कफ़न: प्रेमचंद के आदर्शों का कफ़न?

प्रमोद कुमार यादव

शोधार्थी, हिंदी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय
चलभाष:+91 837 609 0824; ईमेल: pramod26487@gmail.com



प्रमोद कुमार यादव
        
हिंदी साहित्य में लोकप्रियता की दृष्टि से गोस्वामी तुलसीदास के बाद प्रेमचंद का स्थान है। प्रेमचंद हिंदी कथा-साहित्य के ऐसे सशक्त, प्राणवान और लोकप्रिय कथाकार हैं, जिनका साहित्य जन-जन को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। नि:संकोच इस बात को कहा जा सकता है कि आजादी-पूर्व और आजादी के पश्चात् भी हिंदी साहित्य में कोई दूसरा लेखक इस हद तक लोकप्रिय और विख्यात नहीं हो सका जितना प्रेमचंद हुए।  उनके कथा साहित्य की लोकप्रियता सिर्फ भारत के गाँवों, शहरों, नगरों एवं महानगरों सीमित नहीं है बल्कि गांव और देहातों की गलियों से लेकर विदेशों में भी उनके रचनात्मक पात्रों की मनोवृत्तियों की अनुगूँज सुनाई पड़ती है।
          प्रेमचंद के पात्र ग्रामीण जीवन और परिवेश से समीपता और सघनता के साथ जुड़े हुए हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि प्रेमचंद का अधिकांश समय गाँवों में व्यतीत हुआ था। फलतः गाँवों के जीवन और वहाँ की विभिन्न समस्याओं को उन्हें नजदीक से देखने-समझने का अवसर प्राप्त हुआ।  खेतों-खलिहानों में काम करने वाले कृषक-मजदूरों के भावों, विचारों और मनःस्थितियों तथा उनके शोषित पीड़ित जीवन की कारुणिक गाथाओं  और प्रसंगों के अंकन में उन्हें बेहद सफलता प्राप्त हुई है। ग्रामीण जीवन और उसके बहुविध प्रसंगों और समस्याओं को इतनी बारीकी और गहराई से चित्रित करने वाला हिंदी साहित्य का कोई दूसरा कलाकार आज भी उपलब्ध नहीं है। दुर्भाग्य यह है कि आज भी प्रेमचंद से हमारा परिचय एक दो महत्वपूर्ण उपन्यासों और कुछ चर्चित कहानियों तक सीमित है । बेशक ‘गोदान’ उपन्यास और कफ़न, पूस की रात या ईदगाह जैसी कहानियाँ प्रेमचंद की चरम अभिव्यक्तियाँ हैं, पर जिन राहों से गुजरते हुए प्रेमचंद यहाँ तक पहुँचे हैं, जिन पड़ावों पर ठहरे हैं, जिन मोड़ों पर मुड़े हैं, वे भी कुछ कम महत्वपूर्ण नहीं हैं । इसलिए प्रेमचंद का मुकम्मल परिचय उनकी चर्चित-अचर्चित कृतियों के बड़े संसार से गुजर कर ही पाया जा सकता है ।
          प्रेमचंद को हिंदी के युगप्रवर्तक कहानीकार की संज्ञा से विभूषित किया गया है। इनकी कहानियों में इतिहास वर्तमान बनकर झाँकता है और भविष्य की ओर इशारा करता है। इनकी कहानियाँ अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को परखती हैं और समाज तथा देश को आगे की रणनीति तैयार करने का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं। मनोरंजन के साथ-साथ उनकी कहानियाँ रोमांच भी पैदा करती हैं। यहाँ पर वर्णन के लिए मैंने प्रेमचंद की कालजयी कहानी ‘कफ़न’ को अपना आलोच्य विषय-वस्तु बनाया है। जीवन के अंतिम दिनों में रचित प्रेमचंद की कहानियों में ‘कफ़न’ (1936) एक अद्भुत एवं कालजयी कहानी है।
          यहाँ कहानी के बारे में भी थोड़ा जानना समीचीन होगा। ‘कफ़न’ प्रेमचंद की आखिरी कहानी है, जो मूल रूप से उर्दू में लिखी गयी थी। यह ‘जामिया मिल्लिया इस्लामिया’ की पत्रिका ‘जामिया’ के दिसंबर, 1935 के अंक में प्रकाशित हुई। इसका हिंदी रूप ‘चाँद’ पत्रिका के अप्रैल, 1936 में प्रकाशित हुआ। कुछ आलोचकों का ऐसा मत है कि कफ़न हिंदी की मौलिक कहानी नहीं है, बल्कि उर्दू का तर्जुमा है।
          ‘कफ़न’ कहानी का कथासार इस प्रकार है: घनी रात में झोपड़ी के निकट बुझते हुए अलाव के पास घीसू और उसका बेटा माधव बैठे हैं। झोपड़ी में से माधव की स्त्री की प्रसव-वेदना की कराहें सुनाईं पड़ती हैं। जाति के वे घृणित चमार हैं और उस पर से वे गाँव में अत्यंत आलसी के रूप में प्रसिद्ध हैं। “विचित्र जीवन था इनका। घर में मिट्टी के दो-चार बर्तनों के सिवा कोई संपत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जिए जाते थे। संसार की चिंताओं से मुक्त। कर्ज से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई गम नहीं। दीन इतने कि बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ कर्ज दे देते थे। मटर, आलू की फसल में दूसरे के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पाँच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते।”[1]
          अपने तुच्छ जीवन के विषय में घीसू को याद है कि बीस वर्ष पहले जमींदार के घर शादी के अवसर पर उसने भरपेट भोजन किया था।
          पके हुए आलू खाकर वे वहीं जमीन पर सोने का प्रयत्न करते हैं। सुबह पता चलता है कि माधव की स्त्री मर गई। घीसू जमींदार के पास जाता है और दीनता से उसके अंतिम संस्कार के लिए रुपए माँगता है। जमींदार घृणा के साथ उसके सामने दो रुपये फेंक देता है। उसके बाद गाँव के धनी लोगों का चक्कर लगाकर घीसू कुल पाँच रुपए इकट्ठा करता है।
          दोपहर बाद घीसू और माधव मृतक के लिए कफ़न खरीदने निकलते हैं। बाज़ार पहुँचकर वे शराब की दुकान में चले जाते हैं और सब रुपए खा-पी जाते हैं। पिता और पुत्र एक दूसरे को दोष देते हैं कि मृतक के अंतिम संस्कार के लिए कफ़न खरीदने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं है। प्रशंसा-भरे शब्दों में माधव की स्त्री की चर्चा करते हैं, जो उन्हें समय पर खाना बनाकर देती थी और पीने को भी देती थी। नशे में वे गाते हैं, नाचते हैं और लड़खड़ाकर गिर पड़ते हैं। दरअसल, कहानी पाठक मन को न केवल घायल ही कर डालती है, बल्कि उसे लहूलुहान भी कर देती है।
          प्रेमचंद के अन्य सभी नायकों से माधव और घीसू बिलकुल भिन्न हैं। यदि सामाजिक परिस्थितियों पर विचार किया जाए तो लेखक के सामान्य सिद्धांतों के अनुसार वे अवश्य ही सकारात्मक नायक हैं, परन्तु वे वैसे सकारात्मक नायक नहीं हैं, जैसे पहले की कहानियों में दीखते हैं। अपने पहले के नियमों के विपरीत इस कहानी में लेखक चरित्रों में सकारात्मक आचरण आरोपित नहीं करते और न उनकी आतंरिक निष्कलंकता को रेखांकित करते हैं। यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि वे वैसे मानव के आदर्श रूप नहीं हैं, जैसे प्रेमचंद के अन्य सकारात्मक नायक थे।
          घीसू और उसके पुत्र माधव आलसी थे। वे उससे अधिक काम नहीं करते, जितना जीने के लिए अत्यंत जरूरी था। काम करने के बजाय किसी के खेत से चुरा लेना उन्हें अधिक पसंद था। वे स्त्री के दुःख से उदासीन हैं। स्त्री के साथ सहानुभूति करने की तुलना में भुने हुए आलू खाकर अपनी भूख बुझाने की माधव की भावना अधिक शक्तिशाली है। जब घीसू रुपया माँगने जमींदार के पास जाता है तो दिल खोलकर उसकी चापलूसी करता है। उसके ह्रदय में करुणा जगाने की कोशिश में वह झूठ बोलने से नहीं हिचकता। वही घीसू बाद में शराब की दुकान पर कहना शुरू करता है कि उन्होंने सब रुपए गँवा दिये, कफ़न इसीलिए नहीं खरीदा। थोड़े में कहें तो दोनों नायक कहीं से भी अच्छी प्रकृति के नहीं हैं।
          फिर भी घीसू और माधव बुरे चरित्र नहीं हैं। वे प्रदर्शित करते हैं कि सामाजिक परिस्थिति कितनी दुखदायी है। प्रेमचंद स्वीकार करते हैं कि स्वयं नायक इसके लिए सबसे कम दोषी हैं, पर वह अपने सदाचार की डींग नहीं मार सकते। उनकी जीवन-पद्धति और कार्यकलाप सभी स्वीकृत मानकों के लिए एक विलक्षण चुनौती है। वे दास होना नहीं चाहते, न वे स्वामी बनाना चाहते थे और संभवतः उनकी इच्छा थी कि वे किसी प्रकार थोड़े सज्जन बन जाएँ। और यहाँ से स्वेच्छाचारिता, अराजकता और जीवन भर निरंतर कमरतोड़ परिश्रम करने वालों के विरुद्ध आरंभ हो जाती है; इसके बावजूद कि उनकी भावनाएँ विषम हैं, घीसू और माधव के पास जीवन-पद्धति और विचार की सर्वमान्य स्वतंत्रता थी और अंततः उनकी मानवतापूर्ण भावनाएँ समाप्त नहीं हुई थी।
          दरअसल, कफ़न कहानी प्रेमचंद की अन्य कहानियों से एकदम भिन्न है। उनके कहानी-संसार से इसका संसार सर्वथा निस्संग है, इसलिए उनकी कहानियों से परिचित लोगों के लिए यह अनबूझ पहेली हो जाती है, प्रेमचंद के संबंध में बनी पूर्ववर्ती धारणा के आगे प्रश्नचिह्न लगा देती है। यह मूल्यों के खंडहर की कहानी है। आधुनिकता के सारे मुद्दे इसमें मिल जाते हैं। यह तो आधुनिकताबोध की पहली कहानी है। यही कारण है कि कुछ विद्वान इसे प्रगतिवादी कहते हैं तो वहीं डॉ. इंद्रनाथ मदान का कहना है, “कहानी जिस सत्य को उजागर करती है वह जीवन के तथ्य से मेल नहीं खाता।”[2] कफ़न प्रेमचंद की जिंदगी के उस बिंदु से जुड़ी हुई कहानी है आगे कोई बिंदु नहीं होता। डॉ. बच्चन सिंह ने लिखा है कि, “यह उनके जीवन का ही कफ़न नहीं सिद्ध हुई बल्कि उनके संचित आदर्शों, मूल्यों, आस्थाओं और विश्वासों का भी कफ़न सिद्ध हुई।”[3] जबकि डॉ. परमानंद श्रीवास्तव का कहना है कि, “... कफ़न हिंदी की सर्वप्रथम नयी कहानी है, वह पूर्णतः आधुनिक है क्योंकि उसमें न तो प्रेमचंद का जाना-पहचाना आदर्शोन्मुख यथार्थवाद है, न कथानक संबंध पूर्ववर्ती धारणा है, न गढ़े-गढ़ाये इंस्ट्रुमेंटल जैसे पात्र हैं, न कोई परिणति, न चरमसीमा, न छिछली भावुकता और अतिरंजना और न कोई सीधा संप्रेष्य वस्तु। वह लेखक के बदले हुए दृष्टिकोण और कहानी की बदली हुई संरचना का ठोस उदाहरण है।”[4]  
          प्रेमचंद जी द्वारा ‘कफ़न’ कहानी में घीसू और माधव को निकम्मा, कामचोर, गरीब और फटेहाल, कर्ज़दार परंतु सांसारिक चिंताओं से मुक्त, प्रसव-वेदना से चीखती औरत को मरने देना और कफ़न के पैसे से शराब पीते हुए दिखाने के कारण दलित लेखक इस कहानी और कहानीकार दोनों को दलित-विरोधी मानते हैं, लेकिन किसी काल्पनिक कहानी में किसी पात्र के अवगुणी अथवा गुणी होने से समाज में उसकी जाति के सभी लोग अवगुणी या गुणी कैसे हो सकते हैं? कहानी कल्पना से जन्मती है, उसके पात्र काल्पनिक होते हैं, अतः किसी पात्र का चरित्र उसकी जाति-धर्म  का प्रतिरूप नहीं हो सकता।
          कुछ दलित लेखक प्रेमचंद पर दलित-विरोधी होने का आरोप लगाते हैं। उनके लेखन को सहानुभूति और स्वानुभूति को मानक मानकर ख़ारिज करते हैं। “यदि प्रेमचंद की सहानुभूति दलितों से न होती, तो वे दलित समस्या को न समझ पाते और न दलित आन्दोलन का समर्थन करते। प्रेमचंद के पास दलित जीवन की स्व-अनुभूति नहीं थी, यह सच है। इस दृष्टि से वे दलित लेखक नहीं हैं। पर, जिस समाज में वे साँसे ले रहे थे, वहाँ अस्पृश्यता, जातिभेद और सामंतवादी व्यवस्था की क्रूरता को वे रोज अनुभव करते थे। उनका सारा लेखन इसी अनुभव से निकलता है।”[5]सिर्फ इस आधार पर प्रेमचंद के लेखन को ख़ारिज कर देना कि वे दलित नहीं हैं और उनका लेखन स्वानुभूति की उपज है, तार्किक नहीं है।
          यह स्पष्ट करते हुए कि किस प्रकार समाज का निर्माण किया जा सकता है, कहानी में लेखक कहते हैं: “जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज्यादा संपन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज्यादा विचारवान था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाजों की कुत्सित मंडली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी कि बैठकबाजों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मंडली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फायदा तो नहीं उठाते।”[6]
          सच्चाई ये है कि “प्रेमचंद का सरोकार सत्याग्रह-युग के नैतिक मानस से है। नतीजा यह हुआ कि उनके द्वारा प्रस्तुत किया गया सामाजिक यथार्थ कटुतर और अधिक नंगा होता गया, जहाँ भीतर का संघर्ष उबलकर बाहर आता गया। एक नैतिक मूल्य-निष्ठा, चाहे वह किसान हो, स्त्री हो, दलित हो- इन सभी ने लगातार प्रेमचंद को प्रेरणा दी।”[7]
         
          ‘कफ़न’ कहानी यह सिद्ध करती है कि लेखक जनता के जीवन का बुद्धिमत्तापूर्ण मूल्यांकन करते हैं। रचना के प्रारंभ में प्रेमचंद ने कृषक जीवन को आदर्श माना और बाद में वे साधारण जनता के मानवीय गुणों को अत्यंत आदर्श रूप में बहुधा चित्रित करने लगे। इन अंतिम कहानियों में, जो उनकी मृत्यु के कुछ पूर्व रची गई, आदर्श के चिह्न नहीं हैं। इनके पृष्ठों से जीवन के कठोर सत्य फूट निकलते हैं।                                                                                                  
संदर्भ


[1] सं. कमल किशोर गोयनका, प्रेमचंद: संपूर्ण दलित कहानियाँ, संस्करण: 2016, सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-468
[2] कफ़न (कथा-संग्रह): https://hi.wikipedia.org/wiki/कफन_(कथासंग्रह); 17 अप्रैल 2018 को देखा गया|
[3] वही
[4] वही
[5] सं. मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, रेखा अवस्थी, प्रेमचंद: विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता’, पहला संस्करण: 2006, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-499
[6] सं. मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, रेखा अवस्थी, प्रेमचंद: विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता’, पहला संस्करण: 2006, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-309
[7] कमल किशोर गोयनका (सं.), प्रेमचंद: संपूर्ण दलित कहानियाँ, संस्करण: 2016, सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ-9

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