पीने लगता है। पुरुष अश्लील -सी हँसी हँस कर औरत की ओर देखता है, औरत मुस्कुरा देती है। एकाध बार तो पुरुष अपने पैरों को उठा कर औरत के कंधे पर लाद देता है।
   लड़का, जो मेरी खिड़की के उस पार से भागता हुआ वहाँ पहुँचा है, शायद कुछ खाने को माँग रहा है। औरत का ध्यान लड़के की ओर खिचा तो बाप की क्रीडा में व्यवधान पड़ने लगा। बडी भद्दी आवाज में पुरुष ने लड़के को गाली दी। औरत पुरुष से कुछ कह रही है। उसकी बात तो समझ में नहीं आ रही है किन्तु, आवाज बड़ी  करकश है।
   पुरुष उस औरत की बातों का समर्थन कर रहा है या प्रतिकार, समझ में नहीं आ रहा है, किन्तु अब तक का प्रेमपूर्ण समय लड़के के वहाँ पहुँच जाने से कुछ कलह में जरूर बदल गया है।
   अचानक वह पुरुष अपने दाहिने हाथ को घुमाकर बड़ी लापरवाही से लड़के की ओर कुछ उछालता है जो लड़के के कन्धे से लुढ़कता हुआ नीचे जमीन पर गिर जाता है। लड़का झुक कर उसे उठा लेता है और अपने हाथ में लटका कर खुशी से गोल-गोल नाचने लगता है। आस-पास खड़े कुछ बच्चे भी उस लड़के को घेर लेते हैं। सब खुश हैं, उछल रहे हैं, ताली बजा रहे हैं।
   क्या हो सकता है ये! खाने की कोई चीज या खिलौना! मैं दिमाग पर जोर डाल कर बड़े ध्यान से बच्चे के उस हाथ को, जिसमें वह उस वस्तु को लटका रखा है, देखने लगती हूँ।
   कुछ चुलबुलाहट हो रही है।
   अरे, यह तो कोई पक्षी है। एक नहीं, चार पाँच हैं। सारे पक्षियों के पैरों को एक साथ मोटे धागे में बाँधा गया है। यह लड़का पक्षियों के बँधें पैरों को पकड़ कर उन्हें उलटा लटका कर नाच रहा है। विवश पक्षी रह-रह कर पंख फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। उनके पंख थोडे से खुलते हैं फिर बंद हो जाते हैं।
   सुना है मैंने, ये लोग तीतर खाते हैं। ये पक्षी तीतर ही होंगे। अभी थोड़ी देर में भून दिये जायेंगे। मन में एक अजीब अकुलाहट उठी।
   मैं उन पक्षियों की ओर से ध्यान हटा कर बच्चे को दूध पिलाती उस औरत को देखने लगती हूँ। पुरुष फिर से अपनी उन्हीं हरकतों को दुहरा रहा है। उस पुरुष के गट्ठर से लग कर कई और गट्ठर वहाँ रखें हैं। उसके पास ही पन्द्रह-बीस लोग बैठे हैं। सब आपस में उसी तरह की मोटी और कर्कश  आवाज में बोल बतिया रहे हैं।
   पुरुष की हरकत से औरत की गोद में दूध पीता बच्चा कुनमुना कर रोने लगा है। झुंझला कर औरत ने जमीन से एक मुटठी  मिट्टी उठाई तथा पुरुष के चेहरे पर फेंक दी। पुरुष तेजी से सिर झटकता हुआ उठा और औरत के सिर पर थूक कर हँसते हुए भागा। आठ-दस कदम भाग कर वह फिर रुका। पीछे मुड़ कर औरत की ओर देखा और ताली बजाकर शरीर को दोहरा करते हुए जोर से हँसने लगा।
   औरत चिल्ला-चिल्ला कर उस पुरुष को कुछ कह रही है। शायद नाराज हो रही है, किन्तु बनावटी ही क्योंकि साफ दिखाई दे रहा है कि उसके ओठों पर मुसकान और आँखों में चमक है।
   पुरुष हँसते हुए पैर पटक कर ताली बजाता है और प्लेटफॉर्म की ओर आगे बढ़ जाता है।
   सिग्नल हो गया है शायद। प्लेटफॉर्म पर खड़े यात्री ट्रेन में चढने लगे हैं। मेरे पति तथा सामने बैठे यात्रियों के बीच अब भी भिखारियों के स्वभाव और उनकी स्थिति पर बातें हो रही हैं। मैं फिर से उस लड़के को देखती हूँ जो अब भी कई बच्चों से घिरा हुआ, पक्षियों की टाँग पकड़े घूम रहा है।
   वहाँ बैठे लोगों के झुण्ड के दूसरे किनारे पर एक बूढी  औरत चूल्हा जलाकर भगोने में कुछ पका रही है। एक बूढा आदमी – शायद उसका पति - लगातार उस बुढ़िया को गाली दे रहा है। बुढ़िया चुप है। बूढ़े का गुस्सा अधिक बढ़ गया है। हाथ में एक डंडा लेकर वह उठता है। ठीक ढंग से चल पाने में असमर्थ वह बूढा घिसटते हुए बुढ़िया की ओर बढ़ता है। आस-पास बैठे लोग बुढ़िया को आगाह करते है। बुढ़िया वहाँ से हटने के लिए उठती है, यह देख बूढा डण्डा फेंक कर उसे मारता है। डण्डा दूर जाकर गिरता है। बुढ़िया बच जाती है किन्तु डण्डे के सहारे के बिना बूढा वहीं गिर जाता है। वहाँ बैठे लोग बूढे को गिरता देख, हँसने लगते हैं। बूढा खिसिया जाता है।
   मेरी ट्रेन प्लेटफॉर्म से सरकने लगी है। थोडी देर बाद रफ्तार भी पकड़ ली। स्टेान पीछे छूट गया, किन्तु स्टेशन पर का वह दृश्य मेरी आँखों में गहरे उतर कर मेरे साथ आगे बढ़ रहा है।
   सामने की सीट पर बैठे सज्जन बता रहे हैं कि कैसे वे एक बार ट्रेन में एक भिखारी लड़के को कुछ खाने को दे दिये थे। खाते ही वह लड़का वहीं गिर पड़ा था। उसके गिरते ही उसके माँ-बाप भी न जाने कहाँ से प्रकट हो गये थे और लगे शोर मचाने कि इन्होंने मेरे बच्चे को पता नहीं क्या खिला दिया, मेरा बेटा बेहोश हो गया।
   वे अचम्भित, परेशान, कुछ सूझ ही नहीं रहा था उन्हें कि  क्या करें। अन्त में अन्य यात्रियों ने बीच-बचाव करके एक रास्ता निकाला कि वे बच्चे के माँ-बाप को बच्चे के इलाज के लिए कुछ पैसे देकर फुर्सत पायें।
   बच्चे के माँ-बाप को पाँच सौ रुपये देकर उन्होंने अपना पीछा छुड़ाया। पैसा पाते ही उसके माँ-बाप बच्चे को गोद में उठाकर ट्रेन से उतर गये। प्लेटफॉर्म पर उतरते ही वह बच्चा अपने बाप की गोद से उतर कर दौड़ता हुआ आगे बढ़ गया। ठगे से वे देखते ही रह गये।
   मैं कहना चाहती हूँ कि हाँ, ऐसा होता होगा, लेकिन इसकी सही जानकारी कैसे हो कि ‘भूख-भूख‘ कह कर हाथ पसारने वाला हर बच्चा वैसा ही शातिर होगा। कुछ तो सचमुच भूखे होते होंगे न! उन्हें कैसे पहचाना जाये ? इन्हें भूखा छोड़ देने से ये भी तो हो सकता है कि ये इन्सानियत से दूर होकर दुनिया से बदला लेने की कुप्रवृत्ति में फँस जायें। चोरी, गुण्डागर्दी किसी भी राह पर जा सकते हैं ये। इन्हें कोई रास्ता दिखाये बगैर इनके भूख को नकार कर आगे बढ़ जाने से तो इस समस्या का समाधान नहीं होगा न! कोई छोटा-मोटा काम भी तो नहीं दिया जा सकता है इन्हें। बालश्रम कानूनन अपराध है। कोई कैसे करे इनकी मदद! न इन्हें भीख देनी चाहिए न कोई काम। भूख मिटे तो कैसे! खुद्दारी सीखें तो कैसे!
   “अन्नदान महादान की श्रेणी में आता है” माँ अकसर कहा करती थीं।
भूखे के भूख को नकार देना पाप की किस श्रेणी में आता होगा? 
   सामने की सीट पर बैठे लोग भोजन कर रहे हैं। पति मुझसे कुछ कह रहे हैं। मैं ध्यान देती हूँ -
   “इन लोगों का भोजन हो जाये तो हम लोग भी भोजन करके सीट गिरा लेंगे। वैसे भी पौने नौ बज गए हैं .... खा-पीकर सो जाना चाहिए।”
   मैं ‘हाँ‘ में सिर हिलाती हूँ। सामने बैठे लोग बचा हुआ भोजन पेपर में लपेट रहे हैं। आठ-दस पराठा, दो व्यक्ति खा सकें इतनी सब्जी, अचार। बहुत भोजन बच गया है इनका। अब इसका क्या करेंगे! शायद रख लें, सुबह के लिए।
   भोजन पेपर में लपेट कर उन्होंने खिड़की  खोली और बाहर फेंक दिया। उधर पेपर फड़फड़ाता  हुआ नीचे गिरा इधर मैं कुछ चिड़चिड़ा सी उठी -
   “आप कब से अपना पैर लम्बा करके मेरी सीट पर टिका कर बैठे हैं। ये भी नहीं सोच रहे हैं कि मुझे कितनी असुविधा हो रही होगी।”
   बड़ी तत्परता से सामने बैठे व्यक्ति ने अपने पैर हटा लिये, किन्तु मैं भीतर ही भीतर अब भी झुंझला रही हूँ।
   हम लोग भी अब अपना टिफिन निकाल लिये हैं। पति ने भोजन करना शुरू कर दिया। भूख मुझे भी लगी है किन्तु मन बुझा है। बच्चा अब भी याद आ रहा है।
   ट्रेन दौड़ रही है। उसकी गति से बीच-बीच में खिड़की से खड़खड़ाहट भरी आवाज आ जाती है। मैं चौंक कर खिड़की की ओर देखने लगती हूँ। लगता है जैसे वो बच्चा ही खिड़की को खड़खड़ाकर मुझसे भोजन माँग रहा है। पति पूछते हैं, “तबियत ठीक नहीं लग रही है क्या?” मैं चुप हूँ। भोजन हो जाने के बाद पति सीट बिछा देते हैं - “सो जाओ, दिन भर की थकान होगी। नींद मिल जायेगी तो सुबह अच्छा लगेगा।” मैं अपनी सीट पर लेट जाती हूँ। डिब्बे में कुछ लोग सो चुके हैं तो कुछ लोग सोने की तैयारी कर रहे हैं। बत्तियाँ जलाई-बुझाई जा रही हैं। सामने की तीनों सीट से खर्राटे की आवाज आ रही है।
   मुझे लेटे-लेटे दो घंटे से अधिक बीत गये किन्तु नींद कोसों दूर है मुझसे। रह-रह कर पीछे छूटा स्टेशन याद आ रहा है। उफ! प्रेम का कितना वीभत्स दृय था वहाँ।  और उस वृद्घ का क्रोध!  चलने तक में असमर्थ था किन्तु पत्नी को मारने उठ पडा! .... वह भूखा बच्चा! प्लेटफॉर्म का एक लैंडस्केप बन गया है मेरी आँखों में। पलके मूँद रही हूँ तो वही चित्र दिखाई दे रहा है।
   वातावरण में गर्मी नहीं है किन्तु, मेरी गरदन के चारों ओर पसीना हो आया है। मैं उठ कर खड़ी हो जाती हूँ - मुँह - हाथ धोकर आऊँ तो शायद कुछ राहत मिले।
   वॉश-वेसिन के पास एक दो लोग खड़े हैं। एक बूढा  टॉयलेट के गेट से एकदम सट कर लेटा है। बूढे ने करवट बदली। अब मैं उसका चेहरा देख पा रही हूँ। ... अरे ये! ... ये भी तो उसी स्टेशन पर भीख माँगते हुए दिखा था मुझे। ... मेहनत और खुद्दारी का सुख शायद ये जानता ही नहीं तभी तो चैन से लेटा है टॉयलेट के सामने। ... वो लड़का भी कहीं ऐसे ही न बिता दे अपनी जिन्दगी! ... उसे भीख में कुछ न देने का पति का निर्णय सही  था क्या! ... यह बूढा उस लड़के का भविष्य है! ... वह लड़का इस बूढे का अतीत!
   मैं बेसिन में हाथ-मुँह धोती हूँ। दुबारा बूढ़े की ओर देखे बिना ही वापस अपनी सीट पर आ जाती हूँ। बड़ी उलझन के बाद देर रात तक सो ही जाती हूँ मैं। सुबह पति ने आवाज दी, “उठो, थाणे निकल गया, थोडी देर में दादर आ जायेगा।”
   हम ट्रेन से उतरने के लिए तैयार हैं। वह बूढा भी दादर स्टेान पर उतरने के लिए ठीक मेरे पीछे खड़ा है। स्टेशन पर उतर कर हम लोग अपना बैग खींचते हुए कुछ कदम आगे बढ़े ही थे कि उस बूढे के चिल्लाने की आवाज आई। पलट कर देखा तो वह आठ-नौ साल के एक बच्चे को गन्दी-गन्दी गालियाँ देता हुआ उसे खदेड़ रहा है। बच्चा हम लोगों के पास आ गया तो बूढा उलटे कदम लौट गया। कुछ कदम आगे बढ़ कर वह बच्चा भी उस बूढे को उतनी ही तेज आवाज में, उतनी ही भद्दी गाली दिया। बच्चे की गाली बूढे तक पहुँची या नहीं ये तो पता नहीं किन्तु बदला ले लेने का सन्तोष बच्चे के चेहरे पर तैर गया। अब वह मुझसे कुछ दे देने की मनुहार करते हुए मेरे पीछे-पीछे चलने लगा।
   पति कुछ आगे बढ़ गये हैं। बच्चा मुझसे पैसा माँगते हुए मेरे साथ-साथ चल रहा है।
   मैं टिकट निकालने के लिए पर्स खोलती हूँ बीस का एक नोट हाथ में आ जाता है। मैं उसे बच्चे को पकड़ा देती हूँ। बच्चा नोट पाकर खुश हो जाता है और मेरा साथ छोड़ देता है।
   मैं आश्चर्य में हूँ। यह कैसे सम्भव हुआ!  मैंने तो टिकट निकालने के लिए पर्स खोला था, नोट निकाल कर बच्चे को कैसे पकड़ा दी मैं! क्या यह घूंटी में पिलाया माँ का संस्कार था! उस लड़के को पैसा देते ही बेचैनी कुछ कम कैसे हो गई...!
   वैसे एक प्रश्न अब भी मेरे साथ बना है कि पैसा देकर मैंने उस बच्चे की भूख मिटाई या उसे उस बूढे जैसा जीवन दिया।

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